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Monday, June 30, 2008

प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद

वे सनातनी हिन्‍दू हैं। पर वे हिन्‍दुत्‍व के समर्थक नहीं हैं। उन्‍हें बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और गुजरात में राज्‍य के समर्थन से की गई हिंसा से सख्‍त विरोध है। चूँकि वे मजबूती से अपनी बात कहते हैं, इसलिए अक्‍सर उन्‍हें विरोध का भी सामना करना पड़ता है। यह हैं प्रभाष जोशी। प्रभाष जोशी भारतीय पत्रकारिता का मशहूर नाम हैं। मैंने पिछले दिनों एक पोस्‍ट किया था ‘यह तैयारी किसके लिए है’। उसके बाद प्रभाष जोशी की जनसत्‍ता में यह टिप्‍पणी पढ़ी। यह टिप्‍पणी मेरे पोस्‍ट से किसी न किसी रूप में जुड़ती है, और विचार के लिए कई मुद्दे उठाती है। इसलिए यहाँ जनसत्‍ता से साभार पेश कर रहा हूँ।

प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद

हिंदू आतंकवादी और हिंदू आतंकवादी संगठन पढ़ने में ही कितना अटपटा लगता है। लेकिन मुंबई में आजकल यही पढ़ रहा हूँ। क्या महाराष्ट्र और महाराष्ट्रियनों में ही ऐसा कुछ है कि वे इस तरह की व्यर्थ और सिरफिरी हिंसा की तरफ खिंचे चले आते हैं, और प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा की कार्रवाई करते है, जैसी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था के रमेश गडकरी और मंगेश निकम ने की? ऐसा क्यों हुआ कि हिंसक प्रतिशोध को राष्ट्र बनाने की प्रेरणा बता कर हिंदुत्व का सिद्घांत निकालने वाले विनायक दामोदर सावरकर भी यहीं हुए और उनके वाहियात शिष्य बाला साहेब ठाकरे भी यहीं विराज रहे हैं? महाराष्ट्र वीरों की भूमि है और शिवाजी महाराज प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा का गान और अमल करने वाले तो कभी नहीं थे। फिर क्या ऐसी हिंसा को वीरता समझने वालों की एक कमजोर प्रवृत्ति यहाँ चलती आई है। बहुत पीछे नहीं कोई सौ सवा सौ साल पहले ही यहाँ सावरकर हुए। बचपन में मस्जिद पर पत्थर फेंकने से लेकर अभिनव भारत समाज जैसे तथाकथित क्रांतिकारी संगठन उनने बनाए। मदनलाल ढींगरा से सर विलियम कर्जन विली को मरवाने से लेकर नाथूराम गोडसे से महात्मा गांधी तक की हत्या करवाने के पुण्य कार्य उनने किए। दुनिया भर में वीर और क्रांतिकारी वे कहे जाते है जो खुद शस्त्र उठाते हैं और या तो फांसी पर झूल जाते हैं या लड़ते हुए मारे जाते हैं। अपने स्वातंत्रय वीर और क्रांतिकारी सावरकर ने हमेशा दूसरों के हाथ पिस्तौल थमाई और खुद दूर खड़े छल कपट से बचते रहे। और आखिर अस्सी पार करने के बाद बिस्तर पर बुढ़ापे से मरे। बदले की भावना और साजिश से भारत को स्वतंत्र करवाने का उपदेश देने वाले सावरकर को वीर और क्रांतिकारी तो वही मान सकते हैं जो जानते नहीं कि वीरों की हिंसा क्या होती है। इन वीर सावरकर के दो बड़े शिष्य अपने राजनीतिक जीवन में हैं। एक बाला साहेब ठाकरे और दूसरे लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी।

हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था बाला साहेब ठाकरे या उनकी शिवसेना की बनवाई हुई नहीं है। पुलिस को इनके विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े होने या प्रेरित होने के सूत्र भी नहीं मिले है। कहते हैं कोई छह साल हुए एक सभा हो रही थी जिसमें हिंदू देवी देवताओं की निंदा की जा रही थी किसी एक श्रोता ने खड़े होकर इसका विरोध किया। उसे चुप कर दिया गया। लेकिन उसने हिंदू संस्थाओं को इकट्ठा किया और ऐसे सब मौकों पर हिंदू विरोध दर्ज करने के लिए यह हिंदू जन जागृति समिति बनाई। एक सूचना कहती है कि उसे डॉक्टर जयंत आठवले ने बनाया।

इसी से सनातन संस्था भी जुड़ गई जो पनवेल के देवगाँव इलाके से सनातन संकुल आश्रम से चलती है। गुरूकृपा प्रतिष्ठान इस संकुल को चलाता हैं सनातन संस्था कोई अठारह साल से चल रही है। उसका दावा है कि वह सामाजिक कार्य, सत्संग और ध्यान योग ओर आध्यात्मिकता की तलाश में लगे लोगों की संस्था है। महाराष्ट्र भर के पढ़े लिखे लोग दुनियादारी छोड़ कर यहाँ समाज सेवा करने और आध्यात्मिकता में जीने को आते हैं। संस्था हिंदू धर्म और देवी देवताओं के अपमान का विरोध करती हैं। लेकिन हम शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं। रमेश गडकरी हमारे यहाँ रहता था, लेकिन बम बनाने और फोड़ने की आतंकवादी हरकतों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।



ऐसा लगता है कि हिंदू जन जागृति समिति सनातन संस्था के लोगों ने बनाई है और जमीन से ज्यादा इसकी उपस्थिति ऑन लाइन हैं। इसका कोई मुख्यालय कहीं दिखाई नहीं देता। इसका उद्देश्य हिंदू धर्म की निंदा करने और बदनाम करने वालों के विरुद्घ विश्व भर के हिंदुओं को एक और संगठित करना है। अभी इसका वैश्चिक एजंडा हॉलीवुड फिल्म लव गुरु का विरोध करना और गोवा में स्कूल की किताबों से हिंदू विरोधी उद्घरण हटवाना और रामसेतु की रक्षा करना है। ये दोनों संस्थाएँ मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों का विरोध करती रही हैं। जोधा अकबर फिल्म में इन्हें हिंदू देवी देवताओं का अपमान दिखा और मराठी नाटक आम्ही पाचपुते में महाभारत और उसके पात्रों का मखौल उड़ते लगा। हिंदुओं की भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले ऐसे नाटक, फिल्म, चित्र आदि का विरोध करना इन संस्थाओं के लोगों को अपना काम लगता है।

अब महाराष्ट्र पुलिस ने जिन रमेश गडकरी, मंगेश निकम, विक्रम भावे और संतोष आंग्रे को गिरफ्तार किया है वे जोधा अकबर और आम्ही पाचपुते जैसी फिल्म और नाटक का शांतिपूर्ण विरोध करने तक ही नहीं रुके। उनने बम बनाए और जिन हॉलों में यह फिल्म दिखाई और नाटक खेला जा रहा था वहां उन्हें फोड़ा। वाशी नवी मुंबई के विष्णुदास भावे ऑडिटोरियम में इकतीस मई को और ठाणे के गडकरी रंगायतन में चार जून को इनने जो बम फोड़े उनमें से नवी मुंबई में तो कुछ नहीं हुआ पर ठाणे में सात लोग घायल हुए। इसके पहले फरवरी में नए पनवेल के एक सिनेमाघर में भी अनगढ़ बम फोड़ा गया था जहाँ जोधा अकबर फिल्म दिखाई जा रही थी। वहाँ भी कोई हताहत नहीं हुआ था, बम बनाने और फोड़ने की इनकी करतूतों को देखते हुए साफ है कि न तो इन्हें भयंकर मारकर बम बनाना आता है न ये उनसें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाना जानते हैं।

फिर भी समाज सेवा और अध्यात्म में लगी संस्था के ये लोग बम बनाने और फोड़ने जैसे आतंकवादी अभियान में कैसे और क्यों लग गए। सबसे मजेदार किस्सा रमेश गडकरी का है। समिति और संस्था के ये पचास साल के सेवक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किए हुए हैं और अभी आठ साल पहले तक सफल दुकानदार थे। अंधेरी में उनकी दुकान थी। वे संस्था के सेवकों के संपर्क में आए। उनके काम और उपदेशों का उन पर ऐसा असर पड़ा कि उनने अपनी दुकान बेच दी और जो पैसा मिला उसे बैंक में रख दिया जिसके ब्याज से उनका घर चलता है। उनकी पत्नी नीला भी उनके साथ संस्था की सेविका हो गई। तीन साल पहले इन दोनों ने सांगली का अपना घर भी छोड़ दिया और पनवेल में सनातन संस्था के संकुल आश्रम में आकर रहने लगे। तब तक गडकरी को बम बनाने और फोड़ने में न तो कोई रुचि थी न जानकारी न अनुभव। उनके दोनों दामाद भी सनातन संस्था के सेवक हो गए थे।

आश्रम में गडकरी की मंगेश निकम से जान पहचान हुई जो धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। मंगेश निकम ने कुएँ खोदने वाले एक व्यक्ति से गोला-बारूद मिलाना और विस्फोट करना सीखा था। यही जानकारी बम बनाने के काम भी आई। गडकरी और निकम ने आम्ही पाचपुते मराठी नाटक के विरुद्घ विरोध प्रदर्शन किया था। सतारा के रहने वाले निकम अब गडकरी के साथ मिल कर इस नाटक से होने वाले अपमान का बदला लेना चाहते थे। निकम बम बनाने की सामग्री अमोनियम नाइट्रेट, विस्फोटक, र्छे आदि लेकर आया और उनने सनातन संकुल आश्रम के एक कमरे में बम बनाया। गड़करी गुरुकृपा प्रतिष्ठान की मोटरसाइकिल से बम लेकर निकला, आश्रम की लॉग बुक में उसकी मोटरसाइकिल का नंबर और उसका निकलना दर्ज था। ठाणे के गड़गरी रंग आयतन की पार्किग में ले जाकर रमेश गड़गरी ने गाड़ी खड़ी की वहाँ की लॉग बुक में भी इसी मोटरसाइकिल का नम्बर दर्ज था। आतंकवादी विरोधी दस्ता इन लॉग बुकों के जारिए ही रमेश गडकरी तक इन गतिविधियों से अनजान बता कर उनसे पूरी तरह अलग किया है। और दावा किया है कि उसने आतंकवादी विरोधी दस्ते की खोजबीन में मदद की है। मंगेश निकम ने बम बनाने और फोड़ने में जिन दूसरे लोगों की मदद की थी उनमें से विक्रम भावे और संतोष आंग्रे भी पकड़े गए हैं। रायगढ़ जिले के पेन के रहने वाले विक्रम भावे भी सनातन संकुल आश्रम में आकर रहने लगे थे। वहीं उनकी बम बनाने वाले निकम और गडकरी से मुलाकात हुई थी। संतोष आंग्रे तो आश्रम में ड्राइवर का काम करता था। इनने पनवेल के एक सिनेमा घर में बम रखा था, जिसका विस्फोट नहीं हुआ। रत्नागिरी में एक ईसाई उपदेशक के घर के बाहर भी इनने बम रखा था, जिससे कोई नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन उसमें निकम और दूसरे लोग पकड़े गए थे जो इस साल सत्रह अप्रैल को कोर्ट से छूटे।

इन लोगों की ये सभी कोशिशें देखी जाएँ तो साफ हो जाता है कि न तो ये शातिर पेशेवर अपराधी हैं न इन्हें ठीक से बम बनाना और उन्हें मंजे हुए आतंकवादी की तरह जानमाल के ज्यादा से नुकसान करने के साथ फोड़ना आता है। ये निश्चित ही अपने धर्म और देवी देवताओं के अपमान के विरोध में प्रदर्शन करते हुए हिंसा के रास्ते चले गए और वैसे ही काम करने लगे जैसे सिख और मुसलिम आतंकवादियों ने इस देश में किए हैं। लेकिन इनकी अनुभवहीनता और जानमाल का नुकसान न पहुँचा पाने की मारक अक्षमता इनके अपराध को कम नहीं करती न यह बताती है कि इनके इरादे नेक थे। इनकी संस्थाओं ने इनके कुकर्मों से अपने को अलग करते हुए भी कहा है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाना बंद होना चाहिए।

लेकिन बाला साहेब ठाकरे के अखबार सामना ने बाकायदा एक संपादकीय लिख कर इन कोशिशों को मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद बताया है। संपादकीय ने कहा है कि हमने जब सुना कि हिंदू लोग भी बम बनाने लगे हैं तो हमें खुशी हुई। लेकिन क्या तो ये घामड़ बम और कहाँ ये फोड़े गए। ठाणे में जो सात घायल हुए वे हिंदू ही हैं। हिंदुओं को खूब ताकतवर बम बनाने चाहिए और उन्हें ठाणे और नवी मुंबई में बन रहे छोटे-छोटे पाकिस्तानों में फोड़ना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवादियों के मारक बमों का जवाब दिया जा सके। लेकिन इनसे भी हिंदुओं और हिंदुत्व की सही रक्षा नहीं होगी। भारत में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इसलामी आतंकवादियों का राज है और वहाँ पुलिस भी जाने से डरती है। हिंदू संगठनों को जैश, अल कायदा और हिजबुल जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों से सीखना चाहिए। अपने ऐसे आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए कि वे भारत में बने छोटे-छोटे पाकिस्तानों को नष्ट करके उनमें और मुसलमानों में दहशत फैला सके।

यानी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था वाले कितना ही कहें कि वे शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं और पकड़े गए बम बनाने और फोड़ने वालों की करतूतों से उनका कोई लेना-देना नहीं है, शिवसेना चाहती है कि वे बड़ा आतंक मचा देने वाले संगठन हो जाएँ। सामना को शर्म है तो इस बात की कि इन मूखरे ने क्या तो घामड़ बम बनाए और कहां ले जाकर उन्हें फोड़ा। सामना चाहता है कि आतंक मचाने और हिंसा करने में इन हिंदू संगठनों को इस्लामी आतंकवादी संगठनों से भी ज्यादा चतुर, चुस्त और चाक चौबंद होना चाहिए। हम सब सभी किस्म के आतंकवाद को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन शिवसेना हिंदुओं को आतंकवाद में अव्वल और सक्षम बनाना चाहती है। अब बेचारे वेंकैया नायडू कह रहें हैं कि हमें अपने राज्य को मजबूत करना चाहिए ताकि वह आतंकवाद से निपट सके। सामना कहता है किसका राज्य ? हिंदुओं को वीर और हिंसक होना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवाद से निपट सकें।

वेंकैया नायडू को संघ से पूछना चाहिए। क्या वह भी हिंदुओं को वीर और हिंसक नहीं बनाना चाहता ? सावरकर और हेडगेवार और गोलवलकर क्या कह गए हैं ? संघ क्या सिखाता है?

Wednesday, June 18, 2008

यह तैयारी किसके लिए है

यह तैयारी किसके लिए ? किसके खिलाफ ? किसकी हिफाजत के लिए ? क्‍यों और कौन लोग कर रहे हैं? एक चैनल के जरिए खबर आई कि इंदौर में सरेआम राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के कार्यकर्ता एक पार्क में हवाई फायरिंग कर रहे थे। एक-दो नहीं बल्कि कई। जाहिर है, ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज़ सुनाई दी होगी तो आस-पड़ोस के लोग खुशी से झूम नहीं उठे होंगे। डर ही गए होंगे। तो ये किसे डराया जा रहा है ? यह तैयारी किनके खिलाफ काम आएगी ?

इससे पहले भी, उत्‍तर प्रदेश के कई शहरों में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कैम्‍पों में त्रिशूल को सही पकड़ने और लड़कियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिए जाने की खबर आई थी।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि रक्षा मंत्रालय ने सीमा की हिफाजत का जिम्‍मा संघ परिवार को आउटसोर्स कर दिया है। भई आउटसोर्सिंग का जमाना है, कुछ भी मुमकिन है। सीमा की हिफाजत नहीं, तो हो सकता है, शहर और मोहल्‍ले की हिफाजत का जिम्‍मा मिल गया हो। लेकिन सवाल फिर वही, किससे, किसकी हिफाजत ? कौन है भई ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि वैसी ही हिफाजत की तैयारी हो, जैसा गुजरात नाम के राज्‍य में कभी हुआ था। गुजरात का नाम सुनकर भड़किए मत। बस बात जल्‍दी समझ में आ जाए इसीलिए नाम लिया। असल में स्‍कूल में उदाहरण सहित बताएँ या समझाएँ- वाला सवाल बहुत आता था। वही आदत बनी हुई है। खैर, यह क्‍यों कर रहे हैं, इनके दिल की बात राम ही जानें।

पर राम का नाम लेकर यह क्‍या-क्‍या हो रहा है। एक और खबर आई है, कि महाराष्‍ट्र के आतंक विरोधी दस्‍ते ने ठाणे और नवी मुम्‍बई के दो ऑडिटोरियम में बम धमाका करने के इलजाम में दो और दो, चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इन सबका जुड़ाव सनातन संस्‍था और हिन्‍दू जनजागृति समिति से है। यह हिन्‍दुत्‍व वाले हैं। (हिन्‍दू मजहब और हिन्‍दुत्‍व में फर्क है। यही जनाब वीर सावरकर समझाते हैं और मैं उनसे राज़ी हूँ।) इससे पहले भी नासिक में दो बजरंग दली बम बनाते मारे गए थे।

फिर वही सवाल कि बम किसके लिए बन रहा था/है और किन पर बम फेंका जाता/जाएगा ? भगत सिंह ने भी बम फेंका था लेकिन बहरों को सुनाने के लिए। उससे किसी को खराश तक नहीं आई थी। हॉं, पूरे मुल्‍क में एक वैचारिक बहस जरूर शुरू हो गई थी। ये तो मरने-मारने वाले बम हैं। किसे मारने का प्‍लान है ? किसे भगाने की योजना है ? कोई बताता ही नहीं।

लेकिन एक बात अटक रही है। ज़रा गौर करें। एक संगठन, जिसके नाम में कहीं मुस्लिम, तो कहीं इस्‍लाम, तंजीम या इदारा जैसे अल्‍फाज हों और इनके कारकुन इंदौर के किसी पार्क में हथियार की ट्रेनिंग ले रहे हों या इस तरह सरेआम फायरिंग कर रहे होते, तब तक क्‍या होता ?

एक और बात, फर्ज कीजिए अगर ठाणे और नवी मुम्‍बई के ऑडिटोरियम में हुए बम धमाकों में किसी इस्‍लामिक मूवमेंट या मुजाहिदीन या जेहादी टाइप नाम वाले संगठन के सदस्‍य पकड़े जाते तो मीडिया और दूसरे जिम्‍मेदार इस खबर को क्‍या वैसे ही लेते जैसे मंगलवार 17 जून 2008 को इनकी खबर को तवज्‍जो दिया गया है। (जनाब, इस दिन का अख़बार और टीवी चैनल खँगाल डालिए शायद ही यह खबर नजर आ जाए।)

क्‍या यह खबर, मिथकों और भ्रांतियों से जूझते समाज का आँख खोलने वाली नहीं होती ? क्‍या इस खबर से यह नहीं होता कि बम किसी मजहब की जागीर नहीं है और खून-खराबे पर किसी का कॉपीराइट नहीं। लेकिन नहीं... भ्रम बना रहे है, यही अच्‍छा है।

लेकिन सवाल तो वहीं रह गया, जहाँ से बात शुरू हुई थी। आखिर यह तैयारी किसके हक में है, किस के खिलाफ ? यानी हम और तुम में समाज बॉंटा जाएगा। है न। तब ही तो दुश्‍मन तैयार होगा। तब ही तो इस तैयारी का इस्‍तेमाल होगा। अब सोचना यह है कि हम और तुम में, हम सब किस पाले में हैं। या हम इससे इतर कोई मजबूत पाला बनाने को तैयार हैं।

Thursday, April 3, 2008

खुदा के लिए Khuda Ke liye, एक जरूरी फिल्‍म

एक खूबसूरत और झकझोर देने वाली फिल्‍म है- खुदा के लिए (Khuda ke liye- In the name of God)।  फिल्‍म कई मायनों में अहम है। यह पाकिस्‍तानी है। इसने पाकिस्‍तानी सिनेमा (Pakistani Film) को फिर से जिंदा कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत-पाकिस्‍तान के बीच एक-दूसरे की फिल्‍मों के दिखाने पर लगी पाबंदी भी,  इसीसे खत्‍म होगी। करीब दो महीने पहले दिल्‍ली में इस फिल्‍म का खास शो देखने का मौका मिला था। पाकिस्‍तान फिल्‍मों की जो छवि दिमाग में बसी है, यह फिल्‍म उसे पूरी तरह तोड़ देती है।

यह तो हुईं ऊपरी बातें। फिल्‍म का तानाबाना 9/11  के आतंकी हमले की पृष्‍ठभूमि में बुना गया है। यह फिल्‍म आज  के समाज के सवाल से टकराती है। यही इस फिल्‍म को खास बनाती है। मुसलमानों की नई और उदारवादी पीढ़ी के कशमकश को जबान देती है।  एक ओर समाज के अंदर पुरातनपंथी  विचार से उसको जूझना पढ़ रहा है तो दूसरी ओर, दुनिया उसे एक खास बने बनाए खाँचे में ही देखना चाहती है। यानी वह आतंक का हरकारा है।  यह पीढ़ी कई ओर से पिस रही है। अंदरूनी समाज उसे अपनी जकड़न में कैद रखना चाहता है तो बाहरी समाज उसमें दुश्‍मन की छवि देख रहा है और अपने से दूर धकेल रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी खींचतान/तकलीफों / तनावों के बीच अपनी जिंदगी गुजार रही है। 

एक मुसलमान परिवार में पैदा होने वाले दो नौजवान भाई, संगीत के सरगम में खो जाना चाहते हैं। तो उनकी राह में एक ओर मजहबी पुरातनपंथी रोड़ा बनते हैं तो दूसरी ओर दुनिया भर चल रही 'आतंक के खिलाफ जंग' उनके ख्‍वाबों पर पानी फेरने को तैयार है। फिल्‍म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।  लेकिन फिल्‍म यही नहीं है। इसमें मोहब्‍बत है, गीत है और खुशनुमा संगीत भी पर कुछ भी बोझिल नहीं।

मुसलमान या इस्‍लाम कोई इकरंगा चीज नहीं है। इनमें भी कई परतें हैं। आमतौर पर बाहरी समाज या अंदरूनी समाज का पुरातनपंथी तबका और मीडिया उसे इकरंगा और अमानुष के रूप में ही पेश करना चाहता है। लेकिन परतों की बात कोई नहीं करता या करना नहीं चाहता। फिल्‍म इन परतों को सामने लाती है और उनके बीच के तनाव को दिखाती है।

इस फिल्‍म में एक और चीज खास है। इसका भारतीय कनेक्‍शन। नसीरूद्दीन शाह इस फिल्‍म में हैं। जैसा कि निर्देशक का कहना है कि जब यह रोल उन्‍होंने नसीरूद्दीन शाह को ऑफर किया तो पहले उन्‍होंने मना किया। फिर स्क्रिप्‍ट माँगी। और स्क्रिप्‍ट पढ़ने के बाद, बिना पैसे के ही काम करने को राजी हो गए। यानी उस रोल में जरूर कुछ खास था। जी!!!

नसीरूद्दीन शाह भी एक मजहबी आलिम हैं लेकिन मजहब का उदारवादी चेहरा। वह मजहब के आधार पर ही पुरातनपंथियों के तर्कों का जवाब देते हैं। यह मजहब की वह आवाज है, जो आमतौर पर पुरातनपंथियों के शोरगुल में दब जाती है या दबा दी जाती है।

फिल्‍म में संगीत, सिनेमाटोग्राफी, अभिनय, लोकेशन का चुनाव और सबसे बढ़कर निर्देशन लाजवाब है। मौका मिले तो इस फिल्‍म को जरूर देखा जाना चाहिए।

Tuesday, September 18, 2007

ओसामा-महात्मा गांधी संवाद

क्‍या आप यह संवाद पढ़ने से चूक गये हैं। ... तो आइये चार हिस्‍सों में पोस्‍ट इस संवाद को इकट्ठा पढि़ये।

नोट- इंग्‍लैंड में बसे भारतीय मूल के विचारक, दार्शनिक लार्ड भिक्खु पारिख राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर, लेबर पार्टी के हाउस आफ लार्ड के सदस्य तथा गांधी पर लिखी तीन पुस्तकों के लेखक हैं। अपने बेबाक विचारों के लिए प्रसिद्ध भिक्‍खु पारिख ने कई ज्‍वलंत विषयों पर अपनी कलम चलाई है। गुजरात में सन् 2002 में हुई हिंसा हो या फिर प्रवासी हिन्‍दुस्‍तानियों की बात, उनकी राय हमेशा अहम रही है।

यहां पेश उनकी रचना अंग्रेजी में सन् 2004 में प्रोस्‍पेक्‍ट में प्रकाशित हुई। हिन्‍दी में इसे गिरिराज किशोर के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका अकार के ताज़ा अंक में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद महेन्‍द्रनाथ शुक्‍ला का है। ढाई आखर को इसके इस्‍तेमाल की इजाजत देने के लिए हम गिरिराज किशोर और प्रियंवद के आभारी हैं।

भूमिका
संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को क्या प्रेरित करता है
?
वे अपने कारनामों के साथ कैसे जीवित रहते हैं? क्या हिंसा के इस चक्रवात का कोई विकल्प है? इसके बारे में सलाह देने के लिए अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से अच्छा और कौन हो सकता है? उनके और ओसामा बिन लादेन का काल्पनिक संवाद दो बातें करने का प्रयास करता है। बिना बिन लादेन के विक्षिप्त दृष्टिकोण को समझे उसका उन्मूलन संभव नहीं है। दूसरा उसके द्वारा ही उसका वैचारिक विकल्प ढूंढ़ा जा सकता है। मेरा बिन लादेन एक बुद्धिजीवी, लाक्षणिक पुरुष है, जो उग्र इस्लामी आतंकवाद का पक्षधर है। उसका वास्तविक बिन लादेन से कोई लेना देना नहीं है।

भिक्खु पारिख

आतंक क्‍यों:ओसामा बिन लादेन-महात्‍मा गांधी संवाद

  1. ओसामा का ख़त महात्मा गांधी के नाम
  2. महात्मा गांधी का ओसामा को जवाब

  3. क्या ओसामा को महात्मा गांधी की बात पसंद आयी
  4. महात्मा गांधी का आखिरी जवाब

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Sunday, September 16, 2007

महात्मा गांधी का आखिरी जवाब

अब आप पढ़ें कि ओसामा की बातों का महात्‍मा गांधी के पास क्‍या जवाब है। इस संवाद के रचयिता हैं दार्शनिक, राजनीतिक विश्‍लेषक लार्ड भिक्खु पारिख यह इस संवाद का आखिरी खत है। इसकी खत की तारीख काफी अहम है। यानी जिस दिन यह खत लिखा गया, वो बिना कुछ कहे काफी कुछ कह जाता है।

आतंक क्‍यों:ओसामा बिन लादेन-महात्‍मा गांधी संवाद 4
भूमिका- संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को क्या प्रेरित करता है? वे अपने कारनामों के साथ कैसे जीवित रहते हैं? क्या हिंसा के इस चक्रवात का कोई विकल्प है? इसके बारे में सलाह देने के लिए अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से अच्छा और कौन हो सकता है? उनके और ओसामा बिन लादेन का काल्पनिक संवाद दो बातें करने का प्रयास करता है। बिना बिन लादेन के विक्षिप्त दृष्टिकोण को समझे उसका उन्मूलन संभव नहीं है। दूसरा उसके द्वारा ही उसका वैचारिक विकल्प ढूंढ़ा जा सकता है। मेरा बिन लादेन एक बुद्धिजीवी, लाक्षणिक पुरुष है, जो उग्र इस्लामी आतंकवाद का पक्षधर है। उसका वास्तविक बिन लादेन से कोई लेना देना नहीं है।
भिक्खु पारिख


प्रिय ओसामा
30 जनवरी 2004

तुमने निम्न चार धारणायें प्रपादित की हैं- पहली, अमरीकी विश्व पर आधिपत्य जमाने के लिए साम्राज्यवादी प्रयास में लगे हैं। दूसरी, मुस्लिम समाज को इस्लाम के वास्तविक सिद्धांतों के अनुसार परवर्तित कर देना चाहिये। तीसरी, अमरीकियों व उनके देशी सहयोगियों को समाज से निकाले बिना ऐसा संभव नहीं है। चौथी, केवल हिंसक आतंकवाद से ही यह हो सकता है।

जहां तक पहला सवाल है, तुम्हारी सोच समस्त अमरीकियों के बारे में सही नहीं है। उनमें से कुछ के बारे में तुम्हारी सोच सही है पर अन्यों के लिये नहीं। कई अमरीकियों ने उनके नाम पर की गई कार्यवाही पर चिंता प्रकट की है। उन्होंने इराक युद्ध का विरोध भी प्रकट किया है। सरकार को समर्थन करने वाले कुछ वर्ग ऐसा कर रहे हैं क्योंकि वे 9/11 की घटनाओं से डरे हुये हैं। उनका विश्वास था कि उनका देश विदेशी आक्रमण से सुरक्षित है। वह विश्वास टूट गया है और उनको भय है कि अभी और आक्रमण भी हो सकते हैं। बुश उनको सांत्वना देते हैं कि उसके विश्व आतंकवाद के विरुद्ध अभियान से ही उन्हें वांछित सुरक्षा मिल सकती है, इसीलिये वे उसका साथ देते हैं। जब तक तुम इसी प्रकार बात करते रहोगे जैसी कि कर रहे हो, वे डरते रहेंगे और बुश की नीति का समर्थन करते रहेंगे। यदि तुम शांति की भाषा बोलते और अमरीकी उन्नतिशील शक्तियों से सम्बन्धित रहते, तो तुम्हारी सफलता की अधिक संभावना थी।

जहां तक कि तुम्हारी दूसरी बात का प्रश्न है, मैं पूरी तरह से उसके विरुद्ध हूँ। मेरा पूर्व तथा वर्तमान का अनुभव मुझको विश्वस्त करता है कि धर्म और राज्य का गठबंधन दोनों को भ्रष्ट कर देता है। जनजीवन में धर्म का एक उचित स्थान अवश्य है। उसी से मनुष्य की आस्था व उद्देश्य संचालित होते हैं परन्तु यह कहना कि राज्य धर्म पर आधारित हो या वह धर्म को बाध्य करे या धर्म के सिद्धान्तों से संचालित हो, बिल्कुल भिन्न बात है। सरकारें बाह्य शक्ति पर निर्भर होती हैं, धर्म स्वतन्त्रता पर और दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। तुम्हारे साथ स्थिति और भी खराब हो जाती है क्योंकि तुम धर्म को अविचल, संकीर्ण और मताग्रही समझते हो न कि खुला हुआ, उदार व सहनशील। तुमको इस कारण एक संकुचित, धर्म प्रधान समाज की बाध्यता हो जाती है, जो व्यक्ति व समाज के हर मसले में दखल देती है। यह धर्म को नष्ट करने का तथा आतंकवादी राज्य स्थापित करने का निश्चयात्मक तरीक़ा है, जिसमें व्यक्ति एक आत्माविहीन कठपुतली बनकर जीवनयापन करता है। क्या तुमने ईरान से, व स्वयं के 'दो पवित्र मस्जिदों के देश'- जैसा तुम सऊदी अरेबिया को कहते हो- की दुर्दशा से कोई सीख नहीं ली? ये दोनों देश धर्म व राज्य को अलग रखने की आवश्यकता का अनुभव करने लगे हैं।

तुम्हारा तीसरा बिन्दु केवल आंशिक रूप से सत्य है। तुमसे विचार विनिमय के बाद मैंने अमरीका की मुस्लिम राज्यों में दखलन्दाज़ी के इतिहास का गहराई से अध्ययन किया। मैं तुम्हारे विचार से आंशिक रूप से सहमत हूं कि तुम्हारे समाज में सार्थक बदलाव के बिना अमरीकी प्रभाव समाप्त नहीं हो सकता। किन्तु अमरीकियों को शारीरिक रूप से भगा देने मात्र से यह आवश्यक नहीं है कि उनके प्रभाव व जीवन मूल्य नष्ट हो जायेंगे। यदि तुम्हारे लोग उनके प्रति आकर्षित रहेंगे। तुम विचारों को विचारों से ही लड़ सकते हो। उसके लिये स्पष्ट रूप से विकसित विकल्प की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त जब तक तुम्हारा समाज विभाजित व अन्यायपूर्ण रहेगा और सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और समरसता से वंचित रहेगा, तब तक वह कमज़ोर रहते हुये विदेशी ताकतों के आधिपत्य व उनकी चालबाज़ियों से बच नहीं पायेगा। विदेशियों और उनके देशी प्रतिनिधियों पर आतंकवादी हमलों से तुम आहलादित भले ही हो जाओ या तुम्हारा दंभ आश्वासित हो जाये, किन्तु उससे कोई दूरगामी लाभ होने वाला नहीं है। तुमको सुधारवादी सक्रिय संगठन बनाना पड़ेगा जो जनता के बीच में काम करे और न्यायोचित तरीक़ों से विपक्ष का सामना करे, साथ ही समाज का सुधार कर सके। एक बार तुम्हारे समाज में संगठित पहचान बनाने की शक्ति पैदा हो जाये और स्वाधीनता की भावना उत्पन्न हो जाये तो अमरीका इस पर कभी हावी नहीं हो सकता। अन्त में, तुम अहिंसा को दरकिनार करके बहुत बड़ी भूल कर रहे हो।

अमरीका के दक्षिण राज्यों की बर्बरता को झेलते हुये मार्टिन लुथर किंग ने अहिंसक रास्ता अपनाते हुये काले अमरीकियों को मौलिक अधिकार दिलवाये और उनके अन्दर गर्व और आत्मसम्मान की भावना जागृत की। ईरान वासियों ने भी इसी प्रकार शाह के विरुद्ध सफलता प्राप्त की। जितनी हत्या उसकी सेना ने निर्दोष आन्दोलनकारियों की, उतनी ही जल्दी उसका शासन समाप्त हो गया। बल्कि कुछ सैनिकों ने तो उसका साथ ही छोड़ दिया। तुम कहते हो कि मेरे देशवासियों ने भी हिंसा की और मैंने उसको स्वीकृत किया। मेरे देशवासियों में से कुछ ने हिंसा अवश्य की क्योंकि यातना उनकी बरदाश्त से बाहर हो गई थी। यद्यपि मैं उनकी हिंसा को समझ सकता हूं परन्तु मैं सदा उसकी निन्दा करता रहा। मैंने उसके प्रायश्चित स्वरूप भूख हड़ताल की और विदेशी शासकों से क्षमा याचना भी की। कुछ व्यक्तियों की छुटपुट हिंसा की अनदेखी करना एक चीज़ है, किन्तु हिंसा पर अपने संघर्ष को केन्द्रित करना बिल्कुल दूसरी चीज़ है।

तुम्हारा कथन, कि बलिदान के लिये गवाह होना आवश्यक है, सही है और इस संदर्भ में पत्रकारिता का महत्व है। पत्रकारों का एक वर्ग निश्चय ही सरकारों का पक्षधर होता है परन्तु समस्त पत्रकार नहीं। कोई कारण नहीं है कि तुम स्वयं अपनी पत्रकारिकता संस्था आरम्भ करो, जिसके माध्यम से तुम अपनी बात कह सको, जैसा मैंने किया था। अल जज़ीरा भी ऐसा ही कर रहा है। मिश्रित समाज में पत्रकारिता का इतना महत्व नहीं है जितना तुम बता रहे हो। वे अहिंसक विरोध की पूरी अनदेखी नहीं कर सकते क्योंकि उससे उनकी न्यायपरकता खत़रे में पड़ जायेगी। साधारण मनुष्य जानते हैं कि पत्रकार अक्सर पूर्वाग्रही होते हैं और वे इसका समुचित ध्यान रखते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो इंगलैंड जैसे देश में इराक युद्ध के विरोध में इतनी व्याख्या संभव नहीं होती। मैं तो कहूंगा कि तुम पत्रकारिता के महत्त्व को बढ़ाकर आंकने में अपने