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Tuesday, January 22, 2008

कुछ कहना चाहती है बिलकीस (Bilkis has something to say)

इंसाफ के लिए जद्दोजहद का नया चेहरा है बिलकीस बानो (Bilkis Bano)। सन् 2002 में हुए जनसंहार के दौरान बिलकीस बानो और उनकी महिला परिवारीजनों के साथ सामूहिक दुराचार हुआ और फिर उनकी हत्‍या कर दी गई। इस घटना में बिलकीस किसी तरह बच गई। उसने इंसाफ के लिए जद्दोजहद किया और कामयाब हुई। (खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसके बाद बिलकीस ने कुछ कहने का मन बनाय। तो पढि़ए बिलकीस की संघर्ष गाथा, बिलकीस की जुबानी-

bilkis

मैं सच साबित हुई

आज मैं सच साबित हुई हूँ. मेरे सच की सुनवाई कर ली गई है.मुम्बई की एक अदालत में बीस रोज़ तक मुझसे जिरह की जाती रही लेकिन मेरे सच की ताकत ने मुझे सहारा दिए रखा. शुक्रवार १८ जनवरी , २००८ को मुम्बई के सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया उसने उस लम्बे और दर्दनाक सफर को किसी हद तक एक मंजिल तक पहुँचाया है  जिस पर मुझे और मेरे परिवारवालों को चलने पर मजबूर कर दिया गया था. यह भी सच है कि कई घाव कभी भी नहीं भरेंगे लेकिन आज मैं पहले के मुताबिक कहीं अधिक ताकत महसूस कर रही हूँ और इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ.

इस जीत का बड़ा हिस्सा उन दोस्तों और साथियों का है जो इस दौरान मेरे साथ बने रहे, जब मैं लड़खडाई और लगा कि और नहीं चल सकूंगी तो जिन्होंने मुझे थामा . आज इन दोस्तों में से कई मेरे साथ हैं पर कई मौजूद नहीं हैं. इस पूरे दौर में मेरे शौहर याकूब का संग लगातार बना रहा है. मेरा साथ देने की वजह से मेरे परिवारवालों और रिश्तेदारों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया. आज यहाँ मैं उनकी हिम्मत की बदौलत खड़ी हूँ . उन्होंने मेरे हक में तब गवाही देने का फैसला किया जब ऐसा करना उनके लिए खतरनाक था.इस जीत का श्रेय राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग को भी है जिसने मुझ पर यकीन किया , वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे को है जिन्होंने इन्साफ की मेरी गुहार को उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों तक पहुँचाया और यह तय करवाया कि सी बी आई इस मामले की तहकीकात करे. उनकी वजह से ही इस मुक़दमे को मुम्बई की अदालत तक लाया जा सका. सबसे आखिरी बात यह कि यह मुकदमा इस नतीजे तक नहीं पहुंचता अगर सी बी आई ने नए सिरे से ईमानदारी के साथ जांच पड़ताल न की होती. सी बी आई के विशेष अभियोजक ने झूठ की परतों को उधेड़ते हुए सच को -उस पर से राजकीय संस्थाओं की लीपापोती को साफ कर बाहर निकाला.मैं इनमें से हरेक की शुक्रगुजार हूँ. मुझ जैसा सफर अकेले नहीं तय किया सकता.

पिछले छः साल मैंने खौफ के साए में बिताए हैं, एक पनाहगाह से दूसरी पनाहगाह तक भागती फिरी हूँ , अपने बच्चों को अपने साथ लिए लिए उस नफरत से बचाने के लिए जो अभी भी मुझे पता है कई लोगों के दिलोदिमाग में पैबस्त है. इस फैसले का मतलब नफरत का खात्मा नहीं है.लेकिन इससे यह भरोसा जागता है कि कहीं किसी तरह इन्साफ की जीत हो सकती है. यह फैसला सिर्फ़ मेरी नहीं उन सभी बेगुनाह मुसलमानों की जीत है जिनका कत्ल कर दिया गया और उन सभी औरतों की भी जिनकी देह इसलिए रौंद डाली गई कि मेरी तरह वे भी मुसलमान थीं. यह जीत है क्योंकि अब इसके बाद कोई भी उन चीजों से इनकार नहीं कर सकेगा जो गुजरात मं २००२ के उन खौफनाक दिनों में औरतों के साथ हुई थीं . क्योंकि अब हमेशा के लिए गुजरात के इतिहास में यह बात दर्ज कर दी गई है की हमारे ख़िलाफ़ यौन हिंसा के हथियार का इस्तेमाल किया गया था. मैं यह मनाती हूँ कि ऐसा एक दिन आएगा कि गुजरात के लोगों के लिये उस नफ़रत और हिंसा के दाग के साथ जीना मुश्किल हो जायेगा और वे उस राज्य की जमीन से उसे उखाड़ फेंकेंगे जो अभी भी मेरा वतन है.  

आज लेकिन मैं ग़मगीन भी हूँ क्योकि मेरा तो सिर्फ़ एक मामला था उन हजारों के बीच जो अदालत की दहलीज तक भी नहीं पहुँच सके हैं. और हालांकि मैं यहाँ जीत कर खड़ी हूँ पर मैं पुरजोर ढंग से यह कहना चाहती हूँ कि इन्साफ की राह इतनी लम्बी और यंत्रणा भरी नहीं होनी चाहिए. मैं क्षुब्ध भी हूँ क्योंकि राज्य और उसके अधिकारी अभी भी बेदाग और आजाद हैं जिन्होंने उन मुजरिमों की पीठ ठोंकी , उनकी हिम्मत बढ़ाई और उन्हें बचाया जिन्होनें मेरे पूरे समुदाय को तबाहोबर्बार्द कर दिया जबकि उनका काम दरअसल हमारी हिफाजत करना था. आज मैंने जो लड़ाई जीती है वह मुझे और बड़ी और शायद कहीं और लम्बी जद्दोजहद के लिए ताकत देती है जो अभी आगे मेरे सामने है.

Saturday, December 15, 2007

मर्दाना वाइब्रेंट गुजरात और महिलाएं

मायावी वाइब्रेंट गुजरात की चकाचौंध में महिलाएं कहां हैं? मर्दानगी के दंभ में डूबे 'विकास पुरुष' के विकास के नक्‍शे पर महिलाओं का वजूद कहां है? विकास, कंक्रीट और गारे का नाम नहीं है। विकास का मतलब हाड़ मांस के लोगों की जिंदगी का विकास है। हम इसे मुसलमानों-दलितों या आदिवासियों के संदर्भ में नहीं देख रहे बल्कि हम तो इसे आधी आबादी के रूप में देखने जा रहे हैं। हालांकि कुछ राज्‍यों की ही तरह गुजरात के संदर्भ में महिलाओं को आधी आबादी कहना सही नहीं होगा। क्‍यों? आइये थोड़ा जायजा लें।

बिटिया मारो

गुजरात के बच्‍चों की आबादी में से चार लाख सड़सठ हजार आठ सौ बिरयानबे (4,67, 892) लड़कियां गायब हैं। यानी लड़कों के मुकाबले करीब 12 फीसदी लड़कियां कम हैं। कोई समाज बेटियों के प्रति कितना संवेदनशील है, उसके नापने का एक तरीका है, जिसे लिंग अनुपात कहा जाता है। यानी प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद। शिशु लिंग अनुपात 0-6 साल के उम्र के लड़के-लड़कियों का होता है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात का शिशु लिंग अनुपात 883 है यानी प्रति हजार लड़कों में करीब 117 लड़कियां कम हैं। यही नहीं कुछ जिले तो इससे भी नीचे हैं। जैसे मेहसाणा (801), गांधीनगर (813), अहमदाबाद (836), आनंद (849), राजकोट (854)। बिटिया मारने वाले पढ़े-लिखे और पैसे वाले लोग हैं। लिंग जांच करके बताने वाले डॉक्‍टर हैं।

मुझे नहीं मालूम कि कितने डॉक्‍टरों को गुजरात में इसलिए गिरफ्तार किया गया कि वे लिंग जांचते हैं या लिंग चयनित गर्भपात में शामिल हैं। मुझे यह भी नहीं मालूम कि कितने अल्‍ट्रासाउंड सेंटर बंद किये गए या कितने जगह छापे डाले गए। कितने ससुराली इस बात के लिए पकड़े गए कि वे अपनी बहुओं की कोख में सिर्फ बेटा देखना चाहते हैं। क्‍या गुजरात के चुनाव का मुद्दा यह नहीं होना चाहिए था। क्‍या बिन बेटियों के सिर्फ 'मर्दाना' विकास होगा।

खौफ के साये में जिंदगी

गुजरात में हर रोज एक से ज्‍यादा महिला के साथ दुराचार (बलात्‍कार) हुआ। पिछले साल के जो आंकड़े मिले, उसके मुताबिक पुलिस के पास कुल 388 बलात्‍कार के मामले दर्ज हुए।

आप कहने को कह सकते हैं कि यह तो हर जगह होता है। पर जनाब हम कुछ और कहना चाहते हैं। हम जानना चाहते हैं कि इस वाइब्रेंट गुजरात में महिलाओं को भय मुक्‍त माहौल मिल रहा है या नहीं। क्‍योंकि बिना भय मुक्‍त माहौल के विकास ?

गुजरात पुलिस के आंकड़े बता रहे हैं,

एक वर्ष में 854 महिलाओं का अपहरण हुआ।

5,284 महिलाएं ससुराल में उत्‍पीड़न/ मारपीट की शिकार हुई।

महिला उत्‍पीड़न में अहमदाबाद का नम्‍बर सबसे ऊपर है।

इसी सच्‍चाई के मद्देनजर गुजरात के महिला संगठनों ने पिछले दिनों नफरत और असुरक्षा का माहौल पैदा करने वालों को चुनाव में हराने की एक अपील जारी की। इस अपील पर दस्‍तखत करने वालों में, मृणालिनी साराभाई, मल्लिका साराभाई, कल्‍पना शाह, इला पाठक, सरुप ध्रुव, शीबा जार्ज, सोफिया खान, शबनम हाशिमी, अमिता वर्मा, तृप्ति शाह, दीप्‍ता अचर शाहिर शामिल हैं।

जो लोग वाइब्रेंट गुजरात के धुर समर्थक हैं, उनके लिए तथ्‍य देना जरूरी है। वरना वे यही समझेंगे कि यह सब हमारे दिमाग की उपज है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के 14 मार्च 2005 के अंक में छपे एक खबर के मुताबिक, गुजरात में सन् 2004 में 580 युवतियों का अपहरण हुआ। इसी दौरान 1377 यु‍वतियों के लापता होने की शिकायत भी दर्ज कराई गई।

जो समाज 'हम' और 'वो' में बंटा हो, वहां पहले 'वो' पर हमला होता है। जब 2002 में 300 से ज्‍यादा औरतों के साथ सार्वजनिक-सामूहिक बलात्‍कार हुआ, उनके साथ सरेआम यौन हिंसा हुई, तब समाजा का बड़ा तबका इसे मौन स्‍वीकृति दे रहा था। क्‍यों, क्‍योंकि यह सब 'वो' के साथ हो रहा था। अब आस पड़ोस में 'वो' रहे नहीं। उन्‍हें तो कहीं दूर फेंक दिया गया। लेकिन नफरत फैलाने वालों को हमेशा एक 'वो' चाहिए। अब 'अपने' ही समुदाय की महिलाएं उनके लिए 'वो' हैं। एक बार खून की आदत लग जाए तो बड़ी मुश्किल से जाती है। आज भी गुजरात के बड़े हिस्‍से में 2002 में हुई हिंसा को लेकर कोई पछतावा या विरोध नहीं है। जब दूसरे के साथ नाइंसाफी पर आवाज उठाने की आदत खत्‍म हो जाएगी, तो यह नाइंसाफी अपना दायरा फैलाएगी और फैला रही है। ऐसे किसी भी सामाजिक नाइंसाफी का सबसे पहला शिकार महिलाएं होती हैं और वे हो रही हैं... इसलिए यह आंकड़े महज संख्‍या नहीं है... जीती जागती महिलाएं हैं। यह है वाइब्रेंट गुजरात का अमानवीय और महिला विरोधी विकास।

हिंसा... हिंसा और सिर्फ हिंसा

महिलाओं के साथ हिंसा, यह भी बताता है कि कोई समाज अपनी महिलाओं की कितनी इज्‍जत करता है। उसे आदमी का दर्जा देता है या नहीं। अहमदाबाद वीमेंस एक्‍शन ग्रुप (आवाग) ने इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट- अहमदाबाद के साथ मिलकर एक सर्वेक्षण किया। पता चला कि उस सर्वे में शामिल अहमदाबाद महानगर की 58 फीसदी महिलाएं गंभीर रूप से मानसिक तनाव का शिकार हैं। यह भी निकल कर आया कि संभ्रांत घरों की महिलाओं को थप्‍पड़ मारे जाते हैं, घूँसे पड़ते हैं, दांत काटे जाते हैं, लात मारे जाते हैं और तो और जलती सिगरेट से दागा जाता है।

सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 65 फीसदी महिलाओं ने माना कि उन्‍हें सरेआम और पड़ोसियों के सामने बेइज्जत किया जाता है। 35 फीसदी ने माना कि उनके बच्‍चे खासतौर से बेटियां, पिता की हिंसा की शिकार हैं। कितनी महिलाएं, कितने तरह की हिंसा की शिकार हैं, इसकी एक बानगी देखिये- गाली-गलौज/ धमकी- 70 फीसदी महिलाओं ने माना, थप्‍पड़- 68 फीसदी, ठोकर या धक्‍का- 62 फीसदी, घूंसा- 53 फीसदी, किसी सख्त चीज से प्रहार- 49 फीसदी, दांत काटा- 37 फीसदी, गला दबाने की कोशिश- 29 फीसदी, सिगरेट से जलाया- 22 फीसदी ने महिलाओं ने माना।

हर पितृसत्‍तात्‍मक समाज, मर्दानगी हिंसा की बुनियाद पर टिका होता है। विकास का मतलब, मर्दानगी हिंसा को खत्‍म करना है। जेण्‍डर विभेद की बुनियाद पर बने समाज को बदलना भी है। बिना जेण्‍डर विभेद मिटाए कोई भी विकास कामयाब नहीं हो सकता। क्‍या वाइब्रेंट गुजरात का यह मुद्दा?

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Friday, December 14, 2007

गांधी जी की ताबीज और वाइब्रेंट गुजरात

मैं कोई ताबीज नहीं बांधता। मैं गांधीवादी भी नहीं हूं लेकिन मुझे गांधी जी की ताबीज पसंद है। यही ताजीब मुझे साबरमती आश्रम के दीवारों पर दिख गई। मैंने सोचा, क्‍यों न साबरमती के संत की ताबीज, उनकी ही जन्‍मभूमि यानी गुजरात के 'वाइब्रेशन' पर आजमा कर देखी जाए।

Nasir-Gandhi

गांधी जी की ताबीज

गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा?

हिंसा की बात नहीं

पांच साल से गुजरात को 'वाइब्रेंट' बनाने का दावा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि गुजरात प्रगत‍ि की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। (हालांकि मुझे नहीं मालूम कि गुजरात प्रगति में कब बिहार, पश्चिमबंगाल, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश या राजस्‍थान जैसे बड़े राज्‍यों से पीछे था और पांच साल में कैसे इसे इन राज्‍यों से आगे कर दिया गया।) जो लोग भी थोड़ी आलोचना करते हैं, उन्‍हें कहा जाता रहा है 'गुजरात का विकास हो रहा है और आप हिंसा और हिन्‍दू-मुसलमान की बात कर रहे हैं।' चलिए आज हम हिंसा, हिन्‍दू-मुसलमान की बात नहीं करेंगे। हम यह कतई नहीं कहेंगे कि अहमदाबाद के वेजलपुर, वस्‍त्रापुर की तुलना में जुहापूरा या सरखेज में पानी-बिजली-सड़क-स्‍कूल की हालत काफी खराब है। हम यह भी नहीं कहेंगे कि किस जगह किस मजहब के मानने वाले लोग रहते हैं। हम दूसरी बात करेंगे। हम गांधी जी की ताबीज के मुताबिक अपनी दुविधा दूर करने के लिए गरीब औ दुर्बल व्‍यक्ति की बात करेंगे। हम उसकी बात करेंगे, जिसकी बात बड़े शहरों के चकाचौंध में खोती चली जा रही है।

किसान आत्महत्या कर रहे हैं

हम आज सिर्फ गांधी जी की ताबीज को परखेंगे। किसान अन्‍नदाता है, शायद हम सभी ने बचपन में यह लाइन जरूर पढ़ी होगी। आइये देखें वाइब्रेंट गुजरात में किसान कहां है? क्‍या आपको पता है कि गुजरात में भी किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं?

नहीं, तो हम बताते हैं। सन् 2004 में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में 'विकासपुरुष' नरेन्‍द्र भाई मोदी ने जोरदार तरीके से कहा था कि गुजरात में एक भी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की है। ... एक महीने बाद ही भाई को विधानसभा में मानना पड़ा कि गुजरात में 148 किसानों ने आत्‍महत्‍या की। ... लेकिन सच इससे भी डरावना था। फिल्‍मकार राकेश शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता भरत झाला ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से एक जानकारी मॉंगी। उस जानकारी के जवाब चौंकाने वाले हैं। बकौल राकेश शर्मा, 'पांच महीने की जद्दोजहद के बाद दस अक्‍टूबर 2007 को गुजरात सरकार ने बताया कि राज्‍य में 498 किसानों ने खेती की परेशानियों से तंग आकर आत्‍महत्‍या की है। यह आंकड़ा भी अधूरा है। मेरी नई फिल्‍म में ऐसे करीब 6695 किसानों की मौतों का हवाला है, जिनकी मौत की वजह 'दुर्घटना' बतायी गई। इन किसानों को बीमा योजना का भी लाभ नहीं मिला है।' न...न यह किसी मोदी विरोधी के दिमाग की उपज नहीं है। यह किसानों की आत्‍महत्‍या का स‍रकारी आंकड़ा है। सूचना के अधिकार के तहत मिले आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्‍महत्‍या का जिलावार आंकड़ा कुछ यूँ है- राजकोट (63), जूनागढ़ (85), अम्रेली (34), मेहसाणा (48), नाडियाड (44), जामनगर (55), नर्मदा (30) और भाई नरेन्‍द्र मोदी की नाक के नीचे गांधीनगर में 13 किसानों ने आत्‍महत्‍या की।

बाढ़ की तबाही

यही नहीं। विकास की दिशा क्‍या है, यह भी देखें। सौराष्‍ट्र में पिछले दिनों बाढ़ आई थी। राकेश शर्मा की नई फिल्‍म 'खेड़ु मोरा रे' में एक किसान बताता है, 'गोखरवाड़ा (जिला सुरेन्‍द्रनगर) में कुछ सालों पहले तक बाढ़ की तबाही नहीं होती थी। जब से सुजलम सुफलम योजना शुरू हुई और चेक डैम बनाए जाने लगें, तब से हर साल जल जमाव और बाढ़ की परेशानी शुरू हो गई है।' यही नहीं मोदी ने किसानों की राहत के लिए पैकेज की घोषणा की। सन् 2007 की बात कौन करे, सन् 2005 में एलान किये गए पैकेज का एक पैसा भी किसानों को नहीं मिला। यही नहीं बाकि राज्‍यों की तरह यहां के किसान भी सेज का विरोध कर रहे हैं। भावनगर और काठिवादर इसके उदाहरण हैं।

लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं

सरदार वल्‍लभ भाई पटेल की जन्‍मस्‍थली गुजरात है। आणंद जिला का करमसद इलाका। क्‍या आपको पता है कि वाइब्रेंट गुजरात का दावा करने वाले जिन पटेल का नाम लेते नहीं अघाते, उन लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं है। सड़क का हाल बुरा है। यह हम नहीं, टीवी कैमरे के सामने वहां के लोगों ने बताया है।

अंत में

अब आप गांधी जी की ताबीज को एक बार फिर याद कीजिये और खुद अंदाजा लगाइये कि कितना और किनके लिए वाइब्रेंट है, गुजरात। जरा इस पर भी गौर फरमाइये कि अगर वाकई में गुजरात वाइब्रेंट है, तो फिर नरेन्‍द्र भाई मोदी को तेजाबी भाषण पर क्‍यों उतरना पड़ा ? क्‍यों उन्‍हें चुनाव नजदीक आते-आते विष वमन पर ही भरोसा करना पड़ रहा है? क्‍यों नहीं, वह विकास पर ही टिके रहें? क्‍यों वे ही उनके चुनाव का मुद्दा बन गए, जो नाम से एक खास मजहब के मानने वाले लगते हैं ? गांधी जी की ताबीज इन सवालों का जवाब खोजने में आपकी मदद करेगी, यही दुआ है। आमीन।

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Wednesday, December 12, 2007

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात।

लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा?

उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।'

मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।'

फिर उसने अपना नाम बताया- राजू। कहने लगा, 'गुजराती तो सब मोदी जी के साथ हैं।'

मैंने पूछा, 'सब।'

बोला हां, सिर्फ 'वो' लोग नहीं हैं।

मैंने फिर पूछा, 'वो' कौन।

बोला, 'वही' लोग। समझे नहीं। और हंसने लगा।

उसकी हंसी ने बता दिया था कि वो कौन। पर मैं उसकी जबान से सुनना चाह रहा था। और आखिरकार उसने कहा, 'मुसलमान लोग तो भाजप के साथ नहीं हैं।'

तब मैंने फिर पूछा, 'क्‍या मुसलमान गुजराती नहीं हैं।'

उसका जवाब था, 'कैसी बात करते हैं। मुसलमान कहीं गुजराती होते हैं। गुजराती तो हमलोग हैं।'

तब एकाएक स्‍पार्क हुआ और मुझे समझ में आ गया कि जब जनाब मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र भाई मोदी गुजरातियों की बात करते हैं तो उनके गुजराती में कौन शामिल है और कौन नहीं। यकीनन, उसमें 'वो' नहीं हैं।

जो बात बड़े बड़े नहीं समझा पा रहे थे वह बात एक अनजान और शायद निम्‍न मध्‍य वर्गीय ऑटो वाले ने मुझे समझा दिया था।

अभी इस उहापोह से उबर ही रहा था तो एक गुजराती (जिस पर मुझे गर्व है) लॉर्ड मेघनाद देसाई का एक इंटरव्यू दिख गया। प्रख्‍यात अर्थशास्‍त्री और साम‍ाजिक रूप से सक्रिय मेघनाद देसाई ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक के दौरान संघ परिवार ने गुजरात के हिन्‍दुओं में यह भाव पैदा करने की कोशिश की गुजराती यानी हिन्‍दू बाकि सब 'वो'। गुजराती की इस नई परिभाषा को सबसे ज्‍यादा अपनाया मध्‍यवर्ग ने। (ब्‍लॉग की दुनिया पर इस मध्‍यवर्ग की प्रतिक्रिया देख आप अब आसानी से इसकी वजह समझ सकते हैं।) यही मध्‍यवर्ग संघ परिवार का वैचारिक कॅरियर है। उनका कहना था कि जब पांच करोड़ गुजराती की बात मोदी करते हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह किसकी बात कर रहे हैं।

लेकिन मेरी उहापोह और बढ़ गई है। मैं अब सोच रहा हूं कि दक्‍कनी उर्दू के जन्‍मदाता, वली गुजराती का क्‍या होगा, जिसने अपने को गुजरात की मिट्टी में जज्‍ब कर दिया है? उस रजब अली को क्‍या कहा जाएगा जिसने वसंत हेंगिश्‍ते के साथ अहमदाबाद के जमालपुर में साम्‍प्रद‍ायिक सौहार्द्र के लिए जान दे दिया? उस एहसान जाफरी को क्‍या माना जाएगा,  जो गुजरात की आग में जला और गुजरात की हवा में फैल गया है? गुलाम मोहम्‍मद शेख को क्‍या नाम देंगे, जिसने पेंटिंग में गुजरात का नाम दुनिया के नक्‍शे पर ला खड़ा किया? एसआर बंदूकवाला को क्‍या माना जाएगा। इस्‍माइल दरबार के गरबा संगीत को किस नाम से पुकारा जाएगा? जहीर खान,  इरफान पैठान, युसूफ पैठान, सायरा, रशीदा, नियाज बेन को किस खांचे में फिट किया जाएगा? गुजराती या‍ सिर्फ 'वो'?

gmsheikh-
प्रख्‍यात चित्रकार गुलाम मोहम्‍मद शेख की एक पेंटिंग।(साभार)
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 क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

एक "गुजराती" की तलाश 

Tuesday, December 11, 2007

क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

अपने अध्‍ययन और काम के सिलसिले में इस साल मैं तीसरी बार गुजरात घूम कर आया हूं। हर बार एक नई अनुभूति के साथ लौटा। हर बार जो जानकारी पढ़कर और सुनकर इकट्ठी की थी, उसमें नए आयाम जुड़ते गए। मैंने कई बार लिखने का विचार किया। लेकिन हिन्‍दी ब्‍लॉग में तो जैसे गुजरात का नाम लेना अपराध बना  दिया गया। न सिर्फ गुजरात बल्कि नरेन्‍द्र मोदी नाम के शख्‍स का जिक्र किसी भी ब्‍लॉगर के लिए गाली खाने की वजह बनता रहा। एक नहीं कई उदाहरण हैं। मैंने डर से नहीं बल्कि गाली गलौज से बचने के लिए गुजरात के अनुभव ब्‍लॉग पर छोड़कर सब जगह बांटे। कई ब्‍लॉगर दोस्‍तों ने अनुभव सुना है। पर ताजा अनुभव आपके साथ बांटने जा रहा हूं।

गुजरात चुनाव का पहला चरण चल रहा है। कुछ दिनों बाद दूसरा चरण और दस दिन बाद गुजरात चुनाव के नतीजे भी सामने होंगे। हालांकि जमीन की महक कुछ अलग सा संदेश दे रही है। चुनाव को लेकर कोई खास उत्‍साह नहीं। सरगर्मी नहीं। बड़ौदा से अहमदाबाद, एक्‍सप्रेस हाइवे पर हवा से बात करती बस में किसी की बात का भी मौजू चुनाव नहीं था।  पूछने पर बगल में बैठे सज्‍जन बताते हैं, 'इस बार 'भाजप' के लिए 'निष्‍पक्ष' चुनाव नहीं होगा। निष्‍पक्ष यानी... यानी एकतरफा चुनाव नहीं होंगे। जैसा पिछली बार हो गया था।' यानी नरेन्‍द्र भाई मोदी के लिए राह आसान नहीं है। यह शख्‍स कांग्रेस का समर्थक नहीं था। यह भाजप का वोटर है।  इसी बीच एक और साहब बताते हैं, 'अब पार्टी कहां रही। अब तो नरेन्‍द्र मोदी ही सब कुछ हैं। आपने मुखौटा नहीं देखा।' ... तो इसका असर...  'असर होगा... पर सरकार तो मोदी जी की ही बनेगी लेकिन मिलीजुली।' मिली जुली यहां कहां... इसका जवाब तो इनके पास नहीं था लेकिन इन दोनों लोगों की बात का संकेत साफ था। यानी सबकुछ पहले जैसा आसान नहीं है। वे इसके लिए दस तर्क और गिनाते हैं कि मुश्किल क्‍यों बढ़ गई। पर लब्‍बोलुआब ये कि सीटें कम होंगी। ऐसी ही बात बड़ौदा/अहमदाबाद/मणिनगर की सड़कों पर घूमते, ऑटो वालों से बात करते, दुकानदारों की राय सुनने के दौरान मिली।

पर सबसे अहम वजह कुछ और है। भारतीय जनता पार्टी को कैडर आधारित पार्टी माना जाता है। जहां, व्‍यक्ति से ऊपर विचारधारा मानी जाती है। उस कैडर आधारित पार्टी में पूरा संगठन एक शख्‍स के सामने दण्‍डवत हो गया है। मुझे तो कम से कम एक भी चुनाव नहीं याद है, जहां होर्डिंग या पोस्‍टरों में भाजप के सिर्फ एक नेता की तस्‍वीर छपी हो। किसी की छपे न छपे, अटल आडवाणी तो नजर आते ही थे। इस बार चहुंओर मोदी ही मोदी। कैडर आधारित पार्टी का एक व्‍यक्ति के इर्दगिर्द सिमटना, दीमक की तरह काम करता है। इसका खामियाजा भाजप उत्‍तर प्रदेश में उठा चुकी है।

मेरे वहां रहने के दौरान ही यानी एक दिसम्‍बर को सोनिया नवसारी और राजकोट ( शायद यही नाम थे) आईं थीं। दोनों जगह कांग्रेस की रैली में जबरदस्‍त भीड़ उमड़ी थी। यह गुजराती अखबार और गुजराती ईटीवी भी बता रहा था। भाजपा (मोदी) कैम्‍प में बेचैनी बढ़ रही थी। मोदी आतंकवाद का मुद्दा सेलेक्टिव तरीके से उठा चुके थे। फिर भी वह असर पैदा नहीं हो रहा था ... और अहमदाबाद या बड़ौदा में विश्‍वविद्यालय के किसी शिक्षक या प्रकाश शाह जैसे सामाजिक कार्यकर्ता से बात कीजिये, सबको यही डर था कि या तो मोदी कोई हमला करायेगा या कोई विवाद शुरू करेगा। इसलिए सब खैर खूबी की दुआ कर रहे थे। 

और हुआ यही... मोदी को सोहराबुद्दीन की हत्‍या पर गर्व करने का मौका मिल गया। यही असली नरेन्‍द्र भाई मोदी है। पांच साल त‍क विकास... विकास... विकास का भ्रम फैलाने वाले का यही सच है। इसे आप मौत का सौदागर कहें न कहें ... हमें मानने में कोई परेशानी नहीं है। (नरेन्‍द्र मोदी जैसा गुजरात बनाना चाहते हैं, उसपर गर्व करने वाले तो गर्भवती कौसर बी के साथ भी जो हुआ, उसे भी ठीक मानते हैं।)  लेकिन भाई को देखिये, भाई ने उसी की हत्‍या को जायज ठहराया जो नाम से एक खास मजहब का लगता है। उसे तुलसी राम प्रजापति, महेन्‍द्र काधव और गणेश कुंथे नहीं याद आए जिन्‍हें 'एनकाउंटर' मे साफ कर दिया गया है। इस भाई को यह भी याद नहीं रहा है कि सरकार ने तो माना है कि यह एनकाउंटर फर्जी हैं। लेकिन भाई दिल की बात जुबां पर आ ही जाती है। जब कराया था... तो बता दिया।

नरेन्‍द्र भाई की यह बेचैनी, उस बात को साबित करती है कि इस बार चुनाव 'निष्‍पक्ष' नहीं है। इस बार राह आसान नहीं है। विकास का ढोल का पोल सामने आ रहा है। अगर ऐसा नहीं था तो विकास पर ही चुनाव लड़ते, भले ही दुनिया कुछ भी कहती।  तब शायद उनकी जीत का सेहरा भी विकास के सिर बंधता पर अब तो जीतेंगे भी तो हारेंगे। क्‍यों... क्‍योंकि भाई नरेन्‍द्र मोदी ने फिर साबित किया है कि जिंदा आदमी से ज्‍यादा, मरा आदमी उनके काम का है। यह ज्‍यादा दिन नहीं चलता। हो सकता है कि इसकी शुरुआत जल्‍द हो जाए।

(कृपया टिप्‍पणी करने से पहले पूरी पोस्‍ट पढ़ें और उसके बाद दाहिने की गुजारिश को पढ़ें। फिर लगे कि आप संवाद चाहते हैं तो टिप्‍पणी करें।)

Saturday, November 17, 2007

बंधु बुद्धदेव और भाई नरेन्द्र

अंतर बताओ तो जानें !

सत्या सागर ने‍ कोशिश की है, आप भी कुछ कोशिश करें। तलाशें करें कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बंधु बुद्धदेव भट्टाचार्य और गुजरात के मुख्‍यमंत्री भाई नरेन्‍द्र मोदी कितने पास, कितने दूर हैं।
03buddha NarendraModi
पार्टी के वफादार कारकुन पार्टी के वफादार कारकुन
रहन सहन का तरीका आम रहन सहन का तरीका आम
नन्‍दीग्राम में नरसंहार के लिए कुख्‍यात नरोदा पाटिया में नरसंहार के लिए कुख्‍यात
कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते
भारतीय पूंजीपति के दुलारे भारतीय पूंजीपति के दुलारे
वैश्विक पूंजीपति के दुलारे वैश्विक पूंजीपति के दुलारे
'सेज' के चैम्पियन 'सेज' के चैम्पियन
लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते
इनके पार्टी कार्यकर्ता 'शत्रु' खेमे की महिलाओं के साथ बलात्‍कार कर सबक सिखाते हैं इनके पार्टी कार्यकर्ता 'शत्रु' खेमे की महिलाओं के साथ बलात्‍कार कर सबक सिखाते हैं
इनके पार्टी कार्यकर्ता विरोध करने वाले सीधे साधे निहत्‍थे लोगों का खून करते हैं इनके पार्टी कार्यकर्ता विरोध करने वाले सीधे साधे निहत्‍थे लोगों का खून करते हैं
इनके पार्टी कार्यकर्ता मीडिया को धमकाते हैं इनके पार्टी कार्यकर्ता मीडिया को धमकाते हैं
यह महाश्‍य ' आंख के बदले आंख' लेने के सिद्धांत पर यकीन रखते हैं यह महाश्‍य ' आंख के बदले आंख' लेने के सिद्धांत पर यकीन रखते हैं
विरोधियों को यह महाश्‍य माओवादी, आतंकवादी और कट्टरपंथी का नाम देते हैं विरोधियों को यह महाश्‍य माओवादी, आतंकवादी और कट्टरपंथी का नाम देते हैं
नैतिक रूप से दिवालिया नैतिक रूप से दिवालिया
और इसके बावजूद भी चुनाव दर चुनाव जीतते हैं ! और इसके बावजूद भी चुनाव दर चुनाव जीतते हैं !
इस भद्रलोक के पास अमरीका का 'मल्‍टीपल एंट्री वीजा' है ! इस महाश्‍य के पास अमरीका का 'मल्‍टीपल एंट्री वीजा' नहीं है !