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Thursday, July 17, 2008

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है।

मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?'

यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढेर सारे दोस्‍त हैं। यह मेरा यक़ीन है और अविश्‍वास की कोई वजह नहीं।
 
मैं न तो अपने दोस्‍तों के मज़हब के बारे में जानने को परेशान रहता हूँ और न ही जाति। इसलिए यहाँ जिन्‍होंने टिप्‍पणी की है, उनके मज़हब का महज़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। वह भी घिसा पिटा तरीका है। ख़ैर।

ब्‍लॉगिंग की दुनिया में मुझे लगातार हौसला देने वाली  Mired Mirage की, जिन्‍हें हम घुघूती बासूती के रूप में जानते हैं, इस पोस्‍ट पर राय है कि 'आपने इस विषय पर लिखा, बहुत अच्छा किया। ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता है। अच्छा बुरा हर जगह होता है। हमें उसमें से अच्छा चुनना सीखने की आवश्यकता है।'

पर इस पूरे मामले को एक अलग नज़रिये से देखने वाले भी कई हैं। और जैसा की लगता है, शायद ये वही हैं, जिनके बीच जाने की बात ऊपर वाले दोस्‍त कर रहे हैं। हालाँकि मुझे पक्‍का यक़ीन नहीं है।

महामंत्री-तस्लीम की टिप्‍पणी है, 'इस तरह के बेसिर पैर के फतवों के कारण ही इस्‍लाम के प्रति लोगों में गलत धारणा बैठी है।'

तो Anwar Qureshi पूरे विमर्श को एक नया आयाम देते हैं-  'आप ने बहुत अच्छा लिखा है, अगर हम बुरा ना देखना चाहें तो ये हमें उसके लिए प्रेरित नहीं करती हैं। लेकिन हमें विवादों से दूर होकर इस्लाम और मुसलमानों के हक की बातें सोचनी चाहिए और उनके पिछडे़पन को दूर करने की कोशिश करना चाहिए...'

धर्म के अलमबरदारों के बारे में लोगों की ही क्‍या राय है, यह Farid Khan से समझा जा सकता है। फरीद खान का कहना है, '... जिस अँधेरे के ख़िलाफ़ इस्लाम का आविर्भाव हुआ था, मौलवी-मुल्ला उसी अँधेरे में वापस जा कर मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं। असल में ये मुल्ला ही इस्लाम विरोधी हैं, आज के युग में।'  इससे ज्‍यादा आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी क्‍या हो सकती है।

यही नहीं, वह एक हवाला पेश करते हैं, जिसके मुताबिक 'अल बरूनी ने एक जगह लिखा है कि इस्लाम विज्ञान के क्षेत्र में दख़ल नहीं देता। इसका आधार क़ुरान में बतायी गईं वे बातें जिसमें अल्लाह ने बार-हा कहा कि हमने बहुत सारी निशानियाँ इस दुनिया में छोड़ी हैं, जिसे समझो।'

वेब साइट  TwoCircles.net  से आई राय भी इसी बात को और तर्क मुहैया कराती है। इनका कहना है, ' टेक्‍नॉलॉजी ख़ुद में बुरी नहीं है। कोई ईजाद ख़ुद में अच्‍छी या बुरी नहीं होती लेकिन ये तो निर्भर करता है कि हम इसका इस्‍तेमाल कैसे करते हैं?

चाक़ू का इस्‍तेमाल आप सब्‍जी काटकर अपना पेट भरने के लिए कर सकते हैं या फिर आप उसका इस्‍तेमाल किसी को जख्‍़मी करने के लिए करें। लिहाज़ा टीवी का इस्‍तेमाल अगर इल्‍म और तरबियत के लिए किया जाए तो यह बहुत अच्‍छी बात होगी।'

टू सर्किल दूसरा पहलू भी सामने लाती हैं, 'हाँ कुछ उलमा तस्‍वीरों को बहुत बुरा मानते हैं लेकिन इस सोच में काफी बदलाव आया है और अब तो नदवा और देवबंद को भी टीवी चैनल खोलने की रिक्‍वेस्‍ट की जा रही है। नासिरूद़दीन साहब ने काफी अच्‍दा लिखा है कि मीडिया डेमोक्रेसी का ऑक्‍सीजन है।'

यह एक ऐसी बात है जो विमर्श का जमीन मुहैया कराती है न कि विवाद का। आगे टू सर्किल का कहना है, '...और मुसलमानों की एक अच्‍छी ख़ासी आबादी टीवी के ज़रिए मुल्‍क़ और दुनिया का हाला जान पाती है। इसलिए टीवी के खि़लाफ मुहिम मुसलमानों को सामाजी तौर पर कमज़ोर करेगी।'  फिर एक आँकड़ा पेश करते हैं क‍ि मुसलमानों के पास ख़बर पाने का ज़रिया क्‍या है- 

How do Muslims get news:
Oral sources: 50.1% rural, 36.1% urban
TV: 13.2% rural, 42.9% urban
Radio: 20% rural, 19% urban
Newspapers: 9%rural, 20.2% urban

यह बात सबसे अहम है। और इनमें से किसी ने साँस की डोर थामने की बात नहीं की। बल्कि ये जाहिलियत के अँधेरे से बाहर निकलने की कोशिश में लगे हैं। इसलिए जब हम समाज को देखें तो बेहतर हो कि 'हम' और 'तुम' में बाँट कर न देखें। क्‍योंकि जो 'तुम' में है, वह 'हम' में भी होगा या हो सकता है।

Tuesday, July 15, 2008

... तो टीवी देखना इस्लाम के खिलाफ़ है! (Ooh...Watching TV is against the Islam!)

सनिचर 12 जुलाई की सुबह मेरठ के लावड़ कस्‍बे के पास दौराला रोड पर लोगों का हुजूम लगा था। जिसे देखिए वही अपनी गाड़ी लगाकर तमाशा देख रहा था। समझना चाह रहा था कि आखिर यह हुआ क्‍या। क्‍या हो रहा है। ... लोग अपने घरों से टीवी उठाकर ला रहे हैं और सड़क पर पटक रहे हैं। कोई वीसीडी प्‍लेयर लिए चला आ रहा है तो किसी के हाथ में टेपरिकार्डर। ... टीवी, टेपरिकार्डर, सीडी और सीडी प्‍लेयर ... जिस घर में जो था ... सब तोड़ दिए गए। कहीं किसी सामान की साँस न चलती रहे, इसलिए इतिमिनान के लिए मलबे में आग लगा दी गई। राख... सब कुछ खाक।

पर यह हुआ क्‍यों।

इन सबकी अगुआई कर रहे नेता जी कहना था कि 'ये सारी चीज़ें अश्‍लीलता और जुर्म को बढ़ावा देने का सबब हैं। नौजवान अपनी जिम्‍मेदारियों से दूर हो रहे हैं।' और तो और उन्‍होंने एक और लुकमा जोड़ दिया... 'यह सारी चीज़ें इस्‍लाम विरोधी हैं। ऐसा इस्‍लाम के विद्वानों ने बताया है। मुसलमानों के लिए इन्‍हें देखना हराम है। इनकी अपील है कि मुसलमान टीवी... सीडी प्‍लेयर इस्तेमाल न करें और कर रहे हैं तो इनकी तरह घर से इन्‍हें बेदख़ल कर दे।'

इस्‍लाम के पहले के युग को जाहिलियत का युग कहा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इस्‍लाम ने अपने समय की ढेर सारी कुरीतियों को कुसंस्‍कार को दूर करने और कई पर पाबंदी लगाने का काम किया। जैसे बेटी को मारने की प्रथा पर पाबंदी... औरतों को विरासत में हक दिलाना... वगैरह वगैरह। इस मामले में यह मज़हब यथास्थिति का हिमायती नहीं रहा और अपने समय से आगे रहा। तो अब ज़रा सोचिए, चौदह सौ साल पहले बहुत कुछ ऐसा नहीं था, जो आज है। तो इनके होने और इस्‍तेमाल के बारे में मज़हब का नज़रिया क्‍या होगा या होना चाहिए, यह सबसे अहम सवाल है।

क्‍या जो भी चीज आधुनिक युग की देन है, उन सबको नकारा जाएगा। तब तो जंगल में पत्‍ते बटोरकर, पत्‍ते खाकर, पत्‍ते पहनकर, पत्‍तों पर सोकर ही जि़दगी बसर करनी चाहिए। यह मान लेना चाहिए कि इस्‍लाम की घड़ी की सुई 14 सौ साल पहले ही अटकी हुई है। फिर क्‍या टीवी और टेप रिकार्डर के साथ ही हर चीज, जिसका ईजाद इस्‍लाम के आने के बाद हुआ, उसके इस्‍तेमाल पर पाबंदी लगेगी। यह तो इस्‍लाम की सीख नहीं बताती है।

असल में दिक्‍कत यह है कि जाहिलियत का युग, इस्‍लाम के आने के बाद ख़त्‍म नहीं हुआ। ऐसे मामलों को देखकर तो यही लगता है। जाहिलियत का अँधेरा अब भी बरकरार है। ऐसे लोग और ऐसी घटनाओं, कुछ और करती हों या न करती हों, इस्‍लाम का मज़ाक जरूर बनाती हैं।

समझने की बात है कोई तकनीक या नया अविष्‍कार अपने आप में न तो अश्‍लील होता है और न मज़हब विरोधी। उसका इस्‍तेमाल कौन, किस मक़सद से कर रहा है, यह सबसे अहम है। अगर सास बहू के सीरियल हैं तो क्‍यू टीवी भी है। अगर दस बुरी फिल्‍में हैं तो कई अच्‍छी फिल्‍म भी। क्‍यों नहीं सबसे पहले क्‍यू टीवी और अल जज़ीरा चैनल बंद करवा दिए जाते हैं। हुजूर, ये सारे माध्‍यम सूचना और जानकारी पहुँचाने के औजार हैं। आज के वक्‍त में इनकी वैसी ही जरूरत है, जैसे दाना-पानी की। यह ऑ‍क्‍सीजन का काम करते हैं। जम्‍हूरियत की जरूरत हैं।

इसलिए, नौजवान अश्‍लीलता के आगोश में डूबेगा या नहीं, जुर्म के गलियारे में फँसेगा या नहीं... यह तो बाद की बात है, पर इतना तो तय है कि वह दुनिया के बेशुमार इल्‍म और जानकारी की दौलत से महरूम जरूर रह जाएगा। और आज के वक्‍त में यही जाहिलियत है। इसका अँधेरा कैसे मिटेगा।

Wednesday, July 9, 2008

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर।

दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेरणा का स्रोत है। और हिन्‍दुस्‍तानी सेक्‍यूलरिज्‍म और जम्‍हूरियत को अपना आदर्श मानते हैं। वे इसके लिए लिखते हैं। मुहिम चलाते हैं। जेल जाते हैं। लेकिन जब वे इस मुल्‍क का हाल भी वैसा ही देखते हैं, तो परेशान हो जाते हैं।

इसी परेशानी का सबब है, कि फ़हमीदा रियाज़ Fahmida Riyaz जैसी शायरा बेचैन हो कर एक नज्‍म लिखती हैं लेकिन उनका लिखा यहाँ के 'राष्‍ट्रवादी तत्‍वों' को पसंद नहीं आता है। उन पर दिल्‍ली में एक कार्यक्रम में हमला होता है। आपके लिए पेश है वही नज्‍म।

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई 

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

 

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे ?

सारे उल्‍टे काज करोगे !

अपना चमन ताराज़ करोगे !

 

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फ़तवे जारी

 

होगा कठिन वहाँ भी जीना

दाँतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

 

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

क्‍या हमने दुर्दशा बनायी

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

 

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हँसी आज आयी

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

 

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा

उल्‍टे पाँव चलते जाना

ध्‍यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

 

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया जमाना

 

एक जाप सा करते जाओ

बारंबार यही दोहराओ

'कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत'

 

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे

बस परलोक पहुँच जाओगे

 

हम तो हैं पहले से वहाँ पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहाँ से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

 

Friday, July 4, 2008

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है।

कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर।

एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई नए बनेंगे। जिस चीज का दूर-दूर तक मज़हब के साथ लेना-देना नहीं है, उस डील के साथ भी मजहब की डील हो गई।

यह हमारे सियासतदानों को भा गया। इसमें कोई पीछे नहीं रहा। क्‍या वाम, क्‍या दक्षिण। अपने-अपने पक्ष में तर्क जुटाने के लिए सबने निकाल लिया, करार का मजहबी एंगिल। मजहबी रहनुमाओं को भी लुभाने लगा। और दीन की रहनुमाई करने वाले पहुँच गए दुनियावी रहनुमा के आस्‍तान: पर।

निहायत सेक्‍यूलर मसले पर धर्म का कर्म का काम करने वाले दखलंदाजी न करें, आदर्श स्थिति तो यही है। वरना हम तो हम पूछेंगे ही भई कि जब दलितों पर अत्‍याचार होता है, महिलाओं पर जुल्‍म होता है, नौजवान हाथों को काम नहीं मिलता... तब मजहबी रहनुमा कहाँ चले जाते हैं।  यही नहीं सियासतदानों की राजनीति उस समय क्‍यों चुक जाती है, जब धर्म के नाम पर बाँटने का काम होता है। राजधर्म भले याद न रहे, धर्म की राजनीति जरूर याद रहती है।

भई, क्‍यों इस मुल्‍क में कभी अयोध्‍या तो कभी अमरनाथ तो कभी डील के नाम पर धर्म और राजनीतिक के घालमेल की कोशिश की जाती है। ऐसा जब-जब होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं। नफ़रत फ़ैलती है। इस मुल्‍क की रूह ऐसी राजनीति के माफि़क़ नहीं है।

Thursday, July 3, 2008

तो यह तैयारी की झलक है

तो यह तैयारी ऐसे ही वक्‍त के लिए थी। यह बात बृहस्‍पतिवार को समझ में आई। चकाचक क्रिज वाला भगवा शर्ट पहने... कान में मोबाइल की आवाज पकड़ने वाला मशीन लगाए...हाथों में चमकता त्रिशूल लहराते नौजवान..गदा उठाए... जी हाँ... ये हैं ‘तेजस्‍वी’ और ‘वीर बालक’। यह छवि उसी इंदौर की है, जहाँ ‘सांस्‍कृतिक’ काम करने वाले एक संगठन के लोग पिछले दिनों खुलेआम बंदूक से गोलियाँ दाग रहे थे। क्‍यों। क्‍यों क्‍या...प्रैक्टिस कर रहे थे...

ये लोग भी इन्‍हीं के भाई बंधु हैं, ऐसा कहा जाता है। यह सड़क पर उतरें और भू-डोल न हो, तो इनका उतरना बेमानी। इनका कमाल देखिए, रथ पर चलते हैं, पीछे-पीछे अपने-आप भू-डोल होता जाता है। बृहस्‍पतिवार को देश बंद कराने चले, तो हो गया भू-डोल। और फिर बंदूक चलाना और त्रिशूल लहराना, सीखने का फायदा क्‍या, जब उसका इस्‍तेमाल ही न हो। तो हो गया इस्‍तेमाल। लग गया इंदौर के कई इलाकों में कर्फ्यू।

राष्‍ट्रीय अस्मिता का सवाल है जनाब, थोड़ा बर्दाश्‍त तो करना पड़ेगा। न ही करेंगे तो मुश्किल होगी। क्‍या हुआ जो राष्‍ट्रहित में चाय की देगची उलट दी। मिठाई बनाने का दूध पलट दिया। किच-किच क्‍यों करते हैं, भगोने को दो लात ही तो मारी थी। दुत, टेसू बहा रहे हैं, राष्‍ट्र हित में एक दिन खोमचा बंद नहीं कर सकता था। दो हाथ ही तो दिया। जवानी का जोश है, भई। बर्दाश्‍त कीजिए। अब बताइये, यह क्‍या बात हुई, बंद करा रहे थे, तो व्‍यापारी जी ने आग लगा ली। अरे एक दिन शुभ लाभ न होता तो कौन सी आफत आ जाती... संस्‍कृति की रक्षा की खातिर भी हानि बर्दाश्‍त नहीं।

... यह तैयारी की झलक है, भई। दूसरे के साथ होता है, बड़ा मजा आता है। खून बढ़ जाता है। है न। पर जिनके मुँह स्‍वाद लग गया है, उनसे कोई कितने दिन बचा रह सकता है। पता हो तो जरूर बताइयेगा, गलियाइयेगा नहीं। प्‍लीज।

Wednesday, June 18, 2008

यह तैयारी किसके लिए है

यह तैयारी किसके लिए ? किसके खिलाफ ? किसकी हिफाजत के लिए ? क्‍यों और कौन लोग कर रहे हैं? एक चैनल के जरिए खबर आई कि इंदौर में सरेआम राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के कार्यकर्ता एक पार्क में हवाई फायरिंग कर रहे थे। एक-दो नहीं बल्कि कई। जाहिर है, ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज़ सुनाई दी होगी तो आस-पड़ोस के लोग खुशी से झूम नहीं उठे होंगे। डर ही गए होंगे। तो ये किसे डराया जा रहा है ? यह तैयारी किनके खिलाफ काम आएगी ?

इससे पहले भी, उत्‍तर प्रदेश के कई शहरों में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कैम्‍पों में त्रिशूल को सही पकड़ने और लड़कियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिए जाने की खबर आई थी।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि रक्षा मंत्रालय ने सीमा की हिफाजत का जिम्‍मा संघ परिवार को आउटसोर्स कर दिया है। भई आउटसोर्सिंग का जमाना है, कुछ भी मुमकिन है। सीमा की हिफाजत नहीं, तो हो सकता है, शहर और मोहल्‍ले की हिफाजत का जिम्‍मा मिल गया हो। लेकिन सवाल फिर वही, किससे, किसकी हिफाजत ? कौन है भई ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि वैसी ही हिफाजत की तैयारी हो, जैसा गुजरात नाम के राज्‍य में कभी हुआ था। गुजरात का नाम सुनकर भड़किए मत। बस बात जल्‍दी समझ में आ जाए इसीलिए नाम लिया। असल में स्‍कूल में उदाहरण सहित बताएँ या समझाएँ- वाला सवाल बहुत आता था। वही आदत बनी हुई है। खैर, यह क्‍यों कर रहे हैं, इनके दिल की बात राम ही जानें।

पर राम का नाम लेकर यह क्‍या-क्‍या हो रहा है। एक और खबर आई है, कि महाराष्‍ट्र के आतंक विरोधी दस्‍ते ने ठाणे और नवी मुम्‍बई के दो ऑडिटोरियम में बम धमाका करने के इलजाम में दो और दो, चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इन सबका जुड़ाव सनातन संस्‍था और हिन्‍दू जनजागृति समिति से है। यह हिन्‍दुत्‍व वाले हैं। (हिन्‍दू मजहब और हिन्‍दुत्‍व में फर्क है। यही जनाब वीर सावरकर समझाते हैं और मैं उनसे राज़ी हूँ।) इससे पहले भी नासिक में दो बजरंग दली बम बनाते मारे गए थे।

फिर वही सवाल कि बम किसके लिए बन रहा था/है और किन पर बम फेंका जाता/जाएगा ? भगत सिंह ने भी बम फेंका था लेकिन बहरों को सुनाने के लिए। उससे किसी को खराश तक नहीं आई थी। हॉं, पूरे मुल्‍क में एक वैचारिक बहस जरूर शुरू हो गई थी। ये तो मरने-मारने वाले बम हैं। किसे मारने का प्‍लान है ? किसे भगाने की योजना है ? कोई बताता ही नहीं।

लेकिन एक बात अटक रही है। ज़रा गौर करें। एक संगठन, जिसके नाम में कहीं मुस्लिम, तो कहीं इस्‍लाम, तंजीम या इदारा जैसे अल्‍फाज हों और इनके कारकुन इंदौर के किसी पार्क में हथियार की ट्रेनिंग ले रहे हों या इस तरह सरेआम फायरिंग कर रहे होते, तब तक क्‍या होता ?

एक और बात, फर्ज कीजिए अगर ठाणे और नवी मुम्‍बई के ऑडिटोरियम में हुए बम धमाकों में किसी इस्‍लामिक मूवमेंट या मुजाहिदीन या जेहादी टाइप नाम वाले संगठन के सदस्‍य पकड़े जाते तो मीडिया और दूसरे जिम्‍मेदार इस खबर को क्‍या वैसे ही लेते जैसे मंगलवार 17 जून 2008 को इनकी खबर को तवज्‍जो दिया गया है। (जनाब, इस दिन का अख़बार और टीवी चैनल खँगाल डालिए शायद ही यह खबर नजर आ जाए।)

क्‍या यह खबर, मिथकों और भ्रांतियों से जूझते समाज का आँख खोलने वाली नहीं होती ? क्‍या इस खबर से यह नहीं होता कि बम किसी मजहब की जागीर नहीं है और खून-खराबे पर किसी का कॉपीराइट नहीं। लेकिन नहीं... भ्रम बना रहे है, यही अच्‍छा है।

लेकिन सवाल तो वहीं रह गया, जहाँ से बात शुरू हुई थी। आखिर यह तैयारी किसके हक में है, किस के खिलाफ ? यानी हम और तुम में समाज बॉंटा जाएगा। है न। तब ही तो दुश्‍मन तैयार होगा। तब ही तो इस तैयारी का इस्‍तेमाल होगा। अब सोचना यह है कि हम और तुम में, हम सब किस पाले में हैं। या हम इससे इतर कोई मजबूत पाला बनाने को तैयार हैं।

Monday, March 24, 2008

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।

 

इन्‍हें भी देखें

'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...'

कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन

Saturday, March 22, 2008

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दुस्तान की गंगा जमनी तहजीब का अगर कोई सबसे मजबूत वाहक है, तो वह हैं नजीर अकबराबादी। नजीर एक शायर नहीं, बल्कि परम्परा हैं। जो इस बात की मजबूत दलील पेश करते हैं कि इस मुल्क में रहने वाले लोगों के मजहब भले ही अलग-अलग हों, उनकी तहजीब की जड़ एक है। उस जड़ को बिना 'जड़' बनाए आगे बढ़ाते रहना ही, हिन्दुस्तान की असली परम्परा है। आज इसी मिली-जुली संस्कृति पर कई ओर से हमला हो रहा है। एक खास विचारधार इस बात पर यकीन करती है कि इस मुल्क में संस्कृति और धर्म के आधार पर मेलजोल मुमकिन नहीं है। इसके लिए वे नफ़रत और हिंसा फैलाने में यकीन रखते हैं। हमारे आस-पास नफ़रत फैलाने वाले ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है।
ऐसे में होली के मौके पर नजीर को याद करना जरूरी है। होली पर जितना नजीर ने लिखा है, उतना शायद ही किसी और ने लिखा हो। यह बात हर साल इसलिए याद दिलाने की जरूरत है ताकि कुछ लोग जो भारतीय संस्कृति के एकमात्र दावेदार होने की घोषणा करते हैं, नजीर की शायरी में अपना असली चेहरा देखें। नजीर की ढेर सारी होली कविताओं में से दो की चंद लाइनें आपके सामने पेश है।
होली मुबारक!!!!!!

होली- 1

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

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जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।
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होली- 2

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीशए (सागर) जाम (शराब का प्याला) छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
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गुलज़ार (बाग़) खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

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Thursday, March 13, 2008

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं।

उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है।

जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ।

उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'।