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Wednesday, August 8, 2007

मदरसे पर हमला, इमाम की पिटाई

पहले बसपा और अब सपा। श्रावस्ती में एक अंतधार्मिक शादी के बाद हुए हमले और यौन हिंसा में बसपा नेताओं का नाम आया था तो सिद्धार्थ नगर में एक मदरसे पर हमले में सपा नेता का नाम आ रहा है। उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियां अल्पसंख्यकों की कितनी हितैषी हैं, ये घटनाएं एक झलक भर हैं।

सिद्घार्थ नगर के अटवा तहसील के मौजा हरिबंधन पुर में कल 7 अगस्त को बन रहे मदरसे तालीमुल कुरान की दीवार और अन्य  हिस्से को गांव के ही दूसरे फिरके के लोगों ने हमला कर तोड़ दिया। मदरसे के कर्ताधर्ता की पिटाई की। बताया जा रहा है कि हमलावरों का नेतृत्व समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष अजय उर्फ झिंकू कर रहा था।

गांव की आबादी लगभग 700 है, जिसमें पाँच छह फीसदी अल्पसंख्यक हैं। यह मदरसा 20 साल पुराना है और छप्पर के मकान में चल रहा था। अभी तक किसी विवाद की बात सामने नहीं आयी है और इसकी जमीन भी रजिस्टर्ड है। अभी इसे लोगों के चंदे से पक्का बनाने की कोशिश हो रही थी। अहले सुबह हुए हमले में वहां काम कर रहे मजदूर औरत-मर्द की पिटाई हुई। मदरसे के कर्ताधर्ता 85 साल के मोहम्मद सलीम भी पिटाई के शिकार हुए। गांव में इस तामीर को लेकर पहले ही तनाव की आशंका जाहिर की जा चुकी थी। पुलिस भी तैनात थी। ऐसा बताया जा रहा है कि हमलावरों ने पुलिस की राइफल छीन ली थी। और जब उन्होंने मदरसे की दीवार गिरा दी तब जाकर राइफल दी। मदरसे में लगे जंगले, दरवाज़े और दूसरे सामान भी हमलावर उखाड़ कर ले गये।

हमलावरों को रास्‍ते में अल्पसंख्यक समुदाय का जो भी मिला, उसकी पिटाई की। बाद में एसएसपी और डीएम घटना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। आज आठ अगस्त को डीआईजी ने भी गांव का जायजा लिया। इस मामले में सपा नेता अजय उर्फ झिंकू समेत 45 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। तीन दारोगा को निलम्बित कर दिया गया है। इस घटना के बाद गांव के 'शिव का चबूतरा' को भी क्षतिग्रस्त किये जाने की खबर है।

हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश में हो रही, यह घटनाएं कहीं एक बड़े अनिष्ट की ओर तो इशारा नहीं कर रहे हैं। नागरिक समाज और राजनीतिक दलों का जो हाल है वह इससे लड़ पाने में फिलहाल सक्षम नहीं दिखते। इसलिए वक्त का तकाजा है कि जिन लोगों और संगठनों को देश की बहुलता और ना‍गरिक अधिकारों पर यकीन है, वे ऐसी ताकतों का सामना करने के लिए आगे आयें।

Saturday, July 7, 2007

''राष्‍ट्रवादियों'' का देश के ''गद्दारों'' पर हमला।

चश्‍मदीद शबनम हाशमी ने बयान की अहमदाबाद में हमले की दास्‍तान
छह जुलाई को गुजरात में संघ परिवार ने फिर हमलावर तेवर दिखाने की कोशिश की और राज्‍य का तंत्र मूक दर्शक बना देखता रहा। यह हमला 'अनहद' द्वारा नौजवानों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ। अनहद ने छह से आठ जुलाई तक अहमदाबाद में अमन, कौमी भाईचारा और इंसाफ के लिए आयोजित राष्‍ट्रीय छात्र महोत्‍सव का आयोजन किया है। इस आयोजन में पूरे देश से चुने गये स्‍कूली बच्‍चों की 60 पेंटिंग, मीडिया के विद्यार्थियों की 80 डिजायन और 45 डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म का प्रदर्शन हो रहा है।

सेंट जेवियर सोशल सर्विस सोसायटी के फादर एरविती मेमोरियल हाल में प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रोफेसर शिवजी पण्णिकर को करना था। जबकि सेंट जेवियर हाई स्‍कूल कैम्‍पस के लोयला हॉल के डायमंड जुबली ऑडिटोरियम में स्‍टूडेंट वीडियो डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म महोत्‍सव का उद्घाटन नफीसा अली को करना था। करीब पौने ग्‍यारह बजे जैसे ही प्रोफेसर पण्णिकर जेवियर कैम्‍पस की गेट तक पहुंचे, उनकी कार को एक भीड़ ने घेर लिया। वे पण्णिकर के खिलाफ नारे लगा रहे थे... पण्णिकर वापस जाओ... भारत माता की जय...

बकौल, कार्यक्रम की आयोजक और अनहद की कर्ताधर्ता शबनम हाशमी, ' मैं किसी तरह भीड़ में घुसी और पण्णिकर की कार तक पहुँचने में कामयाब हो गयी। भीड़ से हमारी ओर लगातार पत्‍थरबाजी हो रही थी। उनमें से एक ने लोहे का ड्रम उठाकर कार की बोनेट पर दे मारा। उसी ड्रम को दोबारा फिर किसी ने फेंका‍, जिससे कार का अगला शीशा चकनाचूर हो गया। इसी बीच नौजवान फोटोग्राफर साहिर वहां पहुँचा और किसी तरह ड्रम उनसे छीनने में कामयाब रहा लेकिन इस जद्दोजहद वह खुद जख्‍़मी हो गया। दो हमलावरों ने दो ईंटें फेंकी, जो शीशे को तोड़ता हुआ ड्राइवर की पेशानी से जा टकराया। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि मुझे समझने में कुछ मिनट लग गये। मैं दरवाजे़ के पास खड़ी हो गयी ताकि ये हमलावर पण्णिकर को अपने साथ ले जाने में कामयाब न हो पायें। इसके बाद मैं काफी जोर से चिल्‍लाने लगी। कुछ क्षण के लिए वे भी ठिठक गये। इस बीच मैंने पण्णिकर और ड्राईवर को वहां से तेज़ी से निकलने को कहा। मैंने उन्‍हें सलाह दी कि तुरंत किसी नज़दीक के पुल‍िस स्‍टेशन जायें।'

तब तक इन हमलावरों को आभास हुआ कि ये लोग निकल रहे हैं। उन्‍होंने रास्‍ता रोकने की कोशिश की, पथराव किये पर तब तक कार तेज़ी से निकल गयी। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता गगन सेठी और वैज्ञानिक-फिल्‍मकार गौहर रज़ा, जो उसी परिसर में मौजूद थे, पण्णिकर की मदद के लिए नवरंगपुरा थाने की ओर गये।

इसी बीच वहां मौजूद ये हमलावर, बाहर लगी होर्डिंग और दूसरी चीज़ों की तोड़ फोड़ में जुट चुके थे। उन्‍होंने परिसर के अंदर जबरदस्‍ती घुसने की कोशिश की। वे गुजराती में नारे लगा रहे थे... मोदी अमर रहे... देश के गद्दारों वापस जाओ... भारत माता की जय... उन्‍होंने परिसर में लगी सभी डिस्‍पले तोड़ डाले। जब इन्‍हें रोकने की कोशिश हुई तो इन्‍होंने शबनम हाशमी, स्‍वरूप बेन, जकिया जौहर, बिना बेन को धमकाया।

बकौल शबनम, 'ये लोग भद्दी-भद्दी गालियां दे रहे थे, अश्‍लील इशारे कर रहे थे और जुमले उछाल रहे थे। उनकी शारीरिक मुद्रा काफी आक्रामक और अश्‍लील थी।' ये लोग जहां स्‍वरूप बेन, जकिया और बिना बेन को 'गद्दार' के तमगे़ से नवाज़ रहे थे, वहीं शबनम के खिलाफ इनका इलज़ाम था कि एक बाहरी, गुजराती अस्मिता से खिलवाड़ कर रही है। यह सब करीब 20 मिनट तक चलता रहा। इसी बीच इनमें से एक शख्‍स ने इन गुंडों को इशारा किया कि पुलिस आ रही है और वे सभी वहां से खिसक लिये। शबनम ने इशारे करने वाले शख्‍़स की पहचान स्‍था‍नीय खुफिया पुलिस कर्मचारी के रूप में की। यानी पुलिस की मिलीभगत और जानकारी में सब कुछ हुआ।

शबनम ने बताया '...पुलिस पहुँची तो मैंने पाया कि पुलिस वालों के साथ सादी वर्दी में खड़ा शख्‍स, वही है, जिसने इशारा करके हमलावरों को भागने को कहा था। मैं पुलिस वालों के पास गयी और बताया कि यह शख्‍स तो हमलावारों के साथ था, तो पहले उन्‍होंने मेरी बात को नज़रंदाज़ किया। फिर कहा... नहीं... यह तो पुलिस का आदमी है। बाद में थाने में भी मैंने उस शख्‍स की पहचान की और इंस्‍पेक्‍टर को बताया भी, लेकिन उसने भी इस बात पर कोई तवज्‍जो नहीं दी। यहां तक कि पुलिस कमिशनर ने भी इस बात को अनुसनी कर दी। यानी यह हमला पुलिस, भाजपा और संघ परिवार का साझा ऑपरेशन था।'

करीब एक बजे पण्णिकर की एफआईआर दर्ज़ हुई। शबनम ने भी अपनी ओर से एक एफआईआर दर्ज़ कराना चाहा लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। इस बीच देर से ही सही कार्यक्रम शुरू हुआ। शाम पाँच बजे, अनहद के साथी, दूसरे संगठनों के कार्यकर्ता और वकील एफआईआर दर्ज़ कराने फिर थाने पहुँचे। ये लोग अपने साथ घटना की तस्‍वीरें, हमलावरों की तस्‍वीरें भी साथ लेकर गये थे। लेकिन पुलिस ने रात नौ बजे त‍क इन्‍हें बैठाये रखा पर एफआईआर दर्ज़ नहीं की। क्‍योंकि अगर एफआईआर दर्ज़ होती तो पुलिस को उन हमलावरों को गिरफ्तार करना पड़ता जिनकी पहचान अनहद ने फोटो देकर करने की कोशिश की थी। यह हमला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है‍ कि गुजरात में लोकतंत्र, कौमी भाईचारा और शांति की बात करना आज भी कितना मुश्किल है।

Sunday, June 3, 2007

महाश्वेता देवी की नज़र में विभूति

बिरले ही ऐसे पुलिस अफसर मिलते हैं, जो वर्दी की जिम्मेदारी के साथ-साथ समाज में हो रही उथल-पुथल का समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी करते हैं। विभूति नारायण राय ऐसे ही पुलिस अफसर हैं। वे वर्दीधारी अफसर हैं। साहित्यकार हैं। जिज्ञासु शोधार्थी भी। मूलत: उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले के रहने वाले विभूति की तालीम बनारस और इलाहाबाद में हुई। 1971 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। 1975 से भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अफसर हैं।कुछ सालों के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में भी रहे। बतौर साहित्यकार उनकी सबसे मशहूर रचना 'शहर में कर्फ्यू' है। भारतीय पुलिस अकादमी की फेलोशिप के तहत साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस पर किया गया उनका रिसर्च काफी चर्चित रहा है।1857 के विद्रोह पर भी उन्होंने नये सिरे से विचार करने की कोशिश की है। ढाई आखर के पाठक विभूति के विचार पहले ही पढ् चुके हैं। विभूति किस शख्सियत के मालिक हैं, प्रख्यात साहित्यकार, समाजसेवी महाश्वेता देवी ने कुछ दिनों पहले हिन्दुस्तान में उनके बारे में अपनी राय जाहिर की है। विभूति, बकौल महाश्वेता देवी- ढाई आखर के पाठकों के लिए।
विभूति की बेबाकी विस्मयकारी
दंगे भारत के माथे पर कलंक है। दंगे पर भारतीय भाषाओं में काफी लिखा गया है, लेकिन विभूति नारायण राय कृत 'शहर में कर्फ्यू' इस अर्थ में सबसे अलग है कि रचयिता ने ऐसे दंगों को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में निकट से देखा और प्रामाणिक चित्र उपन्यास में खींचा। विभूति का यह उपन्यास मैंने हिन्दी में ही पढ़ा था। बाद में मैने इसका बांग्ला में अनुवाद कराया, जो मासिक 'भाषा बंधन' के पूजा विशेषांक में छपा और अब यह ग्रंथ मित्र प्रकाशन से यह पुस्तकार छपा है। बांग्ला में यह औपन्यासिक कृति बहुत समादृत हुई है। इसके बारे में नवारूण भट्टाचार्य ने लिखा है, 'शहर में कर्फ्यू' एक दस्तावेजी उपन्यास है। इसके साथ बांग्ला ही क्यों, भारत की किसी भाषा की रचना से तुलना नहीं हो सकती। साम्प्रदायिक दंगे किस प्रकार होते हैं और कौन इस नृशंसता के शिकार होते हैं, यह जानने के लिये 'शहर में कर्फ्यू' पढ़ना पड़ेगा।'
नवारुण ने जो लिखा है, उसी में बांग्ला के आलोचकों और पाठकों की राय अंतर्निहित है। मेरी राय भी। पुलिस सेवा में रहते हुए राज्य और जनता के रिश्तों पर जिस बेबाकी से विभूति ने कलम चलाई है, वह मेरे लिये विस्मयकारी है। अपने बेबाक वर्णन-विश्लेषण में विभूति ने पुलिस को भी नहीं बख्शा है। विभूति एक वक्तव्य में कहते हैं कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस और फौज का काम देश के सभी नागरिकों की रक्षा करना है, हिन्दुत्व के औजार की तरह काम करना नहीं है। इस बेबाक वक्तव्य में ही हम विभूति की विलक्षणता और विशिष्टता का संधान आसानी से कर सकते हैं। विभूति की बेबाकी से सिर्फ मैं ही नहीं विस्मित हुई हूँ। अनेक अन्य लोंगों को भी भरोसा नहीं है कि पुलिस सेवा में वरिष्ठ पद पर रहते हुए उन्होंने साम्प्रदायिक दंगों पर इस तरह कलम चलाई है। इसीलिए 'मुस्लिम इंडिया` के संपादक शहाबुद्दीन, विभूति को रिटायर्ड पुलिस अफसर लिखतें हैं। यह तथ्य दीगर है कि वे अभी भी पुलिस सेवा में हैं। संप्रति वे उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) हैं। विभूति ने 'शहर में कर्फ्यू' तब लिखा जब इलाहाबाद में वे एसपी (सिटी) थे और उसी समय इलाहाबाद का पुराना हिस्सा दंगों के चपेट में था। उसी दंगे की दरिंदगी विभूति के अनुभव संसार का अंग बन गई। विभूति को भारतीय पुलिस अकादमी की एक फेलोशिप भी मिली जिसके तहत उन्होंने पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में शोध भी किया। फेलाशिप के तहत वही शोध प्रबन्ध है 'साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस'।
विभूति नारायण इस धारणा को गलत साबित करतें है कि हिन्दू स्वभाव से अधिक उदार और सहिष्णु होता है और मुसलमान आनुवांशिक रूप से क्रूर होता है। वे यह भी बताते हैं कि दंगों में मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान होते हैं। विभूति बहुसंख्यक समुदाय के मनोविज्ञान की बात करतें है। उनका यह मानना है कि इस मनोविज्ञान को बदले बगैर, इस देश में साम्प्रदायिक दंगे नहीं रोके जा सकते 'शहर में कर्फ्यू' में लेखक बताता है कि दंगे और उसके बाद लगने वाले कर्फ्यू के दौरान सबसे ज्यादा तकलीफ कौन उठातें हैं।
उपन्यास बताता है कि सईदा यानी एक औसत मुस्लिम स्त्री 13 गुना आठ फीट के कमरे में किस तरह अपने पूरे परिवार के साथ गुजर बसर करती है। उपन्यास बताता है कि 15 साल की एक लड़की दंगे के दौरान किस तरह दंगाइयों द्वारा बलात्कार की शिकार हुई और उसकी यातना तभी खत्म हुई, जब वह बेहोश हो गई। इसके ठीक पहले वह लड़की एक लड़के प्रेम में पड़ी थी।
विभूति ने 'शहर में कर्फ्यू' के अवाला तीन अन्य उपन्यास, 'घर', 'किस्सा लोकतंत्र' और 'तबादला' भी लिखा। 'घर' उनका पहला उपन्यास है, जिसके छपते ही वे हिन्दी जगत में चर्चित हो गये थे। 'शहर में कर्फ्यू' उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ले गया।
'किस्सा लोकतंत्र' और 'तबादला` भी चर्चा में रहे। चारों उपन्यासों के अनुभव संसार अलग हैं। चारों के अनुकूल भाषा और शिल्प के सार्थक प्रयोग उन्होंने किये हैं। उपन्यासकार में जन के साथ प्रतिबद्धता है। उनमें प्रतिबद्धता के साथ नवीनता और प्रयोगधर्मिता का मणिकांचन योग भी है। उन्होंने धारदार व्यंग्य भी लिखें हैं। विभूति ने पत्रिका 'वर्तमान साहित्य' का 15 वर्ष तक संपादन किया। वे आजमगढ़ के अपने गांव में एक पुस्तकालय-श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय भी चलाते हैं। पुलिस में रहते हुए भी रचनात्मक कार्य किये जा सकते हैं, इसका विरल उदाहरण विभूति नारायण राय हैं। (हिन्दुस्तान से साभार)

Wednesday, May 30, 2007

इन बुज़ुर्गों से हम क्यों नहीं सीख लेते

एकता की अनूठी मिसाल हैं मौलाना यामीन और डॉ. हरपाल
दोनों काफी बुज़ुर्ग हैं। दोनों के जवान बेटे फिरकापरस्त हिंसा की बलि चढ़ गये। अगर मज़हब के चश्मे से देखें तो एक हिन्दू है, दूसरा मुसलमान। पर ये 'हम' और 'तुम' के मज़हबी खानों में नहीं बँटे। ये एक-दूसरे के दुश्मन भी नहीं बने। न ही इन्हें, हर दूसरा मज़हब वाला दुश्मन नज़र आता है। ये हैं मौलाना मोहम्मद यामीन और डॉ. हरपाल सिंह। मौलाना मोहम्मद यामीन मज़हबी मामलों के जानकार हैं और मेरठ नगर निगम के पार्षद रह चुके हैं। डॉ़. हरपाल राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं। नफरत के साये में रहने के बावजूद ये दोनों हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल हैं। मेरठ के हाशिमपुरा कांड की जद्दोजहद बीस साल से चलते रहने के पीछे भी यही दो बुज़ुर्ग हैं। चारों ओर बढ़ते नफरत के बीच ये लोग प्रेरणा की जीवंत मिसाल हैं।
मेरठ। मई १९८७। वही दंगा जिसमें हाशिमपुरा कांड हुआ। एक नौजवान डॉक्टर, जिसने अभी-अभी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की थी, एक मुस्लिम डॉक्टर के बुलावे पर, मुस्लिम मरीज के ऑपरेशन के लिएं बेहोशी की दवा देने घर से निकलता है। दंगा, एक दिन पहले ही शहर में फैल चुका था। इसके बावजूद नौजवान डॉक्टर अपनी कार से चल पड़ता है क्योंकि उसे तो सिखाया गया था -डॉक्टर यानी इंसान के रूप में भगवान। उसके पास ऑक्सीजन के सिलेंडर और और ऑपरेशन के लिए कुछ जरूरी सामान थे। रास्ते में दंगाई उसे घेर लेते हैं। कार में आग लगा देते हैं। जली हुई कार में सब कुछ खत्म हो जाता है। यह डॉक्टर प्रभात कुमार थे। डॉ. हरपाल सिंह के बेटे। कार इतनी जल चुकी थी कि हरपाल साहब के लिए कुछ भी पहचान पाना मुश्किल था। बेटे की मौत की सचाई से अभी रूबरू ही हो रहे थे कि हाशिमपुरा कांड का पता चला। अपना गम़ पीछे कर वे हाशिमपुरा के लोगों की खोज खब़र में लग गये।
तीन साल बाद मेरठ में एक और दंगा होता है। जगह-जगह पर दंगाई उन लोगों को निशाना बना रहे थे, जो उनके धर्म के नहीं थे। यानी मुसलमान नामधारी दंगाई हिन्दुओं को और हिन्दू नामधारी दंगाई मुसलमानों को निशाना बना रहे थे। एक इलाके में मुसलमान नामधारी दंगाई पहुँचते हैं और हिन्दुओं को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं। पड़ोस का एक मुसलमान नौजवान निकलता है और अपने हिन्दू पड़ोसियों की ढाल बन जाता है। वो उन्हें बचाने में कामयाब होता है। इस बीच उसकी दंगाइयों से तकरार होती है। वे उसकी लानत मलामत करते हैं। उससे हिन्दुओं को सौंपने की माँग करते हैं। वह उन्हें जवाब देता है कि उसके पड़ोसी अच्छे लोग हैं। उनका इन दंगों से कोई वास्ता नहीं है, वो इन्हें नहीं सौंपेगा। इसी तकरार में उसे चाकू मार दी जाती है। पड़ोसियों को बचाने के दौरान मरने वाला यह नौजवान मौलाना मोहम्मद यामीन का २४ साल का बेटा तारिक रशीद था। वकालत की पढ़ाई कर रहा था और धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बन कुर्बान हो गया।
दोनों बाप, अपने बेटों के गम़ को, सामूहिक गम़ के आगे भूल गये। हाशिमपुरा कांड के वक्त मौलाना यामीन को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था और इन्हें इस दर्दनाक घटना की जानकारी जेल में हुई। जेल से बाहर आने के बाद दोनों ने मिलकर इंसाफ की लड़ाई शुरू की।
दोनों के विचार गौर करने लायक है। डॉ. हरपाल का मानना है कि सामान्य सोच है कि मुसलमान ही दंगा शुरू करते हैं। मुसलमान हमलावर होते हैं। दंगों के दौरान जिस तरह से पुलिस का व्यवहार उनके प्रति होता है, उसमें भी यह बात झलकती है। इसीलिए हाशिमपुरा जैसी घटना होती है। वो यह भी मानते हैं कि दोनों समुदायों में अच्छे और बुरे, दोनों तरह के लोग हैं। किसी भी मामले में पूरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। वहीं मौलाना यामीन को हिन्दू-मुसलमानं की एकता पर पूरा यकीन है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय एकता की बुनियाद इस मुल्क में काफी मज़बूत है और चंद फिरकापरस्त ताकत, उस ताने-बाने को तबाह नहीं कर सकते। हाशिमपुरा के लोगों को इंसाफ देने के लिए 'हाशिमपुरा कानूनी सलाह कमेटी' है। ये दोनों बुज़ुर्गवार इस कमेटी के कर्ताधर्ता हैं। हर सुनवाई पर मेरठ से दिल्ली आते-जाते हैं। ढलती उम्र के बावजूद, बीस साल का लम्बा वक्त इन्हें थका नहीं पाया है। इंसाफ की इसी जद्दोजहद में वों हाशिमपुरा के 25 औरत-मर्द के साथ लखनऊ पहुँच जाते हैं। हर जगह बिना थके और परेशान हुए अपनी बात कहते हैं। शायद इसलिए हाशिमपुरा के लोगों की यह जद्दोजहद आज भी जारी है।
डॉ. प्रभात, तारिक या फिर मौलाना यामीन या डॉ. हरपाल- ऐसे लोग आज भी बड़ी तादाद में है, तभी अभी तक सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। लेकिन जो लोग यह सब खत्म करना चाहते हैं, उनके लिए ऐसे लोग चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, उनके दुश्मन हैं। हमें तय करना होगा, हम किधर होंगे- डॉ. प्रभात, तारिक, मौलाना यामीन, डॉ. हरपाल की ओर या फिर ...
(डॉ. हरपाल और मौलाना यामीन पर अंग्रेजी में नीलेश मिश्र की रिपोर्ट हिन्दुस्तान टाइम्स में पढ़ी जा सकती है।)

Monday, May 28, 2007

मकसद, मुसलमानों को सबक सिखाना था

मेरठ के हाशिमपुरा नरसंहार को नजदीक से देखने और महसूस करने वालों में आईपीएस अफसर विभूति नारायण राय भी हैं। इस घटना के बीस साल पूरे होने पर मैंने,हिन्दुस्तान के लिए उनसे बात की। बातचीत और उनकी किताब के आधार पर तैयार रिपोर्ट ढाई आखर के पाठकों के लिए- नासिरूद्दीन
हाशिमपुरा कांड पर एक पुलिस अफसर का नजरिया
'पुलिस हिरासत में हत्या का हाशिमपुरा कांड जैसा उदाहरण खोजना मुश्किल है। असलीयत में यह नरसंहार मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए अंजाम दिया गया था। अल्पसंख्यकों के बारे में पुलिस के नजरिये का इससे बेहतर उदाहरण और दिल दहला देने वाली घटना, शायद ही कोई और हो।' सन् 1987 में हुए मेरठ के हाशिमपुरा कांड के बारे में यह ख्यालात आईपीएस अफसर विभूति नारायण राय के हैं।
बतौर गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय ने इस घटना को नजदीक से देखा था। यही नहीं, शोधकर्ता के रूप में भारतीय पुलिस पर अपने अध्ययन 'कॉम्बैटिंग कम्युनल कांफिल्कट` में इस घटना का विश्लेषण भी किया है। 22 मई 2007 को जब इस हत्याकांड के 20 साल पूरे हो गये हैं, वीएन राय घटनाक्रम की कड़ियाँ ऐसे जोड़ते हैं, मानो कल की ही बात है। चूंकि पीएसी ने मेरठ के हाशिमपुरा में तलाशी के दौरान गिरफ्तार लोगों को जहां मारा, वो दोनों जगह गाजियाबाद में पड़ती थी, इसलिए वीएन राय ने ही इनके खिलाफ दो मुकदमे दर्ज किये थे। हालांकि बाद में यह मामला सीआईडी को सौंप दिया गया।

उन्होंने इस घटना के पीछे काम कर रही मानसिकता को समझने के लिए कई पीएसी जवानों से बात की। जो बात उभर कर सामने आयी, उसमें भारतीय समाज के साम्प्रदायिक नजरिये की झलक मिलती है। आमतौर पर दूसरे समुदायों के बारे जैसा पूर्वग्रह और सोच समाज में देखा जाता है, वह पुलिस वालों के बीच भी था।
वीएन राय के मुताबिक इन पुलिस वालों का मानना था कि मेरठ में हिंसा, मुसलमानों की शरारत का
नतीजा है। यही नहीं वे मानते थे कि मेरठ मिनी पाकिस्तान बन चुका है और यहाँ मुसलमानों पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है। इसलिए अगर मेरठ में शांति कायम करनी है तो इन्हें सबक सीखाना जरूरी है ताकि वे सर न उठा सकें। वे इस अफवाह के साथ भी बह रहे थे कि मेरठ के हिन्दू खतरे में हैं और अल्पसंख्यकों के हमले के शिकार हो रहे हैं। ये पुलिस वाले इस बात के हिमायती थे कि किसी भी सभ्य समाज में दंगा, बिना मुसलमानों को सबक सिखाये नहीं रुक सकता है और उनकी यही समझ मेरठ में अमन लाने के लिए हाशिमपुरा नरसंहार की वजह बन गया। वे ध्यान दिलाते हैं कि पुलिस के साम्प्रदायिकरण का अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि जिस पीएसी की इकाई ने इस घटना को अंजाम दिया, वो उस वक्त ड्य़ूटी पर नहीं थी।
वीएन राय मानते हैं, पुलिस के ऐसे नजरिये की झलक हर दंगे में मिल सकती है, जहाँ पुलिस वालों का व्यवहार अल्पसंख्यकों के साथ दुर्भावनापूर्ण होता है। वे हाशिमपुरा की घटना को न सिर्फ बर्बर कार्रवाई मानते हैं बल्कि पुलिस वालों के गैर पेशेवराना व्यवहार का जघन्य उदाहरण भी मानते हैं। अपने शोध में वो रेखांकित करते हैं कि औसत हिन्दू या मुसलमान, एक दूसरे के बारे में जो धारणा लेकर बड़ा होता है, उन्हीं धारणाओं के साथ 18 साल की कच्ची उम्र में सिपाही भर्ती होता है। उसे महज नौ माह का पेशेवर प्रशिक्षण मिलता है। इसके बाद की पूरी सेवा में कोई प्रशिक्षण उसके लिए नहीं होता। इसलिए वो उन्हीं आग्रहों और पूर्वग्रहों के साथ ही ताउम्र ड्यूटी करता रहता है, जो 18 की उम्र में साथ लेकर आया था। हाशिमपुरा कांड के संदर्भ में वे सवाल करते हैं कि राज्य पर लोग कैसे यकीन करेंगे जबकि बीस साल बाद भी उनकी इंसाफ की जद्दोजहद जारी है। उनकी राय में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा बलों में उचित प्रतिनिधित्व देकर शायद ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।

Saturday, May 26, 2007

हाशिमपुरा याद है!


हाशिमपुरा याद है! 22 मई 1987 तक मेरठ का यह एक गुमनाम कस्बा था। पर बीस साल पहले कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस कस्बे को देश की सुर्खी बना दिया। दंगे के दौरान इस इलाके से हिरासत में लिये गये करीब 50 मुसलमानों को पीएसी की एक बटालियन उठाकर ले जाती है और रात के अँधेरे में मारकर नहर में फेंक देती है। संयोग से मरा हुआ समझ कर फेंके लोगों में पाँच, गोलियाँ लगने के बावजूद बचने में कामयाब रहे। आजाद हिन्दुस्तान में पुलिस हिरासत में इतनी बडी तादाद में हत्या का कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। नागरिक समाज उस वक्त तो उद्वेलित हुआ था पर पिछले 20 सालों में वह इसे लगभग भूल सा गया। ठीक वैसे ही जैसे असम का नल्ली, बिहार का भागलपुर या महराष्ट्र का मुम्बई भुला दिया गया या फिर अब गुजरात के दंगों को भुलाने की कोशिश हो रही है। जख्म हमेशा हरे रहे, यह अच्छी बात नहीं है। पर जख्म भरने के लिए जरूरी है कि पीड़ितों को इंसाफ मिले। ऊपर गिनाये गये किसी भी नरसंहार में लोगों को आज तक इंसाफ नहीं मिला। हजारों लोगों ने न सिर्फ अपने अजीज खोये बल्कि हजारों परिवार पीढ़ियों के लिए तबाह व बर्बाद हो गये। हाशिमपुरा के लोग पिछले 20 सालों से इंसाफ पाने की जद्दोजहद में लगे हैं। इंसाफ की आस में बीस साल बाद वे लखनऊ भी पहुँचे। क्या है हाशिमपुरा का नरसंहार, अब तक क्या हुआ, पीड़ितों की लड़ाई कहाँ तक पहुँची- पेश है घटनाक्रम।

नासिरूद्दीन
  • सन् 1986 में अयोघ्या में बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोले जाने के बाद पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव की हालत थी। इसी पसेमंजर में मेरठ में अप्रैल 1987 में दंगे भड़के, जो तुरंत ही थम गये लेकिन मई 1987 में दोबारा साम्प्रदायिक हिंसा शुरू हुई और इसने एक बड़े इलाके को काफी दिनों तक अपने घेरे में ले लिया।
  • हिंसा को देखते हुए पीएसी और सेना बुलायी गयी।
  • कर्फ्यू लगा और मुस्लिम इलाकों में तलाशी अभियान शुरू हुई।
  • 22 मई को हाशिमपुरा में जबरदस्त तलाशी अभियान हुई और 650 से ज्यादा मुसलमान मर्दों को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • इनमें से करीब 50-60 मुसलमान मर्दों को ट्रक (यूआरयू 1493) में प्लाटून कमांडर सुरेन्द्र पाल सिंह के नेतृत्व में पीएसी जवान लेकर चले लेकिन जेल की बजाय कहीं और...
  • पुलिस हिरासत में पकड़े ये लोग 13 से 65 साल के बीच के थे। पहले इन्हें गाजियाबाद के मुरादनगर के पास स्थित नहर ले जाया गया। फिर बारी-बारी से उतार कर पीएसी जवानों ने उन्हें गोली मारना शुरू किया और इन्हें नहर में फेंकते चले गये। इसी बीच गोलियों की आवाज सुनकर दूर कहीं गांव वालों ने हल्ला करना शुरू कर दिया तो ये पीएसी जवान ट्रक ले कर वहाँ से भागे। इसके बाद ये हिंडन नहर के पास पहुँचे और बाकी बचे लोगों को मार गिराया और इनके शवों को नहर में बहा दिया।
  • इस नरसंहार में छह लोग किसी तरह जिंदा निकले। जिनमें एक ने अस्पताल के रास्ते में दम तोड़ दिया। बाकी बचे पाँच लोग आज इस पूरे मामले के चश्मदीद हैं। कितने लोग मरे, ये आज तक पता नहीं चल पाया क्योंकि कई लोग अब भी लापता हैं। हालांकि सीआईडी की रिपोर्ट 43 लोगों के मरने की बात कहती है। दो लोग स्थाई रूप से विकलांग हो चुके हैं।
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने 1988 में सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिये। छह साल बाद फरवरी 1994 में सीबीसीआईडी ने अपनी रिपोर्ट दी। ऐसा कहा जाता है कि सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में 66 लोगों को इस घटना के लिए जिम्मेदार माना है। हालाँकि जांच रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गयी है।
  • सीबीसीआईडी की रिपोर्ट आने के दो साल तक सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। फिर 20 मई 1996 को गाज़ियाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में केवल 19 पीएसी कर्मियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किये गये। राज्य सरकार ने केवल 19 के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आदेश दिया न कि सभी पीएसी कर्मियों के खिलाफ जिन्हे सीआईडी रिपोर्ट में दोषी माना गया था।
  • सन् 1997 से 2000 के बीच गाज़ियाबाद अदालत के समक्ष कोई भी अभियुक्त पेश नहीं हुआ। यह सभी 19 अभियुक्त राज्य की सक्रिय सेवा में लगे रहे। इनके खिलाफ छह जमानती और 17 गैरजमानती वारंट भी जारी हुए लेकिन ये अदालत में पेश नहीं हुये। नतीजतन, मुकदमा ही नहीं शुरू हो सका।
  • मई 2000 में मीडिया द्वारा केस में जानबूझ कर की जा रही हिलाहवाली की खबरें छापे जाने के बाद 19 अभियुक्तों में से 16 ने गाज़ियाबाद अदालत में समर्पण किया।
  • जून से जुलाई 2000 के बीच गाज़ियाबाद कोर्ट ने अभियुक्तों को जमानत दे दी।
  • सितम्बर 2000 में हाशिमपुरा के पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई उत्तर प्रदेश से दिल्ली में करने का आदेश दिया। यहां ध्यान देने वाली बात है कि बेस्ट बेकरी से कई साल पहले मुकदमे की सुनवाई मूल राज्य से बाहर किये जाने का आदेश हाशिमपुरा कांड में सुप्रीम कोर्ट दे चुकी थी।
  • 2002 में दिल्ली में मुकदमा दिल्ली पहुँचा। हाशिमपुरा के पीड़ित परिवारों ने वृन्दा ग्रोवर और रेबेका जॉन को अपना वकील बनाया।
  • लेकिन सन् 2004 तक मुकदमे की कार्यवाही इसलिये नहीं शुरू हो पा रही थी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार प्रशिक्षित और योग्य सरकारी वकील नहीं नियुक्त कर रही थी।
  • मार्च 2004 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एएस कुलश्रेष्ठ को विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) नियुक्त किया।
  • अक्टूबर 2004 में पीड़ितों के वकील ने एसपीपी की नियुक्ति और योग्यता को चुनौती दी। एसएस कुलश्रेष्ठ ने एसपीपी के रूप में अपना नाम वापस लिया।
  • नवम्बर 2004 में सुरेन्द्र अदलाखा एसपीपी नियुक्त किये गये।
हत्याकाण्ड के 19 साल बाद
  • मई 2006 में एएसजे दिल्ली श्री एनपी कौशिक की अदालत ने सभी अभियुक्त पीएसी कर्मियों के खिलाफ हत्या, हत्या की साज़िश, हत्या की कोशिश, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ समेत कई मामलों में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/120बी/307/201/149/364/148/147 के तहत आरोप निर्धारित किये।
  • 15 जुलाई 2006 को तारीख के बावजूद घटना के चश्मदीद जुल्फिकार नासिर की गवाही नहीं हो सकी।
  • 31 जुलाई 2006 को एसपीपी एस. अदलाखा सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हो पाये। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर पाँच हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
  • अगस्त से चार सितम्बर 2006 तक हत्याकाण्ड के चश्मदीद गवाह जुल्फिकार नासिर का बयान रिकार्ड किया गया।
  • सितम्बर से सात नवम्बर 2006 तक दूसरे चश्मदीद मोहम्मद नईम का बयान रिकार्ड किया गया।
  • 15 जनवरी 2007 को उत्तर प्रदेश सरकार ने हत्याकाण्ड में मारे गये 43 लोगों के परिजनों के लिए चार लाख 60 हजार रुपये मुआवजा देने की घोषणा की।
  • चूंकि मामले में 164 लोगों गवाहियॉं होनी है और तब तक केवल दो लोगों के बयान दर्ज हो पाये थे। इस आधार पर मुकदमे की सुनवाई कर रही अदालत ने पाँच फरवरी 2007 को आठ फरवरी के बाद प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई का आदेश दिया।
  • आठ से 22 फरवरी 2007 तक तीसरे गवाह उस्मान का बयान दर्ज किया गया। वो इस हत्याकांण्ड में जान बचाने में कामयाब तो रहे लेकिन उन्हें अपना एक पैर हमेशा के लिए खो देना पड़ा है। उनके पैर में गोली लगी थी।
  • आठ मार्च 2007 को चौथे गवाह मुजिबुर्रहमान के बयान दर्ज होने शुरू हो गये।
  • अप्रैल 2007 को मुकदमा एएसजे रमेश कुमार की अदालत में स्थानांतरित किया गया।
  • 31 जुलाई 2007 को चौथे गवाह मुजिबुर्रहमान की गवाही की अगली तारीख है।
  • एक ओर जहां पीएसी वालों पर सामूहिक नरसंहार के लिए मुकदमा चल रहा है, दूसरी ओर वो सेवा में बने रहे। तीन अभियुक्त पुलिस वालों की मुकदमा शुरू होने से पहले ही मौत हो गयी। दो लोग सेवानिवत्त हो चुके हैं और अब पेंशन का लाभ उठा रहे हैं। एक अभियुक्त ने पीएसी से इस्तीफा दे दिया था।
  • पीड़ित परिवार वालों के इंसाफ की जद्दोजहद अब भी चल रही है।


  • 24 मई 2007: नरसंहार के 20 साल बाद सूचना के अधिकार के तहत कई जानकारी लेने पीड़ित परिवार लखनऊ पहुँचे।