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Thursday, July 17, 2008

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है।

मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?'

यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढेर सारे दोस्‍त हैं। यह मेरा यक़ीन है और अविश्‍वास की कोई वजह नहीं।
 
मैं न तो अपने दोस्‍तों के मज़हब के बारे में जानने को परेशान रहता हूँ और न ही जाति। इसलिए यहाँ जिन्‍होंने टिप्‍पणी की है, उनके मज़हब का महज़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। वह भी घिसा पिटा तरीका है। ख़ैर।

ब्‍लॉगिंग की दुनिया में मुझे लगातार हौसला देने वाली  Mired Mirage की, जिन्‍हें हम घुघूती बासूती के रूप में जानते हैं, इस पोस्‍ट पर राय है कि 'आपने इस विषय पर लिखा, बहुत अच्छा किया। ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता है। अच्छा बुरा हर जगह होता है। हमें उसमें से अच्छा चुनना सीखने की आवश्यकता है।'

पर इस पूरे मामले को एक अलग नज़रिये से देखने वाले भी कई हैं। और जैसा की लगता है, शायद ये वही हैं, जिनके बीच जाने की बात ऊपर वाले दोस्‍त कर रहे हैं। हालाँकि मुझे पक्‍का यक़ीन नहीं है।

महामंत्री-तस्लीम की टिप्‍पणी है, 'इस तरह के बेसिर पैर के फतवों के कारण ही इस्‍लाम के प्रति लोगों में गलत धारणा बैठी है।'

तो Anwar Qureshi पूरे विमर्श को एक नया आयाम देते हैं-  'आप ने बहुत अच्छा लिखा है, अगर हम बुरा ना देखना चाहें तो ये हमें उसके लिए प्रेरित नहीं करती हैं। लेकिन हमें विवादों से दूर होकर इस्लाम और मुसलमानों के हक की बातें सोचनी चाहिए और उनके पिछडे़पन को दूर करने की कोशिश करना चाहिए...'

धर्म के अलमबरदारों के बारे में लोगों की ही क्‍या राय है, यह Farid Khan से समझा जा सकता है। फरीद खान का कहना है, '... जिस अँधेरे के ख़िलाफ़ इस्लाम का आविर्भाव हुआ था, मौलवी-मुल्ला उसी अँधेरे में वापस जा कर मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं। असल में ये मुल्ला ही इस्लाम विरोधी हैं, आज के युग में।'  इससे ज्‍यादा आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी क्‍या हो सकती है।

यही नहीं, वह एक हवाला पेश करते हैं, जिसके मुताबिक 'अल बरूनी ने एक जगह लिखा है कि इस्लाम विज्ञान के क्षेत्र में दख़ल नहीं देता। इसका आधार क़ुरान में बतायी गईं वे बातें जिसमें अल्लाह ने बार-हा कहा कि हमने बहुत सारी निशानियाँ इस दुनिया में छोड़ी हैं, जिसे समझो।'

वेब साइट  TwoCircles.net  से आई राय भी इसी बात को और तर्क मुहैया कराती है। इनका कहना है, ' टेक्‍नॉलॉजी ख़ुद में बुरी नहीं है। कोई ईजाद ख़ुद में अच्‍छी या बुरी नहीं होती लेकिन ये तो निर्भर करता है कि हम इसका इस्‍तेमाल कैसे करते हैं?

चाक़ू का इस्‍तेमाल आप सब्‍जी काटकर अपना पेट भरने के लिए कर सकते हैं या फिर आप उसका इस्‍तेमाल किसी को जख्‍़मी करने के लिए करें। लिहाज़ा टीवी का इस्‍तेमाल अगर इल्‍म और तरबियत के लिए किया जाए तो यह बहुत अच्‍छी बात होगी।'

टू सर्किल दूसरा पहलू भी सामने लाती हैं, 'हाँ कुछ उलमा तस्‍वीरों को बहुत बुरा मानते हैं लेकिन इस सोच में काफी बदलाव आया है और अब तो नदवा और देवबंद को भी टीवी चैनल खोलने की रिक्‍वेस्‍ट की जा रही है। नासिरूद़दीन साहब ने काफी अच्‍दा लिखा है कि मीडिया डेमोक्रेसी का ऑक्‍सीजन है।'

यह एक ऐसी बात है जो विमर्श का जमीन मुहैया कराती है न कि विवाद का। आगे टू सर्किल का कहना है, '...और मुसलमानों की एक अच्‍छी ख़ासी आबादी टीवी के ज़रिए मुल्‍क़ और दुनिया का हाला जान पाती है। इसलिए टीवी के खि़लाफ मुहिम मुसलमानों को सामाजी तौर पर कमज़ोर करेगी।'  फिर एक आँकड़ा पेश करते हैं क‍ि मुसलमानों के पास ख़बर पाने का ज़रिया क्‍या है- 

How do Muslims get news:
Oral sources: 50.1% rural, 36.1% urban
TV: 13.2% rural, 42.9% urban
Radio: 20% rural, 19% urban
Newspapers: 9%rural, 20.2% urban

यह बात सबसे अहम है। और इनमें से किसी ने साँस की डोर थामने की बात नहीं की। बल्कि ये जाहिलियत के अँधेरे से बाहर निकलने की कोशिश में लगे हैं। इसलिए जब हम समाज को देखें तो बेहतर हो कि 'हम' और 'तुम' में बाँट कर न देखें। क्‍योंकि जो 'तुम' में है, वह 'हम' में भी होगा या हो सकता है।

Tuesday, July 15, 2008

... तो टीवी देखना इस्लाम के खिलाफ़ है! (Ooh...Watching TV is against the Islam!)

सनिचर 12 जुलाई की सुबह मेरठ के लावड़ कस्‍बे के पास दौराला रोड पर लोगों का हुजूम लगा था। जिसे देखिए वही अपनी गाड़ी लगाकर तमाशा देख रहा था। समझना चाह रहा था कि आखिर यह हुआ क्‍या। क्‍या हो रहा है। ... लोग अपने घरों से टीवी उठाकर ला रहे हैं और सड़क पर पटक रहे हैं। कोई वीसीडी प्‍लेयर लिए चला आ रहा है तो किसी के हाथ में टेपरिकार्डर। ... टीवी, टेपरिकार्डर, सीडी और सीडी प्‍लेयर ... जिस घर में जो था ... सब तोड़ दिए गए। कहीं किसी सामान की साँस न चलती रहे, इसलिए इतिमिनान के लिए मलबे में आग लगा दी गई। राख... सब कुछ खाक।

पर यह हुआ क्‍यों।

इन सबकी अगुआई कर रहे नेता जी कहना था कि 'ये सारी चीज़ें अश्‍लीलता और जुर्म को बढ़ावा देने का सबब हैं। नौजवान अपनी जिम्‍मेदारियों से दूर हो रहे हैं।' और तो और उन्‍होंने एक और लुकमा जोड़ दिया... 'यह सारी चीज़ें इस्‍लाम विरोधी हैं। ऐसा इस्‍लाम के विद्वानों ने बताया है। मुसलमानों के लिए इन्‍हें देखना हराम है। इनकी अपील है कि मुसलमान टीवी... सीडी प्‍लेयर इस्तेमाल न करें और कर रहे हैं तो इनकी तरह घर से इन्‍हें बेदख़ल कर दे।'

इस्‍लाम के पहले के युग को जाहिलियत का युग कहा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इस्‍लाम ने अपने समय की ढेर सारी कुरीतियों को कुसंस्‍कार को दूर करने और कई पर पाबंदी लगाने का काम किया। जैसे बेटी को मारने की प्रथा पर पाबंदी... औरतों को विरासत में हक दिलाना... वगैरह वगैरह। इस मामले में यह मज़हब यथास्थिति का हिमायती नहीं रहा और अपने समय से आगे रहा। तो अब ज़रा सोचिए, चौदह सौ साल पहले बहुत कुछ ऐसा नहीं था, जो आज है। तो इनके होने और इस्‍तेमाल के बारे में मज़हब का नज़रिया क्‍या होगा या होना चाहिए, यह सबसे अहम सवाल है।

क्‍या जो भी चीज आधुनिक युग की देन है, उन सबको नकारा जाएगा। तब तो जंगल में पत्‍ते बटोरकर, पत्‍ते खाकर, पत्‍ते पहनकर, पत्‍तों पर सोकर ही जि़दगी बसर करनी चाहिए। यह मान लेना चाहिए कि इस्‍लाम की घड़ी की सुई 14 सौ साल पहले ही अटकी हुई है। फिर क्‍या टीवी और टेप रिकार्डर के साथ ही हर चीज, जिसका ईजाद इस्‍लाम के आने के बाद हुआ, उसके इस्‍तेमाल पर पाबंदी लगेगी। यह तो इस्‍लाम की सीख नहीं बताती है।

असल में दिक्‍कत यह है कि जाहिलियत का युग, इस्‍लाम के आने के बाद ख़त्‍म नहीं हुआ। ऐसे मामलों को देखकर तो यही लगता है। जाहिलियत का अँधेरा अब भी बरकरार है। ऐसे लोग और ऐसी घटनाओं, कुछ और करती हों या न करती हों, इस्‍लाम का मज़ाक जरूर बनाती हैं।

समझने की बात है कोई तकनीक या नया अविष्‍कार अपने आप में न तो अश्‍लील होता है और न मज़हब विरोधी। उसका इस्‍तेमाल कौन, किस मक़सद से कर रहा है, यह सबसे अहम है। अगर सास बहू के सीरियल हैं तो क्‍यू टीवी भी है। अगर दस बुरी फिल्‍में हैं तो कई अच्‍छी फिल्‍म भी। क्‍यों नहीं सबसे पहले क्‍यू टीवी और अल जज़ीरा चैनल बंद करवा दिए जाते हैं। हुजूर, ये सारे माध्‍यम सूचना और जानकारी पहुँचाने के औजार हैं। आज के वक्‍त में इनकी वैसी ही जरूरत है, जैसे दाना-पानी की। यह ऑ‍क्‍सीजन का काम करते हैं। जम्‍हूरियत की जरूरत हैं।

इसलिए, नौजवान अश्‍लीलता के आगोश में डूबेगा या नहीं, जुर्म के गलियारे में फँसेगा या नहीं... यह तो बाद की बात है, पर इतना तो तय है कि वह दुनिया के बेशुमार इल्‍म और जानकारी की दौलत से महरूम जरूर रह जाएगा। और आज के वक्‍त में यही जाहिलियत है। इसका अँधेरा कैसे मिटेगा।

Friday, July 4, 2008

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है।

कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर।

एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई नए बनेंगे। जिस चीज का दूर-दूर तक मज़हब के साथ लेना-देना नहीं है, उस डील के साथ भी मजहब की डील हो गई।

यह हमारे सियासतदानों को भा गया। इसमें कोई पीछे नहीं रहा। क्‍या वाम, क्‍या दक्षिण। अपने-अपने पक्ष में तर्क जुटाने के लिए सबने निकाल लिया, करार का मजहबी एंगिल। मजहबी रहनुमाओं को भी लुभाने लगा। और दीन की रहनुमाई करने वाले पहुँच गए दुनियावी रहनुमा के आस्‍तान: पर।

निहायत सेक्‍यूलर मसले पर धर्म का कर्म का काम करने वाले दखलंदाजी न करें, आदर्श स्थिति तो यही है। वरना हम तो हम पूछेंगे ही भई कि जब दलितों पर अत्‍याचार होता है, महिलाओं पर जुल्‍म होता है, नौजवान हाथों को काम नहीं मिलता... तब मजहबी रहनुमा कहाँ चले जाते हैं।  यही नहीं सियासतदानों की राजनीति उस समय क्‍यों चुक जाती है, जब धर्म के नाम पर बाँटने का काम होता है। राजधर्म भले याद न रहे, धर्म की राजनीति जरूर याद रहती है।

भई, क्‍यों इस मुल्‍क में कभी अयोध्‍या तो कभी अमरनाथ तो कभी डील के नाम पर धर्म और राजनीतिक के घालमेल की कोशिश की जाती है। ऐसा जब-जब होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं। नफ़रत फ़ैलती है। इस मुल्‍क की रूह ऐसी राजनीति के माफि़क़ नहीं है।

Thursday, March 13, 2008

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं।

उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है।

जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ।

उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'।

Tuesday, January 22, 2008

कुछ कहना चाहती है बिलकीस (Bilkis has something to say)

इंसाफ के लिए जद्दोजहद का नया चेहरा है बिलकीस बानो (Bilkis Bano)। सन् 2002 में हुए जनसंहार के दौरान बिलकीस बानो और उनकी महिला परिवारीजनों के साथ सामूहिक दुराचार हुआ और फिर उनकी हत्‍या कर दी गई। इस घटना में बिलकीस किसी तरह बच गई। उसने इंसाफ के लिए जद्दोजहद किया और कामयाब हुई। (खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसके बाद बिलकीस ने कुछ कहने का मन बनाय। तो पढि़ए बिलकीस की संघर्ष गाथा, बिलकीस की जुबानी-

bilkis

मैं सच साबित हुई

आज मैं सच साबित हुई हूँ. मेरे सच की सुनवाई कर ली गई है.मुम्बई की एक अदालत में बीस रोज़ तक मुझसे जिरह की जाती रही लेकिन मेरे सच की ताकत ने मुझे सहारा दिए रखा. शुक्रवार १८ जनवरी , २००८ को मुम्बई के सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया उसने उस लम्बे और दर्दनाक सफर को किसी हद तक एक मंजिल तक पहुँचाया है  जिस पर मुझे और मेरे परिवारवालों को चलने पर मजबूर कर दिया गया था. यह भी सच है कि कई घाव कभी भी नहीं भरेंगे लेकिन आज मैं पहले के मुताबिक कहीं अधिक ताकत महसूस कर रही हूँ और इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ.

इस जीत का बड़ा हिस्सा उन दोस्तों और साथियों का है जो इस दौरान मेरे साथ बने रहे, जब मैं लड़खडाई और लगा कि और नहीं चल सकूंगी तो जिन्होंने मुझे थामा . आज इन दोस्तों में से कई मेरे साथ हैं पर कई मौजूद नहीं हैं. इस पूरे दौर में मेरे शौहर याकूब का संग लगातार बना रहा है. मेरा साथ देने की वजह से मेरे परिवारवालों और रिश्तेदारों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया. आज यहाँ मैं उनकी हिम्मत की बदौलत खड़ी हूँ . उन्होंने मेरे हक में तब गवाही देने का फैसला किया जब ऐसा करना उनके लिए खतरनाक था.इस जीत का श्रेय राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग को भी है जिसने मुझ पर यकीन किया , वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे को है जिन्होंने इन्साफ की मेरी गुहार को उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों तक पहुँचाया और यह तय करवाया कि सी बी आई इस मामले की तहकीकात करे. उनकी वजह से ही इस मुक़दमे को मुम्बई की अदालत तक लाया जा सका. सबसे आखिरी बात यह कि यह मुकदमा इस नतीजे तक नहीं पहुंचता अगर सी बी आई ने नए सिरे से ईमानदारी के साथ जांच पड़ताल न की होती. सी बी आई के विशेष अभियोजक ने झूठ की परतों को उधेड़ते हुए सच को -उस पर से राजकीय संस्थाओं की लीपापोती को साफ कर बाहर निकाला.मैं इनमें से हरेक की शुक्रगुजार हूँ. मुझ जैसा सफर अकेले नहीं तय किया सकता.

पिछले छः साल मैंने खौफ के साए में बिताए हैं, एक पनाहगाह से दूसरी पनाहगाह तक भागती फिरी हूँ , अपने बच्चों को अपने साथ लिए लिए उस नफरत से बचाने के लिए जो अभी भी मुझे पता है कई लोगों के दिलोदिमाग में पैबस्त है. इस फैसले का मतलब नफरत का खात्मा नहीं है.लेकिन इससे यह भरोसा जागता है कि कहीं किसी तरह इन्साफ की जीत हो सकती है. यह फैसला सिर्फ़ मेरी नहीं उन सभी बेगुनाह मुसलमानों की जीत है जिनका कत्ल कर दिया गया और उन सभी औरतों की भी जिनकी देह इसलिए रौंद डाली गई कि मेरी तरह वे भी मुसलमान थीं. यह जीत है क्योंकि अब इसके बाद कोई भी उन चीजों से इनकार नहीं कर सकेगा जो गुजरात मं २००२ के उन खौफनाक दिनों में औरतों के साथ हुई थीं . क्योंकि अब हमेशा के लिए गुजरात के इतिहास में यह बात दर्ज कर दी गई है की हमारे ख़िलाफ़ यौन हिंसा के हथियार का इस्तेमाल किया गया था. मैं यह मनाती हूँ कि ऐसा एक दिन आएगा कि गुजरात के लोगों के लिये उस नफ़रत और हिंसा के दाग के साथ जीना मुश्किल हो जायेगा और वे उस राज्य की जमीन से उसे उखाड़ फेंकेंगे जो अभी भी मेरा वतन है.  

आज लेकिन मैं ग़मगीन भी हूँ क्योकि मेरा तो सिर्फ़ एक मामला था उन हजारों के बीच जो अदालत की दहलीज तक भी नहीं पहुँच सके हैं. और हालांकि मैं यहाँ जीत कर खड़ी हूँ पर मैं पुरजोर ढंग से यह कहना चाहती हूँ कि इन्साफ की राह इतनी लम्बी और यंत्रणा भरी नहीं होनी चाहिए. मैं क्षुब्ध भी हूँ क्योंकि राज्य और उसके अधिकारी अभी भी बेदाग और आजाद हैं जिन्होंने उन मुजरिमों की पीठ ठोंकी , उनकी हिम्मत बढ़ाई और उन्हें बचाया जिन्होनें मेरे पूरे समुदाय को तबाहोबर्बार्द कर दिया जबकि उनका काम दरअसल हमारी हिफाजत करना था. आज मैंने जो लड़ाई जीती है वह मुझे और बड़ी और शायद कहीं और लम्बी जद्दोजहद के लिए ताकत देती है जो अभी आगे मेरे सामने है.

Wednesday, December 12, 2007

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात।

लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा?

उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।'

मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।'

फिर उसने अपना नाम बताया- राजू। कहने लगा, 'गुजराती तो सब मोदी जी के साथ हैं।'

मैंने पूछा, 'सब।'

बोला हां, सिर्फ 'वो' लोग नहीं हैं।

मैंने फिर पूछा, 'वो' कौन।

बोला, 'वही' लोग। समझे नहीं। और हंसने लगा।

उसकी हंसी ने बता दिया था कि वो कौन। पर मैं उसकी जबान से सुनना चाह रहा था। और आखिरकार उसने कहा, 'मुसलमान लोग तो भाजप के साथ नहीं हैं।'

तब मैंने फिर पूछा, 'क्‍या मुसलमान गुजराती नहीं हैं।'

उसका जवाब था, 'कैसी बात करते हैं। मुसलमान कहीं गुजराती होते हैं। गुजराती तो हमलोग हैं।'

तब एकाएक स्‍पार्क हुआ और मुझे समझ में आ गया कि जब जनाब मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र भाई मोदी गुजरातियों की बात करते हैं तो उनके गुजराती में कौन शामिल है और कौन नहीं। यकीनन, उसमें 'वो' नहीं हैं।

जो बात बड़े बड़े नहीं समझा पा रहे थे वह बात एक अनजान और शायद निम्‍न मध्‍य वर्गीय ऑटो वाले ने मुझे समझा दिया था।

अभी इस उहापोह से उबर ही रहा था तो एक गुजराती (जिस पर मुझे गर्व है) लॉर्ड मेघनाद देसाई का एक इंटरव्यू दिख गया। प्रख्‍यात अर्थशास्‍त्री और साम‍ाजिक रूप से सक्रिय मेघनाद देसाई ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक के दौरान संघ परिवार ने गुजरात के हिन्‍दुओं में यह भाव पैदा करने की कोशिश की गुजराती यानी हिन्‍दू बाकि सब 'वो'। गुजराती की इस नई परिभाषा को सबसे ज्‍यादा अपनाया मध्‍यवर्ग ने। (ब्‍लॉग की दुनिया पर इस मध्‍यवर्ग की प्रतिक्रिया देख आप अब आसानी से इसकी वजह समझ सकते हैं।) यही मध्‍यवर्ग संघ परिवार का वैचारिक कॅरियर है। उनका कहना था कि जब पांच करोड़ गुजराती की बात मोदी करते हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह किसकी बात कर रहे हैं।

लेकिन मेरी उहापोह और बढ़ गई है। मैं अब सोच रहा हूं कि दक्‍कनी उर्दू के जन्‍मदाता, वली गुजराती का क्‍या होगा, जिसने अपने को गुजरात की मिट्टी में जज्‍ब कर दिया है? उस रजब अली को क्‍या कहा जाएगा जिसने वसंत हेंगिश्‍ते के साथ अहमदाबाद के जमालपुर में साम्‍प्रद‍ायिक सौहार्द्र के लिए जान दे दिया? उस एहसान जाफरी को क्‍या माना जाएगा,  जो गुजरात की आग में जला और गुजरात की हवा में फैल गया है? गुलाम मोहम्‍मद शेख को क्‍या नाम देंगे, जिसने पेंटिंग में गुजरात का नाम दुनिया के नक्‍शे पर ला खड़ा किया? एसआर बंदूकवाला को क्‍या माना जाएगा। इस्‍माइल दरबार के गरबा संगीत को किस नाम से पुकारा जाएगा? जहीर खान,  इरफान पैठान, युसूफ पैठान, सायरा, रशीदा, नियाज बेन को किस खांचे में फिट किया जाएगा? गुजराती या‍ सिर्फ 'वो'?

gmsheikh-
प्रख्‍यात चित्रकार गुलाम मोहम्‍मद शेख की एक पेंटिंग।(साभार)
इसे भी पढ़ें

 क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

एक "गुजराती" की तलाश 

Friday, November 23, 2007

नन्दीग्राम और मुसलमान

कोलकाता में दो दिन पहले हुए प्रदर्शन से कई लोगों की पेशानी पर चिंता की लकीर खिंच गई है। जिस तरह से वह प्रदर्शन होने दिया गया। पहले से पता होने के बाद सुरक्षा बलों का एहतियाती इंतजाम नहीं किया गया और उसके बाद सेना बुला ली गई... पहले सच्चर कमेटी और उसके बाद नन्दीग्राम ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की बदतर हालत और सरकार का उनके प्रति नजरिया, उजागर कर दिया है। ऐसे में संगठित होते मुसलमान स‍रकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं... इसलिए नौजवान पत्रकार और www.twocircles.net के सम्पादक काशिफ उल हुदा की सलाह है कि भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है। ढाई आखर की गुजारिश पर उन्होंने हिन्दी में यह टिप्पणी भेजी है। हिन्दी में यह उनकी पहली औपचारिक टिप्पणी है।

मुसलामानों की तरक्की के लिए जरूरी है शांतिपूर्ण समाजी और सियासी तहरीक

1977 से वाम मोर्चा पश्विम बंगाम की सत्ता पर काबिज़ है. चुनाव के जरिये सत्‍ता में रहने वाली ये दुनिया की सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार है. वाम मोर्चे के 30 साल तक सत्ता पर बरक़रार रखने का कुछ सेहरा पश्चिम बंगाल के मुसलामानों को भी जाता है. 1977 से हर चुनाव में राज्य के मुसलमान वाम मोर्चे को वोट देते आये हैं.

मुसलामानों एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल मिला. शायद उनके लिए काफी दिनों तक यही बहुत कुछ था। इसलिए उन्होंने तकरीबन 30 साल अपनी ज़िंदगी को बाद से बदतर होते देखा, लेकिन वाम मोर्चे का साथ नहीं छोड़ा. सच्‍चर कमेटी कि रिपोर्ट ने मुसलमानो के पढ़े-लिखे तबके को ज़ोर से झिंझोड़ा. मुसलमान जागे और तंजीमें हरकत में आयीं. सच्‍चर कमेटी ने जो बयान किया, उससे पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की बदतर हालत दुनिया के सामने आ गई. सिर्फ मुसलमान ही क्‍यों, दलितों की हालत भी वहां अच्‍छी नहीं.

खैर, पता ये चला कि मुसलमान यहां हर पायदान पर पिछड़े हैं. पश्चिम बंगाल में ही नहीं बल्कि भारत के दूसरे राज्यों में भी मीटिंग, धरना और कई पहल होने लगी ताकि मुसलमानों की बदतर हालत पर सरकारों का ध्‍यान जाए.पश्चिम बंगाल में कई संगठन पिछले चंद महीनों से काफी सक्रिय हुए. यही नहीं कई बार अपनी मांगें मनवाने के लिए सड़क पर भी उतरे. नंदीग्राम के हादसे ने इन्हें और झिंझोड़ दिया. जो सुरक्षा मिलने का दावा अब तक सरकार करती रही थी, उसकी भी गारंटी नंदीग्राम ने खत्‍म कर दी. अगर मुसलमानो का हाल एक वामपंथी-सेक्‍यूलर हुकूमत में ये हो सकता है तो फिर हिंदुत्व और सॉफ्ट-हिंदुत्व पार्टियों वाली सरकारों से क्या उम्मीद कि जा सकती है?

इन सब वजहों से ही मुस्लिम संगठनों ने मिल्ली इत्तेहाद परिषद बनाने का ऐलान किया और पिछले शुक्रवार को एक ज़बरदस्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें तकरीबन एक लाख लोग शामिल हुए. इस पर्दर्शन कि अगली कड़ी 24 नवम्‍बर को नंदीग्राम मार्च है. पश्चिम बंगाल और उसके बाहर के लोगों ने महसूस किया कि भारतीयों मुसलामानों के बीच एक मूवमेंट शुरू हो रहा है. ...और नंदीग्राम से उठा या मूवमेंट मुसलमानों के बेहतर सामाजिक और आर्थिक न्याय कि लड़ाई लड़ेगा. सियासत में मुसलमानों को सही मुकाम दिलवाएगा.ये मूवमेंट हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा साबित होगा क्योंकि इस देश का सबसे पिछड़ा समाज अपने बलबूते पे खड़ा हो तो यही देश के लिए भी बेहतर है.

नन्‍दीग्राम एक समाजी और आर्थिक मुद्दा है. इससे तसलीमा के मुद्दे जो कि मुसलमानों कि नज़र में एक धार्मिक मुद्दा है, जोड़ना नहीं चाहिए था. ये ग़लती मुसलमान बार-बार करते आये हैं. एक भावानात्‍मक और सांकेतिक मुद्दे पर ज्यादा ज़ोर देते हैं और सरकार पर दबाव डालते हैं. एक बार फिर सरकार ने तसलीमा को बंगाल से बाहर करने की भावनात्‍मक मांग को मान लिया है... इस तरह मुसलमान तंजीमें अपनी जीत का ऐलान कर देंगी... लोग 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का इल्जाम लगायेंगे. नंदीग्राम जो कि समाजी-आर्थिक मुद्दे के रूप में एक तहरीक की शक्ल ले रह था, दम तोड़ देगा.

मुसलमान तंजीम और लीडरों को बेहतर रणनीति बनाकर मुसलमानों को संगठित करना होगा और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाना होगा. यही नहीं, जिंदगी के मसायल और उनसे जुड़े मुद्दों पर अन्य सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठनों के साथ मिल कर काम करमा होगा. मुसलमान भारत कि आबादी के 15 % हैं और कोई भी देश एक बड़ी आबादी को पिछड़ा रख कर विकास नहीं कर सकता.

Tuesday, September 18, 2007

ओसामा-महात्मा गांधी संवाद

क्‍या आप यह संवाद पढ़ने से चूक गये हैं। ... तो आइये चार हिस्‍सों में पोस्‍ट इस संवाद को इकट्ठा पढि़ये।

नोट- इंग्‍लैंड में बसे भारतीय मूल के विचारक, दार्शनिक लार्ड भिक्खु पारिख राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर, लेबर पार्टी के हाउस आफ लार्ड के सदस्य तथा गांधी पर लिखी तीन पुस्तकों के लेखक हैं। अपने बेबाक विचारों के लिए प्रसिद्ध भिक्‍खु पारिख ने कई ज्‍वलंत विषयों पर अपनी कलम चलाई है। गुजरात में सन् 2002 में हुई हिंसा हो या फिर प्रवासी हिन्‍दुस्‍तानियों की बात, उनकी राय हमेशा अहम रही है।

यहां पेश उनकी रचना अंग्रेजी में सन् 2004 में प्रोस्‍पेक्‍ट में प्रकाशित हुई। हिन्‍दी में इसे गिरिराज किशोर के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका अकार के ताज़ा अंक में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद महेन्‍द्रनाथ शुक्‍ला का है। ढाई आखर को इसके इस्‍तेमाल की इजाजत देने के लिए हम गिरिराज किशोर और प्रियंवद के आभारी हैं।

भूमिका
संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को क्या प्रेरित करता है
?
वे अपने कारनामों के साथ कैसे जीवित रहते हैं? क्या हिंसा के इस चक्रवात का कोई विकल्प है