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Monday, June 30, 2008

प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद

वे सनातनी हिन्‍दू हैं। पर वे हिन्‍दुत्‍व के समर्थक नहीं हैं। उन्‍हें बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और गुजरात में राज्‍य के समर्थन से की गई हिंसा से सख्‍त विरोध है। चूँकि वे मजबूती से अपनी बात कहते हैं, इसलिए अक्‍सर उन्‍हें विरोध का भी सामना करना पड़ता है। यह हैं प्रभाष जोशी। प्रभाष जोशी भारतीय पत्रकारिता का मशहूर नाम हैं। मैंने पिछले दिनों एक पोस्‍ट किया था ‘यह तैयारी किसके लिए है’। उसके बाद प्रभाष जोशी की जनसत्‍ता में यह टिप्‍पणी पढ़ी। यह टिप्‍पणी मेरे पोस्‍ट से किसी न किसी रूप में जुड़ती है, और विचार के लिए कई मुद्दे उठाती है। इसलिए यहाँ जनसत्‍ता से साभार पेश कर रहा हूँ।

प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद

हिंदू आतंकवादी और हिंदू आतंकवादी संगठन पढ़ने में ही कितना अटपटा लगता है। लेकिन मुंबई में आजकल यही पढ़ रहा हूँ। क्या महाराष्ट्र और महाराष्ट्रियनों में ही ऐसा कुछ है कि वे इस तरह की व्यर्थ और सिरफिरी हिंसा की तरफ खिंचे चले आते हैं, और प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा की कार्रवाई करते है, जैसी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था के रमेश गडकरी और मंगेश निकम ने की? ऐसा क्यों हुआ कि हिंसक प्रतिशोध को राष्ट्र बनाने की प्रेरणा बता कर हिंदुत्व का सिद्घांत निकालने वाले विनायक दामोदर सावरकर भी यहीं हुए और उनके वाहियात शिष्य बाला साहेब ठाकरे भी यहीं विराज रहे हैं? महाराष्ट्र वीरों की भूमि है और शिवाजी महाराज प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा का गान और अमल करने वाले तो कभी नहीं थे। फिर क्या ऐसी हिंसा को वीरता समझने वालों की एक कमजोर प्रवृत्ति यहाँ चलती आई है। बहुत पीछे नहीं कोई सौ सवा सौ साल पहले ही यहाँ सावरकर हुए। बचपन में मस्जिद पर पत्थर फेंकने से लेकर अभिनव भारत समाज जैसे तथाकथित क्रांतिकारी संगठन उनने बनाए। मदनलाल ढींगरा से सर विलियम कर्जन विली को मरवाने से लेकर नाथूराम गोडसे से महात्मा गांधी तक की हत्या करवाने के पुण्य कार्य उनने किए। दुनिया भर में वीर और क्रांतिकारी वे कहे जाते है जो खुद शस्त्र उठाते हैं और या तो फांसी पर झूल जाते हैं या लड़ते हुए मारे जाते हैं। अपने स्वातंत्रय वीर और क्रांतिकारी सावरकर ने हमेशा दूसरों के हाथ पिस्तौल थमाई और खुद दूर खड़े छल कपट से बचते रहे। और आखिर अस्सी पार करने के बाद बिस्तर पर बुढ़ापे से मरे। बदले की भावना और साजिश से भारत को स्वतंत्र करवाने का उपदेश देने वाले सावरकर को वीर और क्रांतिकारी तो वही मान सकते हैं जो जानते नहीं कि वीरों की हिंसा क्या होती है। इन वीर सावरकर के दो बड़े शिष्य अपने राजनीतिक जीवन में हैं। एक बाला साहेब ठाकरे और दूसरे लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी।

हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था बाला साहेब ठाकरे या उनकी शिवसेना की बनवाई हुई नहीं है। पुलिस को इनके विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े होने या प्रेरित होने के सूत्र भी नहीं मिले है। कहते हैं कोई छह साल हुए एक सभा हो रही थी जिसमें हिंदू देवी देवताओं की निंदा की जा रही थी किसी एक श्रोता ने खड़े होकर इसका विरोध किया। उसे चुप कर दिया गया। लेकिन उसने हिंदू संस्थाओं को इकट्ठा किया और ऐसे सब मौकों पर हिंदू विरोध दर्ज करने के लिए यह हिंदू जन जागृति समिति बनाई। एक सूचना कहती है कि उसे डॉक्टर जयंत आठवले ने बनाया।

इसी से सनातन संस्था भी जुड़ गई जो पनवेल के देवगाँव इलाके से सनातन संकुल आश्रम से चलती है। गुरूकृपा प्रतिष्ठान इस संकुल को चलाता हैं सनातन संस्था कोई अठारह साल से चल रही है। उसका दावा है कि वह सामाजिक कार्य, सत्संग और ध्यान योग ओर आध्यात्मिकता की तलाश में लगे लोगों की संस्था है। महाराष्ट्र भर के पढ़े लिखे लोग दुनियादारी छोड़ कर यहाँ समाज सेवा करने और आध्यात्मिकता में जीने को आते हैं। संस्था हिंदू धर्म और देवी देवताओं के अपमान का विरोध करती हैं। लेकिन हम शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं। रमेश गडकरी हमारे यहाँ रहता था, लेकिन बम बनाने और फोड़ने की आतंकवादी हरकतों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।



ऐसा लगता है कि हिंदू जन जागृति समिति सनातन संस्था के लोगों ने बनाई है और जमीन से ज्यादा इसकी उपस्थिति ऑन लाइन हैं। इसका कोई मुख्यालय कहीं दिखाई नहीं देता। इसका उद्देश्य हिंदू धर्म की निंदा करने और बदनाम करने वालों के विरुद्घ विश्व भर के हिंदुओं को एक और संगठित करना है। अभी इसका वैश्चिक एजंडा हॉलीवुड फिल्म लव गुरु का विरोध करना और गोवा में स्कूल की किताबों से हिंदू विरोधी उद्घरण हटवाना और रामसेतु की रक्षा करना है। ये दोनों संस्थाएँ मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों का विरोध करती रही हैं। जोधा अकबर फिल्म में इन्हें हिंदू देवी देवताओं का अपमान दिखा और मराठी नाटक आम्ही पाचपुते में महाभारत और उसके पात्रों का मखौल उड़ते लगा। हिंदुओं की भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले ऐसे नाटक, फिल्म, चित्र आदि का विरोध करना इन संस्थाओं के लोगों को अपना काम लगता है।

अब महाराष्ट्र पुलिस ने जिन रमेश गडकरी, मंगेश निकम, विक्रम भावे और संतोष आंग्रे को गिरफ्तार किया है वे जोधा अकबर और आम्ही पाचपुते जैसी फिल्म और नाटक का शांतिपूर्ण विरोध करने तक ही नहीं रुके। उनने बम बनाए और जिन हॉलों में यह फिल्म दिखाई और नाटक खेला जा रहा था वहां उन्हें फोड़ा। वाशी नवी मुंबई के विष्णुदास भावे ऑडिटोरियम में इकतीस मई को और ठाणे के गडकरी रंगायतन में चार जून को इनने जो बम फोड़े उनमें से नवी मुंबई में तो कुछ नहीं हुआ पर ठाणे में सात लोग घायल हुए। इसके पहले फरवरी में नए पनवेल के एक सिनेमाघर में भी अनगढ़ बम फोड़ा गया था जहाँ जोधा अकबर फिल्म दिखाई जा रही थी। वहाँ भी कोई हताहत नहीं हुआ था, बम बनाने और फोड़ने की इनकी करतूतों को देखते हुए साफ है कि न तो इन्हें भयंकर मारकर बम बनाना आता है न ये उनसें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाना जानते हैं।

फिर भी समाज सेवा और अध्यात्म में लगी संस्था के ये लोग बम बनाने और फोड़ने जैसे आतंकवादी अभियान में कैसे और क्यों लग गए। सबसे मजेदार किस्सा रमेश गडकरी का है। समिति और संस्था के ये पचास साल के सेवक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किए हुए हैं और अभी आठ साल पहले तक सफल दुकानदार थे। अंधेरी में उनकी दुकान थी। वे संस्था के सेवकों के संपर्क में आए। उनके काम और उपदेशों का उन पर ऐसा असर पड़ा कि उनने अपनी दुकान बेच दी और जो पैसा मिला उसे बैंक में रख दिया जिसके ब्याज से उनका घर चलता है। उनकी पत्नी नीला भी उनके साथ संस्था की सेविका हो गई। तीन साल पहले इन दोनों ने सांगली का अपना घर भी छोड़ दिया और पनवेल में सनातन संस्था के संकुल आश्रम में आकर रहने लगे। तब तक गडकरी को बम बनाने और फोड़ने में न तो कोई रुचि थी न जानकारी न अनुभव। उनके दोनों दामाद भी सनातन संस्था के सेवक हो गए थे।

आश्रम में गडकरी की मंगेश निकम से जान पहचान हुई जो धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। मंगेश निकम ने कुएँ खोदने वाले एक व्यक्ति से गोला-बारूद मिलाना और विस्फोट करना सीखा था। यही जानकारी बम बनाने के काम भी आई। गडकरी और निकम ने आम्ही पाचपुते मराठी नाटक के विरुद्घ विरोध प्रदर्शन किया था। सतारा के रहने वाले निकम अब गडकरी के साथ मिल कर इस नाटक से होने वाले अपमान का बदला लेना चाहते थे। निकम बम बनाने की सामग्री अमोनियम नाइट्रेट, विस्फोटक, र्छे आदि लेकर आया और उनने सनातन संकुल आश्रम के एक कमरे में बम बनाया। गड़करी गुरुकृपा प्रतिष्ठान की मोटरसाइकिल से बम लेकर निकला, आश्रम की लॉग बुक में उसकी मोटरसाइकिल का नंबर और उसका निकलना दर्ज था। ठाणे के गड़गरी रंग आयतन की पार्किग में ले जाकर रमेश गड़गरी ने गाड़ी खड़ी की वहाँ की लॉग बुक में भी इसी मोटरसाइकिल का नम्बर दर्ज था। आतंकवादी विरोधी दस्ता इन लॉग बुकों के जारिए ही रमेश गडकरी तक इन गतिविधियों से अनजान बता कर उनसे पूरी तरह अलग किया है। और दावा किया है कि उसने आतंकवादी विरोधी दस्ते की खोजबीन में मदद की है। मंगेश निकम ने बम बनाने और फोड़ने में जिन दूसरे लोगों की मदद की थी उनमें से विक्रम भावे और संतोष आंग्रे भी पकड़े गए हैं। रायगढ़ जिले के पेन के रहने वाले विक्रम भावे भी सनातन संकुल आश्रम में आकर रहने लगे थे। वहीं उनकी बम बनाने वाले निकम और गडकरी से मुलाकात हुई थी। संतोष आंग्रे तो आश्रम में ड्राइवर का काम करता था। इनने पनवेल के एक सिनेमा घर में बम रखा था, जिसका विस्फोट नहीं हुआ। रत्नागिरी में एक ईसाई उपदेशक के घर के बाहर भी इनने बम रखा था, जिससे कोई नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन उसमें निकम और दूसरे लोग पकड़े गए थे जो इस साल सत्रह अप्रैल को कोर्ट से छूटे।

इन लोगों की ये सभी कोशिशें देखी जाएँ तो साफ हो जाता है कि न तो ये शातिर पेशेवर अपराधी हैं न इन्हें ठीक से बम बनाना और उन्हें मंजे हुए आतंकवादी की तरह जानमाल के ज्यादा से नुकसान करने के साथ फोड़ना आता है। ये निश्चित ही अपने धर्म और देवी देवताओं के अपमान के विरोध में प्रदर्शन करते हुए हिंसा के रास्ते चले गए और वैसे ही काम करने लगे जैसे सिख और मुसलिम आतंकवादियों ने इस देश में किए हैं। लेकिन इनकी अनुभवहीनता और जानमाल का नुकसान न पहुँचा पाने की मारक अक्षमता इनके अपराध को कम नहीं करती न यह बताती है कि इनके इरादे नेक थे। इनकी संस्थाओं ने इनके कुकर्मों से अपने को अलग करते हुए भी कहा है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाना बंद होना चाहिए।

लेकिन बाला साहेब ठाकरे के अखबार सामना ने बाकायदा एक संपादकीय लिख कर इन कोशिशों को मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद बताया है। संपादकीय ने कहा है कि हमने जब सुना कि हिंदू लोग भी बम बनाने लगे हैं तो हमें खुशी हुई। लेकिन क्या तो ये घामड़ बम और कहाँ ये फोड़े गए। ठाणे में जो सात घायल हुए वे हिंदू ही हैं। हिंदुओं को खूब ताकतवर बम बनाने चाहिए और उन्हें ठाणे और नवी मुंबई में बन रहे छोटे-छोटे पाकिस्तानों में फोड़ना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवादियों के मारक बमों का जवाब दिया जा सके। लेकिन इनसे भी हिंदुओं और हिंदुत्व की सही रक्षा नहीं होगी। भारत में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इसलामी आतंकवादियों का राज है और वहाँ पुलिस भी जाने से डरती है। हिंदू संगठनों को जैश, अल कायदा और हिजबुल जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों से सीखना चाहिए। अपने ऐसे आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए कि वे भारत में बने छोटे-छोटे पाकिस्तानों को नष्ट करके उनमें और मुसलमानों में दहशत फैला सके।

यानी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था वाले कितना ही कहें कि वे शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं और पकड़े गए बम बनाने और फोड़ने वालों की करतूतों से उनका कोई लेना-देना नहीं है, शिवसेना चाहती है कि वे बड़ा आतंक मचा देने वाले संगठन हो जाएँ। सामना को शर्म है तो इस बात की कि इन मूखरे ने क्या तो घामड़ बम बनाए और कहां ले जाकर उन्हें फोड़ा। सामना चाहता है कि आतंक मचाने और हिंसा करने में इन हिंदू संगठनों को इस्लामी आतंकवादी संगठनों से भी ज्यादा चतुर, चुस्त और चाक चौबंद होना चाहिए। हम सब सभी किस्म के आतंकवाद को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन शिवसेना हिंदुओं को आतंकवाद में अव्वल और सक्षम बनाना चाहती है। अब बेचारे वेंकैया नायडू कह रहें हैं कि हमें अपने राज्य को मजबूत करना चाहिए ताकि वह आतंकवाद से निपट सके। सामना कहता है किसका राज्य ? हिंदुओं को वीर और हिंसक होना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवाद से निपट सकें।

वेंकैया नायडू को संघ से पूछना चाहिए। क्या वह भी हिंदुओं को वीर और हिंसक नहीं बनाना चाहता ? सावरकर और हेडगेवार और गोलवलकर क्या कह गए हैं ? संघ क्या सिखाता है?

Saturday, January 26, 2008

बिलकिस को शुक्रिया (Thanks to Bilkis)

अपूर्वानन्‍द *

गणतंत्र दिवस की सुबह धूप खिल आई है. मैं उनकी सूची देख रहा हूँ जिनको राज्य ने इस मौके पर अपना धन्यवाद  देने के लिए अलग अलग उपाधियों  से विभूषित किया है. अजीब सी इच्छा थी इस बार कि एक नाम होता इस सूची  में कहीं तो शायद यह गणतंत्र बता पाता कि वह उनकी कद्र करता है जो उसे वैसा  बनाए  रखने के लिए अपने आप की बाजी लगा देते हैं जिसकी कल्पना आज से साठ साल पहले उसने की थी. यह मालूम है हम सबको  कि यह एक व्यर्थ  इच्छा है एक मामूली सी हिन्दुस्तानी शहरी बिलकीस बानो का नाम उनके बीच तलाश करने की जिन्हें यह गणतंत्र मानता है कि उन्होंने उसे प्राणवंत   बनाए  रखा है.

बिलकीस आज  कहाँ होगी, यह ख़बर हमें नहीं. क्या वह उस गुजरात को लौट गई जिसे वह अभी भी अपना वतन मानती है लेकिन जहाँ   पिछले छः साल तक वह नहीं रह सकी थी ? उस  गुजरात को जिसकी पुलिस ने यह रिपोर्ट दाखिल की कि  उसे इसके पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके जिससे वह बिलकीस की वह बात  कानूनी तौर पर कबूल करने  लायक मान सके कि २८ फरवरी , २००२ से गुजरात में मुसलमानों पर शुरू हुए हमलों के दौरान उसके साथ  सामूहिक  बलात्कार किया गया , कि उसकी   तीन साल  की बेटी को उसके सामने पटक कर मार डाला गया , कि उसके परिवार के १४ लोगों को उसके सामने कत्ल कर दिया गया ? उस  गुजरात को जहाँ  की अदालत में यह मुकदमा न चले, इसके लिए  उसे सर्वोच्च न्यायालय के पास गुहार लगनी पड़ी?

पिछले  छह साल बिलकीस ने परदे में  गुजारे हैं. उसके परिवारवालों को अपना  घर द्वार छोड़ देना  पडा   क्योकि   उनकी रिश्तेदार बिलकीस ने  इस मुक़दमे को जिंदा  रखने की  हिमाकत की थी.इस बीच  बिलकीस कहाँ थी? अगर २००२ के 'दंगे', जैसा उन्हीं कहने के हम आदी हैं , लेकिन जो शब्द कभी भी उस कत्लेआम की असलियत  नहीं बता पाता , वक्ती  हिंदू गुस्से का नतीजा थे तो फिर इसका क्या जवाब है कि बिलकीस को  इन्साफ की लड़ाई लड़ने को   गुजरात  में जगह नहीं थी? वह मुम्बई  में थी, दिल्ली में थी , उत्तर प्रदेश में थी , नहीं  थी तो अपने वतन, अपने  घर में नहीं थी. अपनी पनाहगाह बदलती हुई बिलकीस दरअसल, जैसा उसने कहा अपने  बच्चों को उस नफरत  से बचाने  की जुगत में लगी  थी जो अभी भी न जाने कितने लोगों  के  दिलो-दिमाग में मुसलमानों के लिए पल रही है और जिसे लगातार खाद पानी देने  का काम संगठित रूप से किया जा रहा है.

बिलकीस बानो के मामले  में तेरह लोगों को सज़ा सुनाई गई है. पर क्या सिर्फ़  वे ही गुनहगार थे?  बिलकीस के  अलावा बेस्ट बेकरी, गुलमर्ग सोसाईटी , नरोदा पाटिया का   इन्साफ होना बाकी  है . क्या इनके खून के निशान २००२ से और पीछे नहीं जाते? क्या उस व्यक्ति को कभी अदालतें हाज़िर होने का हुक्म  सुनाएंगी  जिसने  गुजरात से ही वह रथ निकाला था जिससे पूरे देश  में मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा और हिंसा का प्रचार किया गया था  और जो इस  देश  का प्रधानमंत्री होने का ख्वाब देख रहा है ? या उस  व्यक्ति को  जो भारत का रत्न होने की इच्छा रखता है लेकिन जिसने गुजरात में बिलकीस पर हमले का औचित्य यह कह कर खोजने की कोशिश की थी की गोधरा में पहले आग किसने लगाई? या उसे जिसने यह कहा था कि बिलकीस जैसे  बलात्कार और औरत  का पेट चीर कर भ्रूण जलाना एक आम घटना है जिसे ज़रूरत से  ज़्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं?  या उस अखबार को जिसने इस घटना के दो रोज़ पहले यह ख़बर छापी, जो पूरी तरह मनगढ़ंत थी कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस पर हमले में दो लड़कियों को अगवा करके , उनके साथ  बुरी तरह बलात्कार करके , उनकी छाती काट कर लाशों को कालोल के एक तालाब में फ़ेंक दिया गया है? या उस संगठन को जो गुजरात में जाने कई सालों से ऐसे पर्चे छाप कर बाँट रहा था  कि हर साल गुजरात में दस हज़ार हिंदू लड़कियों का बलात्कार किया जाता है  , मुसलमान मर्द  हिंदू लड़कियों को अगवा करके उन्हें ख़राब करते हैं? क्या बिलकीस   का बलात्कार एक क्षणिक आवेश में भीड़ ने किया या यह बरसों से नफरत के सुसंगठित प्रचार की स्वाभाविक परिणति थी जिसकी ओर से राज्य   और न्याय प्रणाली ने आंखें मूँद रखी हैं? क्या किसी भी सभ्य  समाज  में इस तरह के घृणा प्रचार की इजाजत दी जा सकती है ? लेकिन इस समाज  को अपनी नागरिक नैतिकता के  बारे में अभी बहुत सोचन की ज़रूरत है, जिसका 'सबसे बड़ा' और 'सदी का महान अभिनेता' मुम्बई  के उस मुजरिम के साथ तस्वीर खिंचाने में गौरव अनुभव करता है जो रोज़ रोज़  मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफरत का प्रचार करता रहा है ओर जिसने बाबरी मस्जिद के गिरा दिय जाने पर खुशी जाहिर की थी? 


न्यायपालिका ने थोड़ा प्रायश्चित किया है बिलकीस  के मामले में इन्साफ करके . पर उस ख़ुद अपने बारे में यह सोचना है कि  क्यों २००२  में पूरे डेढ़ साल तक उसने उन अर्जियों को ठंड बस्ते में डाल दिया जो गुजरात के उजड़े मुसलमानों की ओर से दायर की गयीं थीं, जो हिफाजत और मुआवजे की मामूली मांगें कर रहीं थीं , जिससे वे  जिंदा भर  रह सकें? या न्यायाधीशगण कभी यह सोच पाएंगे कि उनके इस क्रूर  उदासीनता ने  कितने भारतवासियों की जिंदगियों को तबाह कर दिया होगा?


जैसा बिलकीस ने कहा, इस फैसले   से यह उम्मीद बंधी है कि कहीं , किसी जगह इन्साफ हो सकता है. पर भारतीय  गणतंत्र को यह विचार करना पड़ेगा कि न्याय क्या सिर्फ़ संयोगवश ही सम्भव होगा ! यह भी उसे याद रखने  की ज़रूरत है कि टुकड़े-टुकड़े  में इन्साफ नहीं मिलता, वह तो एक सम्पूर्ण एहसास है. क्या इसका आश्वासन बिलकीस जैसे शहरियों को यह गणतंत्र दे सकता है ?

बिलकीस  ने छह साल तक हर धमकी , प्रलोभन का सामना करके जो हासिल किया है वह सिर्फ़ अपने लिए नहीं. उसने भारत के  इस धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के जीवित होने का प्रमाण जुटाया है. इसके लिय पूरे मुल्क को उसका शुक्रिया अदा करने  की ज़रूरत है. मैं , हिंदुस्तान का एक आम शहरी,  इस क्षतविक्षत  गणतंत्र की ओर से  उसकी जीवनदात्री   हमशहरी बिलकीस को इसके लिए सलाम करता हूँ.  

(* लेखक दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी के प्राध्‍यपाक हैं।)

 

य‍ह भी पढ़ें-

कुछ कहना चाहती हैं बिलकिस (Bilkis has something to say)

Tuesday, December 4, 2007

हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या

नन्‍दीग्राम ने उन सारे लोगों को काफी परेशान कर दिया है, जो सालों से उस विचारधारा के हामी हैं, जिस विचार का होने का दावा पश्चिम बंगाल की सरकार करती है। ऐसे लोग किसी आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्‍य भले न हो पर वे इस मुल्‍क में हर तरह की गैर बराबरी के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। हालांकि जब ऐसे लोग अब सवाल कर रहे हैं तो उन पर तथा‍कथित क्रांतिकारियों ने हमले बोल दिए हैं।

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्राध्‍यापक अपूर्वानन्‍द ने जब नन्‍दीग्राम में हिंसा पर टिप्‍पणियां लिखीं तो कई 'क्रांतिकारियों' ने उन पर तरह तरह के आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। शायद आक्षेपों और उससे चल रही जद्दोजहद ने एक कविता की शक्‍ल ले ली। पेश है अपूर्वानन्‍द की कविता

हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या

ओ मेरी धर्षिता माँ
मैं सिर्फ़ खड़ा रहना चाहता हूँ तुम्हारे पास
पूछना नहीं चाहता कौन सा रंग था ध्वजा का जिसे तुम्हारी देह में गाड़ा था
कौन थे वे लोग पूछना नहीं चाहता
क्यों ऐसा लगने लगा है मुझे कि कहीं मैं तो नहीं था वह
यह एक ठंड भरी रात है
और रक्त

चंद्रमा की निर्विकार चाँदनी में मुझे कुछ दिखाई भी तो नहीं देता
तुम्हारे पास पहुँचने को मैं चलते-चलते बहुत थक गया लगता हूँ
मेरे पाँव खून की दलदल में फँस गए है और मैं और नीचे ही नीचे धंसता चला
जा रहा हूँ
क्या है यह खून का धुवां जो मेरे फेफड़ों में फँस गया है और मुझे खांसी आ
रही है लगातार
सैकड़ों शताब्दियों से मेरी छाती में जमा खूनी बलगम
थक्कों में गिर रहा है बाहर
आह, मैं साँस लेना चाहता हूँ ,
एक लम्बी और खुली साँस,
क्या यह बहुत कठिन है ईश्वर
मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूँ
मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ
अपने लिए
और मेरे पास देखता हूँ कोई शब्द ही नहीं है
मेर गले में एक अस्पष्ट सी घरघराहट है
लेकिन उसका तो कोई अर्थ नहीं
क्यों मुस्करा रहे हैं मेरी असमर्थता पर पाब्लो नेरुदा
क्यों ब्रेख्त हंस रहे हैं क्यों नाजिम
माय्कोव्सकी क्या कहना चाह रहे हो तुम
पिछली शताब्दी से ढेर सारी आवाजों का एक तूफान मेरे करीब आ रहा है
साइबेरियाई बर्फानी हवा
कराहती हुई घुसती जा रही है मेरे हर रोम छिद्र में
और एक संगीत जो पिस गया है इस तूफ़ान में
मेडल श्टाम क्या गा रहे थे तुम जब तुम्हारी उंगलियाँ गल रही थीं उस महायात्रा में
तुम्हारा वह गान इतना धुंधला क्यों सुनाई दे रहा है मुझे
मैं एक शब्द चाहता हूँ वाल्टर बेंजामिन
सिर्फ़ एक शब्द जो मुझे इस दलदल में सहारा दे
जिसकी ऊष्मा को पहन सकूं अपनी आत्मा पर
मैं धंस रहा हूँ और बचना चाहता हूँ
और मैं एक घुटी हुई चीख सुनता हूँ
सौ साल से जो मेरा पीछा कर रही है
' लगता है उन्होंने एक बाड़ा डाल दिया है मेरे गिर्द जिसे मैं फांद नहीं पाता
... उन्होंने घेर लिया है मुझे और मैं हिल भी नहीं सकता '

ओह, गोर्की , मैं क्यों नहीं था तुम्हारे पास उस क्षण , क्यों नहीं मैंने
हाथ बढाया अपना
मैं मैकबेथ नहीं हूँ , मैं चीखना चाहता हूँ , फिर भी क्यों मेरी
आत्मा पर हैं खून के धब्बे
एक शब्द चाहिए मुझे मेरे खुदा
कोई यकीन नहीं

एक शब्द
निरंग
विशेषणहीन
एक शब्द
जिसे मैं
इस घरघराती छाती पर मल सकूं
क्या ऐसा शब्द मनुष्य की भाषा से बहिष्कृत कर दिया गया ,
जाने कब से खोज रहा हूँ उसे मेरे मालिक
एक विशेषणहीन शब्द,

मैं

हत्या को कहना चाहता हूँ हत्या

जीवन को जीवन

Friday, November 23, 2007

नन्दीग्राम और मुसलमान

कोलकाता में दो दिन पहले हुए प्रदर्शन से कई लोगों की पेशानी पर चिंता की लकीर खिंच गई है। जिस तरह से वह प्रदर्शन होने दिया गया। पहले से पता होने के बाद सुरक्षा बलों का एहतियाती इंतजाम नहीं किया गया और उसके बाद सेना बुला ली गई... पहले सच्चर कमेटी और उसके बाद नन्दीग्राम ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की बदतर हालत और सरकार का उनके प्रति नजरिया, उजागर कर दिया है। ऐसे में संगठित होते मुसलमान स‍रकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं... इसलिए नौजवान पत्रकार और www.twocircles.net के सम्पादक काशिफ उल हुदा की सलाह है कि भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है। ढाई आखर की गुजारिश पर उन्होंने हिन्दी में यह टिप्पणी भेजी है। हिन्दी में यह उनकी पहली औपचारिक टिप्पणी है।

मुसलामानों की तरक्की के लिए जरूरी है शांतिपूर्ण समाजी और सियासी तहरीक

1977 से वाम मोर्चा पश्विम बंगाम की सत्ता पर काबिज़ है. चुनाव के जरिये सत्‍ता में रहने वाली ये दुनिया की सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार है. वाम मोर्चे के 30 साल तक सत्ता पर बरक़रार रखने का कुछ सेहरा पश्चिम बंगाल के मुसलामानों को भी जाता है. 1977 से हर चुनाव में राज्य के मुसलमान वाम मोर्चे को वोट देते आये हैं.

मुसलामानों एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल मिला. शायद उनके लिए काफी दिनों तक यही बहुत कुछ था। इसलिए उन्होंने तकरीबन 30 साल अपनी ज़िंदगी को बाद से बदतर होते देखा, लेकिन वाम मोर्चे का साथ नहीं छोड़ा. सच्‍चर कमेटी कि रिपोर्ट ने मुसलमानो के पढ़े-लिखे तबके को ज़ोर से झिंझोड़ा. मुसलमान जागे और तंजीमें हरकत में आयीं. सच्‍चर कमेटी ने जो बयान किया, उससे पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की बदतर हालत दुनिया के सामने आ गई. सिर्फ मुसलमान ही क्‍यों, दलितों की हालत भी वहां अच्‍छी नहीं.

खैर, पता ये चला कि मुसलमान यहां हर पायदान पर पिछड़े हैं. पश्चिम बंगाल में ही नहीं बल्कि भारत के दूसरे राज्यों में भी मीटिंग, धरना और कई पहल होने लगी ताकि मुसलमानों की बदतर हालत पर सरकारों का ध्‍यान जाए.पश्चिम बंगाल में कई संगठन पिछले चंद महीनों से काफी सक्रिय हुए. यही नहीं कई बार अपनी मांगें मनवाने के लिए सड़क पर भी उतरे. नंदीग्राम के हादसे ने इन्हें और झिंझोड़ दिया. जो सुरक्षा मिलने का दावा अब तक सरकार करती रही थी, उसकी भी गारंटी नंदीग्राम ने खत्‍म कर दी. अगर मुसलमानो का हाल एक वामपंथी-सेक्‍यूलर हुकूमत में ये हो सकता है तो फिर हिंदुत्व और सॉफ्ट-हिंदुत्व पार्टियों वाली सरकारों से क्या उम्मीद कि जा सकती है?

इन सब वजहों से ही मुस्लिम संगठनों ने मिल्ली इत्तेहाद परिषद बनाने का ऐलान किया और पिछले शुक्रवार को एक ज़बरदस्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें तकरीबन एक लाख लोग शामिल हुए. इस पर्दर्शन कि अगली कड़ी 24 नवम्‍बर को नंदीग्राम मार्च है. पश्चिम बंगाल और उसके बाहर के लोगों ने महसूस किया कि भारतीयों मुसलामानों के बीच एक मूवमेंट शुरू हो रहा है. ...और नंदीग्राम से उठा या मूवमेंट मुसलमानों के बेहतर सामाजिक और आर्थिक न्याय कि लड़ाई लड़ेगा. सियासत में मुसलमानों को सही मुकाम दिलवाएगा.ये मूवमेंट हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा साबित होगा क्योंकि इस देश का सबसे पिछड़ा समाज अपने बलबूते पे खड़ा हो तो यही देश के लिए भी बेहतर है.

नन्‍दीग्राम एक समाजी और आर्थिक मुद्दा है. इससे तसलीमा के मुद्दे जो कि मुसलमानों कि नज़र में एक धार्मिक मुद्दा है, जोड़ना नहीं चाहिए था. ये ग़लती मुसलमान बार-बार करते आये हैं. एक भावानात्‍मक और सांकेतिक मुद्दे पर ज्यादा ज़ोर देते हैं और सरकार पर दबाव डालते हैं. एक बार फिर सरकार ने तसलीमा को बंगाल से बाहर करने की भावनात्‍मक मांग को मान लिया है... इस तरह मुसलमान तंजीमें अपनी जीत का ऐलान कर देंगी... लोग 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का इल्जाम लगायेंगे. नंदीग्राम जो कि समाजी-आर्थिक मुद्दे के रूप में एक तहरीक की शक्ल ले रह था, दम तोड़ देगा.

मुसलमान तंजीम और लीडरों को बेहतर रणनीति बनाकर मुसलमानों को संगठित करना होगा और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाना होगा. यही नहीं, जिंदगी के मसायल और उनसे जुड़े मुद्दों पर अन्य सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठनों के साथ मिल कर काम करमा होगा. मुसलमान भारत कि आबादी के 15 % हैं और कोई भी देश एक बड़ी आबादी को पिछड़ा रख कर विकास नहीं कर सकता.

Monday, November 19, 2007

यह किसकी लड़ाई है दोस्तो

नन्‍दीग्राम में जो कुछ हुआ, उसने बड़ी तादाद में देश के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष लोगों को काफी परेशान कर दिया है। आत्‍ममंथन भी चल रहा है। कई लोगों के लिए यह आंख खोलने वाला है तो कई इसे सबक के रूप में ले रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उभर रहा है कि जिस तरह गुजरात की साम्‍प्रदायिक हिंसा को वहां का मुखिया जायज ठहराता रहा, क्‍या ठीक उसी तरह नन्‍दीग्राम की हिंसा को वहां का मुखिया जायज नहीं ठहरा रहा। बलात्‍कार, हिंसा, लूट, आगजनी और अब वसूली... यह क्‍या है। आज के नवभारत टाइम्‍स में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक अपूर्वानन्‍द का एक लेख प्रकाशित हुआ है। ढाई आखर के पाठकों के लिए यह लेख, नवभारत टाइम्‍स से साभार पेश है-

यह किसकी लड़ाई है दोस्‍तो

अपूर्वानंद
बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नंदीग्राम पर कब्जे के लिए शासक दल के हिंसक अभियान पर जो बयान दिया, उसने सन 2002 में गोधरा के बाद गुजरात में भड़के दंगों का औचित्य ठहराने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की याद दिला दी। 'उन्हें उन्हीं की जुबान में जवाब दिया गया है' और 'हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है' में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री पर यह आरोप लगा कि उन्होंने अपने आप को सारे गुजरातियों का नहीं, बल्कि एक संप्रदाय विशेष का मुख्यमंत्री मान लिया है। बंगाल के मुख्यमंत्री से भी यह सवाल किया गया है कि वे सारे बंगाल के मुख्यमंत्री हैं या सिर्फ शासक दल सीपीएम के?
वैसे गुजरात और बंगाल के बीच तुलना मुख्यमंत्री के बयान के पहले से की जाने लगी थी। हमारे समाज में ऐसे लोग बचे हुए हैं, जिनकी आत्मा पर हिंसा निशान छोड़ जाती है, जो विचारधारा के सहारे किसी हिंसा का समर्थन करने की मजबूरी महसूस नहीं करते। ऐसे लोग 2002 में गुजरात को दौड़ पड़े और 2007 की शुरुआत में नंदीग्राम भी गए। देखा गया कि दोनों ही राज्यों में शासक दल के हथियारबंद कार्यकर्ताओं को खुली छूट ही नहीं, संरक्षण भी दिया गया। अगर 2002 में यह आरोप लगाया गया (जो हाल में एक खोजी रिपोर्ट से साबित भी हुआ) कि पुलिस के संरक्षण में संप्रदाय विशेष पर हमला हुआ, तो 2007 में नंदीग्राम में पुलिस के साथ शासक दल के लोगों ने भी गोलियां चलाईं। इसके सबूत भी मौजूद हैं। लेकिन यह तुलना यहां आकर खत्म नहीं हो जाती।
इस बात पर गौर कीजिए कि सन 2002 में हिंसा के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक पत्रकार और दूसरे लोग अपने जोखिम पर कहीं भी जा सकते थे। लेकिन नंदीग्राम में यह नामुमकिन था। छह रोज तक शासक दल के हथियारबंद गिरोहों ने नंदीग्राम की इतनी जबर्दस्त नाकेबंदी कर दी कि कोई अंदर नहीं जा सकता था। इस हिंसा में कितने लोग मारे गए, कितनों का अपहरण हुआ, कितनों पर बलात्कार- यह बताना नामुमकिन हो गया है। अनगिनत लोग उजड़ गए हैं, उन्हें कैम्पों में रहना पड़ रहा है, उनकी आजीविका खत्म हो चुकी है। इसके ब्यौरे अब धीरे-धीरे मीडिया में आ रहे हैं। सन 2002 की हिंसा के बाद अपने गांवों से विस्थापित हुए मुसलमानों को हमलावरों की ओर से गांव लौट आने को कहा जा रहा है, बशर्ते वे उनके खिलाफ रिपोर्ट वापस ले लें। नंदीग्राम से भगा दिए गए ग्रामवासियों को भी शासक दल वापस आने को कह रहा है। आश्वासन दिया जा रहा है कि अगर वे उसकी बात मानकर रहेंगे तो उन्हें शांति से रहने दिया जाएगा। वे अपने घरों में रह सकते हैं, लेकिन सीपीएम के समर्थक बनकर। इसी को अमन-चैन बहाल होने का नाम दिया जा रहा है।
गुजरात में दंगों के समय ऐसे कई जिला और पुलिस अफसर मौजूद थे, जिन्होंने संविधान की रक्षा के लिए राज्य सरकार के गैरजरूरी निर्देशों को को मानने से इनकार कर दिया। ऐसे बहादुर लोगों की वजह से सरकार पर लगाम लगी और उसके कारनामे उजागर हुए। लेकिन बंगाल में ऐसे अधिकारी खोजने पर भी नहीं मिलते। तीन दशकों के शासन में राज्य की सारी प्रक्रियाओं और उन्हें संचालित करने वाले तंत्र पर शासक दल का निर्बाध नियंत्रण कायम कर लिया गया है। राशन की दुकानों से लेकर पंचायतें शासक दल के लिए पैसे और ताकत का जरिया बन कर रह गई हैं। बंगाल में रहने वाले बताते हैं कि लोगों की निजी जिंदगी के फैसलों में भी शासक दल का दखल रहता है। यह असामान्य स्थिति है और स्टालिन के जमाने के सोवियत संघ की याद दिलाती है। प्राथमिक स्तर से उच्चतर शिक्षा तक के सारे निर्णय शासक दल के अनुसार लिए जाते हैं।
शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थानों की ही नहीं, व्यक्तियों की स्वायत्तता के भी प्रति अनादर बंगाल के स्वभाव का अंग बन चुका है। ऐसी स्थिति में आश्चर्य नहीं कि बंगाल की राजनीति की प्रकृति मूलत: हिंसक है। शासक दल का आचरण विरोधी दलों को भी अनुकूलित करता है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हिंसा को समझने में हाल की घटनाओं ने मदद की है। अगर वह गुंडों और लफंगों का सहारा लेती है, जैसा कि शासक दल का आरोप है, तो ठीक यही बात उसके बारे में भी कही जाती है। हिंसा की संस्कृति बंगाल की राजनीति पर इस कदर छा गई है कि इससे कोई नहीं बचा। वहां राजनीति प्राचीन युद्धों में बदल गई है और इलाकों पर कब्जे के लिए ऐसे लड़ा जा रहे है, जैसे जागीरदार लड़ा करते थे। इस जंग में लोकतंत्र की भावना कहां बची रह जाती है?
गुजरात के जनसंहार और नंदीग्राम की हिंसा का विरोध करने वालों को इसलिए एक बार ठहरकर राजनीतिक कार्रवाइयों और राजनीति की भाषा में हिंसा के प्रति अ