Showing posts with label संवाद. Show all posts
Showing posts with label संवाद. Show all posts

Thursday, July 17, 2008

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है।

मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?'

यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढेर सारे दोस्‍त हैं। यह मेरा यक़ीन है और अविश्‍वास की कोई वजह नहीं।
 
मैं न तो अपने दोस्‍तों के मज़हब के बारे में जानने को परेशान रहता हूँ और न ही जाति। इसलिए यहाँ जिन्‍होंने टिप्‍पणी की है, उनके मज़हब का महज़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। वह भी घिसा पिटा तरीका है। ख़ैर।

ब्‍लॉगिंग की दुनिया में मुझे लगातार हौसला देने वाली  Mired Mirage की, जिन्‍हें हम घुघूती बासूती के रूप में जानते हैं, इस पोस्‍ट पर राय है कि 'आपने इस विषय पर लिखा, बहुत अच्छा किया। ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता है। अच्छा बुरा हर जगह होता है। हमें उसमें से अच्छा चुनना सीखने की आवश्यकता है।'

पर इस पूरे मामले को एक अलग नज़रिये से देखने वाले भी कई हैं। और जैसा की लगता है, शायद ये वही हैं, जिनके बीच जाने की बात ऊपर वाले दोस्‍त कर रहे हैं। हालाँकि मुझे पक्‍का यक़ीन नहीं है।

महामंत्री-तस्लीम की टिप्‍पणी है, 'इस तरह के बेसिर पैर के फतवों के कारण ही इस्‍लाम के प्रति लोगों में गलत धारणा बैठी है।'

तो Anwar Qureshi पूरे विमर्श को एक नया आयाम देते हैं-  'आप ने बहुत अच्छा लिखा है, अगर हम बुरा ना देखना चाहें तो ये हमें उसके लिए प्रेरित नहीं करती हैं। लेकिन हमें विवादों से दूर होकर इस्लाम और मुसलमानों के हक की बातें सोचनी चाहिए और उनके पिछडे़पन को दूर करने की कोशिश करना चाहिए...'

धर्म के अलमबरदारों के बारे में लोगों की ही क्‍या राय है, यह Farid Khan से समझा जा सकता है। फरीद खान का कहना है, '... जिस अँधेरे के ख़िलाफ़ इस्लाम का आविर्भाव हुआ था, मौलवी-मुल्ला उसी अँधेरे में वापस जा कर मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं। असल में ये मुल्ला ही इस्लाम विरोधी हैं, आज के युग में।'  इससे ज्‍यादा आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी क्‍या हो सकती है।

यही नहीं, वह एक हवाला पेश करते हैं, जिसके मुताबिक 'अल बरूनी ने एक जगह लिखा है कि इस्लाम विज्ञान के क्षेत्र में दख़ल नहीं देता। इसका आधार क़ुरान में बतायी गईं वे बातें जिसमें अल्लाह ने बार-हा कहा कि हमने बहुत सारी निशानियाँ इस दुनिया में छोड़ी हैं, जिसे समझो।'

वेब साइट  TwoCircles.net  से आई राय भी इसी बात को और तर्क मुहैया कराती है। इनका कहना है, ' टेक्‍नॉलॉजी ख़ुद में बुरी नहीं है। कोई ईजाद ख़ुद में अच्‍छी या बुरी नहीं होती लेकिन ये तो निर्भर करता है कि हम इसका इस्‍तेमाल कैसे करते हैं?

चाक़ू का इस्‍तेमाल आप सब्‍जी काटकर अपना पेट भरने के लिए कर सकते हैं या फिर आप उसका इस्‍तेमाल किसी को जख्‍़मी करने के लिए करें। लिहाज़ा टीवी का इस्‍तेमाल अगर इल्‍म और तरबियत के लिए किया जाए तो यह बहुत अच्‍छी बात होगी।'

टू सर्किल दूसरा पहलू भी सामने लाती हैं, 'हाँ कुछ उलमा तस्‍वीरों को बहुत बुरा मानते हैं लेकिन इस सोच में काफी बदलाव आया है और अब तो नदवा और देवबंद को भी टीवी चैनल खोलने की रिक्‍वेस्‍ट की जा रही है। नासिरूद़दीन साहब ने काफी अच्‍दा लिखा है कि मीडिया डेमोक्रेसी का ऑक्‍सीजन है।'

यह एक ऐसी बात है जो विमर्श का जमीन मुहैया कराती है न कि विवाद का। आगे टू सर्किल का कहना है, '...और मुसलमानों की एक अच्‍छी ख़ासी आबादी टीवी के ज़रिए मुल्‍क़ और दुनिया का हाला जान पाती है। इसलिए टीवी के खि़लाफ मुहिम मुसलमानों को सामाजी तौर पर कमज़ोर करेगी।'  फिर एक आँकड़ा पेश करते हैं क‍ि मुसलमानों के पास ख़बर पाने का ज़रिया क्‍या है- 

How do Muslims get news:
Oral sources: 50.1% rural, 36.1% urban
TV: 13.2% rural, 42.9% urban
Radio: 20% rural, 19% urban
Newspapers: 9%rural, 20.2% urban

यह बात सबसे अहम है। और इनमें से किसी ने साँस की डोर थामने की बात नहीं की। बल्कि ये जाहिलियत के अँधेरे से बाहर निकलने की कोशिश में लगे हैं। इसलिए जब हम समाज को देखें तो बेहतर हो कि 'हम' और 'तुम' में बाँट कर न देखें। क्‍योंकि जो 'तुम' में है, वह 'हम' में भी होगा या हो सकता है।

Wednesday, July 9, 2008

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर।

दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेरणा का स्रोत है। और हिन्‍दुस्‍तानी सेक्‍यूलरिज्‍म और जम्‍हूरियत को अपना आदर्श मानते हैं। वे इसके लिए लिखते हैं। मुहिम चलाते हैं। जेल जाते हैं। लेकिन जब वे इस मुल्‍क का हाल भी वैसा ही देखते हैं, तो परेशान हो जाते हैं।

इसी परेशानी का सबब है, कि फ़हमीदा रियाज़ Fahmida Riyaz जैसी शायरा बेचैन हो कर एक नज्‍म लिखती हैं लेकिन उनका लिखा यहाँ के 'राष्‍ट्रवादी तत्‍वों' को पसंद नहीं आता है। उन पर दिल्‍ली में एक कार्यक्रम में हमला होता है। आपके लिए पेश है वही नज्‍म।

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई 

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

 

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे ?

सारे उल्‍टे काज करोगे !

अपना चमन ताराज़ करोगे !

 

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फ़तवे जारी

 

होगा कठिन वहाँ भी जीना

दाँतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

 

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

क्‍या हमने दुर्दशा बनायी

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

 

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हँसी आज आयी

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

 

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा

उल्‍टे पाँव चलते जाना

ध्‍यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

 

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया जमाना

 

एक जाप सा करते जाओ

बारंबार यही दोहराओ

'कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत'

 

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे

बस परलोक पहुँच जाओगे

 

हम तो हैं पहले से वहाँ पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहाँ से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

 

Monday, July 7, 2008

वो बात उनको बहुत नाग़वार गुज़री है

कितना आसान होता है, दूसरों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट माँगना। उससे भी आसान होता है, तड़ से सर्टिफिकेट दे देना। मुझे भी सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। पहले भी ख़ूब दिए गए। ललकारा गया। पर मुझे किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। इसलिए कि जब सर्टिफिकेट देने वाला किसी खास रंग का चश्‍मा पहने होगा, तो उसे कुछ भी साफ नज़र नहीं आएगा। न ही मैं यहाँ बॉक्सिंग रिंग में हूँ कि धींगामुश्‍ती करूँ।
जो चीज हम देखना नहीं चाहते, वह सामने होते हुए भी नहीं दिखती। जैसे कुछ दोस्‍तो को (मैं जानबूझ कर नाम नहीं लेना चाहता) पिछले पोस्‍ट में नहीं दिखा। मैं यही कह सकता हूँ कि उन्‍होंने पोस्‍ट पूरी नहीं पढ़ी। कुछ लोग अगर मेरे पिछले कई पोस्‍ट देख लेते तो शायद,  उनका जो ख़ून जला, न जलता। यही नहीं, यह सब संवाद वाली टिप्पिणियाँ नहीं हैं, विवाद वाली हैं। संवाद वाली टिप्पिणियाँ कैसे की जाती हैं, यह घुघूती बासूती से सीखना चाहिए। ख़ैर।

कुछ उदाहरण। पिछली पोस्‍ट की दो लाइन है-
'मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है।'

इसमें तो हर वो संगठन और व्‍यक्ति शामिल है, जिसने इस तनाव में भूमिका अदा की। लेकिन मेरे दोस्‍तो को इसमें कुछ और दिखा।  मैंने तो बाँटने वाले का नाम भी नहीं लिखा, लेकिन शु‍क्रिया दोस्‍तो, आप समझ गए।

दूसरा उदाहरण देखिए। दो पैरा के बाद पूरी पोस्‍ट में न्‍यूक्‍लीयर डील पर मजहबी नेताओं की दखंलदाजी पर टिप्‍पणी है। लेकिन यहाँ तो खून के उबाल में पूरी पोस्‍ट पर भी नजर नहीं डाली जाती... बस पटक देने की जल्‍दी रहती है। नेस्‍तनाबूत करने का उतावलापन रहता है।

तीसरी बात। सुना है, समझदार लोग- जिस मुद़दे पर बात होती है, उसी पर बात करते हैं। लेकिन यहाँ तो उलट दिखाई दे रहा है। आप बात कीजिए कि फलाँ ने खून क्‍यों किया तो जवाब होगा, अच्‍छा दस साल पहले उसने ख़ून किया तो नहीं बोले। इस पर बोल रहे हैं, उस पर क्‍यों नहीं कुछ कहते। हुजूर जो लिखा है पहले उसकी बात करें।

मजहब की सियासत और सियासतदानों का मजहबी चोला- मेरी पोस्‍ट का विषय यही है। तो इस पर बात करें। हमारा भी ज्ञानवर्धन होगा।

हाँ, एक बात और प्रभु ईसा मसीह जब सलीब पर चढ़ाए जा रहे थे, तो उन्‍होंने दुआ की थी- हे ईश्‍वर इन्‍हें क्षमा करना, यह नहीं जानते क्‍या कर रहे हैं। मेरी भी एक दुआ है- हे प्रभु, यह जानते हैं, ये क्‍या कर रहे हैं। क्‍यों कर रहे हैं फिर भी इन्‍हें माफ कर देना। क्षमा की वर्षा करना।

अंत में, फ़ैज़ की एक लाइन है, वो बात जिसका सारे फ़साने में जिक्र न था, वो बात उनको बहुत नाग़वार गुज़री है।

नोट- कुछ लोगो ने एक बार फिर घटिया, नीचले दर्जे और व्‍यक्तिगत हमले वाली टिप्पिणियाँ भेजनी शुरू की हैं। पिछले दिनों मैंने ऐसी कई टिप्पिणियाँ रिजेक्‍ट की हैं। टिप्‍पणी करने से पहले, कमेंट बॉक्‍स के ऊपर और ब्‍लॉग के दाहिनी ओर की गुजारिश जरूर पढ़े।

Friday, July 4, 2008

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है।

कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर।

एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई नए बनेंगे। जिस चीज का दूर-दूर तक मज़हब के साथ लेना-देना नहीं है, उस डील के साथ भी मजहब की डील हो गई।

यह हमारे सियासतदानों को भा गया। इसमें कोई पीछे नहीं रहा। क्‍या वाम, क्‍या दक्षिण। अपने-अपने पक्ष में तर्क जुटाने के लिए सबने निकाल लिया, करार का मजहबी एंगिल। मजहबी रहनुमाओं को भी लुभाने लगा। और दीन की रहनुमाई करने वाले पहुँच गए दुनियावी रहनुमा के आस्‍तान: पर।

निहायत सेक्‍यूलर मसले पर धर्म का कर्म का काम करने वाले दखलंदाजी न करें, आदर्श स्थिति तो यही है। वरना हम तो हम पूछेंगे ही भई कि जब दलितों पर अत्‍याचार होता है, महिलाओं पर जुल्‍म होता है, नौजवान हाथों को काम नहीं मिलता... तब मजहबी रहनुमा कहाँ चले जाते हैं।  यही नहीं सियासतदानों की राजनीति उस समय क्‍यों चुक जाती है, जब धर्म के नाम पर बाँटने का काम होता है। राजधर्म भले याद न रहे, धर्म की राजनीति जरूर याद रहती है।

भई, क्‍यों इस मुल्‍क में कभी अयोध्‍या तो कभी अमरनाथ तो कभी डील के नाम पर धर्म और राजनीतिक के घालमेल की कोशिश की जाती है। ऐसा जब-जब होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं। नफ़रत फ़ैलती है। इस मुल्‍क की रूह ऐसी राजनीति के माफि़क़ नहीं है।

Thursday, April 3, 2008

खुदा के लिए Khuda Ke liye, एक जरूरी फिल्‍म

एक खूबसूरत और झकझोर देने वाली फिल्‍म है- खुदा के लिए (Khuda ke liye- In the name of God)।  फिल्‍म कई मायनों में अहम है। यह पाकिस्‍तानी है। इसने पाकिस्‍तानी सिनेमा (Pakistani Film) को फिर से जिंदा कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत-पाकिस्‍तान के बीच एक-दूसरे की फिल्‍मों के दिखाने पर लगी पाबंदी भी,  इसीसे खत्‍म होगी। करीब दो महीने पहले दिल्‍ली में इस फिल्‍म का खास शो देखने का मौका मिला था। पाकिस्‍तान फिल्‍मों की जो छवि दिमाग में बसी है, यह फिल्‍म उसे पूरी तरह तोड़ देती है।

यह तो हुईं ऊपरी बातें। फिल्‍म का तानाबाना 9/11  के आतंकी हमले की पृष्‍ठभूमि में बुना गया है। यह फिल्‍म आज  के समाज के सवाल से टकराती है। यही इस फिल्‍म को खास बनाती है। मुसलमानों की नई और उदारवादी पीढ़ी के कशमकश को जबान देती है।  एक ओर समाज के अंदर पुरातनपंथी  विचार से उसको जूझना पढ़ रहा है तो दूसरी ओर, दुनिया उसे एक खास बने बनाए खाँचे में ही देखना चाहती है। यानी वह आतंक का हरकारा है।  यह पीढ़ी कई ओर से पिस रही है। अंदरूनी समाज उसे अपनी जकड़न में कैद रखना चाहता है तो बाहरी समाज उसमें दुश्‍मन की छवि देख रहा है और अपने से दूर धकेल रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी खींचतान/तकलीफों / तनावों के बीच अपनी जिंदगी गुजार रही है। 

एक मुसलमान परिवार में पैदा होने वाले दो नौजवान भाई, संगीत के सरगम में खो जाना चाहते हैं। तो उनकी राह में एक ओर मजहबी पुरातनपंथी रोड़ा बनते हैं तो दूसरी ओर दुनिया भर चल रही 'आतंक के खिलाफ जंग' उनके ख्‍वाबों पर पानी फेरने को तैयार है। फिल्‍म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।  लेकिन फिल्‍म यही नहीं है। इसमें मोहब्‍बत है, गीत है और खुशनुमा संगीत भी पर कुछ भी बोझिल नहीं।

मुसलमान या इस्‍लाम कोई इकरंगा चीज नहीं है। इनमें भी कई परतें हैं। आमतौर पर बाहरी समाज या अंदरूनी समाज का पुरातनपंथी तबका और मीडिया उसे इकरंगा और अमानुष के रूप में ही पेश करना चाहता है। लेकिन परतों की बात कोई नहीं करता या करना नहीं चाहता। फिल्‍म इन परतों को सामने लाती है और उनके बीच के तनाव को दिखाती है।

इस फिल्‍म में एक और चीज खास है। इसका भारतीय कनेक्‍शन। नसीरूद्दीन शाह इस फिल्‍म में हैं। जैसा कि निर्देशक का कहना है कि जब यह रोल उन्‍होंने नसीरूद्दीन शाह को ऑफर किया तो पहले उन्‍होंने मना किया। फिर स्क्रिप्‍ट माँगी। और स्क्रिप्‍ट पढ़ने के बाद, बिना पैसे के ही काम करने को राजी हो गए। यानी उस रोल में जरूर कुछ खास था। जी!!!

नसीरूद्दीन शाह भी एक मजहबी आलिम हैं लेकिन मजहब का उदारवादी चेहरा। वह मजहब के आधार पर ही पुरातनपंथियों के तर्कों का जवाब देते हैं। यह मजहब की वह आवाज है, जो आमतौर पर पुरातनपंथियों के शोरगुल में दब जाती है या दबा दी जाती है।

फिल्‍म में संगीत, सिनेमाटोग्राफी, अभिनय, लोकेशन का चुनाव और सबसे बढ़कर निर्देशन लाजवाब है। मौका मिले तो इस फिल्‍म को जरूर देखा जाना चाहिए।

Friday, December 14, 2007

गांधी जी की ताबीज और वाइब्रेंट गुजरात

मैं कोई ताबीज नहीं बांधता। मैं गांधीवादी भी नहीं हूं लेकिन मुझे गांधी जी की ताबीज पसंद है। यही ताजीब मुझे साबरमती आश्रम के दीवारों पर दिख गई। मैंने सोचा, क्‍यों न साबरमती के संत की ताबीज, उनकी ही जन्‍मभूमि यानी गुजरात के 'वाइब्रेशन' पर आजमा कर देखी जाए।

Nasir-Gandhi

गांधी जी की ताबीज

गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा?

हिंसा की बात नहीं

पांच साल से गुजरात को 'वाइब्रेंट' बनाने का दावा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि गुजरात प्रगत‍ि की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। (हालांकि मुझे नहीं मालूम कि गुजरात प्रगति में कब बिहार, पश्चिमबंगाल, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश या राजस्‍थान जैसे बड़े राज्‍यों से पीछे था और पांच साल में कैसे इसे इन राज्‍यों से आगे कर दिया गया।) जो लोग भी थोड़ी आलोचना करते हैं, उन्‍हें कहा जाता रहा है 'गुजरात का विकास हो रहा है और आप हिंसा और हिन्‍दू-मुसलमान की बात कर रहे हैं।' चलिए आज हम हिंसा, हिन्‍दू-मुसलमान की बात नहीं करेंगे। हम यह कतई नहीं कहेंगे कि अहमदाबाद के वेजलपुर, वस्‍त्रापुर की तुलना में जुहापूरा या सरखेज में पानी-बिजली-सड़क-स्‍कूल की हालत काफी खराब है। हम यह भी नहीं कहेंगे कि किस जगह किस मजहब के मानने वाले लोग रहते हैं। हम दूसरी बात करेंगे। हम गांधी जी की ताबीज के मुताबिक अपनी दुविधा दूर करने के लिए गरीब औ दुर्बल व्‍यक्ति की बात करेंगे। हम उसकी बात करेंगे, जिसकी बात बड़े शहरों के चकाचौंध में खोती चली जा रही है।

किसान आत्महत्या कर रहे हैं

हम आज सिर्फ गांधी जी की ताबीज को परखेंगे। किसान अन्‍नदाता है, शायद हम सभी ने बचपन में यह लाइन जरूर पढ़ी होगी। आइये देखें वाइब्रेंट गुजरात में किसान कहां है? क्‍या आपको पता है कि गुजरात में भी किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं?

नहीं, तो हम बताते हैं। सन् 2004 में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में 'विकासपुरुष' नरेन्‍द्र भाई मोदी ने जोरदार तरीके से कहा था कि गुजरात में एक भी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की है। ... एक महीने बाद ही भाई को विधानसभा में मानना पड़ा कि गुजरात में 148 किसानों ने आत्‍महत्‍या की। ... लेकिन सच इससे भी डरावना था। फिल्‍मकार राकेश शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता भरत झाला ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से एक जानकारी मॉंगी। उस जानकारी के जवाब चौंकाने वाले हैं। बकौल राकेश शर्मा, 'पांच महीने की जद्दोजहद के बाद दस अक्‍टूबर 2007 को गुजरात सरकार ने बताया कि राज्‍य में 498 किसानों ने खेती की परेशानियों से तंग आकर आत्‍महत्‍या की है। यह आंकड़ा भी अधूरा है। मेरी नई फिल्‍म में ऐसे करीब 6695 किसानों की मौतों का हवाला है, जिनकी मौत की वजह 'दुर्घटना' बतायी गई। इन किसानों को बीमा योजना का भी लाभ नहीं मिला है।' न...न यह किसी मोदी विरोधी के दिमाग की उपज नहीं है। यह किसानों की आत्‍महत्‍या का स‍रकारी आंकड़ा है। सूचना के अधिकार के तहत मिले आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्‍महत्‍या का जिलावार आंकड़ा कुछ यूँ है- राजकोट (63), जूनागढ़ (85), अम्रेली (34), मेहसाणा (48), नाडियाड (44), जामनगर (55), नर्मदा (30) और भाई नरेन्‍द्र मोदी की नाक के नीचे गांधीनगर में 13 किसानों ने आत्‍महत्‍या की।

बाढ़ की तबाही

यही नहीं। विकास की दिशा क्‍या है, यह भी देखें। सौराष्‍ट्र में पिछले दिनों बाढ़ आई थी। राकेश शर्मा की नई फिल्‍म 'खेड़ु मोरा रे' में एक किसान बताता है, 'गोखरवाड़ा (जिला सुरेन्‍द्रनगर) में कुछ सालों पहले तक बाढ़ की तबाही नहीं होती थी। जब से सुजलम सुफलम योजना शुरू हुई और चेक डैम बनाए जाने लगें, तब से हर साल जल जमाव और बाढ़ की परेशानी शुरू हो गई है।' यही नहीं मोदी ने किसानों की राहत के लिए पैकेज की घोषणा की। सन् 2007 की बात कौन करे, सन् 2005 में एलान किये गए पैकेज का एक पैसा भी किसानों को नहीं मिला। यही नहीं बाकि राज्‍यों की तरह यहां के किसान भी सेज का विरोध कर रहे हैं। भावनगर और काठिवादर इसके उदाहरण हैं।

लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं

सरदार वल्‍लभ भाई पटेल की जन्‍मस्‍थली गुजरात है। आणंद जिला का करमसद इलाका। क्‍या आपको पता है कि वाइब्रेंट गुजरात का दावा करने वाले जिन पटेल का नाम लेते नहीं अघाते, उन लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं है। सड़क का हाल बुरा है। यह हम नहीं, टीवी कैमरे के सामने वहां के लोगों ने बताया है।

अंत में

अब आप गांधी जी की ताबीज को एक बार फिर याद कीजिये और खुद अंदाजा लगाइये कि कितना और किनके लिए वाइब्रेंट है, गुजरात। जरा इस पर भी गौर फरमाइये कि अगर वाकई में गुजरात वाइब्रेंट है, तो फिर नरेन्‍द्र भाई मोदी को तेजाबी भाषण पर क्‍यों उतरना पड़ा ? क्‍यों उन्‍हें चुनाव नजदीक आते-आते विष वमन पर ही भरोसा करना पड़ रहा है? क्‍यों नहीं, वह विकास पर ही टिके रहें? क्‍यों वे ही उनके चुनाव का मुद्दा बन गए, जो नाम से एक खास मजहब के मानने वाले लगते हैं ? गांधी जी की ताबीज इन सवालों का जवाब खोजने में आपकी मदद करेगी, यही दुआ है। आमीन।

इसे भी पढ़ें

कौन हैं 'गुजराती' ?

क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

एक "गुजराती" की तलाश

Wednesday, December 12, 2007

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात।

लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा?

उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।'

मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।'

फिर उसने अपना नाम बताया- राजू। कहने लगा, 'गुजराती तो सब मोदी जी के साथ हैं।'

मैंने पूछा, 'सब।'

बोला हां, सिर्फ 'वो' लोग नहीं हैं।

मैंने फिर पूछा, 'वो' कौन।

बोला, 'वही' लोग। समझे नहीं। और हंसने लगा।

उसकी हंसी ने बता दिया था कि वो कौन। पर मैं उसकी जबान से सुनना चाह रहा था। और आखिरकार उसने कहा, 'मुसलमान लोग तो भाजप के साथ नहीं हैं।'

तब मैंने फिर पूछा, 'क्‍या मुसलमान गुजराती नहीं हैं।'

उसका जवाब था, 'कैसी बात करते हैं। मुसलमान कहीं गुजराती होते हैं। गुजराती तो हमलोग हैं।'

तब एकाएक स्‍पार्क हुआ और मुझे समझ में आ गया कि जब जनाब मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र भाई मोदी गुजरातियों की बात करते हैं तो उनके गुजराती में कौन शामिल है और कौन नहीं। यकीनन, उसमें 'वो' नहीं हैं।

जो बात बड़े बड़े नहीं समझा पा रहे थे वह बात एक अनजान और शायद निम्‍न मध्‍य वर्गीय ऑटो वाले ने मुझे समझा दिया था।

अभी इस उहापोह से उबर ही रहा था तो एक गुजराती (जिस पर मुझे गर्व है) लॉर्ड मेघनाद देसाई का एक इंटरव्यू दिख गया। प्रख्‍यात अर्थशास्‍त्री और साम‍ाजिक रूप से सक्रिय मेघनाद देसाई ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक के दौरान संघ परिवार ने गुजरात के हिन्‍दुओं में यह भाव पैदा करने की कोशिश की गुजराती यानी हिन्‍दू बाकि सब 'वो'। गुजराती की इस नई परिभाषा को सबसे ज्‍यादा अपनाया मध्‍यवर्ग ने। (ब्‍लॉग की दुनिया पर इस मध्‍यवर्ग की प्रतिक्रिया देख आप अब आसानी से इसकी वजह समझ सकते हैं।) यही मध्‍यवर्ग संघ परिवार का वैचारिक कॅरियर है। उनका कहना था कि जब पांच करोड़ गुजराती की बात मोदी करते हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह किसकी बात कर रहे हैं।

लेकिन मेरी उहापोह और बढ़ गई है। मैं अब सोच रहा हूं कि दक्‍कनी उर्दू के जन्‍मदाता, वली गुजराती का क्‍या होगा, जिसने अपने को गुजरात की मिट्टी में जज्‍ब कर दिया है? उस रजब अली को क्‍या कहा जाएगा जिसने वसंत हेंगिश्‍ते के साथ अहमदाबाद के जमालपुर में साम्‍प्रद‍ायिक सौहार्द्र के लिए जान दे दिया? उस एहसान जाफरी को क्‍या माना जाएगा,  जो गुजरात की आग में जला और गुजरात की हवा में फैल गया है? गुलाम मोहम्‍मद शेख को क्‍या नाम देंगे, जिसने पेंटिंग में गुजरात का नाम दुनिया के नक्‍शे पर ला खड़ा किया? एसआर बंदूकवाला को क्‍या माना जाएगा। इस्‍माइल दरबार के गरबा संगीत को किस नाम से पुकारा जाएगा? जहीर खान,  इरफान पैठान, युसूफ पैठान, सायरा, रशीदा, नियाज बेन को किस खांचे में फिट किया जाएगा? गुजराती या‍ सिर्फ 'वो'?

gmsheikh-
प्रख्‍यात चित्रकार गुलाम मोहम्‍मद शेख की एक पेंटिंग।(साभार)
इसे भी पढ़ें

 क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

एक "गुजराती" की तलाश 

Monday, November 5, 2007

क्या रवीश पैसे के लिए सेक्यूलर हैं

बड़ा आसान होता है किसी की ईमानदारी और विचार पर सवाल खड़े करना। अपने विचार को ‍ सर्वश्रेष्ठ मानना भी बड़ा आसान होता है और सबसे आसान होता है कि किसी की धर्मनिरपेक्षता पर ताने कसना। इस तरह के विचार छिपाते-छिपाते काफी कुछ कह जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माहिर सहाफी रवीश कुमार ने काफी पहले (22 अगस्‍त 2007) 'चक दे इंडिया' पर एक टिप्‍पणी लिखी थी। वह टिप्‍पणी ढाई आखर ने पोस्‍ट की। जनाब अतुल जी ने कल चार नवम्‍बर को उस पोस्‍ट पर अपनी राय जाहिर की। उस टिप्‍पणी में उन्‍होंने रवीश कुमार पर ही कुछ सवाल उठा दिए। चूँकि पोस्‍ट को काफी दिन हो चुके हैं, इसलिए अतुल जी की राय और रवीश के जवाब को हम यहां अलग पोस्‍ट की तरह पेश कर रहे हैं।

जनाब अतुल जी ने लिखा है-

' विवाद कि जगह संवाद करने का र‍िक्‍वेस्ट बिल्कुल बढि़या है और कोशिश कि जायेगी। कबीर खान को लेकर फिल्म बनाना आसान है क्योंकि आजकल काफी फ़ैशनेबल सा हो गय