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Wednesday, July 9, 2008

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर।

दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेरणा का स्रोत है। और हिन्‍दुस्‍तानी सेक्‍यूलरिज्‍म और जम्‍हूरियत को अपना आदर्श मानते हैं। वे इसके लिए लिखते हैं। मुहिम चलाते हैं। जेल जाते हैं। लेकिन जब वे इस मुल्‍क का हाल भी वैसा ही देखते हैं, तो परेशान हो जाते हैं।

इसी परेशानी का सबब है, कि फ़हमीदा रियाज़ Fahmida Riyaz जैसी शायरा बेचैन हो कर एक नज्‍म लिखती हैं लेकिन उनका लिखा यहाँ के 'राष्‍ट्रवादी तत्‍वों' को पसंद नहीं आता है। उन पर दिल्‍ली में एक कार्यक्रम में हमला होता है। आपके लिए पेश है वही नज्‍म।

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई 

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

 

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे ?

सारे उल्‍टे काज करोगे !

अपना चमन ताराज़ करोगे !

 

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फ़तवे जारी

 

होगा कठिन वहाँ भी जीना

दाँतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

 

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

क्‍या हमने दुर्दशा बनायी

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

 

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हँसी आज आयी

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

 

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा

उल्‍टे पाँव चलते जाना

ध्‍यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

 

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया जमाना

 

एक जाप सा करते जाओ

बारंबार यही दोहराओ

'कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत'

 

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे

बस परलोक पहुँच जाओगे

 

हम तो हैं पहले से वहाँ पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहाँ से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

 

Monday, March 24, 2008

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।

 

इन्‍हें भी देखें

'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...'

कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन

Saturday, March 22, 2008

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दुस्तान की गंगा जमनी तहजीब का अगर कोई सबसे मजबूत वाहक है, तो वह हैं नजीर अकबराबादी। नजीर एक शायर नहीं, बल्कि परम्परा हैं। जो इस बात की मजबूत दलील पेश करते हैं कि इस मुल्क में रहने वाले लोगों के मजहब भले ही अलग-अलग हों, उनकी तहजीब की जड़ एक है। उस जड़ को बिना 'जड़' बनाए आगे बढ़ाते रहना ही, हिन्दुस्तान की असली परम्परा है। आज इसी मिली-जुली संस्कृति पर कई ओर से हमला हो रहा है। एक खास विचारधार इस बात पर यकीन करती है कि इस मुल्क में संस्कृति और धर्म के आधार पर मेलजोल मुमकिन नहीं है। इसके लिए वे नफ़रत और हिंसा फैलाने में यकीन रखते हैं। हमारे आस-पास नफ़रत फैलाने वाले ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है।
ऐसे में होली के मौके पर नजीर को याद करना जरूरी है। होली पर जितना नजीर ने लिखा है, उतना शायद ही किसी और ने लिखा हो। यह बात हर साल इसलिए याद दिलाने की जरूरत है ताकि कुछ लोग जो भारतीय संस्कृति के एकमात्र दावेदार होने की घोषणा करते हैं, नजीर की शायरी में अपना असली चेहरा देखें। नजीर की ढेर सारी होली कविताओं में से दो की चंद लाइनें आपके सामने पेश है।
होली मुबारक!!!!!!

होली- 1

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

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जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।
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होली- 2

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीशए (सागर) जाम (शराब का प्याला) छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
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गुलज़ार (बाग़) खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

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Thursday, March 13, 2008

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं।

उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है।

जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ।

उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'।

Monday, March 10, 2008

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ (Lover From Palestine)

Mahmood_darwish  महमूद दरवेश (Mahmoud या Mahmood Darwish) फिलिस्‍तीन के मशहूर कवि हैं। दुनिया के बड़े साहित्‍यकारों में उनका शुमार होता है। अपने वतन फिलिस्‍तीन के लिए जबरदस्‍त बेचैनी उनकी शायरी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। फिलिस्‍तीन को समझने का एक बड़ा जरिया दरवेश की कविताएँ हैं। ढाई आखर पर इससे पहले भी हमने उनकी कविताएँ पोस्‍ट की थीं। आज चंद और रचनाएँ पेश हैं। इसे अंग्रेजी से हिन्‍दुस्‍तानी में पेश किया है साहित्‍यकार/ नाटककार ख़ुर्शीद अनवर ने।

 

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़

तेरी आँखें

कि उतरता कोई नश्‍तर दिल में

दर्द महसूस करूँ, या कि फि़दा हो जाऊँ

तेज़ झोंकों में हूँ फा़नूस इनका

 

रात को चीर दे और दर्द को गहरा कर दे

ऐसे पेवस्‍त करो आँखों को सीने में मेरे

तेरी आँखों से मिले ज़ख्‍़म यूँ चमकें जैसे

आज के घोर अँधेरों में रोशनी की किरण

कल के ख्‍़वाबों को भी रोशन कर दे

और मेरी रूह पे भी छा जाए।

और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र

यह भी न याद रहे

हम कभी साथ भी थे, एक ही थी राहगुज़र

******

तेरे अल्‍फ़ाज़ मेरा नग़मा थे

मेरे होठों पे वह उभरे थे तरन्‍नुम बनकर

लेकिन अफसोस कि मौसम बदले

खुशनुमा रंगों पे एक बर्फ की चारद फैली

यूँ उड़े लफ्ज तेरे जैसे परिंदा कोई

अजनबी रास्‍तों में खो जाए

फिर तेरा साथ छुटा

ख्‍़वाब के आइने भी टूट गए

दर्द के तूफाँ में हम डूब गए

ख्‍वाब के टुकड़ों की झंकार लिए

ऐ वतन तुझ पे तड़पते ही रहे

*******

 

तेरी आँखें हैं हम फि़लिस्‍तीनी

तेरे हैं नाम हम फि़लिस्‍तीनी

तेरे ख्‍़वा़ब-ओ-ख्‍़याल, जिस्‍म, लिबास

तेरी खामोशी और तेरी आवाज़

जिंदगी हो तेरी कि तेरी मौत

हम फिलिस्‍तीनी हम फिलिस्‍तीनी

*******

तू बयाज़ों में जावेदाँ है मेरी

तेरी लफ़्जों में जो चिंगारी है

तेरे सीने से ही उठाई है

तेरे मज़मूँ मेरा सरमाया है

ऐ वतन तेरे नाम पर मैंने

घाटियों को भी यूँ ललकारा !

दुश्‍मनों- तेरे तुंद घोड़ों से

सामना करना मुझको आता है

वक्‍़त बदला  है पर ये याद रहे

पत्‍थरों और टापों के आगे

देव-पैकर तुम्‍हारे हर बुत पर

मेरे नग़मों की ज़वाँ चिंगारी

बिजलियाँ बनके बरसने को है

********

 

ऐ वतन तेरे नाम पर मैंने

अपने दुश्‍मन को यूँ ललकारा है

अब मुझे चैन नहीं

नींद आए तो मेरे जिस्‍म को कीड़े खाएँ

तुमको यह याद रहे

चीटियाँ चीलों की नस्‍लें नहीं पैदा करतीं

साँप के अंडे सपोले ही जनम देते हैं

तुमको यह याद रहे

पहले भी घोड़ों के रूख हमने पलट रखे हैं

और यकीं आज भी है

अपने बाज़ू में लहू आज भी है।

palestine

(अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के मौके पर अपने गम व गुस्‍से का इजहार करती फिलिस्‍तीनी महिलाएँ)

Saturday, February 16, 2008

तसलीमा की ताजा कविताएँ-2 (Latest Poems of Taslmia Nasreen-2)

taslima

 

(3)

नो मेन्स लैंड

अपना देश ही अगर तुम्हें न दे देश,

तो दुनिया का कौन-सा देश है, जो तुम्हें देगा देश, बोलो।

म-फिरकर सभी देश काफी कुछ ऐसे ही होते हैं,

हुक्मरानों के चरित्र भी ऐसे ही।

तकलीफ देने पर आयें, तो ऐसे ही देते हैं तकलीफ।

इसी तरह उल्लास से चुभोएँगे सूइयाँ

तुम्हारी कलाई के सामने, पत्थर-चेहरा लिए बैठे,

मन ही मन नाच रहे होंगे।

नाम-धाम में भले हो फर्क

अँधेरे में भी पहचान लोगे उन्हें,

सुनकर चीत्कार, खुसफुस, चलने-फिरने की आहट,

तुम समझ जाओगे कौन हैं वे लोग।

हवा जिस तरह, उनके लिए, उधर ही दौड़ पड़ने का समय।

हवा भी तुम्हे बता देगी, कौन हैं वे लोग।

हुक्मरान आखिर तो होते हैं हुक्मरान।

चाहे तुम कितनी भी तसल्ली दो अपने को,

किसी शासक की जायदाद नहीं- देश।

देश होता है आम-जन का , जो देश को प्यार करते हैं,

देश होता है उनका।

चाहे तुम जितना भी किसी को समझाओ- यह देश तुम्हारा है,

इसे तुमने रचा-गढ़ा है, अपने अन्तस में,

अपनी मेहनत और सपनों की तूली में आँका है इसका मानचित्र।

अगर शासक ही तुम्हे दुरदुराकर खदेड़ दें, कहाँ जाओगे तुम?

कौन-सा देश खड़ा मिलेगा, खोले दरवाजा?

किसको देने को पनाह?

कौन-सा देश, किस मुँह से देगा तुम्हें-देश, बोलो।

(4)

अब तुम कोई नहीं हो,

शायद इंसान भी नहीं हो।

वैसे भी अब क्या है तुम्हारे पास खोने को?

अब दुनिया को खींच लाओ बाहर, कहो-

तुम्हें वहीं खड़े होने की जगह दे, वहीं दे शरण,

जहाँ खत्म होती है देश की सरहद,

जहाँ की माटी किसी की भी नहीं होती,

फिर भी जितनी-सी माटी मौजूद,

वह अवांछित माटी ही, उतनी-सी जमीन,

चलो, आज से तुम्हारी हो।

(5)

भारतवर्ष

भारतवर्ष सिर्फ भारतवर्ष नहीं है।

मेरे जन्म के पहले से ही,

भारतवर्ष मेरा इतिहास।

बगावत और विद्वेष की छुरी से द्विखंडित,

भयावह टूट-फूट अन्तस में सँजोये,

दमफूली साँसों की दौड़। अनिश्चित संभावनाओं की ओर, मेरा इतिहास।

रक्ताक्त इतिहास। मौत का इतिहास।

इस भारतवर्ष ने मुझे दी है, भाषा,

समृद्ध किया है संस्कृति से,

शक्तिमान सपनों में।

इन दिनों यही भारतवर्ष अगर चाहे, तो छीन सकता है,

मेरे जीवन से, मेरा इतिहास।

मेरे सपनों का स्वदेश।

लेकिन नि:स्व कर देने की चाह पर,

भला मैं क्यों होने लगी नि:स्व?

भारतवर्ष ने जो जन्म दिया है महात्माओं को।

उन विराट आत्माओं के हाथ

आज, मेरे थके-हारे कन्धे पर,

इस असहाय, अनाथ और अवांछित कन्धे पर।

देश से भी यादा विराट हैं ये हाथ,

देश-काल के पार ये हाथ,

दुनियाभर की निर्ममता से,

मुझे बड़ी ममता से सुरक्षा देते हैं-

मदनजित, महाश्वेता, मुचकुन्द-

इन दिनों मैं उन्हें ही पुकारती हूँ- देश।

आज उनका ही, हृदय-प्रदेश, मेरा सच्चा स्वदेश।

(बांग्‍ला से हिन्‍दी किया है, कृपाशंकर चौबे ने।)

Monday, February 11, 2008

(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ

(1)


जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है

इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ,

जिसमें एक बंद खिड़की है,

जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती, 

खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है,

चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती।

इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ

चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़, 

लाँघ नहीं सकती चौखट।

एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं,

जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर,

चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ।

मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को

इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।

हाँ, इन दिनों मैं एक ऐसे कमरे में रहती हूँ,

जहाँ मुझे साँस लेने में बेहद तकलीफ़ होती है।

चारों तरफ न कोई आहट भी नहीं,

सिर्फ़ और सिर्फ़ सिर टकराने की आवाज़ें।

नहीं देखतीं, दुनिया के किसी मनुष्य की आँखें

गड़ी रहती हैं, सिर्फ दो छिपकलियों की आँखें।

आँखें फ़ाड़-फ़ाड़कर निहारती रहती हैं,

पता नहीं, वे दुखी होती हैं या नहीं

क्या वे भी रोती हैं मेरे साथ? जब मैं रोती हूँ?

मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जहाँ रहना मैं एकदम नहीं चाहती।

मैं ऐसे एक कमरे में असहाय कैद हूँ।

हां, ऐसे ही एक कमरे में रहने को, मुझे विवश करता है लोकतंत्र

ऐसे एक कमरे में , ऐसे अँधेरे में

ऐसी एक अनिश्चयता, एक आशंका में

मुझे रहने को लाचार करता है लोकतंत्र

एक कमरे में तिल-तिल मेरी हत्या कर रही है- धर्मनिरपेक्षता।

एक कमरे में मुझे असहाय-निरुपय किये दे रहा है- प्रिय भारतवर्ष।

भयंकर व्यस्त-समस्त मानस और मानसनुमा प्राणी,

पता नहीं, उस दिन भी, उन्हें पल-दो पल की फु़र्सत होगी या नहीं,

जिस दिन कोई जड़-वस्तु, कमरे से बाहर निकलेगी

जिस दिन सड़ा-गला एक लोथड़ा या हड्डी पसली लाँघेगी दहलीज़।

आखिरकार, क्या मौत ही मुक्ति देगी?

मौत ही शायद देती है आज़ादी, चौखट लाँघने की

उस दिन भी मुझे टकटोरती रहेंगी, छिपकिली की दो जोड़ी आँखें।  

दिन भर।

वे भी शायद होंगी दुखी। उस दिन।


गणतंत्र के झंडे में लपेटकर, प्रिय भारत की माटी में,

कोई मुझे दफन कर देगा। शायद कोई सरकारी मुलाजि़म।

खैर, वहाँ भी मुझे नसीब होगी, एक अल्प कोठरी।

उस कोठरी में लाँघने के लिए, कोई दहलीज नहीं होगी,

वहाँ भी मिलेगी मुझे एक अदद कोठरी,

लेकिन, जहाँ मुझे साँस लेने में कोई तकलीफ नहीं होगी।


(2)

नज़रबंद

कभी, किसी दिन, अगर तुम्हें होना पड़े नज़रबंद,

अगर कोई पहना दे पाँवों में बेड़ियाँ,

मुझे याद करना।

जिस कमरे में तुम हो, अगर किसी दिन,

उस कमरे का दरवाज़ा, अन्दर से नहीं,

बाहर से बंद करके, कोई जा चुका हो,

मुझे याद करना।

पूरे मंजि़ले में कोई न हो, जो सुने तुम्हारी आवाज़,

जुबान ताला-बंद, होंठ कसकर सिले हुए

तुम बात करना चाहते हो, मगर कोई नहीं सुनता,

या सुनता है, मगर ध्यान नहीं देता,

मुझे याद करना।

मसलन तुम शिद्दत से चाहते हो, कोई खोल दे दरवाज़ा,

खोल दे तुम्हारी बेड़ियाँ, सारे टाँके,

मैंने भी चाहा था,

गुजर जायें महीने-दर-महीने, कोई रखे नहीं कदम इस राह,

दरवाज़ा खोलते ही जाने क्या हो-न हो,

इसी अंदेशे में अगर कोई खोले नहीं दरवाजा,

मुझे याद करना।

जब तुम्हें हो खूब-खूब तकलीफ़

याद करना, मुझे भी हुई थी तकलीफ,

बेहद डरे-सहमे, सतर्कता के नाप-नापकर चलता हो जीवन,

एकदम से अचानक, हो सकता है नज़रबंद, कोई भी! तुम भी!

अब, तुम-मैं, सब एकाकार, अब नहीं कोई फ़र्क़ सूत भर भी!

मेरी तरह तुम भी! इंतज़ार करना तुम भी, इंसानों का!

हहराकर घिर आता है अँधेरा, मगर नहीं आता कोई इंसान।


किसी कवि को क्या कभी, किसी ने किया था नजरबंद ?

वैसे कवि को लेकर उछाले गये हैं ईंट-कंकड़-पत्थर,

आगजनी भी हुई है,

लेकिन कवि को किसी ने गृहबंदी नहीं किया। किसी भी देश ने।

हिन्दुस्तान ने इस सभ्यता, इस इक्कीसवीं शती से

ग्रहण किया था कवि को,

हाँ अगले ही पल उसे वर्जित भी कर दिया

उसके बचपन जैसे धर्म ने, उसकी निष्ठुर राजनीति ने।

कवि ने कोई गुनाह नहीं किया,

फिर भी कवि है, आज गृह-बंदी।

कवि भूल गया है - आसमान कैसा होता है,

कह गये हैं, अब वे यहाँ फिर कभी कदम नहीं रखेंगे।

आज एक सौ पचास दिन हुए, कवि गृह बंदी है

गुजर गये एक सौ पचास दिन,

कवि का यह अहसास भी छोड़ गया था,

कि धरती पर रहता है, ऐसा कोई इंसान,

जिसके पास मौजूद है दिल,

ऐसा कौन है, जिससे कह वापस माँगे अपने दिन?

अँधेरा समेटे कवि सोच में डूबा है-

कौन लौटाएगा उसके जीवन का उजाला,

कौन हो जो किसी दिन एकांत में उसे सौंपेगा जीवन मंत्र

कवि को कम से कम तसल्ली तो दे इंसान-

आज से पहले, जो लोग गृह-बंदी थे,

अधिकांश ही कवि थे,

मन ही मन, कुछ तो मिले उसे राहत,

नि:संगता से,

निचाट अकेलेपन से

रीत रहे दिनों से।

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Tuesday, December 4, 2007

हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या

नन्‍दीग्राम ने उन सारे लोगों को काफी परेशान कर दिया है, जो सालों से उस विचारधारा के हामी हैं, जिस विचार का होने का दावा पश्चिम बंगाल की सरकार करती है। ऐसे लोग किसी आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्‍य भले न हो पर वे इस मुल्‍क में हर तरह की गैर बराबरी के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। हालांकि जब ऐसे लोग अब सवाल कर रहे हैं तो उन पर तथा‍कथित क्रांतिकारियों ने हमले बोल दिए हैं।

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्राध्‍यापक अपूर्वानन्‍द ने जब नन्‍दीग्राम में हिंसा पर टिप्‍पणियां लिखीं तो कई 'क्रांतिकारियों' ने उन पर तरह तरह के आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। शायद आक्षेपों और उससे चल रही जद्दोजहद ने एक कविता की शक्‍ल ले ली। पेश है अपूर्वानन्‍द की कविता

हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या

ओ मेरी धर्षिता माँ
मैं सिर्फ़ खड़ा रहना चाहता हूँ तुम्हारे पास
पूछना नहीं चाहता कौन सा रंग था ध्वजा का जिसे तुम्हारी देह में गाड़ा था
कौन थे वे लोग पूछना नहीं चाहता
क्यों ऐसा लगने लगा है मुझे कि कहीं मैं तो नहीं था वह
यह एक ठंड भरी रात है
और रक्त

चंद्रमा की निर्विकार चाँदनी में मुझे कुछ दिखाई भी तो नहीं देता
तुम्हारे पास पहुँचने को मैं चलते-चलते बहुत थक गया लगता हूँ
मेरे पाँव खून की दलदल में फँस गए है और मैं और नीचे ही नीचे धंसता चला
जा रहा हूँ
क्या है यह खून का धुवां जो मेरे फेफड़ों में फँस गया है और मुझे खांसी आ
रही है लगातार
सैकड़ों शताब्दियों से मेरी छाती में जमा खूनी बलगम
थक्कों में गिर रहा है बाहर
आह, मैं साँस लेना चाहता हूँ ,
एक लम्बी और खुली साँस,
क्या यह बहुत कठिन है ईश्वर
मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूँ
मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ
अपने लिए
और मेरे पास देखता हूँ कोई शब्द ही नहीं है
मेर गले में एक अस्पष्ट सी घरघराहट है
लेकिन उसका तो कोई अर्थ नहीं
क्यों मुस्करा रहे हैं मेरी असमर्थता पर पाब्लो नेरुदा
क्यों ब्रेख्त हंस रहे हैं क्यों नाजिम
माय्कोव्सकी क्या कहना चाह रहे हो तुम
पिछली शताब्दी से ढेर सारी आवाजों का एक तूफान मेरे करीब आ रहा है
साइबेरियाई बर्फानी हवा
कराहती हुई घुसती जा रही है मेरे हर रोम छिद्र में
और एक संगीत जो पिस गया है इस तूफ़ान में
मेडल श्टाम क्या गा रहे थे तुम जब तुम्हारी उंगलियाँ गल रही थीं उस महायात्रा में
तुम्हारा वह गान इतना धुंधला क्यों सुनाई दे रहा है मुझे
मैं एक शब्द चाहता हूँ वाल्टर बेंजामिन
सिर्फ़ एक शब्द जो मुझे इस दलदल में सहारा दे
जिसकी ऊष्मा को पहन सकूं अपनी आत्मा पर
मैं धंस रहा हूँ और बचना चाहता हूँ
और मैं एक घुटी हुई चीख सुनता हूँ
सौ साल से जो मेरा पीछा कर रही है
' लगता है उन्होंने एक बाड़ा डाल दिया है मेरे गिर्द जिसे मैं फांद नहीं पाता
... उन्होंने घेर लिया है मुझे और मैं हिल भी नहीं सकता '

ओह, गोर्की , मैं क्यों नहीं था तुम्हारे पास उस क्षण , क्यों नहीं मैंने
हाथ बढाया अपना
मैं मैकबेथ नहीं हूँ , मैं चीखना चाहता हूँ , फिर भी क्यों मेरी
आत्मा पर हैं खून के धब्बे
एक शब्द चाहिए मुझे मेरे खुदा
कोई यकीन नहीं

एक शब्द
निरंग
विशेषणहीन
एक शब्द
जिसे मैं
इस घरघराती छाती पर मल सकूं
क्या ऐसा शब्द मनुष्य की भाषा से बहिष्कृत कर दिया गया ,
जाने कब से खोज रहा हूँ उसे मेरे मालिक
एक विशेषणहीन शब्द,

मैं

हत्या को कहना चाहता हूँ हत्या

जीवन को जीवन