हुसैन की कीमत: पेंटिंग की नहीं, जान की

पिछले दिनों मोहल्ला में अपूर्वानन्द की एक टिप्पणी आयी थी कि हुसैन कहां हैं। आज एक और जगह हुसैन बनाम रश्दी और तसलीमा नसरीन पर चर्चा की गयी है। हुसैन यानी एमएफ हुसैन। 91 साल के बुजुर्ग चित्रकार। वो इस देश में नहीं हैं क्योंकि उनकी गिरफ्तारी का वारंट है। इल्जाम है, उन्होंने हिन्दू-दे‍वी देवताओं की बेइज्जती की। हरिद्वार की एक अदालत के निर्देश के बाद मुम्बई में उनके घर पर कुर्की की नोटिस चस्पा कर दी गयी है। लेकिन थोड़ा पीछे जायें तो कुछ और सच्चाई भी पता चलेगी।

हुसैन को मारोगे तो यह मिलेगा...वो मिलेगा
नासिरूद्दीन हैदर खॉं

(एक)
याद दिलाना जरूरी है कि जब मुसलिम कट्टरपंथियों ने विवादास्पद लेखक सलमान रश्दी के खिलाफ मौत का फतवा दिया था, तो बार-बार यह कहा जा रहा था कि मुसलमानों में जरा भी सहिष्णुता नहीं है। इस्लाम कट्टरता सिखाता है। हिन्दू ऐसे नहीं होते। हिन्दू ऐसा नहीं करते। सहिष्णुता तो उनके खून में है। यह आम हिन्दू जन नहीं बल्कि उनके प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले हिन्दुत्व (हिन्दू मजहब और हिन्दुत्व में हम फर्क करते हैं) के अलमबरदार कह रहे थे।
लेकिन दुनिया भर में सहिष्णुता का दावा करने वाले यही हिन्दुत्व वाले हुसैन के पीछे हैं। आपको हरिद्वार की अदालत के बारे में पता है। पता इसलिए कि इसमें मुम्बई पुलिस शामिल हो गयी और उसने कार्रवाई करते हुए कुर्की की नोटिस चस्पा कर दी। लेकिन बहुत कुछ ऐसा है, जो मेट्रो की खबर नहीं पाया।
(दो)
पिछले साल फरवरी-मार्च में पैगम्बर हजरत मुहम्मद का कार्टून बनाने वाले डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट के खिलाफ इस देश में काफी हंगामा बरपा था। सेक्यूलर कही जाने वाली उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने तो कार्टूनिस्ट की हत्या पर इनाम का भी एलान कर दिया। मुसलमानों पर तो कट्टर होने का इल्जाम था ही भला हिन्दुत्व के अलमबरदार कहां पीछे रहते। इन अलमबरदारों को लगा‍ कि डेनमार्क में बैठे कार्टूनिस्ट के नाम पर हिन्दुस्तान में ऐसी गोलबंदी। उन्हें भी कुछ करना चाहिए।... उन्हें हुसैन मिले। चित्रकार हुसैन, जिसने हिन्दू-देवी देवताओं की ऐसी तस्वीर बनायी जो ‘उन्हें’ पच्चीस तीस साल बाद समझ में आयी। ‘उन्हें’ पता चला कि अरे यह तो नंगी हैं। अब देखिये सहिष्णु हिन्दुत्वादियों ने क्या किया। देश के छोटे-छोटे इलाक़ों से लेकर बड़े शहरों तक हुसैन विरोध शुरू हुआ। हिन्दुत्वादियों का साथ कुछ मुसलिम नामधारी संगठनों ने भी दिया। दोस्ती होती भी क्यों न, बात तो दोनों एक ही कर रहे थे। खैर। यह सब उस वक्त हो रहा था, हिन्दू जन जागृति समिति औरे विहिप के हंगामे के बाद लगभग दो हफ्ते पहले ही यानी फरवरी 2006 में हुसैन अपने एक चित्र के लिए माफी मांग चुके थे।
(तीन)
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, बिजनौर, खुर्जा, लखनऊ, जौनपुर, भोपाल, इंदौर, राजकोट, दिल्ली ... में भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू क्रांति दल, शिवसेना, कृष्ण सेना, श्रीराम सेना, जाट महासभा, हिन्दू पर्सनल लॉ बोर्ड, हिन्दू जन जागृति समिति में हिन्दू रक्षक साबित करने की होड़ लग गयी। यही नहीं कांग्रेस के एक मुसलिम (राष्‍ट्रवादी) नेता भी इस होड़ में उतर आये। पर यह कर क्या रहे थे, इसकी चंद बानगी-
- लखनऊ में हिन्दू पर्सनल लॉ बोर्ड ने हुसैन की मौत पर 51 लाख देने का ऐलान किया।
- इंदौर में कांग्रेस के एक नेता हुसैन का हाथ काटने पर 11 लाख का इनाम देने की घोषणा की।
-बिजनौर में हिन्दूवादी संगठनों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में जाट महासभा के जिला अध्यक्ष ने कहा ‘हिन्दू कमजोर नहीं है’ और ऐलान किया कि, हुसैन की हत्या करो और 50 बीघा जमीन ले लो।
- इसी प्रदर्शन में एक व्यापारी नेता ने ‘‍हुसैन के हत्यारे’ को एक लाख देने की घोषणा कर डाली।
- खुर्जा, बुलंदशहर के एक व्यापारी और भारतीय जनता पार्टी के नगर अध्यक्ष भी पीछे कहां रहने वाले थे। उन्होंने कहा, हुसैन का सर कलम करो और मेरी चालीस लाख की फैक्ट्री तोहफ़े में ले जाओ। यही नहीं अगर मारने वाला पकड़ा गया तो उसकी मुक़दमे का खर्चा उठाने का वादा भी साथ में।
- तो एक साहब संघ से जुड़े अख़बार आर्गनाइजर में ललकारते हैं, हुसैन को डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि ‘आधुनिक हिन्‍दुस्थान में एक और हिन्दू चूहे हैं और दूसरी और हिन्दू ज़नख़े... भारतीय धर्मनिरपेक्षता के इंजेक्शन ने इन्हें बिना रीढ़ की हड्डी के बना दिया है।
- मुजफ्फरनगर में तो हिन्दू संगठनों की संयुक्त संघर्ष समिति ने बाजाफ्ता बंद कराया। डंडे और तलवार लहराये। दूसरी तरफ भी ‘सूरमा’ मैदान में आ गये। पत्थरबाजी हुई। एक दर्जन लोग घायल हुए।
(भाषाई मीडिया के विशेषण से नवाजे जाने वाले हिन्दी अखबारों की कतरनें इनकी गवाह हैं।)
(चार)
यह सब हो रहा था, और संविधान की रक्षा के नाम पर बनी सरकारें तमाशबीन बनी थीं। कहीं कोई कार्रवाई, उन लोगों के खिलाफ नहीं हुई। इसमें वह मंत्री भी शामिल हैं, जिन्‍हें कार्टूनिस्ट का सर चाहिए था। सवाल उस वक्त भी था और आज भी है। कहां था सभ्य नागरिक समाज। आपने कहीं कोई विरोध की पुरजोर आवाज इन सबके खिलाफ सुनी। हां, लखनऊ के चंद बु्द्धिजीवियों ने चिंता जरूर जाहिर की थी। लेकिन जब सड्क पर सब मामले निपटाये जा रहे हों और खुलेआम किसी की हत्या की ‘सुपारी’ दी जा रही हो तो सिर्फ चिंता से काम नहीं चलता। बयान देने भर से काम नहीं चलता।
इन सवालों के साथ अपनी बात का यही अंत करता हूँ-
1. क्या एक आजाद, धर्मनिरपेक्ष, संविधान के तहत काम करने वाले देश में किसी को किसी की हत्या की सुपारी देने की इजाजत है।
2. क्या किसी को सिर्फ इसलिए मार देना चाहिए कि उसने जो किया, उससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुंच रही है।
3. यह हक सबको फिर क्यों न मिले कि जिसकी जिससे भावनाएं आहत हो रही हों, वो उन्हें मार डाले या सुपारी दे दे।
4. इन संगठनों को फिर उन गुफा चित्रों, मंदिरों, किताबों, ग्रंथों के बारे में भी अपनी राय जाहिर कर देनी चाहिए, जहां हमें नग्न, कामुक, यौन सम्बंधों के बड़े मनमोहक और काव्यात्मक विवरण मिलते हैं।
5. जैसा कि सीएनएन-आईबीएन की एंकर ने सवाल किया, क्या हुसैन के खिलाफ हमले और उनके मुसलमान होने में भी कोई रिश्ता है।

Comments

Reyaz-ul-haque said…
आप बजा फ़रमाते हैं. हुसैन के मामले में सबकी बोलती बंद हो गयी है. उन्हें खोज कर जिबह किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलिम हैं.
पुराण और अन्य ग्रंथ क्यों नहीं जला दिये जाते जिनमें देवताओं द्वारा किये गये बलात्कारों का विशद वर्णन है. और पुरानी चित्रकला जिसमें देवियां भी लगभग नंगी दिखायी जाती थीं? उनपर क्या विचार है?
जब एक 'देवता' नहाती लडकियों के वस्त्र लेकर छुपा दे और उन्हें नंगी सामने आने पर मज़बूर करे, तब भी वह पूज्यनीय है. और एक पेंटर एक कलात्मक, 'नंगी' तसवीर बना दे तो उसकी हत्या कर दी जानी चाहिए? यही असली फ़ासीवाद है.
आड्वाणी ने जिन्ना के स्मारक पर कोई ग़लत बात नहीं कही.. उन्होने कहा कि जिना का पाकिस्तान आज़ाद होने के बाद दिया गया भाषण एक सच्चे धर्म निरपेक्ष समाज की परिकल्पना करता है.. उन्होने यह नहीं कहा कि जिन्ना धर्म निरपेक्ष थे.. कहा कि भाषण में एक धर्म निरपेक्ष समाज की कल्पना थी.. जो कि एक दम सही है.. जिन्ना पाकिस्तान को मुस्लिम राष्ट्र के तौर पर देखते ही नहीं थे.. ये तब्दीली तो शायद ज़ियाउल्हक़ के समय हुई.. खैर..
आडवाणी ने एक राजनैतिक चालाकी से भरा दोहरे अर्थों का बयान दिया.. कुछ कहा.. कुछ नहीं कहा.. मगर उनके दल के लोग बजाय उनके पीछे चलने के.. उनको अपनी मोटी और छोटी समझ के पीछे चलने के लिये ठेलने लगे.. आडवाणी को अपनी नेतागिरी साबित करने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ा.. अभी भी कर रहे हैं..
लुब्बे लुबाब यह है कि आज के समय आड्वाणी जैसे लोग भी मध्यमार्गी नज़र आ रहे हैं.. ये भले शगुन नहीं हैं..
Nataraj said…
हुसैन अपने चित्र भेदभावपूर्ण बनाते है, इसलिए शिकायत है। नहीं तो मैं भी आपकी हाँ में हाँ मिलाता।
जैसी तस्वीर वे सीताजी की बनाते है वैसी ही अपनी अम्मा की क्यों नहीं बनाते?
हुसैन को कोर्ट के नोटिसों की अवमानना नहीं करनी चाहिये और सम्मन के अनुसार उपस्थित होना चाहिये.