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आतंकवाद का हिन्‍दुत्‍ववादी (हिन्‍दू नहीं) चेहरा (Hindutava terror)

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क्‍या वाकई हम सब, पुलिस और खुफिया निजाम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं। अगर हाँ, तो वक्‍त आ गया है कि आँख में आँख डालकर सच कहने और सुनने की हिम्‍मत पैदा करें। पिछले कई पोस्‍ट में ढाई आखर से यह मुद्दा उठता रहा है कि आतंकवाद को किसी खास मजहब या खास समुदाय या खास नामधारियों के मत्‍थे मढ़ने से काम नहीं चलेगा। इससे आतंकवाद खत्‍म नहीं किया जा सकता। लेकिन जब पूरा का पूरा निजाम, खासतौर पर पुलिस और खु‍फिया एजेंसियाँ और उनकों वैचारिक खाद-पानी देतीं, हिन्‍दुत्‍ववादी पार्टियाँ (हिन्‍दूवादी नहीं)  हों  तो हर जाँच एक खास चश्‍मे से ही की जाएगी। इसी मायने में इंडियन एक्‍सप्रेस की आज की एक खबर हंगामा मचाए है। इंडियन एक्‍सप्रेस के मुताबिक ईद के ठीक पहले मालेगाँव और मोदासा में हूए बम धमाकों में हिन्‍दुत्‍ववादी संगठनों के हाथ होने की खबर है।  खबर कहती है कि इंदौर के एक हिन्‍दुत्‍ववादी संगठन हिन्‍दू जागरण मंच इन धमाकों के पीछे है। धमाका करने वालों का रिश्‍ता अखिल भारतीय विद्यार्थ...

ईद के मौके पर गांधीगीरी

ऐसी न शब्‍बरात न बकरीद की खुशी, जैसी है हर दिल में इस ईद की खुशी।। नजीर अकबराबादी की ये दो लाइनें ईद की अहमियत बताने को काफी हैं। ईद से पहले एक महीना होता है- रमजान। रमजान यानी इबादत, संयम, विवेक, खुद पर काबू रखने की सलाहियत पैदा करना,  अपनी बुराइयों पर विजय पाना, झंझावात में भी इंसानियत का जज्‍बा सम्‍हाल कर रखना, पडो़सियों का हक अदा करना, गरीबों की मदद करना, बेसहारों को सहारा देना... और ढेर सारे आदि-आदि। यानी उन सब की चीजों की याद दिलाना, जिससे इंसान, इंसान बना रहे। यही असली जिहाद भी है। सर्वश्रेष्‍ठ जिहाद। लेकिन यह ईद कुछ अलग है। इस बार रमजान में बम‍ विस्‍फोट, एनकाउंटर, तनाव, खौफ, नफरत के बोल, मीडिया के हर क्षण होते ब्रेकिंग न्‍यूज... हावी रहे। रोजदारों के सूखते गले, पपडि़यों पड़े काँपते होंठ  और खोई- खोई आँखें ढेर सारे सवालों का जवाब खोजती रही। खुशी पर खौफ और नफरत का साया छाया रहा। फिर भी ईद एक ऐसा त्‍योहार है जो आता ही इसीलिए है कि दूरियाँ कम हों, नफरत और खौफ का साया खत्‍म हो। गले यूँ ही थोड़े मिलते हैं। इ...

सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ

सवाल उठाने पर सवाल पृथ्‍वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्‍सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्‍वीकार या इनकार करते हैं। पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्‍लें सामने आ रही हैं। ये शक्‍लें वैसी हैं, जिन्‍हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्‍ली में विस्‍फोट और कई बेगुनाहों की हत्‍या। विस्‍फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्‍यूज... मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्‍पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्‍य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्‍प्‍यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते...

आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस

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जयपुर में विस्‍फोट के कुछ दिनों बाद ही पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा और दावा किया कि साजिश का पर्दाफाश हो गया है। हर पकड़ा गया शख्‍स मास्‍टरमाइंड था। इन्‍हीं में से थे- राशिद हुसैन। बिहार के रहने वाले। पेशे से इंजीनियर। इन्‍फोसिस में नौकरी। इनकी खता क्‍या थी। यह कभी सिमी से जुड़े थे, जब उस पर पाबंदी नहीं थी। लेकिन जो चीज उन्‍हें शक के दायरे में लाई- वह था सेवा करने का जज्‍बा। विस्‍फोट के बाद, राशिद उन चंद लोगों में शामिल थे, जो घायलों की मदद के लिए पहुँचे थे। पुलिस का दिमाग देखिए, उसे लगा ‘राशिद’ नामधारी व्‍यक्ति सेवा करने कैसे पहुँचा। जरूर दाल में काला है। और राशिद हो गए ‘आतंकी’। किसी तरह छूटे। इससे आगे की कहानी, अपूर्वानन्‍द बता रहे हैं। आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस राशिद हुसैन के स्वर में कड़वाहट नहीं थी. होना स्वाभाविक होता. आख़िर राजस्थान पुलिस ने उसे नौ दिन गैरकानूनी तरीके से बंद कर रखा था और लगातार यह कोशिश की थी कि उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया जाए कि उसके ताल्लुकात ‘सिमी’ ...

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?' यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढ...

... तो टीवी देखना इस्लाम के खिलाफ़ है! (Ooh...Watching TV is against the Islam!)

सनिचर 12 जुलाई की सुबह मेरठ के लावड़ कस्‍बे के पास दौराला रोड पर लोगों का हुजूम लगा था। जिसे देखिए वही अपनी गाड़ी लगाकर तमाशा देख रहा था। समझना चाह रहा था कि आखिर यह हुआ क्‍या। क्‍या हो रहा है। ... लोग अपने घरों से टीवी उठाकर ला रहे हैं और सड़क पर पटक रहे हैं। कोई वीसीडी प्‍लेयर लिए चला आ रहा है तो किसी के हाथ में टेपरिकार्डर। ... टीवी, टेपरिकार्डर, सीडी और सीडी प्‍लेयर ... जिस घर में जो था ... सब तोड़ दिए गए। कहीं किसी सामान की साँस न चलती रहे, इसलिए इतिमिनान के लिए मलबे में आग लगा दी गई। राख... सब कुछ खाक। पर यह हुआ क्‍यों। इन सबकी अगुआई कर रहे नेता जी कहना था कि 'ये सारी चीज़ें अश्‍लीलता और जुर्म को बढ़ावा देने का सबब हैं। नौजवान अपनी जिम्‍मेदारियों से दूर हो रहे हैं।' और तो और उन्‍होंने एक और लुकमा जोड़ दिया... 'यह सारी चीज़ें इस्‍लाम विरोधी हैं। ऐसा इस्‍लाम के विद्वानों ने बताया है। मुसलमानों के लिए इन्‍हें देखना हराम है। इनकी अपील है कि मुसलमान टीवी... सीडी प्‍लेयर इस्तेमाल न करें और कर रहे हैं तो इनकी तरह घर से इन्‍हें बेदख़ल कर दे।' इस्‍लाम के पहले के युग ...

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है। कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर। एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई न...

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं। उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है। जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ। उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'। Technorati Tags: मोदी नहीं हूं मैं , उर्दू कहानी , ढाई आखर , मुशर्रफ आलम जौक्‍ी , साहित्‍य , Modi Nahi hoon Main , Urdu storu , Musharraf Alam Zauki , Dhai ...

कुछ कहना चाहती है बिलकीस (Bilkis has something to say)

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इंसाफ के लिए जद्दोजहद का नया चेहरा है बिलकीस बानो (Bilkis Bano)। सन् 2002 में हुए जनसंहार के दौरान बिलकीस बानो और उनकी महिला परिवारीजनों के साथ सामूहिक दुराचार हुआ और फिर उनकी हत्‍या कर दी गई। इस घटना में बिलकीस किसी तरह बच गई। उसने इंसाफ के लिए जद्दोजहद किया और कामयाब हुई। (खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसके बाद बिलकीस ने कुछ कहने का मन बनाय। तो पढि़ए बिलकीस की संघर्ष गाथा, बिलकीस की जुबानी- मैं सच साबित हुई आज मैं सच साबित हुई हूँ. मेरे सच की सुनवाई कर ली गई है.मुम्बई की एक अदालत में बीस रोज़ तक मुझसे जिरह की जाती रही लेकिन मेरे सच की ताकत ने मुझे सहारा दिए रखा. शुक्रवार १८ जनवरी , २००८ को मुम्बई के सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया उसने उस लम्बे और दर्दनाक सफर को किसी हद तक एक मंजिल तक पहुँचाया है  जिस पर मुझे और मेरे परिवारवालों को चलने पर मजबूर कर दिया गया था. यह भी सच है कि कई घाव कभी भी नहीं भरेंगे लेकिन आज मैं पहले के मुताबिक कहीं अधिक ताकत महसूस कर रही हूँ और इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ. इस जीत का बड़ा हिस्सा उन दोस्तों और साथियों का है जो इस दौरान मेरे साथ...

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

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गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात। लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा? उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।' मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।' फिर उसने अप...

नन्दीग्राम और मुसलमान

कोलकाता में दो दिन पहले हुए प्रदर्शन से कई लोगों की पेशानी पर चिंता की लकीर खिंच गई है। जिस तरह से वह प्रदर्शन होने दिया गया। पहले से पता होने के बाद सुरक्षा बलों का एहतियाती इंतजाम नहीं किया गया और उसके बाद सेना बुला ली गई... पहले सच्चर कमेटी और उसके बाद नन्दीग्राम ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की बदतर हालत और सरकार का उनके प्रति नजरिया, उजागर कर दिया है। ऐसे में संगठित होते मुसलमान स‍रकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं... इसलिए नौजवान पत्रकार और www.twocircles.net के सम्पादक काशिफ उल हुदा की सलाह है कि भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है। ढाई आखर की गुजारिश पर उन्होंने हिन्दी में यह टिप्पणी भेजी है। हिन्दी में यह उनकी पहली औपचारिक टिप्पणी है। मुसलामानों की तरक्की के लिए जरूरी है शांतिपूर्ण समाजी और सियासी तहरीक काशिफ उल हुदा 1977 से वाम मोर्चा पश्विम बंगाम की सत्ता पर काबिज़ है. चुनाव के जरिये सत्‍ता में रहने वाली ये दुनिया की सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार है. वाम मोर्चे के 30 साल तक सत्ता पर...

ओसामा-महात्मा गांधी संवाद

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क्‍या आप यह संवाद पढ़ने से चूक गये हैं। ... तो आइये चार हिस्‍सों में पोस्‍ट इस संवाद को इकट्ठा पढि़ये। नोट- इंग्‍लैंड में बसे भारतीय मूल के विचारक , दार्शनिक लार्ड भिक्खु पारिख राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर , लेबर पार्टी के हाउस आफ लार्ड के सदस्य तथा गांधी पर लिखी तीन पुस्तकों के लेखक हैं। अपने बेबाक विचारों के लिए प्रसिद्ध भिक्‍खु पारिख ने कई ज्‍वलंत विषयों पर अपनी कलम चलाई है। गुजरात में सन् 2002 में हुई हिंसा हो या फिर प्रवासी हिन्‍दुस्‍तानियों की बात, उनकी राय हमेशा अहम रही है। यहां पेश उनकी रचना अंग्रेजी में सन् 2004 में प्रोस्‍पेक्‍ट में प्रकाशित हुई। हिन्‍दी में इसे गिरिराज किशोर के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ अकार ’ के ताज़ा अंक में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद महेन्‍द्रनाथ शुक्‍ला का है। ढाई आखर को इसके इस्‍तेमाल की इजाजत देने के लिए हम गिरिराज किशोर और प्रियंवद के आभारी हैं। भूमिका संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ...

क्या ओसामा को महात्मा गांधी की बात पसंद आयी

ओसामा बिन लादेन को दिया गया महात्‍मा गांधी का जवाब आपने पढ़ा। अब आप पढ़ें कि महात्‍मा गांधी के तर्कों का ओसामा के पास क्‍या जवाब है। इस संवाद के रचयिता हैं दार्शनिक, राजनीतिक विश्‍लेषक लार्ड भिक्खु पारिख । मूल अंग्रेजी में यह संवाद प्रोस्‍पेक्‍ट में प्रकाशित हुई थी। हिन्‍दी में इसे गिरिराज किशोर के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ अकार ’ के ताज़ा अंक में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद महेन्‍द्रनाथ शुक्‍ला का है। ढाई आखर को इसके इस्‍तेमाल की इजाजत देने के लिए हम गिरिराज किशोर और प्रियंवद के आभारी हैं । आतंक क्‍यों:ओसामा बिन लादेन-महात्‍मा गांधी संवाद 3 भूमिका- संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को क्या प्रेरित करता है ? वे अपने कारनामों के साथ कैसे जीवित रहते`हैं ? क्या हिंसा के इस चक्रवात का कोई विकल्प है ? इसके बारे में सलाह देने`के लिए अहिंसा के पुजारी महात्मा ...

महात्मा गांधी का ओसामा को जवाब

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ओसामा का ख़त महात्मा गांधी के नाम , आपने पढ़ा। अब आप पढ़ें कि महात्‍मा गांधी ने ओसामा के तर्कों का क्‍या जवाब दिया है। इस संवाद के रचयिता हैं दार्शनिक, राजनीतिक विश्‍लेषक लार्ड भिक्खु पारिख । आतंक क्‍यों:ओसामा बिन लादेन-महात्‍मा गांधी संवाद 2 भूमिका- संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को क्या प्रेरित करता है ? वे अपने कारनामों के साथ कैसे जीवित रहते हैं ? क्या हिंसा के इस चक्रवात का कोई विकल्प है ? इसके बारे में सलाह देने के लिए अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से अच्छा और कौन हो सकता है ? उनके और ओसामा बिन लादेन का काल्पनिक संवाद दो बातें करने का प्रयास करता है। बिना बिन लादेन के विक्षिप्त दृष्टिकोण को समझे उसका उन्मूलन संभव नहीं है। दूसरा उसके द्वारा ही उसका वैचारिक विकल्प ढूंढ़ा जा सकता है। मेरा बिन लादेन एक बुद्धिजीवी , लाक्षणिक पुरुष है, जो उग्र इस्लामी आतंकवाद का ...