तसलीमा के हक में (In favour of Taslima Nasreen)
बनाम आमतौर पर जब भी किसी समुदाय या समूह का कट्टरपंथी या पुरातनपंथी तबका कोई असंवैधानिक और अमानवीय बात कहता है तो उनका शोर सबसे ज्यादा सुनाई देता है। यही नहीं इन्हीं की आवाज को पूरे समुदाय की आवाज भी मान ली जाती है। हालाँकि जब उसी समुदाय या समूह का संवेदनशील और उदारवादी तबका कोई बात कहता है तो उसे आमतौर पर नजरंदाज करने की कोशिश होती है। इसी तरह जब बांग्लादेशी साहित्यकार तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथी ताकतों ने आवाज बुलंद की तो सब ने सुनी। मीडिया ने भी उनको तवज्जो दी। चैनलों के ब्रेंकिंग न्यूज बनी। लेकिन जिन लोगों ने तसलीमा के हक में आवाज उठायी, वह कहीं नहीं दिखे। सिर्फ इस बार नहीं पिछले दिनों भी यही हुआ था। तसलीमा नसरीन के खिलाफ ताजा मुहिम के बाद पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवी अब उनके पक्ष में खुलकर सामने आ गए हैं। एक खबर के मुताबिक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने पिछले दिनों कोलकाता प्रेस क्लब में एक सभा कर तसलीमा को वापस कोलकाता आने देने की माँग की। वे रैली भी करेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गियासुद्दीन का कहना है 'तसलीमा नसरीन को जिस तरह पिछले 52 दिनों से एक अज्ञात स्थान में ...