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कुछ कहना चाहती है बिलकीस (Bilkis has something to say)

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इंसाफ के लिए जद्दोजहद का नया चेहरा है बिलकीस बानो (Bilkis Bano)। सन् 2002 में हुए जनसंहार के दौरान बिलकीस बानो और उनकी महिला परिवारीजनों के साथ सामूहिक दुराचार हुआ और फिर उनकी हत्‍या कर दी गई। इस घटना में बिलकीस किसी तरह बच गई। उसने इंसाफ के लिए जद्दोजहद किया और कामयाब हुई। (खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसके बाद बिलकीस ने कुछ कहने का मन बनाय। तो पढि़ए बिलकीस की संघर्ष गाथा, बिलकीस की जुबानी- मैं सच साबित हुई आज मैं सच साबित हुई हूँ. मेरे सच की सुनवाई कर ली गई है.मुम्बई की एक अदालत में बीस रोज़ तक मुझसे जिरह की जाती रही लेकिन मेरे सच की ताकत ने मुझे सहारा दिए रखा. शुक्रवार १८ जनवरी , २००८ को मुम्बई के सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया उसने उस लम्बे और दर्दनाक सफर को किसी हद तक एक मंजिल तक पहुँचाया है  जिस पर मुझे और मेरे परिवारवालों को चलने पर मजबूर कर दिया गया था. यह भी सच है कि कई घाव कभी भी नहीं भरेंगे लेकिन आज मैं पहले के मुताबिक कहीं अधिक ताकत महसूस कर रही हूँ और इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ. इस जीत का बड़ा हिस्सा उन दोस्तों और साथियों का है जो इस दौरान मेरे साथ...

मर्दाना वाइब्रेंट गुजरात और महिलाएं

मायावी वाइब्रेंट गुजरात की चकाचौंध में महिलाएं कहां हैं? मर्दानगी के दंभ में डूबे 'विकास पुरुष' के विकास के नक्‍शे पर महिलाओं का वजूद कहां है? विकास, कंक्रीट और गारे का नाम नहीं है। विकास का मतलब हाड़ मांस के लोगों की जिंदगी का विकास है। हम इसे मुसलमानों-दलितों या आदिवासियों के संदर्भ में नहीं देख रहे बल्कि हम तो इसे आधी आबादी के रूप में देखने जा रहे हैं। हालांकि कुछ राज्‍यों की ही तरह गुजरात के संदर्भ में महिलाओं को आधी आबादी कहना सही नहीं होगा। क्‍यों? आइये थोड़ा जायजा लें। बिटिया मारो गुजरात के बच्‍चों की आबादी में से चार लाख सड़सठ हजार आठ सौ बिरयानबे (4,67, 892) लड़कियां गायब हैं। यानी लड़कों के मुकाबले करीब 12 फीसदी लड़कियां कम हैं। कोई समाज बेटियों के प्रति कितना संवेदनशील है, उसके नापने का एक तरीका है, जिसे लिंग अनुपात कहा जाता है। यानी प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद। शिशु लिंग अनुपात 0-6 साल के उम्र के लड़के-लड़कियों का होता है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात का शिशु लिंग अनुपात 883 है यानी प्रति हजार लड़कों में करीब 117 लड़कियां कम हैं। यही नहीं कुछ...

गांधी जी की ताबीज और वाइब्रेंट गुजरात

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मैं कोई ताबीज नहीं बांधता। मैं गांधीवादी भी नहीं हूं लेकिन मुझे गांधी जी की ताबीज पसंद है। यही ताजीब मुझे साबरमती आश्रम के दीवारों पर दिख गई। मैंने सोचा, क्‍यों न साबरमती के संत की ताबीज, उनकी ही जन्‍मभूमि यानी गुजरात के 'वाइब्रेशन' पर आजमा कर देखी जाए। गांधी जी की ताबीज गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा? हिंसा की बात नहीं पांच साल से गुजरात को 'वाइब्रेंट' बनाने का दावा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि गुजरात प्रगत‍ि की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। (हालांकि मुझे नहीं मालूम कि गुजरात प्रगति में कब बिहार, पश्चिमबंगाल, उत्‍तर प्रदेश, मध्...

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

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गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात। लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा? उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।' मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।' फिर उसने अप...

क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

अपने अध्‍ययन और काम के सिलसिले में इस साल मैं तीसरी बार गुजरात घूम कर आया हूं। हर बार एक नई अनुभूति के साथ लौटा। हर बार जो जानकारी पढ़कर और सुनकर इकट्ठी की थी, उसमें नए आयाम जुड़ते गए। मैंने कई बार लिखने का विचार किया। लेकिन हिन्‍दी ब्‍लॉग में तो जैसे गुजरात का नाम लेना अपराध बना  दिया गया। न सिर्फ गुजरात बल्कि नरेन्‍द्र मोदी नाम के शख्‍स का जिक्र किसी भी ब्‍लॉगर के लिए गाली खाने की वजह बनता रहा। एक नहीं कई उदाहरण हैं। मैंने डर से नहीं बल्कि गाली गलौज से बचने के लिए गुजरात के अनुभव ब्‍लॉग पर छोड़कर सब जगह बांटे। कई ब्‍लॉगर दोस्‍तों ने अनुभव सुना है। पर ताजा अनुभव आपके साथ बांटने जा रहा हूं। गुजरात चुनाव का पहला चरण चल रहा है। कुछ दिनों बाद दूसरा चरण और दस दिन बाद गुजरात चुनाव के नतीजे भी सामने होंगे। हालांकि जमीन की महक कुछ अलग सा संदेश दे रही है। चुनाव को लेकर कोई खास उत्‍साह नहीं। सरगर्मी नहीं। बड़ौदा से अहमदाबाद, एक्‍सप्रेस हाइवे पर हवा से बात करती बस में किसी की बात का भी मौजू चुनाव नहीं था।  पूछने पर बगल ...

बंधु बुद्धदेव और भाई नरेन्द्र

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अंतर बताओ तो जानें ! सत्या सागर ने‍ कोशिश की है, आप भी कुछ कोशिश करें। तलाशें करें कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बंधु बुद्धदेव भट्टाचार्य और गुजरात के मुख्‍यमंत्री भाई नरेन्‍द्र मोदी कितने पास, कितने दूर हैं। पार्टी के वफादार कारकुन पार्टी के वफादार कारकुन रहन सहन का तरीका आम रहन सहन का तरीका आम नन्‍दीग्राम में नरसंहार के लिए कुख्‍यात नरोदा पाटिया में नरसंहार के लिए कुख्‍यात कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते भारतीय पूंजीपति के दुलारे भारतीय पूंजीपति के दुलारे वैश्विक पूंजीपति के दुलारे वैश्विक पूंजीपति के दुलारे 'सेज' के चैम्पियन 'सेज' के चैम्पियन लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते इनके पार्टी कार्यकर्ता 'शत्र...

पहचानिये, यही हैं हमलावर

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छह जुलाई को अहमदाबाद में अनहद द्वारा आयोजित छात्रों के महोत्‍सव में आये प्रोफेसर शिवजी पण्णिकर पर हमला और उसके बाद की गयी तोड़फोड़ की व्‍यापक निंदा हुई है। (हमले का आंखों का देखा हाल जानने के लिए यहां क्लिक करें।) हमले के बावजूद कार्यक्रम चलता रहा है और आज आठ जुलाई को सेंट जे़वियर सोशल सर्विस सोसायटी में इसका समापन समारोह है। इस बीच अभी तक पुलिस ने किसी भी हमलावर को गिरफ्तार नहीं किया है। हमलावरों की फोटो भी (घेरे में) , पुलिस को मुहैया करायी गयी है। ढाई आखर के पाठक भी देखना चाहेंगे, कि आखिर ये 'वीर राष्‍ट्रवादी' कौन हैं। तो आप इन तस्‍वीरों पर निगाह दौड़ाइये लेकिन ये हमले भी इनके हौसले पस्‍त नहीं कर पाये 'राष्‍ट्रवादियों' के हमले से डिगे बिना अनहद का छात्र महोत्‍सव चलता रहा। हमले के बाद शुरू हुए महोत्‍सव में प्रोफेसर शिवजी पण्णिकर और अनहद की शबनम हाशमी। चित्र में पीछे छात्रों द्वारों बनाये गये डिजायन देखे जा सकते हैं। अमन,कौमी भाईचारा और इंसाफ के लिए आयोजित राष्‍ट्रीय छात्र महोत्‍सव के निमंत्रण और विद्यार्थियों द्वारा बनाये डिजायन की एक झलक।

''राष्‍ट्रवादियों'' का देश के ''गद्दारों'' पर हमला।

चश्‍मदीद शबनम हाशमी ने बयान की अहमदाबाद में हमले की दास्‍तान छह जुलाई को गुजरात में संघ परिवार ने फिर हमलावर तेवर दिखाने की कोशिश की और राज्‍य का तंत्र मूक दर्शक बना देखता रहा। यह हमला 'अनहद' द्वारा नौजवानों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ। अनहद ने छह से आठ जुलाई तक अहमदाबाद में अमन, कौमी भाईचारा और इंसाफ के लिए आयोजित राष्‍ट्रीय छात्र महोत्‍सव का आयोजन किया है। इस आयोजन में पूरे देश से चुने गये स्‍कूली बच्‍चों की 60 पेंटिंग, मीडिया के विद्यार्थियों की 80 डिजायन और 45 डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म का प्रदर्शन हो रहा है। सेंट जेवियर सोशल सर्विस सोसायटी के फादर एरविती मेमोरियल हाल में प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रोफेसर शिवजी पण्णिकर को करना था। जबकि सेंट जेवियर हाई स्‍कूल कैम्‍पस के लोयला हॉल के डायमंड जुबली ऑडिटोरियम में स्‍टूडेंट वीडियो डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म महोत्‍सव का उद्घाटन नफीसा अली को करना था। करीब पौने ग्‍यारह बजे जैसे ही प्रोफेसर पण्णिकर जेवियर कैम्‍पस की गेट तक पहुंचे, उनकी कार को एक भीड़ ने घेर लिया। वे पण्णिकर के खिलाफ नारे लगा रहे थे... पण्णिकर वापस जाओ... भारत माता की ...

एक कवि का गुजरात वियोग

मेरी पोस्ट एक 'गुजराती' की तलाश के बाद कई दोस्तों की राय थी कि वली गुजराती/दक्खिनी की कुछ रचनाओं को भी ढाई आखर पर पेश करना चाहिए था। उनके सुझाव पर वली की कुछ रचनाएँ आपके सामने पेश हैं। जिन कठिन अल्फ़ाज़ के मायने मिले, उन्हें ब्रैकेट में दिया गया है। वली की जिंदगी में दिल्ली जाना एक अहम घटना है। लेकिन दिल्ली जाना, उन जगहों से बिछुड़ना भी था, जिनसे वली बेपनाह मुहब्बत करते थे। तभी तो गुजरात छूटने की तकलीफ एक पूरी नज्म़ के रूप में सामने आयी। मज़ार ढहाते वक्त गुजरात गौरव का ठेका लेने वालों को वली की गुजराती की इस बेपनाह मुहब्बत का भी खयाल नहीं आया! (1) गुजरात वियोग गुजरातके फिराके सों है खा़र-खा़र दिल। बेताब है सूनेमन आतिलबहार दिल।। ( फिराक: वियोग, खा़र-खा़र : काँटा-काँटा, बेताब: अधीर, सूनेमन: शून्य, आतिलबहार: आग बरसता) मरहम नहीं है इसके जखम़का जहाँमने। शम्शेरे-हिज्र सों जो हुआ है फिगा़र दिल।। ( शम्शेरे-हिज्र: वियोग के खड्ग, फिगा़र: घायल) अव्वल सों था ज़ईफ़ यह पाबस्ता सोज़ में। ज्यों बात है अग्निके उपर बेकरार दिल।। ( ज़ईफ़: निर्बल, पाबस्ता: पादनिगड़ित, सोज़: जलन) इस सैरके नशे ...

एक "गुजराती" की तलाश

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यह अहमदाबाद की एक सड़क है। तेज फ़र्राटा वाली सड़क। बगल से गुज़रती रेल लाइन। पास में ही एक अंडर ब्रिज जिसमें महात्मा गांधी के जीवन की कई तस्वीर मिल जाती है। यह अहमदाबाद का शाही बाग़ का इलाका है। सामने लम्बी ऊंची इमारत। जहां रहते हैं शहर के ऊंचे लोग। जो बालकनी से शहर को देखते हैं, तो सब कुछ बौना नज़र आता है। आदमी से लेकर कार तक। इसी सड़क के ठीक सामने अहमदाबाद का पुलिस मुख्यालय है। गुजराती में इसके बोर्ड को पढ़ा जा सकता है। यहां पुलिस कमिशनर का दफ्तर है। पर मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूं। सड़क, इमारतें, पुलिस मुख्यालय, कमिश्नर... क्योंकि मुझे तलाश है एक 'गुजराती' की। जिसके बारे में अवामी शायर मख़्दूम मोहिउद्दीन ने कभी कहा था: यक़ी बख़्शा जुबां को जिसने पहले उसके जीने का वह पहला "नाखुदा" हिन्दुस्तानी के सफ़ीने का दिये रौशन किये मन्दिर में काबे के चिराग़ों से हज़ारों जन्नतें आबाद कर दीं दिल के दागों से वह मिरासे जहां वह ख़ुल्द का पैगाम आता है दकन की सर ज़मीं पर ज़िन्दगी का जाम आता है उसे बाबा-ए-उर्दू का नाम दिया गया। यानी उर्दू का पितामह। गांधी जी ने जिस हिन्दुस्तानी की ...

बिछुडना एक भतीजे का अपनी चाची से

भाई संजय बेगाणी ने कल एक पोस्ट लिखी। मैं कमेंट लिख रहा था लेकिन वो काफी बड़ा हो गया। मुझे लगा कि इस माहौल में अगर यह कमेंट भेजा, तो न जाने इसके कितने निहितार्थ निकाल लिये जायें। फिर इतने बडे़ कमेंट के लिए उनकी जगह क्यों बर्बाद की जाये। तो इसलिए ढाई आखर पर दे रहा हूं। मैं शीर्षक में "एक भतीजे" की जगह संजय लिखना चाह रहा था लेकिन लगा कि इस पर आपत्ति न हो जाये। संजय लिखते हैं_ ' फिर एक दिन चाची ने अपना घर बेच दिया . चाचा दुनिया में थे नहीं , कई जिम्मेदारियाँ थी . दो जवान बेटीयाँ थी , बेटे शायद अरब में कहीं गए हुए थे , तो बहूंए व पौते पौतियों की ज़िम्मेदारी भी थी . आर्थिक संकट रहा होगा . वे मुस्लिम बहूल मोहल्ले में छोटा घर लेकर रहने चले गए .' भाई संजय पहली बार आपके ब्लॉग पर टिप्पणी कर रहा हूँ। अन्यथा नहीं लेंगे। ज़रा सोचियेगा कि आपकी चाची मुस्लिम बहुल मोहल्ले में क्यों रहने चली गयीं? क्या सिर्फ इसलिए कि चाचा नहीं थे... क्या सिर्फ इसलिए कि आर्थिक संकट था... या जहां वो इतनी घुली...