संदेश

मार्च, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।   इन्‍हें भी देखें 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन Technorati Tags: नजीर अकबराबादी , जब फागुन

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दुस्तान की गंगा जमनी तहजीब का अगर कोई सबसे मजबूत वाहक है, तो वह हैं नजीर अकबराबादी । नजीर एक शायर नहीं, बल्कि परम्परा हैं। जो इस बात की मजबूत दलील पेश करते हैं कि इस मुल्क में रहने वाले लोगों के मजहब भले ही अलग-अलग हों, उनकी तहजीब की जड़ एक है। उस जड़ को बिना 'जड़' बनाए आगे बढ़ाते रहना ही, हिन्दुस्तान की असली परम्परा है। आज इसी मिली-जुली संस्कृति पर कई ओर से हमला हो रहा है। एक खास विचारधार इस बात पर यकीन करती है कि इस मुल्क में संस्कृति और धर्म के आधार पर मेलजोल मुमकिन नहीं है। इसके लिए वे नफ़रत और हिंसा फैलाने में यकीन रखते हैं। हमारे आस-पास नफ़रत फैलाने वाले ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है। ऐसे में होली के मौके पर नजीर को याद करना जरूरी है। होली पर जितना नजीर ने लिखा है, उतना शायद ही किसी और ने लिखा हो। यह बात हर साल इसलिए याद दिलाने की जरूरत है ताकि कुछ लोग जो भारतीय संस्कृति के एकमात्र दावेदार होने की घोषणा करते हैं, नजीर की शायरी में अपना असली चेहरा देखें। नजीर की ढेर सारी होली कविताओं में से दो की चंद लाइनें आपके सामने पेश है। होली मुबारक!!!!!! हो ली - 1 जब खेली

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं। उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है। जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ। उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'। Technorati Tags: मोदी नहीं हूं मैं , उर्दू कहानी , ढाई आखर , मुशर्रफ आलम जौक्‍ी , साहित्‍य , Modi Nahi hoon Main , Urdu storu , Musharraf Alam Zauki , Dhai

जनाब फिलिस्‍तीन का संगीत सुनेंगे (Music from Palestine)

फिलिस्‍तीन के संगीत से तो नफरत नहीं है। संगीत हर सीमाओं से परे होता है, ऐसा बड़े-बुजुर्ग कहते हैं। इसलिए हमने सोचा क्‍यों न फिलिस्‍तीन का आधुनिक संगीत ही दोस्‍तो के लिए पेश किया जाए। हमने डायरी के चंद पन्‍ने पेश किए। कविताएँ पेश की- पर कुछ दोस्‍तो को यह पसंद नहीं आया। जाहिर है सबको न तो खुश किया जा सकता है और न ही हम यहाँ सबको खुश करने के लिए आए हैं। शायद इस कला में हम पारंगत भी नहीं हैं। इसलिए हम तो वह बात कहने की कोशिश करते हैं, जो हमें जरूरी लगता है। फिलिस्‍तीन के बारे में हम क्‍यों पोस्‍ट कर रहे हैं, इसको लेकर कई दोस्‍तो में बड़ी बेचैनी है। इस बेचैनी पर बाद में बात करेंगे तब तक यह संगीत सुनें। इस संगीत को तैयार किया है चेकप्‍वाइंट 303 (Checkpopint 303)  नाम के समूह ने। यह फिलिस्‍तीन के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में आवाज के टुकड़ों की संगीतमय प्रस्‍तुति है। इसे किसी बैंड ने तैयार नहीं किया है। मिडिल ईस्‍ट के लोगों की जिंदगी में जो संगीत है, उसमें गोलियों की आवाज, चीख पुकार शामिल हैं। हर रोज इनकी जिंदगी इसी दु:स्‍वपन के साथ गुजरती है। इसके बावजूद वे नाउम्‍मीद नहीं हैं। ये गीत इसी

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ (Lover From Palestine)

चित्र
  महमूद दरवेश (Mahmoud या Mahmood Darwish) फिलिस्‍तीन के मशहूर कवि हैं। दुनिया के बड़े साहित्‍यकारों में उनका शुमार होता है। अपने वतन फिलिस्‍तीन के लिए जबरदस्‍त बेचैनी उनकी शायरी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। फिलिस्‍तीन को समझने का एक बड़ा जरिया दरवेश की कविताएँ हैं। ढाई आखर पर इससे पहले भी हमने उनकी कविताएँ पोस्‍ट की थीं। आज चंद और रचनाएँ पेश हैं। इसे अंग्रेजी से हिन्‍दुस्‍तानी में पेश किया है साहित्‍यकार/ नाटककार ख़ुर्शीद अनवर ने।   फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ तेरी आँखें कि उतरता कोई नश्‍तर दिल में दर्द महसूस करूँ, या कि फि़दा हो जाऊँ तेज़ झोंकों में हूँ फा़नूस इनका   रात को चीर दे और दर्द को गहरा कर दे ऐसे पेवस्‍त करो आँखों को सीने में मेरे तेरी आँखों से मिले ज़ख्‍़म यूँ चमकें जैसे आज के घोर अँधेरों में रोशनी की किरण कल के ख्‍़वाबों को भी रोशन कर दे और मेरी रूह पे भी छा जाए। और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र यह भी न याद रहे हम कभी साथ भी थे, एक ही थी राहगुज़र ****** तेरे अल्‍फ़ाज़ मेरा नग़मा थे मेरे होठों पे वह उभरे थे तरन्‍नुम बनकर लेकि

गाजा की औरतों का संदेसा

दुनिया भर की सारी औरतों के लिए मुहब्बत और एहतराम के साथ मैं गाजा यह खास संदेसा भेज रही हूँ. यहाँ के मुतानिक ११ बजे, यानी अभी से कुछ घंटे बाद गाजा की कई औरतीं और बच्चे इस खास दिन को मनाने अनाम फौजी के चौक पर इकठ्ठा होंगे . वे अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी और खास कर औरतों से यह अपील करेंगे कि वे फिलस्तीन के बच्चों और औरतों पर रोज़-रोज़ ढाए जा रहे जुर्मों के बारे में इस खास रोज़ खामोश न रहें. हम पूरी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि दीवारों से घेर कर या हमारे ख़िलाफ़ लगातार मिलिटरी ज़ुल्म से इसराइल महफूज़ नहीं होगा. सबके लिए सुरक्षा इंसाफ कि बुनियाद पर गढ़ी गई शान्ति से ही हो सकती है और इन्साफ का मतलब है फिलिस्तेनी लोगों के इज्ज़त और बराबरी के साथ रहने के हक को कबूल किया जाना..... गाज़ा से मैं आप सब से अपने लिए समर्थन और सहारा मांगती हूँ. अपनी सरकारों से कहिए कि वे गाजा पर कसी गई इस गिरफ्त को फौरन ख़त्म करने को कदम उठाएं. गाजा में हमारे पास इतने ख़ूबसूरत फूल हैं कि हम उन्हें आपको भेज सकते तो दिली खुशी होती लेकिन सीमाएं सील कर दी गई है और इस वजह से हम अपने फूल आप तक भेज नही सकते!!!! इस

...तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती

फिलस्तीन के कवि महमूद दरवेश (Mahmood Darvish) की चंद रचनाएँ पेश हैं। यह रचना मुश्किल हालात का आईना हैं। फिलस्तीनी लोगों की जिंदगी को समझने को इन कविताओं से बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता। ... एक कातिल को अगर तुमने अपन शिकार के चहरे पर ध्यान दिया होता और फिर ज़रा सोचा होता तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती, तुम बंदूक के तर्क से आज़ाद हो गए होते और तुमने बदल दिया होता अपना ख़याल: यह अपनी पहचान फिर से हासिल करने का तरीका नहीं है. हमारा नुकसान हर रोज़ दो से आठ के बीच शहीद और दस जख्मी और बीस मकान और पचास जैतून के दरख्त... इसमें जोड़ दें वह गड़बड़ी जो संरचना में होती है शायरी , नाटक और अधूरे कैनवास के . ... एक औरत ने बादल को कहा : मेरे महबूब को ढाप लो क्योंकि मेरे कपड़े तर हैं उसके लहू से. ... गर तुम बारिश नहीं हो सकते तो पेड़ बन जाओ उर्वरता से भरपूर पेड़ अगर तुम पेड़ नहीं बन सकते , मेरी जान पत्थर बन जाओ , नमी से पुर , पत्थर अगर तुम पत्थर नहीं बन सकते मेरी जान चाँद बन जाओ, चाँद ( ऐसा कहा एक औरत ने अपने बेटे को दफ्न करते वक्त) ... वह अपने कातिल को सीने से लगाता है. वह अपने क

एक गुजारिश गाजा की तरफ से (Ek Guzaarish Gaza ki Taraf se)

चित्र
मेरा यक़ीन है कि मैं सर्वशक्तिमान ख़ुदा की इच्छा के मुताबिक काम कर रहा हू। यहूदियों के ख़िलाफ़ अपनी हिफाज़त करके मैं ख़ुदा के तरफ से लड़ रहा हू: अडोल्फ़ हिटलर, 1924 हज़ार गैर यहूदी जिंदगियाँ एक यहूदी के नाखून के बराबर भी नहीं हैं: दोव लिओर, किरयात अरबा के रब्बी हम फिलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ और भी भयानक हौलोकास्ट करेंगे: मातन विनी, इसराइल का उप रक्षामंत्री, 1 मार्च 2008 गाजा का दम घुट रहा है। हिटलर के होलोकास्ट के शिकार रह चुके यहूदियों के राष्ट्र का रक्षा मंत्री ख़ुद होलोकास्ट की धमकी दे रहा है। अमेरिका कहता है: हम इसराइल के आत्मरक्षा के अधिकार की हिमायत करते हैं। दुनिया के अख़बारों के लिए, समाचार तंत्र के लिए गाजा की मौतें ख़बर नहीं हैं। भारत के अखबारों के पन्ने पलट जाइए, इस्राइली हमले की ख़बर खोजने पर मिलेंगी। एक मुल्क डूब रहा है। एक पूरी कौम का गला घोंटा जा रहा है। हमारी सरकार हमलावर राज्य के साथ रिश्ते सुधार रही है। दुनिया के सारे लोकतंत्र खामोश देख रहे हैं। या नहीं देख रहे हैं। हम सब भी चुप हैं। फिलिस्तीन कभी था हमारे लिए, अब नहीं है। यह अपील है। अपनी आवाज़ फिलिस्तीन के लिए उठाने, इ