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ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन

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जन्‍माष्‍टमी की चारों ओर धूम है और सूफी शायारों में श्री कृष्‍ण की काफी धूम रही है। नजीर अकबराबदी (पूरा नाम वली मुहम्‍मद नज़ीर ) ने श्री कृष्‍ण पर कई रचनाएँ लिखीं हैं। काफी लम्‍बी और काफी रोचक। नज़ीर ने ये नज्‍़म करीब पौने दो सौ साल पहले लिखी थीं। इस जन्‍माष्‍टमी पर उनकी कई रचनाओं में से दो के कुछ अंश आपके सामने पेश है। अगर आपको पसंद आया तो बाकि पोस्‍ट की भी हिम्‍मत करूँगा। जन्‍माष्‍टमी के मुबारक मौके पर ये कलाम उन दोस्‍तों की नजर, जो साझी संस्‍कृति-विरासत और परम्‍परा को अपवाद बनाने में लगे हैं। इस दुआ के साथ की उनकी कोशिश कभी कामयाब न हो। (1) जनम कन्‍हैया जी ............................................. फिर आया वाँ एक वक्‍़त ऐसा जो आए गर्भ में मनमोहन। गोपाल, मनोहर, मुरलीधर, श्रीकिशन, किशोर न, कंवल नयन।। घनश्‍याम, मुरारी, बनवारी, गिरधारी, सुन्‍दर श्‍याम बरन। प्रभुनाथ बिहारी कान्‍ह लला, सुखदाई, जग के दु:ख भंजन।। जब साअत परगट की, वाँ आई मुकुट धरैया की। अब आगे बात जनम की है, जै बोले किश्‍न कन्‍हैया की।। 11 ।। था नेक महीला भादों का, और दिन बुध, गिनती आठन की। फिर आ...

सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा (Saare Jahan Se Achha Hindostan Hamara)

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'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' के बीच राष्‍ट्रीय गीत या गान का विवाद गाहे ब गाहे चलता रहता है। पिछले दिनों हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया में भी यह विवाद उठा था। मेरे ज़हन में अक्‍सर यह सवाल उठता है कि इस विवाद में 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' का नाम क्‍यों नहीं सुनाई देता। क्‍या कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाता कि यह तराना, कौमी तराना क्‍यों नहीं बना। क्‍या इसमें देशभक्ति की कमी थी। क्‍या इसमें लय ताल छंद कमजोर थे। क्‍या इसमें वह सलाहियत नहीं थी, जो इसके आगे 'राष्‍ट्रीय' गीत या गान लगवा सके। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास इनके जवाब नहीं है। महज जिज्ञासु सवाल हैं। मैं कोई विवाद नहीं पैदा करना चाह रहा  और न ही मेरी बेजा विवादों में दिलचस्‍पी है। न ही इस बात का अब कोई मतलब है। लेकिन यह बात आज क्‍यों फिर जहन में आई। आज सुबह उर्दू राष्‍ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन छपा। इसके मुताबिक दस अगस्‍त यानी आज 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' ...

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

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कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर। दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेर...

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।   इन्‍हें भी देखें 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन Technorati Tags: ...

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दुस्तान की गंगा जमनी तहजीब का अगर कोई सबसे मजबूत वाहक है, तो वह हैं नजीर अकबराबादी । नजीर एक शायर नहीं, बल्कि परम्परा हैं। जो इस बात की मजबूत दलील पेश करते हैं कि इस मुल्क में रहने वाले लोगों के मजहब भले ही अलग-अलग हों, उनकी तहजीब की जड़ एक है। उस जड़ को बिना 'जड़' बनाए आगे बढ़ाते रहना ही, हिन्दुस्तान की असली परम्परा है। आज इसी मिली-जुली संस्कृति पर कई ओर से हमला हो रहा है। एक खास विचारधार इस बात पर यकीन करती है कि इस मुल्क में संस्कृति और धर्म के आधार पर मेलजोल मुमकिन नहीं है। इसके लिए वे नफ़रत और हिंसा फैलाने में यकीन रखते हैं। हमारे आस-पास नफ़रत फैलाने वाले ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है। ऐसे में होली के मौके पर नजीर को याद करना जरूरी है। होली पर जितना नजीर ने लिखा है, उतना शायद ही किसी और ने लिखा हो। यह बात हर साल इसलिए याद दिलाने की जरूरत है ताकि कुछ लोग जो भारतीय संस्कृति के एकमात्र दावेदार होने की घोषणा करते हैं, नजीर की शायरी में अपना असली चेहरा देखें। नजीर की ढेर सारी होली कविताओं में से दो की चंद लाइनें आपके सामने पेश है। होली मुबारक!!!!!! हो ली - 1 जब खेली...

जनाब फिलिस्‍तीन का संगीत सुनेंगे (Music from Palestine)

फिलिस्‍तीन के संगीत से तो नफरत नहीं है। संगीत हर सीमाओं से परे होता है, ऐसा बड़े-बुजुर्ग कहते हैं। इसलिए हमने सोचा क्‍यों न फिलिस्‍तीन का आधुनिक संगीत ही दोस्‍तो के लिए पेश किया जाए। हमने डायरी के चंद पन्‍ने पेश किए। कविताएँ पेश की- पर कुछ दोस्‍तो को यह पसंद नहीं आया। जाहिर है सबको न तो खुश किया जा सकता है और न ही हम यहाँ सबको खुश करने के लिए आए हैं। शायद इस कला में हम पारंगत भी नहीं हैं। इसलिए हम तो वह बात कहने की कोशिश करते हैं, जो हमें जरूरी लगता है। फिलिस्‍तीन के बारे में हम क्‍यों पोस्‍ट कर रहे हैं, इसको लेकर कई दोस्‍तो में बड़ी बेचैनी है। इस बेचैनी पर बाद में बात करेंगे तब तक यह संगीत सुनें। इस संगीत को तैयार किया है चेकप्‍वाइंट 303 (Checkpopint 303)  नाम के समूह ने। यह फिलिस्‍तीन के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में आवाज के टुकड़ों की संगीतमय प्रस्‍तुति है। इसे किसी बैंड ने तैयार नहीं किया है। मिडिल ईस्‍ट के लोगों की जिंदगी में जो संगीत है, उसमें गोलियों की आवाज, चीख पुकार शामिल हैं। हर रोज इ...

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ (Lover From Palestine)

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  महमूद दरवेश (Mahmoud या Mahmood Darwish) फिलिस्‍तीन के मशहूर कवि हैं। दुनिया के बड़े साहित्‍यकारों में उनका शुमार होता है। अपने वतन फिलिस्‍तीन के लिए जबरदस्‍त बेचैनी उनकी शायरी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। फिलिस्‍तीन को समझने का एक बड़ा जरिया दरवेश की कविताएँ हैं। ढाई आखर पर इससे पहले भी हमने उनकी कविताएँ पोस्‍ट की थीं। आज चंद और रचनाएँ पेश हैं। इसे अंग्रेजी से हिन्‍दुस्‍तानी में पेश किया है साहित्‍यकार/ नाटककार ख़ुर्शीद अनवर ने।   फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ तेरी आँखें कि उतरता कोई नश्‍तर दिल में दर्द महसूस करूँ, या कि फि़दा हो जाऊँ तेज़ झोंकों में हूँ फा़नूस इनका   रात को चीर दे और दर्द को गहरा कर दे ऐसे पेवस्‍त करो आँखों को सीने में मेरे तेरी आँखों से मिले ज़ख्‍़म यूँ चमकें जैसे आज के घोर अँधेरों में रोशनी की किरण कल के ख्‍़वाबों को भी रोशन कर दे और मेरी रूह पे भी छा जाए। और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र यह भी न याद रहे हम कभी साथ भी थे, एक ही थ...

(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ (1) जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जिसमें एक बंद खिड़की है, जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती,  खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है, चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती। इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़,  लाँघ नहीं सकती चौखट। एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं, जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर, चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ। मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।...

राम का 'दूसरा बनबास'

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राम के नाम पर अयोध्या में जो कुछ हुआ या उसके बाद पूरे देश में- क्या राम उससे खुश हुए होंगे। इस बात को बिना मर्यादा पुरुषोत्तम को समझे बिना, नहीं जाना जा सकता। कैफ़ी आज़मी ने इसे समझने की कोशिश की। कैफ़ी न सिर्फ बड़े शायर थे बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन के पुरोधा भी। कैफ़ी का जुड़ाव जिस ज़मीन से था, वो उस जगह की मिलीजुली संस्कृति के मज़बूत वारिस हैं। वह, हर उस परम्परा और संस्कृति को अपना मानते थे, जिसे आप हिन्दुस्‍तानी कह सकते हैं। राम उनके लिए इस संस्कृति और परम्‍परा की धरोहर हैं। वे राम के मर्म को समझते थे, तब ही उनकी कलम से 'दूसरा बनबास' जैसी कविता निकली। कैफ़ी ने राम के मन को समझा या नहीं, यह आप तय करें- दूसरा बनबास राम बनबास से लौट कर जब घर में आये याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा (रक्स- तांडव) छह दिसम्बर को सिरी राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये। जगमगाते थे जहां राम के कदमों के निशां प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां मोड़ नफ़रत के उसी राहगुजर में आये। धर्म क्या उनका है, क्या जात है,...

इमाम-ए-हिन्द हैं राम

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एक शख्स जिसे दुनिया इस्लामी चिंतक और दार्शनिक के रूप में जानती है। एक शख्स जिसे अपना हिन्दोस्तां, सारे जहां से अच्छा लगता था। वो शख्स एक ऐसे किरदार के बारे में कलम उठाता है जिसे दुनिया 'राम' के रूप में जानती है। इसमें उसका मज़हब या दीन का यकीन आड़े नहीं आता। उसने यह नज्म अपने को राष्ट्रवादी साबित करने के डर से भी नहीं लिखा। यह शख्स कोई और नहीं मोहम्मद इक़बाल हैं। जिन्होंने 'राम' नाम की महिमा का गान किया है। सबके अपने-अपने राम हैं, अगर यह कहा जाये तो शायद गलत न होगा। ...लेकिन 21 वीं शताब्दी में हिन्दुत्‍ववादी (हिन्दू मज़हब मानने वाले नहीं, बल्कि उसके नाम पर राजनीति करने वाले) राम की एक ही पहचान बनाने की जुगत में लगे हैं। उन्होंने यह भ्रम भी फैलाने का काम किया है कि राम का नाम उनकी ही वजह से बचा है और हिन्दू धर्म तो उनके बिना नेस्तनाबूत हो जायेगा। अपना भ्रम दूर करने के लिए हिन्दुत्‍ववादियों को 20 वीं सदी में लिखी इस नज्म को पर भी जरा गौर करना चाहिए। ख़ैर, वो गौर करें या नहीं, हम तो देखें ही इक़बाल की राम भक्ति। राम लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिन्द सब फ़लसफ़ी ह...

ओसामा का ख़त महात्मा गांधी के नाम

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आतंक क्‍यों:ओसामा बिन लादेन-महात्‍मा गांधी संवाद 1 (नोट- इंग्‍लैंड में बसे भारतीय मूल के विचारक , दार्शनिक लार्ड भिक्खु पारिख राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर , लेबर पार्टी के हाउस आफ लार्ड के सदस्य तथा गांधी पर लिखी तीन पुस्तकों के लेखक हैं। अपने बेबाक विचारों के लिए प्रसिद्ध भिक्‍खु पारिख ने कई ज्‍वलंत विषयों पर अपनी कलम चलाई है। गुजरात में सन् 2002 में हुई हिंसा हो या फिर प्रवासी हिन्‍दुस्‍तानियों की बात, उनकी राय हमेशा अहम रही है। यहां पेश उनकी रचना अंग्रेजी में सन् 2004 में प्रोस्‍पेक्‍ट में प्रकाशित हुई। हिन्‍दी में इसे गिरिराज किशोर के सम्‍पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ अकार ’ के ताज़ा अंक में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद महेन्‍द्रनाथ शुक्‍ला का है। ढाई आखर को इसके इस्‍तेमाल की इजाजत देने के लिए हम गिरिराज किशोर और प्रियंवद के आभारी हैं।) भूमिका संसार में लाखों प्राणियों की तरह मैं भी 9/11 घटना से बहुत विक्षुब्ध हूँ और आतंकवाद की घोर निन्दा करता हूँ। आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक युद्ध छेड़े जाने के बाद भी हिंसक घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं, जैसा कि मैड्रिड में हुआ। बमबाज़ों को...

द ग्रेट डिक्टेक्टर और चार्ली चैप्लिन

चार्ली चैप्लिन की मशहूर फिल्म है 'द ग्रेट डिक्टेक्टर'। पूरी फिल्म की आत्मा इसके आखिरी अंश में बसती है। चार्ली द ग्रेट डिक्टेटर के जरिये हिटलर के सम्मोहनकारी छवि के पीछे छि‍पी क्रूरता को दुनिया के सामने लाना चाहते थे। उन्होंने फिल्म में दो किरदार- तानाशाह हिटलर और एक आम यहूदी की भूमिका निभायी है। यह फिल्म नफ़रत की राजनीति, तानाशाही प्रवृत्तियों और जंग के पैरोकारों के खिलाफ एक मज़बूत आवाज़ है। इस दृश्य में दिया गया भाषण आम जन की आवाज़ है। ऐसा नहीं है कि यह प्रवृत्तियां, हिटलर जैसी सोच वाले लोग आज मौजूद नहीं हैं। इसीलिए यह फिल्म और उसका यह भाषण बार-बार देखना, सुनना और पढ़ना जरूरी है ताकि हम इंसानियत को खत्म करने वाली ताकतों को पहचान सकें। अभी भारत ज्ञान विज्ञान समिति (बीजीवीएस) से जुड़े हमारे दोस्त विनोद कुमार जन वाचन अभियान के लिए यानी आम लोगों के लिए विभिन्न स्रोतों से चार्ली चैप्लिन की जीवनी संकलित कर रहे हैं। बातचीत के दौरान इस भाषण का जिक्र आया तो हमने ढाई आखर के लिए इसका हिन्दी रूपान्तर उनसे साभार ले‍ लिया। आप सिर्फ सुनें और देखें नहीं बल्कि पढ़ें भी 'द ग्रेट डिक्टेटर...

चक दे मुस्लिम इंडिया

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रवी श कुमार किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। खबरिया चैनलों और पत्रकारों की भीड़ में जहां उनका खास मुकाम है वहीं हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में वो अलग पहचान रखते हैं। ... उन्हें खास बनाती है, उनकी दृष्टि। समाज, समाज में रह रहे लोगों और वहां हो रही घटनाओं को देखने की ताकत। फिर चाहे वो फिल्म ही क्यों न हो। फिल्म का सम ाजशास्त्रीय विश्लेषण कम होता है। बुधवार के 'हिन्दुस्तान' में रवीश की 'चक दे इण्डिया...' के बहाने से लिखी एक टिप्पणी छपी है। फिल्म के बहाने समाज की पड़ताल। रवीश की इजाज़त और 'हिन्दुस्तान ' से आभार के साथ यह टिप्पणी ढाई आखर के पाठकों के लिए पेश है। उम्मीद है, आपको पसंद आयेगी। नाम- सेंटर फार्वर्ड का बेहतरीन खिलाड़ी कबीर खान। पद- कोच, भारतीय महिला हॉकी टीम। मजहब- मुसलमान। चक दे इंडिया के मुख्य किरदार की तीन पहचान सामने आती हैं। शुरुआत में ही फिल्म एक सवाल को उठा लेती है। पाकिस्तान से हार का कारण कबीर खान का मुसलमान होना। उसके घर की दीवार पर लिख दिया जाता है- गद्दार। चक दे इंडिया की कहानी क्या है? हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ी की हार के पश्चाताप से निकलने की छट...

दो बदन प्‍यार की आग में जल गये

अभय जी की टिप्‍पणी के बाद मुझे लगा कि कहीं मेरी याददाश्‍त तो धोखा नहीं खा रही है। आखिरकार मैं कल इस नज्‍़म को तलाशने में कामयाब रहा। यह नज्‍़म क्रांतिकारी शायर मख़दूम मोहिउद्दीन की है। मख़दूम ने जहां क्रांति के गीत लिखे वहीं उन्‍होंने मोहब्‍बत के गीत भी उसी जज्‍़बे से गाया। मख़दूम उन इंकलाबी शायरों में हैं, जो बार बार याद दिलाते हैं कि एक इंकलाबी शख्सियत के लिए एक इंसानी जज्‍़बे से भरपूर दिल की भी ज़रूरत होती है। इसके बिना क्रांतिकारी की कल्‍पना अधूरी है। मख़दूम आज़ादी की लड़ाई के सिपाही रहे और बाद में कम्‍युनिस्‍टों की कतार में शामिल होकर तेलंगाना विद्रोह की शमा भी जलाई। उनके चंद मशहूर अशआर हैं- न माथे पर शिकन होती, न जब तेवर बदलते थे खुदा भी मुस्‍कुरा देता था जब हम प्यार करते थे यही खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी। -------------------- हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो- चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो। -------------------- इक नयी दुनिया, नया आदम बनाया जायेगा। -------------------- सुर्ख़ परचम और ऊंचा हो, बग़ावत जि़दाबाद। ढाई आखर के पाठकों के लिए पेश है उनकी मशहूर नज्‍़म। ...

ये जंग है जंगे आज़ादी

आज़ादी मिली तो फैज़ ने बहुतों के दिल के दर्द को आवाज़ दी 'ये वो सहर तो नहीं'। यानी हम देश के बंटवारे के लिए तो आज़ादी नहीं चाह रहे थे। कल तक जिनकी जद्दोजहद साझा थी, उसे हुक्‍मरानों ने बांट दिया था। दिलों पर जख्म लिये लोगों ने नया सफ़र शुरू किया। नये उम्मीदों से भरपूर सफ़र। स्वराज का सफ़र। पर कुछ ही सालों में लोगों को लगा कि आमजन का स्वराज तो अब भी नहीं आया है। फिर याद आने लगी 1931 में लिखी भगत सिंह की  बात- 'भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को- भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगार हटाकार जो कि उसी आर्थिक व्यवस्था के  पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें शोषण पर आधारित हैं-आगे आना है। हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां, एक स्वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्थान लेने के लिए तैयार हैं।' क्या आपको नहीं लगता कि भगत सिंह भविष्यवक्ता के रूप में अपनी बात कह रहे थें। उनकी बात आज भी, मेरी नज़र में सौ फीसदी सटीक है। ... जब यह बात महसूस हुई तो फिर आज़ाद मुल्क में ही जद्दोजहद की शुरुआत हुई। इसका इतिहास काफी लम्बा...