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आतंकवाद का हिन्‍दुत्‍ववादी (हिन्‍दू नहीं) चेहरा (Hindutava terror)

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क्‍या वाकई हम सब, पुलिस और खुफिया निजाम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं। अगर हाँ, तो वक्‍त आ गया है कि आँख में आँख डालकर सच कहने और सुनने की हिम्‍मत पैदा करें। पिछले कई पोस्‍ट में ढाई आखर से यह मुद्दा उठता रहा है कि आतंकवाद को किसी खास मजहब या खास समुदाय या खास नामधारियों के मत्‍थे मढ़ने से काम नहीं चलेगा। इससे आतंकवाद खत्‍म नहीं किया जा सकता। लेकिन जब पूरा का पूरा निजाम, खासतौर पर पुलिस और खु‍फिया एजेंसियाँ और उनकों वैचारिक खाद-पानी देतीं, हिन्‍दुत्‍ववादी पार्टियाँ (हिन्‍दूवादी नहीं)  हों  तो हर जाँच एक खास चश्‍मे से ही की जाएगी। इसी मायने में इंडियन एक्‍सप्रेस की आज की एक खबर हंगामा मचाए है। इंडियन एक्‍सप्रेस के मुताबिक ईद के ठीक पहले मालेगाँव और मोदासा में हूए बम धमाकों में हिन्‍दुत्‍ववादी संगठनों के हाथ होने की खबर है।  खबर कहती है कि इंदौर के एक हिन्‍दुत्‍ववादी संगठन हिन्‍दू जागरण मंच इन धमाकों के पीछे है। धमाका करने वालों का रिश्‍ता अखिल भारतीय विद्यार्थ...

सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ

सवाल उठाने पर सवाल पृथ्‍वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्‍सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्‍वीकार या इनकार करते हैं। पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्‍लें सामने आ रही हैं। ये शक्‍लें वैसी हैं, जिन्‍हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्‍ली में विस्‍फोट और कई बेगुनाहों की हत्‍या। विस्‍फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्‍यूज... मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्‍पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्‍य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्‍प्‍यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते...

आंख बंद! दिमाग बंद!! सवाल कोई नहीं!!!

इस मुल्‍क के एक बड़े हिस्‍से के लिए जो भी अमरीकी है, वह श्रेष्‍ठ है। बोलना- चालना, उठना- बैठना, पहनना- ओढ़ना कहाँ तक गिनती गिनी जाए। यहाँ सिलसिला अब पत्रकारिता तक पहुँच गया है। ऐसा नहीं है कि पहले नहीं था, पहले भी था लेकिन वही मुख्‍य स्‍वर नहीं था। आज अमरीकी पत्रकारिता की शैली आदर्श है। आज वही श्रेष्‍ठ है। आज वही लीड है। जब अमरीका ने अफगानिस्‍तान और फिर इराक में हमले किए तो एक  शब्‍द बड़े जोरशोर से सुनने को मिला। इस शब्‍द के बारे में मैंने मॉस कॉम में कुछ ऐसा नहीं पढ़ा था, जो प्रोफेशन में उतारने लायक हो।  खैर, यह शब्‍द है- इम्‍बेडेड जर्नलिस्‍ट। वैसे इस शब्‍द का रिश्‍ता युद्ध क्षेत्र से जुड़ी पत्रकारिता से हैं और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान भी यह शब्‍द मिलता है। लेकिन इस शब्‍द को इक्‍कीसवीं सदी में जो शोहरत मिली वैसी पहले कभी नहीं थी। इस शब्‍द को नया आयाम मिला। पत्रकारिता को एक नया अर्थ। अफगानिस्‍तान और इराक 'आतंक के खिलाफ जंग'  (यह शब्‍द मेरे न...

यह तैयारी किसके लिए है

यह तैयारी किसके लिए ? किसके खिलाफ ? किसकी हिफाजत के लिए ? क्‍यों और कौन लोग कर रहे हैं ? एक चैनल के जरिए खबर आई कि इंदौर में सरेआम राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के कार्यकर्ता एक पार्क में हवाई फायरिंग कर रहे थे। एक-दो नहीं बल्कि कई। जाहिर है, ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज़ सुनाई दी होगी तो आस-पड़ोस के लोग खुशी से झूम नहीं उठे होंगे। डर ही गए होंगे। तो ये किसे डराया जा रहा है ? यह तैयारी किनके खिलाफ काम आएगी ? इससे पहले भी, उत्‍तर प्रदेश के कई शहरों में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कैम्‍पों में त्रिशूल को ‘ सही ’ पकड़ने और लड़कियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिए जाने की खबर आई थी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि रक्षा मंत्रालय ने सीमा की हिफाजत का जिम्‍मा संघ परिवार को आउटसोर्स कर दिया है। भई आउटसोर्सिंग का जमाना है, कुछ भी मुमकिन है। सीमा की हिफाजत नहीं, तो हो सकता है, शहर और मोहल्‍ले की हिफाजत का जिम्‍मा मिल गया हो। लेकिन सवाल फिर वही, किससे, किसकी हिफाजत ? कौन है भई ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वैसी ही हिफाजत की तैयारी हो, जैसा गुजरात नाम के राज्‍य में कभी हुआ था। गुजरा...

ऐसे फतवों का क्या करें

आज सुबह के अखबार में एक और फतवे की खबर है। खबर के मुताबिक मुसलमानों को फोटो नहीं रखना चाहिए। एक और खबर है कि एक ऐसा फतवा दिया गया है जिसने तीन सौ लोगों की शादीशुदा जिंदगी को खतरे में डाल दिया। ... ... कोई भी शख्‍स जो इन फतवों के बारे में पढ़ेगा या सुनेगा... वह इस पर क्‍या राय देगा, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जो लोग फतवों के बारे में नहीं जानते, उन्‍हें लगेगा कि यह कैसा समुदाय है, जो ऐसे फतवों पर जीता है। फतवा अरबी का लफ्ज़ है। इसका मायने होता है- किसी मामले में आलिम ए दीन की शरीअत के मुताबिक दी गयी राय। ये राय जिंदगी से जुड़े किसी भी मामले पर दी जा सकती है। फतवा यूँ ही नहीं दे दिया जाता है। फतवा कोई मांगता है तो दिया जाता है, फतवा जारी नहीं होता है। हर उलमा जो भी कहता है, वह भी फतवा नहीं हो सकता है। फतवे के साथ एक और बात ध्‍यान देने वाली है कि हिन्‍दुस्‍तान में फतवा मानने की कोई बाध्‍यता नहीं है। फतवा महज़ एक राय है। मानना न मानना, मांगने वाले की नीयत पर निर्भर करता है। यह ठीक उसी तरह है, जिस तरह कोई किसी वकील से किसी मामले में राय लेने जायें और वो कानून सम्‍मत राय दे। ...

नहीं रहना नारद के साथ, बाहर करें

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मेरे ब्‍लॉग को भी बाहर करें नारद से वह बात जिसका सारे फ़साने में जिक्र न था वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है यह सेंसरशिप नहीं, तानाशाही है। सत्ता की तानाशाही। तकनीक की सत्ता की तानाशाही। मानवीय इतिहास के सबसे लोकतांत्रिक ज़रिये इंटरनेट पर जानकारी के प्रवाह को अपनी मुट्ठी में करने की तानाशाही। पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ को भी ऐसी ही तानाशाही की सूझी है। सक्रिय ब्लॉगिंग के डेढ महीने में मैंने ऐसी कई तकलीफदेह चीज़ें देखीं। वरिष्ठ ब्लॉगरों से अपना दर्द भी बांटा। पर हालात दिन प्रति दिन बिगड़ते जा रहे हैं। नहीं तो यह कैसे सम्‍भव है कि कुछ लोग लगातार अनर्गल प्रलाप करें। खुलेआम लोगों को देख लेने की धमकी दें। कुछ लोग ऐसे ब्लॉगर को उकसाने में लगे रहे, उन पर 'बिलो द बेल्‍ट' हमला करें, जो खामख्‍वाह की ओछी व्‍ यक्तिगत राजनीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाह रहे... कुछ लोग किसी भी लेखक-साहित्‍यकार की आलोचना करना तो दूर उसे सारी दुनिया के सामने नंगा कर दें ... कोई किसी की उपमा राखी सावंत से दे दे... कोई किसी का नाम देखकर उसे कट्टरपंथियों की जमात में खड़ा कर दे तो कोई एक नौजवान को अबू सलेम और दाऊद का...

मीडिया का योगी... योगी (1)

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एक ब्‍‍लॉग पर मीडिया की साम्‍‍ ‍ प्रदायिकाता पर भगत सिंह की टिप्‍प णी पोस्‍‍ट की गयी थी । उसके बाद फिर एक पोस्‍ट हुआ, जिसमें मीडिया के बारे में राय जाहिर की गयी थी । मैंने उस पोस्‍‍ट की टिप्‍पणी में वादा किया था कि ढाई आखर पर जल्‍द ही मीडिया की साम्‍प्रदायिक भूमिका पर एक विश्‍‍लेषण पोस्‍ट किया जायेगा। इस काम को आसान बना दिया मेरे दोस्‍त मनोज कुमार सिंह ने। मनोज गोरखपुर के रहने वाले हैं। पेशे से पत्रकार हैं लेकिन सामाजिक सरोकार वाले पत्रकार। पिछले दिनों गोरखपुर में जो हिंसा हुई, उसे इन्‍हें काफी नजदीक से देखा। जो देखा, जो पाया और जो पढ़ा, मनोज ने इसी के बिना पर अपने ही पेशे के काम की पड़ताल की है। स र्कुलेशन ब ढ़ाना है तो योगी ... योगी कहना है गो रखपु र में दिसम्बर 22, 23 व 24 को गोरखपुर में आयोजित विश्व हिन्दू महासंघ के सम्मेलन के दौरान गोरखपुर की मीडिया ने योगी आदित्यनाथ के प्रति जो आदरणीय भाव दिखाया था, वह गोरखपुर में जनवरी में हुए साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान वीभत्स रूप में देखने को मिला। बाहर से आये मीडिया के नुमाइंदों को स्थानीय मीडिया के...

दबे पांव आया एक सामाजिक 'सुनामी'

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जी हां, मशीन से बसपा का जिन्न निकला पर किसी ने उसकी ऐसी धमाकेदार आमद का अहसास नहीं किया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। जब भी हाशिये पर लोगों की दस्तक सत्ता तक पहुँचती है, 'सभ्य नागरिक समाज' उसे न तो देख पाता है और न ही देखना चाहता है। सुनना भी नहीं चाहता। नहीं तो ऐसा क्यों है कि उत्तर प्रदेश में इतना बड़ा बदलाव हो रहा था लेकिन धुरंधर से धुरंधर विश्लेषक, चुनाव सर्वेक्षक, मीडिया कर्मी जमीन पर घूमते हुए जमीन के बदलाव को नहीं महसूस कर पा रहे थे। कुछ थोड़े से लोग जो इस बदलाव की साफ उम्मीद जता रहे थे, उन्हें ही शक के दायरे में रख दिया जा रहा था। उन पर किसी न किसी तरह की चिप्पी चस्पा कर दी गयी और खानों में डाल दिया गया। याद करें, बिहार में सन् 1995 में लालू प्रसाद यादव के साथ ठीक यही हुआ था। दलित-शोषित-वंचित वर्ग, लालू के रूप में ऐसी सरकार देख रहा था, जो उनकी होगी। लेकिन सारे सर्वेक्षण, चंद पत्रकारों को छोड़, सभी अखबार, लालू को खत्म मान रहे थे। उन्हें यह बदलाव नहीं दिख रहा था। ... और लालू लगातार कह रहे थे, बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा। ... और जिन्न ही निकला। लालू पहले से ज्यादा समर्थन के ...

पादरी पर हमला: बकलम एक सहाफी

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उनतीस अप्रैल की शाम टीवी खोलते ही एक आदमी की चिल्‍लाते हुए तस्‍वीर दिखाई दी। वह चिल्‍ला रहा था और मुँह छिपाये कुछ वीर उसे पीट रहे थे। कमरे में रखे सामान तोड़ रहे थे। वह आदमी जीसस... जीसस चिल्‍लाता हुआ भाग रहा था। कोई बचाने वाला नहीं था। अगर टीवी वाले न पहुँचते तो शायद जिस घृणा के साथ उसे पीटा जा रहा था, उस खौफनाक मंजर का अंदाजा लगाना मुश्किल था। देखने, सुनने और पढ़ने में जो फर्क है, वह फर्क ऐसी घटनाओं में और साफ हो जाता है। आज तक के संवाददाता शरत कुमार वहां पहुँचे तो जो देखा, उसे तस्‍वीरों के ज़रिये तो दिखाया ही, उस खौफ नाक मंजर को क़लमबंद भी किया। दोस्‍तों के ज़रिये मिली रिपोर्ट को हम ढाई आखर पर दे रहे हैं। आंखन देखी शरत कुमार मेरे कानों में अभी तक बेबस पादरी वाल्टर मसीह की वेदना गूँज रही है । बर्बरता का ये आलम मेरे लिए नया था । मैंने पहले कभी किसी को एक अकेले और निहत्थे आदमी को इतनी बेरहमी से पीटते नहीं देखा था । आज तक पर पादरी की हिन्दू संगठनों द्वारा पिटाई की तस्वीरें देखने के बाद पूरा देश स्तब्ध है । लेकिन हिन्दू संगठनों , इनका समर्थन करने वाले अख़बार और राज्य की...

मुस्लिम वोटों के लिए इश्‍तेहारी जंग

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बेचारा बनाकर रख दिया उत्‍तर प्रदेश में चुनाव की गर्मी चरम पर है। इसकी के साथ चरम पर छद्म संस्‍थाओं के नाम से मुसलमानों को अपनी ओर करने के लिए उर्दू अखबारों में इश्‍तेहारों की जंग। इन विज्ञापनों में ज्‍यादातर में कांग्रेस पर निशाना है और कुछ में बसपा पर, लेकिन भाजपा मुख्‍य निशाना नहीं है। जवाबी इश्‍तेहार भी कुछ हैं, जिनमें सपा पर निशाना है। इश्‍तेहारों में सद्दाम हुसैन की चिंता है, इस्राइल है, बाबरी मस्जिद और उर्दू भी है लेकिन आम मुसलमानों के मुद्दे न के बराबर हैं। नासिरूद्दीन हैदर खॉं की रिपोर्ट- - सद्दाम की फाँसी पर ... सोनिया के मुँह पर ताले पड़ गये... कांग्रेस को साँप सूँघ गया। ... आइये! बुश के एजेंटों की कदम-कदम पर खबर लें , साम्राज मुखालिफ कुव्वतों को मजबूत करें। (नौ अप्रैल 2007 को छपा एक विज्ञापन) - हिन्दुस्तान की खारजा पालिसी पर सहूनी (यहूदीवादी) जाल का पर्दाफाश! ... सोनिया मनमोहन हुकूमत की इस्राइल नवाजी , अमरीकापरस्ती , और आलमी सहूनियत के खिलाफ खुली आवाज उठाने और सबसे आगे बढ़ कर एहतजाज करने वाले बेबाक समाजवादी रहनुमा मुलायम सिंह यादव की किरदारकुशी (चरित्रहन...