एक पागल की डायरी का पुनर्पाठ
लू शुन की कहानी 'एक पागल की डायरी' का पुनर्पाठ अपूर्वानन्द के शब्दों में- पचीस वर्ष हो गए हैं जब हमने पटना इप्टा की ओर से चीनी लेखक लू शुन की कहानी ' एक पागल की डायरी' का मंचन किया था. जावेद अख्तर खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. ज़ोर देने पर भी याद नहीं आ रहा कि तब क्यों हमने इस कहानी को मंचित करने के बारे में सोचा था. इन पचीस बरसों में यह कहानी दिमाग की दराज में पड़ी रही. कहानी के आखरी दो वाक्य जैसे एक मन्त्र की स्मृति की तरह रक्त में घुल गए : "शायद बच्चों ने आदमी को नहीं खाया है? बच्चों को बचा लें... ." एक विक्षिप्त हो गए मनुष्य की कातर, आर्त पुकार है. नफरत के निरंतर प्रचार के बीच लगभग नब्बे साल पहले चीन से उठी यह चीख मेरे मस्तिष्क के आकाश में मंडराती रही है. कथा का वाचक अपने स्कूल के दो दोस्तों से कई साल बाद मिलने जाता है. उसे उनमें से एक के बीमार रहने कि ख़बर मिली थी. उनके घर जाने पर बड़ा भाई बताता है कि छोटा भाई अभी-अभी बीमारी से उबरा है और कोई सरकारी नौकरी उसे मिल गई है....