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एक पागल की डायरी का पुनर्पाठ

लू शुन की कहानी 'एक पागल की डायरी' का पुनर्पाठ अपूर्वानन्‍द के शब्‍दों में- पचीस वर्ष हो गए हैं जब हमने पटना इप्टा की ओर से चीनी लेखक लू शुन की कहानी ' एक पागल की डायरी'   का मंचन किया था.  जावेद अख्तर खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी.  ज़ोर देने पर भी याद नहीं आ रहा कि तब क्यों हमने इस कहानी को मंचित करने के बारे में सोचा था. इन पचीस बरसों में यह कहानी दिमाग की दराज में पड़ी रही. कहानी के आखरी दो वाक्य जैसे एक मन्त्र की स्मृति की तरह रक्त में घुल गए : "शायद बच्चों ने आदमी को नहीं खाया है? बच्चों को बचा लें... ." एक विक्षिप्त हो गए मनुष्य की कातर, आर्त पुकार है.  नफरत के निरंतर प्रचार के बीच लगभग नब्बे साल पहले चीन से  उठी यह चीख  मेरे मस्तिष्क   के आकाश में मंडराती रही है. कथा का वाचक अपने स्कूल के दो दोस्तों से कई साल बाद मिलने जाता है. उसे उनमें से एक के बीमार रहने कि ख़बर मिली थी. उनके घर जाने पर बड़ा भाई  बताता है कि छोटा भाई अभी-अभी   बीमारी से  उबरा  है  और कोई सरकारी नौकरी उसे मिल गई है....

सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ

सवाल उठाने पर सवाल पृथ्‍वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्‍सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्‍वीकार या इनकार करते हैं। पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्‍लें सामने आ रही हैं। ये शक्‍लें वैसी हैं, जिन्‍हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्‍ली में विस्‍फोट और कई बेगुनाहों की हत्‍या। विस्‍फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्‍यूज... मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्‍पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्‍य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्‍प्‍यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते...

आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस

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जयपुर में विस्‍फोट के कुछ दिनों बाद ही पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा और दावा किया कि साजिश का पर्दाफाश हो गया है। हर पकड़ा गया शख्‍स मास्‍टरमाइंड था। इन्‍हीं में से थे- राशिद हुसैन। बिहार के रहने वाले। पेशे से इंजीनियर। इन्‍फोसिस में नौकरी। इनकी खता क्‍या थी। यह कभी सिमी से जुड़े थे, जब उस पर पाबंदी नहीं थी। लेकिन जो चीज उन्‍हें शक के दायरे में लाई- वह था सेवा करने का जज्‍बा। विस्‍फोट के बाद, राशिद उन चंद लोगों में शामिल थे, जो घायलों की मदद के लिए पहुँचे थे। पुलिस का दिमाग देखिए, उसे लगा ‘राशिद’ नामधारी व्‍यक्ति सेवा करने कैसे पहुँचा। जरूर दाल में काला है। और राशिद हो गए ‘आतंकी’। किसी तरह छूटे। इससे आगे की कहानी, अपूर्वानन्‍द बता रहे हैं। आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस राशिद हुसैन के स्वर में कड़वाहट नहीं थी. होना स्वाभाविक होता. आख़िर राजस्थान पुलिस ने उसे नौ दिन गैरकानूनी तरीके से बंद कर रखा था और लगातार यह कोशिश की थी कि उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया जाए कि उसके ताल्लुकात ‘सिमी’ ...

आंख बंद! दिमाग बंद!! सवाल कोई नहीं!!!

इस मुल्‍क के एक बड़े हिस्‍से के लिए जो भी अमरीकी है, वह श्रेष्‍ठ है। बोलना- चालना, उठना- बैठना, पहनना- ओढ़ना कहाँ तक गिनती गिनी जाए। यहाँ सिलसिला अब पत्रकारिता तक पहुँच गया है। ऐसा नहीं है कि पहले नहीं था, पहले भी था लेकिन वही मुख्‍य स्‍वर नहीं था। आज अमरीकी पत्रकारिता की शैली आदर्श है। आज वही श्रेष्‍ठ है। आज वही लीड है। जब अमरीका ने अफगानिस्‍तान और फिर इराक में हमले किए तो एक  शब्‍द बड़े जोरशोर से सुनने को मिला। इस शब्‍द के बारे में मैंने मॉस कॉम में कुछ ऐसा नहीं पढ़ा था, जो प्रोफेशन में उतारने लायक हो।  खैर, यह शब्‍द है- इम्‍बेडेड जर्नलिस्‍ट। वैसे इस शब्‍द का रिश्‍ता युद्ध क्षेत्र से जुड़ी पत्रकारिता से हैं और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान भी यह शब्‍द मिलता है। लेकिन इस शब्‍द को इक्‍कीसवीं सदी में जो शोहरत मिली वैसी पहले कभी नहीं थी। इस शब्‍द को नया आयाम मिला। पत्रकारिता को एक नया अर्थ। अफगानिस्‍तान और इराक 'आतंक के खिलाफ जंग'  (यह शब्‍द मेरे न...

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?' यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढ...

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

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कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर। दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेर...

वो बात उनको बहुत नाग़वार गुज़री है

कितना आसान होता है, दूसरों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट माँगना। उससे भी आसान होता है, तड़ से सर्टिफिकेट दे देना। मुझे भी सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। पहले भी ख़ूब दिए गए। ललकारा गया। पर मुझे किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। इसलिए कि जब सर्टिफिकेट देने वाला किसी खास रंग का चश्‍मा पहने होगा, तो उसे कुछ भी साफ नज़र नहीं आएगा। न ही मैं यहाँ बॉक्सिंग रिंग में हूँ कि धींगामुश्‍ती करूँ। जो चीज हम देखना नहीं चाहते, वह सामने होते हुए भी नहीं दिखती। जैसे कुछ दोस्‍तो को (मैं जानबूझ कर नाम नहीं लेना चाहता) पिछले पोस्‍ट में नहीं दिखा। मैं यही कह सकता हूँ कि उन्‍होंने पोस्‍ट पूरी नहीं पढ़ी। कुछ लोग अगर मेरे पिछले कई पोस्‍ट देख लेते तो शायद,  उनका जो ख़ून जला, न जलता। यही नहीं, यह सब संवाद वाली टिप्पिणियाँ नहीं हैं, विवाद वाली हैं। संवाद वाली टिप्पिणियाँ कैसे की जाती हैं, यह घुघूती बासूती से सीखना चाहिए। ख़ैर। कुछ उदाहरण। पिछली पोस्‍ट की दो लाइन है- 'मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भु...

तो यह तैयारी की झलक है

तो यह तैयारी ऐसे ही वक्‍त के लिए थी। यह बात बृहस्‍पतिवार को समझ में आई। चकाचक क्रिज वाला भगवा शर्ट पहने... कान में मोबाइल की आवाज पकड़ने वाला मशीन लगाए...हाथों में चमकता त्रिशूल लहराते नौजवान..गदा उठाए... जी हाँ... ये हैं ‘तेजस्‍वी’ और ‘वीर बालक’। यह छवि उसी इंदौर की है, जहाँ ‘सांस्‍कृतिक’ काम करने वाले एक संगठन के लोग पिछले दिनों खुलेआम बंदूक से गोलियाँ दाग रहे थे। क्‍यों। क्‍यों क्‍या...प्रैक्टिस कर रहे थे... ये लोग भी इन्‍हीं के भाई बंधु हैं, ऐसा कहा जाता है। यह सड़क पर उतरें और भू-डोल न हो, तो इनका उतरना बेमानी। इनका कमाल देखिए, रथ पर चलते हैं, पीछे-पीछे अपने-आप भू-डोल होता जाता है। बृहस्‍पतिवार को देश बंद कराने चले, तो हो गया भू-डोल। और फिर बंदूक चलाना और त्रिशूल लहराना, सीखने का फायदा क्‍या, जब उसका इस्‍तेमाल ही न हो। तो हो गया इस्‍तेमाल। लग गया इंदौर के कई इलाकों में कर्फ्यू। राष्‍ट्रीय अस्मिता का सवाल है जनाब, थोड़ा बर्दाश्‍त तो करना पड़ेगा। न ही करेंगे तो ...

प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद

वे सनातनी हिन्‍दू हैं। पर वे हिन्‍दुत्‍व के समर्थक नहीं हैं। उन्‍हें बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और गुजरात में राज्‍य के समर्थन से की गई हिंसा से सख्‍त विरोध है। चूँकि वे मजबूती से अपनी बात कहते हैं, इसलिए अक्‍सर उन्‍हें विरोध का भी सामना करना पड़ता है। यह हैं प्रभाष जोशी। प्रभाष जोशी भारतीय पत्रकारिता का मशहूर नाम हैं। मैंने पिछले दिनों एक पोस्‍ट किया था ‘यह तैयारी किसके लिए है’ । उसके बाद प्रभाष जोशी की जनसत्‍ता में यह टिप्‍पणी पढ़ी। यह टिप्‍पणी मेरे पोस्‍ट से किसी न किसी रूप में जुड़ती है, और विचार के लिए कई मुद्दे उठाती है। इसलिए यहाँ जनसत्‍ता से साभार पेश कर रहा हूँ। प्रभाष जोशी: कमजोर और हिंदू आतंकवाद हिंदू आतंकवादी और हिंदू आतंकवादी संगठन पढ़ने में ही कितना अटपटा लगता है। लेकिन मुंबई में आजकल यही पढ़ रहा हूँ। क्या महाराष्ट्र और महाराष्ट्रियनों में ही ऐसा कुछ है कि वे इस तरह की व्यर्थ और सिरफिरी हिंसा की तरफ खिंचे चले आते हैं , और प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा की कार्रवाई करते है , जैसी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था के रमेश गडकरी और मंगेश निकम ने की ? ऐसा क्यों हुआ कि...

जनाब फिलिस्‍तीन का संगीत सुनेंगे (Music from Palestine)

फिलिस्‍तीन के संगीत से तो नफरत नहीं है। संगीत हर सीमाओं से परे होता है, ऐसा बड़े-बुजुर्ग कहते हैं। इसलिए हमने सोचा क्‍यों न फिलिस्‍तीन का आधुनिक संगीत ही दोस्‍तो के लिए पेश किया जाए। हमने डायरी के चंद पन्‍ने पेश किए। कविताएँ पेश की- पर कुछ दोस्‍तो को यह पसंद नहीं आया। जाहिर है सबको न तो खुश किया जा सकता है और न ही हम यहाँ सबको खुश करने के लिए आए हैं। शायद इस कला में हम पारंगत भी नहीं हैं। इसलिए हम तो वह बात कहने की कोशिश करते हैं, जो हमें जरूरी लगता है। फिलिस्‍तीन के बारे में हम क्‍यों पोस्‍ट कर रहे हैं, इसको लेकर कई दोस्‍तो में बड़ी बेचैनी है। इस बेचैनी पर बाद में बात करेंगे तब तक यह संगीत सुनें। इस संगीत को तैयार किया है चेकप्‍वाइंट 303 (Checkpopint 303)  नाम के समूह ने। यह फिलिस्‍तीन के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में आवाज के टुकड़ों की संगीतमय प्रस्‍तुति है। इसे किसी बैंड ने तैयार नहीं किया है। मिडिल ईस्‍ट के लोगों की जिंदगी में जो संगीत है, उसमें गोलियों की आवाज, चीख पुकार शामिल हैं। हर रोज इ...

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ (Lover From Palestine)

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  महमूद दरवेश (Mahmoud या Mahmood Darwish) फिलिस्‍तीन के मशहूर कवि हैं। दुनिया के बड़े साहित्‍यकारों में उनका शुमार होता है। अपने वतन फिलिस्‍तीन के लिए जबरदस्‍त बेचैनी उनकी शायरी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। फिलिस्‍तीन को समझने का एक बड़ा जरिया दरवेश की कविताएँ हैं। ढाई आखर पर इससे पहले भी हमने उनकी कविताएँ पोस्‍ट की थीं। आज चंद और रचनाएँ पेश हैं। इसे अंग्रेजी से हिन्‍दुस्‍तानी में पेश किया है साहित्‍यकार/ नाटककार ख़ुर्शीद अनवर ने।   फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ तेरी आँखें कि उतरता कोई नश्‍तर दिल में दर्द महसूस करूँ, या कि फि़दा हो जाऊँ तेज़ झोंकों में हूँ फा़नूस इनका   रात को चीर दे और दर्द को गहरा कर दे ऐसे पेवस्‍त करो आँखों को सीने में मेरे तेरी आँखों से मिले ज़ख्‍़म यूँ चमकें जैसे आज के घोर अँधेरों में रोशनी की किरण कल के ख्‍़वाबों को भी रोशन कर दे और मेरी रूह पे भी छा जाए। और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र यह भी न याद रहे हम कभी साथ भी थे, एक ही थ...

गाजा की औरतों का संदेसा

दुनिया भर की सारी औरतों के लिए मुहब्बत और एहतराम के साथ मैं गाजा यह खास संदेसा भेज रही हूँ. यहाँ के मुतानिक ११ बजे, यानी अभी से कुछ घंटे बाद गाजा की कई औरतीं और बच्चे इस खास दिन को मनाने अनाम फौजी के चौक पर इकठ्ठा होंगे . वे अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी और खास कर औरतों से यह अपील करेंगे कि वे फिलस्तीन के बच्चों और औरतों पर रोज़-रोज़ ढाए जा रहे जुर्मों के बारे में इस खास रोज़ खामोश न रहें. हम पूरी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि दीवारों से घेर कर या हमारे ख़िलाफ़ लगातार मिलिटरी ज़ुल्म से इसराइल महफूज़ नहीं होगा. सबके लिए सुरक्षा इंसाफ कि बुनियाद पर गढ़ी गई शान्ति से ही हो सकती है और इन्साफ का मतलब है फिलिस्तेनी लोगों के इज्ज़त और बराबरी के साथ रहने के हक को कबूल किया जाना..... गाज़ा से मैं आप सब से अपने लिए समर्थन और सहारा मांगती हूँ. अपनी सरकारों से कहिए कि वे गाजा पर कसी गई इस गिरफ्त को फौरन ख़त्म करने को कदम उठाएं. गाजा में हमारे पास इतने ख़ूबसूरत फूल हैं कि हम उन्हें आपको भेज सकते तो दिली खुशी होती लेकिन सीमाएं सील कर दी गई है और इस वजह से हम अपने फूल आप तक भेज नही सकते!!!! इस ...

...तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती

फिलस्तीन के कवि महमूद दरवेश (Mahmood Darvish) की चंद रचनाएँ पेश हैं। यह रचना मुश्किल हालात का आईना हैं। फिलस्तीनी लोगों की जिंदगी को समझने को इन कविताओं से बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता। ... एक कातिल को अगर तुमने अपन शिकार के चहरे पर ध्यान दिया होता और फिर ज़रा सोचा होता तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती, तुम बंदूक के तर्क से आज़ाद हो गए होते और तुमने बदल दिया होता अपना ख़याल: यह अपनी पहचान फिर से हासिल करने का तरीका नहीं है. हमारा नुकसान हर रोज़ दो से आठ के बीच शहीद और दस जख्मी और बीस मकान और पचास जैतून के दरख्त... इसमें जोड़ दें वह गड़बड़ी जो संरचना में होती है शायरी , नाटक और अधूरे कैनवास के . ... एक औरत ने बादल को कहा : मेरे महबूब को ढाप लो क्योंकि मेरे कपड़े तर हैं उसके लहू से. ... गर तुम बारिश नहीं हो सकते तो पेड़ बन जाओ उर्वरता से भरपूर पेड़ अगर तुम पेड़ नहीं बन सकते , मेरी जान पत्थर बन जाओ , नमी से पुर , पत्थर अगर तुम पत्थर नहीं बन सकते मेरी जान चाँद बन जाओ, चाँद ( ऐसा कहा एक औरत ने अपने बेटे को दफ्न करते वक्त) ... वह अपने कातिल को सीने से लगाता है. वह अपने क...

एक गुजारिश गाजा की तरफ से (Ek Guzaarish Gaza ki Taraf se)

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मेरा यक़ीन है कि मैं सर्वशक्तिमान ख़ुदा की इच्छा के मुताबिक काम कर रहा हू। यहूदियों के ख़िलाफ़ अपनी हिफाज़त करके मैं ख़ुदा के तरफ से लड़ रहा हू: अडोल्फ़ हिटलर, 1924 हज़ार गैर यहूदी जिंदगियाँ एक यहूदी के नाखून के बराबर भी नहीं हैं: दोव लिओर, किरयात अरबा के रब्बी हम फिलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ और भी भयानक हौलोकास्ट करेंगे: मातन विनी, इसराइल का उप रक्षामंत्री, 1 मार्च 2008 गाजा का दम घुट रहा है। हिटलर के होलोकास्ट के शिकार रह चुके यहूदियों के राष्ट्र का रक्षा मंत्री ख़ुद होलोकास्ट की धमकी दे रहा है। अमेरिका कहता है: हम इसराइल के आत्मरक्षा के अधिकार की हिमायत करते हैं। दुनिया के अख़बारों के लिए, समाचार तंत्र के लिए गाजा की मौतें ख़बर नहीं हैं। भारत के अखबारों के पन्ने पलट जाइए, इस्राइली हमले की ख़बर खोजने पर मिलेंगी। एक मुल्क डूब रहा है। एक पूरी कौम का गला घोंटा जा रहा है। हमारी सरकार हमलावर राज्य के साथ रिश्ते सुधार रही है। दुनिया के सारे लोकतंत्र खामोश देख रहे हैं। या नहीं देख रहे हैं। हम सब भी चुप हैं। फिलिस्तीन कभी था हमारे लिए, अब नहीं है। यह अपील है। अपनी आवाज़ फिलिस्तीन के लिए उठाने, इ...

तसलीमा की ताजा कविताएँ-2 (Latest Poems of Taslmia Nasreen-2)

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  (3) नो मेन्स लैंड अपना देश ही अगर तुम्हें न दे देश , तो दुनिया का कौन-सा देश है , जो तुम्हें देगा देश , बोलो। घ ू म-फिरकर सभी देश काफी कुछ ऐसे ही होते हैं , हुक्मरानों के चरित्र भी ऐसे ही। तकलीफ देने पर आयें , तो ऐसे ही देते हैं तकलीफ। इसी तरह उल्लास से चुभोएँगे सूइयाँ तुम्हारी कलाई के सामने , पत्थर-चेहरा लिए बैठे , मन ही मन नाच रहे होंगे। नाम-धाम में भले हो फर्क अँधेरे में भी पहचान लोगे उन्हें , सुनकर चीत्कार , खुसफुस , चलने-फिरने की आहट , तुम समझ जाओगे कौन हैं वे लोग। हवा जिस तरह , उनके लिए , उधर ही दौड़ पड़ने का समय। हवा भी तुम्हे बता देगी , कौन हैं वे लोग। हुक्मरान आखिर तो होते हैं हुक्मरान। चाहे तुम कितनी भी तसल्ली दो अपने को , किसी शासक की जायदाद नहीं- देश। देश होता है आम-जन का , जो देश को प्यार करते हैं , देश होता है उनका। चाहे तुम जितना भी किसी को समझाओ- यह देश तुम्हारा है , इसे तुमने रचा-गढ़ा है , अपने अन्तस में , अपनी मेहनत और सपनों की तूली में आँका है इसका मानचित्र। अगर शासक ही तुम्हे दुरदुराकर खदेड़ दें , कहाँ जाओग...

(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ (1) जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जिसमें एक बंद खिड़की है, जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती,  खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है, चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती। इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़,  लाँघ नहीं सकती चौखट। एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं, जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर, चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ। मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।...

साबरमती आश्रम में गाँधी जी के साथ एक दिन- 2 (One day in Sabarmati Ashram with Gandhi ji-2)

गाँधी जी की जिंदगी की से जुड़ी तस्वीरों की दूसरी किस्त आज पेश है। तस्वीरों के बारे में जानने के लिए स्लाइड शो में बाएँ क्लिक करें। आप चाहें तो शो की गति अपने मुताबिक भी कर सकते हैं। गाँधी जी के शब्द '' मेरी लोकतंत्र की कल्पना ऐसी है कि उसमें कमजोर से कमजोर को उतना ही मौका मिलना चाहिए जितना कि समर्थ को।... आजकल सारे विश्व में कोई भी देश आश्रयदाता की नजर के बिना निर्बलों को देखता ही नहीं। ... पश्चिम के लोकतंत्र का जो स्वरूप आज विद्यमान है वह ... हलका फासीवाद जैसा है। ... सच्चा लो‍कतंत्र केन्द्र में बैठकर राज्य चलाने वाले बीस इन्सान नहीं चला सकते, वह तो प्रत्येक गाँव के हर इन्सान को चलाना पड़ेगा।''  '' (साबरमती) आश्रम जातिभेद नहीं मानता। आश्रम का मानना हे कि जातिभेद से हिन्दू धर्म को नुकसान हुआ है।'' पहली कड़ी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

तसलीमा के हक में (In favour of Taslima Nasreen)

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बनाम आमतौर पर जब भी किसी समुदाय या समूह का कट्टरपंथी या पुरातनपंथी तबका कोई असंवैधानिक और अमानवीय बात कहता है तो उनका शोर सबसे ज्‍यादा सुनाई देता है। यही नहीं इन्‍हीं की आवाज को पूरे समुदाय की आवाज भी मान ली जाती है। हालाँकि जब उसी समुदाय या समूह का संवेदनशील और उदारवादी तबका कोई बात कहता है तो उसे आमतौर पर नजरंदाज करने की कोशिश होती है। इसी तरह जब बांग्‍लादेशी साहित्‍यकार तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथी ताकतों ने आवाज बुलंद की तो सब ने सुनी। मीडिया ने भी उनको तवज्‍जो दी। चैनलों के ब्रेंकिंग न्‍यूज बनी। लेकिन जिन लोगों ने तसलीमा के हक में आवाज उठायी, वह कहीं नहीं दिखे। सिर्फ इस बार नहीं पिछले दिनों भी यही हुआ था। तसलीमा नसरीन के खिलाफ ताजा मुहिम के बाद पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवी अब उनके पक्ष में खुलकर सामने आ गए हैं। एक खबर के मुताबिक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने पिछले दिनों कोलकाता प्रेस क्लब में एक सभा कर तसलीमा को वापस कोलकाता आने देने की माँग की। वे रैली भी करेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गियासुद्दीन का कहना है 'तसलीमा नसरीन को जिस तरह पिछले 52 दिनों से एक अज्ञात स्थान में ...