(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ

(1)


जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है

इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ,

जिसमें एक बंद खिड़की है,

जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती, 

खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है,

चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती।

इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ

चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़, 

लाँघ नहीं सकती चौखट।

एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं,

जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर,

चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ।

मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को

इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।

हाँ, इन दिनों मैं एक ऐसे कमरे में रहती हूँ,

जहाँ मुझे साँस लेने में बेहद तकलीफ़ होती है।

चारों तरफ न कोई आहट भी नहीं,

सिर्फ़ और सिर्फ़ सिर टकराने की आवाज़ें।

नहीं देखतीं, दुनिया के किसी मनुष्य की आँखें

गड़ी रहती हैं, सिर्फ दो छिपकलियों की आँखें।

आँखें फ़ाड़-फ़ाड़कर निहारती रहती हैं,

पता नहीं, वे दुखी होती हैं या नहीं

क्या वे भी रोती हैं मेरे साथ? जब मैं रोती हूँ?

मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जहाँ रहना मैं एकदम नहीं चाहती।

मैं ऐसे एक कमरे में असहाय कैद हूँ।

हां, ऐसे ही एक कमरे में रहने को, मुझे विवश करता है लोकतंत्र

ऐसे एक कमरे में , ऐसे अँधेरे में

ऐसी एक अनिश्चयता, एक आशंका में

मुझे रहने को लाचार करता है लोकतंत्र

एक कमरे में तिल-तिल मेरी हत्या कर रही है- धर्मनिरपेक्षता।

एक कमरे में मुझे असहाय-निरुपय किये दे रहा है- प्रिय भारतवर्ष।

भयंकर व्यस्त-समस्त मानस और मानसनुमा प्राणी,

पता नहीं, उस दिन भी, उन्हें पल-दो पल की फु़र्सत होगी या नहीं,

जिस दिन कोई जड़-वस्तु, कमरे से बाहर निकलेगी

जिस दिन सड़ा-गला एक लोथड़ा या हड्डी पसली लाँघेगी दहलीज़।

आखिरकार, क्या मौत ही मुक्ति देगी?

मौत ही शायद देती है आज़ादी, चौखट लाँघने की

उस दिन भी मुझे टकटोरती रहेंगी, छिपकिली की दो जोड़ी आँखें।  

दिन भर।

वे भी शायद होंगी दुखी। उस दिन।


गणतंत्र के झंडे में लपेटकर, प्रिय भारत की माटी में,

कोई मुझे दफन कर देगा। शायद कोई सरकारी मुलाजि़म।

खैर, वहाँ भी मुझे नसीब होगी, एक अल्प कोठरी।

उस कोठरी में लाँघने के लिए, कोई दहलीज नहीं होगी,

वहाँ भी मिलेगी मुझे एक अदद कोठरी,

लेकिन, जहाँ मुझे साँस लेने में कोई तकलीफ नहीं होगी।


(2)

नज़रबंद

कभी, किसी दिन, अगर तुम्हें होना पड़े नज़रबंद,

अगर कोई पहना दे पाँवों में बेड़ियाँ,

मुझे याद करना।

जिस कमरे में तुम हो, अगर किसी दिन,

उस कमरे का दरवाज़ा, अन्दर से नहीं,

बाहर से बंद करके, कोई जा चुका हो,

मुझे याद करना।

पूरे मंजि़ले में कोई न हो, जो सुने तुम्हारी आवाज़,

जुबान ताला-बंद, होंठ कसकर सिले हुए

तुम बात करना चाहते हो, मगर कोई नहीं सुनता,

या सुनता है, मगर ध्यान नहीं देता,

मुझे याद करना।

मसलन तुम शिद्दत से चाहते हो, कोई खोल दे दरवाज़ा,

खोल दे तुम्हारी बेड़ियाँ, सारे टाँके,

मैंने भी चाहा था,

गुजर जायें महीने-दर-महीने, कोई रखे नहीं कदम इस राह,

दरवाज़ा खोलते ही जाने क्या हो-न हो,

इसी अंदेशे में अगर कोई खोले नहीं दरवाजा,

मुझे याद करना।

जब तुम्हें हो खूब-खूब तकलीफ़

याद करना, मुझे भी हुई थी तकलीफ,

बेहद डरे-सहमे, सतर्कता के नाप-नापकर चलता हो जीवन,

एकदम से अचानक, हो सकता है नज़रबंद, कोई भी! तुम भी!

अब, तुम-मैं, सब एकाकार, अब नहीं कोई फ़र्क़ सूत भर भी!

मेरी तरह तुम भी! इंतज़ार करना तुम भी, इंसानों का!

हहराकर घिर आता है अँधेरा, मगर नहीं आता कोई इंसान।


किसी कवि को क्या कभी, किसी ने किया था नजरबंद ?

वैसे कवि को लेकर उछाले गये हैं ईंट-कंकड़-पत्थर,

आगजनी भी हुई है,

लेकिन कवि को किसी ने गृहबंदी नहीं किया। किसी भी देश ने।

हिन्दुस्तान ने इस सभ्यता, इस इक्कीसवीं शती से

ग्रहण किया था कवि को,

हाँ अगले ही पल उसे वर्जित भी कर दिया

उसके बचपन जैसे धर्म ने, उसकी निष्ठुर राजनीति ने।

कवि ने कोई गुनाह नहीं किया,

फिर भी कवि है, आज गृह-बंदी।

कवि भूल गया है - आसमान कैसा होता है,

कह गये हैं, अब वे यहाँ फिर कभी कदम नहीं रखेंगे।

आज एक सौ पचास दिन हुए, कवि गृह बंदी है

गुजर गये एक सौ पचास दिन,

कवि का यह अहसास भी छोड़ गया था,

कि धरती पर रहता है, ऐसा कोई इंसान,

जिसके पास मौजूद है दिल,

ऐसा कौन है, जिससे कह वापस माँगे अपने दिन?

अँधेरा समेटे कवि सोच में डूबा है-

कौन लौटाएगा उसके जीवन का उजाला,

कौन हो जो किसी दिन एकांत में उसे सौंपेगा जीवन मंत्र

कवि को कम से कम तसल्ली तो दे इंसान-

आज से पहले, जो लोग गृह-बंदी थे,

अधिकांश ही कवि थे,

मन ही मन, कुछ तो मिले उसे राहत,

नि:संगता से,

निचाट अकेलेपन से

रीत रहे दिनों से।

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