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एक लड़की की शादी

नासिरूद्दीन जहन में एक बात हमेशा कौंधती है, क्‍या लड़की की जिंदगी का सारा सफर शादी पर ही खत्‍म होता है। मैं अक्‍सर सोचता हूँ कि दसवीं, बारहवीं में जो लड़कियाँ हर इम्‍तेहान में लड़कों से बाजी मारती रहती हैं, कुछ दिनों बाद ऊँची तालीम, नौकरी और जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों में क्‍यों नहीं दिखाई देतीं? कहाँ गायब हो जाती हैं? लड़की पैदा हुई नहीं कि शादी की चिंता। उसके लिए एफडी की फिक्र। उसके नैन-नक्‍श, दांत की बुनावट, पढ़ाई-लिखाई, काम-काज की चिंता भी शादी के लिए ही? यही नहीं शादी को लेकर जितनी कल्‍पनाएँ लड़कियों की झोली में डाल दी जाती हैं, वह उनके पूरी दिमागी बुनावट पर असर डालता है। फिर वह भी इसी में झूलती रहती हैं। पढ़ो इसलिए कि अच्‍छा वर मिले। हँसो ठीक से ताकि ससुराल में जग हँसाई न हो। चलो ऐसे कि ‘चाल चलन’ पर कोई उँगली न उठे। चेहरा-मोहरा इसलिए सँवारो ताकि देखने वाला तुरंत पसंद कर ले। यह सब भी इसलिए ताकि ‘सुंदर- सुशील- घरेलू’ के खाँचे में फिट हो सके। क्‍या माँ-बाप कभी किसी लड़के को ताउम्र शादी की ऐसी तैयारी कराते हैं। क्‍या कभी किसी लड़के से शादी की ऐसी तैयारी की उम्‍मीद की जाती है। क्‍...

तीस साल बाद स्याह यादें

(अभी सन 84 के दंगों को लेकर काफी हंगामा बरपा था। जिस पार्टी को जो आसान और सुविधाजनक लगा, उसने 84 के दंगा और पीडि़तों का अपने तरीके से इस्तेमाल किया। लेकिन इस मुल्क ने सत्तर और अस्सी के दशक में कुछ और भयानक दंगे देखे हैं, उन्‍हें कोई याद नहीं रखना चाहता। उसके लिए कोई हो हल्ला भी नहीं मचता। ऐसा ही एक दंगा था, जमशेदपुर का। मैंने भी दंगा पीडि़तों को पहली बार इसी दंगे के जरिए जाना था। समाचार वेबसाइट टूसर्किल्स डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा उस वक्त पाँच साल के थे और दंगे में बाल-बाल बच गए थे। उस दंगे के तीस साल बाद यह बच्‍चा अपने बचपन के उन काली स्‍याह यादों को ताजा कर रहा है। इसलिए नहीं कि आप सियापा करें। इसलिए कि ऐसी यादें कितनी खौफनाक होती हैं और उनका असर ताउम्र होता है। तो क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी ऐसी ही खौफनाक यादें देकर जाना चाहते हैं। यह टिप्‍पणी मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे हिन्दी में सिटिजन न्यूज सर्विस ने तैयार किया है। मैंने उस हिन्दी अनुवाद में थोड़ा संशोधन, थोड़ा सम्पादन किया है।- नासिरूद्दीन ) 1979 के जमशेदपुर के दंगों की याद काशिफ-उल-हुदा 1979 क...

लौटना मार्क्‍स का (Lautna Marx Ka)

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इधर एक शोर बरपा है। दाढ़ी खुजलाते, बाल झटकते, बोलते-बोलते टेढ़े होते बदन, हमेशा तनाव से खींचे रहने वाले चेहरों पर चमक दिख रही है। कार्ल मार्क्‍स लौट रहे हैं। दास कैपिटल यानी पूँजी की तलाश फिर शुरू हुई है। गोष्ठियों में कहा जा रहा है, ‘देखा आ गई ना मार्क्‍स की याद। मार्क्‍स ही इस दुनिया को बचाने वाले हैं।’ कार्ल मार्क्‍स न लौट रहे हों जसे कल्कि अवतार हो रहा हो। जसे कोई आस्थावान कह रहा हो, देखो हम कहा करते थे ना, दुनिया को बचाने भगवान, कल्कि अवतार का रूप लेंगे। वो आ गए। वो आ गए...। पिछले कई सालों से वचारिक रूप से पस्त चल रहे ‘ऑफिशियल मार्क्‍सवादियों’ में विश्व आर्थिक मंदी ने थोड़ी हरकत पैदा कर दी है। पँख फड़ फड़ाकर वे धूल झाड़ रहे हैं। खबरें पढ़कर खुश हो रहे हैं। कोने में छप रही - ‘मार्क्‍स की याद आई’ या ‘तलाशी जा रही है मार्क्‍स की पूँजी’ जसी खबरें उन्हें खुशी से झुमा रही है। याद अमेरिका, यूरोप और दूसरों को आ रही है, खुश ये हो रहे हैं। दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाशना अच्छी बात है। लेकिन ...

आतंकवाद का हिन्‍दुत्‍ववादी (हिन्‍दू नहीं) चेहरा (Hindutava terror)

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क्‍या वाकई हम सब, पुलिस और खुफिया निजाम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं। अगर हाँ, तो वक्‍त आ गया है कि आँख में आँख डालकर सच कहने और सुनने की हिम्‍मत पैदा करें। पिछले कई पोस्‍ट में ढाई आखर से यह मुद्दा उठता रहा है कि आतंकवाद को किसी खास मजहब या खास समुदाय या खास नामधारियों के मत्‍थे मढ़ने से काम नहीं चलेगा। इससे आतंकवाद खत्‍म नहीं किया जा सकता। लेकिन जब पूरा का पूरा निजाम, खासतौर पर पुलिस और खु‍फिया एजेंसियाँ और उनकों वैचारिक खाद-पानी देतीं, हिन्‍दुत्‍ववादी पार्टियाँ (हिन्‍दूवादी नहीं)  हों  तो हर जाँच एक खास चश्‍मे से ही की जाएगी। इसी मायने में इंडियन एक्‍सप्रेस की आज की एक खबर हंगामा मचाए है। इंडियन एक्‍सप्रेस के मुताबिक ईद के ठीक पहले मालेगाँव और मोदासा में हूए बम धमाकों में हिन्‍दुत्‍ववादी संगठनों के हाथ होने की खबर है।  खबर कहती है कि इंदौर के एक हिन्‍दुत्‍ववादी संगठन हिन्‍दू जागरण मंच इन धमाकों के पीछे है। धमाका करने वालों का रिश्‍ता अखिल भारतीय विद्यार्थ...

ईद के मौके पर गांधीगीरी

ऐसी न शब्‍बरात न बकरीद की खुशी, जैसी है हर दिल में इस ईद की खुशी।। नजीर अकबराबादी की ये दो लाइनें ईद की अहमियत बताने को काफी हैं। ईद से पहले एक महीना होता है- रमजान। रमजान यानी इबादत, संयम, विवेक, खुद पर काबू रखने की सलाहियत पैदा करना,  अपनी बुराइयों पर विजय पाना, झंझावात में भी इंसानियत का जज्‍बा सम्‍हाल कर रखना, पडो़सियों का हक अदा करना, गरीबों की मदद करना, बेसहारों को सहारा देना... और ढेर सारे आदि-आदि। यानी उन सब की चीजों की याद दिलाना, जिससे इंसान, इंसान बना रहे। यही असली जिहाद भी है। सर्वश्रेष्‍ठ जिहाद। लेकिन यह ईद कुछ अलग है। इस बार रमजान में बम‍ विस्‍फोट, एनकाउंटर, तनाव, खौफ, नफरत के बोल, मीडिया के हर क्षण होते ब्रेकिंग न्‍यूज... हावी रहे। रोजदारों के सूखते गले, पपडि़यों पड़े काँपते होंठ  और खोई- खोई आँखें ढेर सारे सवालों का जवाब खोजती रही। खुशी पर खौफ और नफरत का साया छाया रहा। फिर भी ईद एक ऐसा त्‍योहार है जो आता ही इसीलिए है कि दूरियाँ कम हों, नफरत और खौफ का साया खत्‍म हो। गले यूँ ही थोड़े मिलते हैं। इ...

सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ

सवाल उठाने पर सवाल पृथ्‍वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्‍सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्‍वीकार या इनकार करते हैं। पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्‍लें सामने आ रही हैं। ये शक्‍लें वैसी हैं, जिन्‍हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्‍ली में विस्‍फोट और कई बेगुनाहों की हत्‍या। विस्‍फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्‍यूज... मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्‍पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्‍य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्‍प्‍यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते...

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन

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जन्‍माष्‍टमी की चारों ओर धूम है और सूफी शायारों में श्री कृष्‍ण की काफी धूम रही है। नजीर अकबराबदी (पूरा नाम वली मुहम्‍मद नज़ीर ) ने श्री कृष्‍ण पर कई रचनाएँ लिखीं हैं। काफी लम्‍बी और काफी रोचक। नज़ीर ने ये नज्‍़म करीब पौने दो सौ साल पहले लिखी थीं। इस जन्‍माष्‍टमी पर उनकी कई रचनाओं में से दो के कुछ अंश आपके सामने पेश है। अगर आपको पसंद आया तो बाकि पोस्‍ट की भी हिम्‍मत करूँगा। जन्‍माष्‍टमी के मुबारक मौके पर ये कलाम उन दोस्‍तों की नजर, जो साझी संस्‍कृति-विरासत और परम्‍परा को अपवाद बनाने में लगे हैं। इस दुआ के साथ की उनकी कोशिश कभी कामयाब न हो। (1) जनम कन्‍हैया जी ............................................. फिर आया वाँ एक वक्‍़त ऐसा जो आए गर्भ में मनमोहन। गोपाल, मनोहर, मुरलीधर, श्रीकिशन, किशोर न, कंवल नयन।। घनश्‍याम, मुरारी, बनवारी, गिरधारी, सुन्‍दर श्‍याम बरन। प्रभुनाथ बिहारी कान्‍ह लला, सुखदाई, जग के दु:ख भंजन।। जब साअत परगट की, वाँ आई मुकुट धरैया की। अब आगे बात जनम की है, जै बोले किश्‍न कन्‍हैया की।। 11 ।। था नेक महीला भादों का, और दिन बुध, गिनती आठन की। फिर आ...

आप कैसा इस्‍लाम या मुसलमान देखना चाहते हैं

प्रभात जी, मैं जानता हूँ आपने उकसाने के लिए ये टिप्‍पणी नहीं कर रहे। लेकिन जिस माहौल में हम रह रहे हैं, वहाँ आपका सवाल और फरीद का जवाब, ये बता रहा है कि हमारे समाज में कहीं कोई कड़ी टूट गयी या गायब हो गई है। हम अपने ही समाज को, वहाँ रहने वाले जीते-जागते इंसानों के बारे में कितना कम जानते हैं। आज कोई हिन्‍दू रोजा रखता है या कोई मुसलमान छठ का व्रत, तो यह हमारे लिए खबर होती है। लेकिन मुझे कभी ताज्‍जुब नहीं हुआ क्‍योंकि मैं ऐसे ही समाज से निकला हूँ। मुझे ताज्‍जुब तब होता है, जब ऐसा नहीं होता। रही बात आपके सवालों की, तो आपने देखा होगा, मैं उकसाने वाले ब्‍लॉगजगत के विद्वानों की बात का जवाब न देना ही पसंद करता हूँ। लेकिन आप उनमें से कतई नहीं हैं। मैं आपके सवालों पर तैयारी के साथ पोस्‍ट लिखना चाह रहा था। पर अब बात शुरू हुई है तो कुछ कह रहा हूँ। इतिहास की मुझे बहुत जानकारी नहीं है। लेकिन जहाँ तक मुझे मालूम है, औरंगजेब को छोड़ आप किसी मुगल बादशाह को तथाकथित कट्टर की श्रेणी में नहीं रख पाएँगे। यहाँ तक कि औरंगजेब ने आपके पड़ोस चित्रकूट में श्री राम वनवास के प्रतीकों की हिफाजत कराई है। खैर। बाबर...

आंख बंद! दिमाग बंद!! सवाल कोई नहीं!!!

इस मुल्‍क के एक बड़े हिस्‍से के लिए जो भी अमरीकी है, वह श्रेष्‍ठ है। बोलना- चालना, उठना- बैठना, पहनना- ओढ़ना कहाँ तक गिनती गिनी जाए। यहाँ सिलसिला अब पत्रकारिता तक पहुँच गया है। ऐसा नहीं है कि पहले नहीं था, पहले भी था लेकिन वही मुख्‍य स्‍वर नहीं था। आज अमरीकी पत्रकारिता की शैली आदर्श है। आज वही श्रेष्‍ठ है। आज वही लीड है। जब अमरीका ने अफगानिस्‍तान और फिर इराक में हमले किए तो एक  शब्‍द बड़े जोरशोर से सुनने को मिला। इस शब्‍द के बारे में मैंने मॉस कॉम में कुछ ऐसा नहीं पढ़ा था, जो प्रोफेशन में उतारने लायक हो।  खैर, यह शब्‍द है- इम्‍बेडेड जर्नलिस्‍ट। वैसे इस शब्‍द का रिश्‍ता युद्ध क्षेत्र से जुड़ी पत्रकारिता से हैं और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान भी यह शब्‍द मिलता है। लेकिन इस शब्‍द को इक्‍कीसवीं सदी में जो शोहरत मिली वैसी पहले कभी नहीं थी। इस शब्‍द को नया आयाम मिला। पत्रकारिता को एक नया अर्थ। अफगानिस्‍तान और इराक 'आतंक के खिलाफ जंग'  (यह शब्‍द मेरे न...

सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा (Saare Jahan Se Achha Hindostan Hamara)

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'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' के बीच राष्‍ट्रीय गीत या गान का विवाद गाहे ब गाहे चलता रहता है। पिछले दिनों हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया में भी यह विवाद उठा था। मेरे ज़हन में अक्‍सर यह सवाल उठता है कि इस विवाद में 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' का नाम क्‍यों नहीं सुनाई देता। क्‍या कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाता कि यह तराना, कौमी तराना क्‍यों नहीं बना। क्‍या इसमें देशभक्ति की कमी थी। क्‍या इसमें लय ताल छंद कमजोर थे। क्‍या इसमें वह सलाहियत नहीं थी, जो इसके आगे 'राष्‍ट्रीय' गीत या गान लगवा सके। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास इनके जवाब नहीं है। महज जिज्ञासु सवाल हैं। मैं कोई विवाद नहीं पैदा करना चाह रहा  और न ही मेरी बेजा विवादों में दिलचस्‍पी है। न ही इस बात का अब कोई मतलब है। लेकिन यह बात आज क्‍यों फिर जहन में आई। आज सुबह उर्दू राष्‍ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन छपा। इसके मुताबिक दस अगस्‍त यानी आज 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' ...

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?' यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढ...

... तो टीवी देखना इस्लाम के खिलाफ़ है! (Ooh...Watching TV is against the Islam!)

सनिचर 12 जुलाई की सुबह मेरठ के लावड़ कस्‍बे के पास दौराला रोड पर लोगों का हुजूम लगा था। जिसे देखिए वही अपनी गाड़ी लगाकर तमाशा देख रहा था। समझना चाह रहा था कि आखिर यह हुआ क्‍या। क्‍या हो रहा है। ... लोग अपने घरों से टीवी उठाकर ला रहे हैं और सड़क पर पटक रहे हैं। कोई वीसीडी प्‍लेयर लिए चला आ रहा है तो किसी के हाथ में टेपरिकार्डर। ... टीवी, टेपरिकार्डर, सीडी और सीडी प्‍लेयर ... जिस घर में जो था ... सब तोड़ दिए गए। कहीं किसी सामान की साँस न चलती रहे, इसलिए इतिमिनान के लिए मलबे में आग लगा दी गई। राख... सब कुछ खाक। पर यह हुआ क्‍यों। इन सबकी अगुआई कर रहे नेता जी कहना था कि 'ये सारी चीज़ें अश्‍लीलता और जुर्म को बढ़ावा देने का सबब हैं। नौजवान अपनी जिम्‍मेदारियों से दूर हो रहे हैं।' और तो और उन्‍होंने एक और लुकमा जोड़ दिया... 'यह सारी चीज़ें इस्‍लाम विरोधी हैं। ऐसा इस्‍लाम के विद्वानों ने बताया है। मुसलमानों के लिए इन्‍हें देखना हराम है। इनकी अपील है कि मुसलमान टीवी... सीडी प्‍लेयर इस्तेमाल न करें और कर रहे हैं तो इनकी तरह घर से इन्‍हें बेदख़ल कर दे।' इस्‍लाम के पहले के युग ...

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

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कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर। दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेर...

वो बात उनको बहुत नाग़वार गुज़री है

कितना आसान होता है, दूसरों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट माँगना। उससे भी आसान होता है, तड़ से सर्टिफिकेट दे देना। मुझे भी सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। पहले भी ख़ूब दिए गए। ललकारा गया। पर मुझे किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। इसलिए कि जब सर्टिफिकेट देने वाला किसी खास रंग का चश्‍मा पहने होगा, तो उसे कुछ भी साफ नज़र नहीं आएगा। न ही मैं यहाँ बॉक्सिंग रिंग में हूँ कि धींगामुश्‍ती करूँ। जो चीज हम देखना नहीं चाहते, वह सामने होते हुए भी नहीं दिखती। जैसे कुछ दोस्‍तो को (मैं जानबूझ कर नाम नहीं लेना चाहता) पिछले पोस्‍ट में नहीं दिखा। मैं यही कह सकता हूँ कि उन्‍होंने पोस्‍ट पूरी नहीं पढ़ी। कुछ लोग अगर मेरे पिछले कई पोस्‍ट देख लेते तो शायद,  उनका जो ख़ून जला, न जलता। यही नहीं, यह सब संवाद वाली टिप्पिणियाँ नहीं हैं, विवाद वाली हैं। संवाद वाली टिप्पिणियाँ कैसे की जाती हैं, यह घुघूती बासूती से सीखना चाहिए। ख़ैर। कुछ उदाहरण। पिछली पोस्‍ट की दो लाइन है- 'मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भु...

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है। कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर। एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई न...

यह तैयारी किसके लिए है

यह तैयारी किसके लिए ? किसके खिलाफ ? किसकी हिफाजत के लिए ? क्‍यों और कौन लोग कर रहे हैं ? एक चैनल के जरिए खबर आई कि इंदौर में सरेआम राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के कार्यकर्ता एक पार्क में हवाई फायरिंग कर रहे थे। एक-दो नहीं बल्कि कई। जाहिर है, ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज़ सुनाई दी होगी तो आस-पड़ोस के लोग खुशी से झूम नहीं उठे होंगे। डर ही गए होंगे। तो ये किसे डराया जा रहा है ? यह तैयारी किनके खिलाफ काम आएगी ? इससे पहले भी, उत्‍तर प्रदेश के कई शहरों में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कैम्‍पों में त्रिशूल को ‘ सही ’ पकड़ने और लड़कियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिए जाने की खबर आई थी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि रक्षा मंत्रालय ने सीमा की हिफाजत का जिम्‍मा संघ परिवार को आउटसोर्स कर दिया है। भई आउटसोर्सिंग का जमाना है, कुछ भी मुमकिन है। सीमा की हिफाजत नहीं, तो हो सकता है, शहर और मोहल्‍ले की हिफाजत का जिम्‍मा मिल गया हो। लेकिन सवाल फिर वही, किससे, किसकी हिफाजत ? कौन है भई ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वैसी ही हिफाजत की तैयारी हो, जैसा गुजरात नाम के राज्‍य में कभी हुआ था। गुजरा...

तसलीमा की ताजा कविताएँ-2 (Latest Poems of Taslmia Nasreen-2)

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  (3) नो मेन्स लैंड अपना देश ही अगर तुम्हें न दे देश , तो दुनिया का कौन-सा देश है , जो तुम्हें देगा देश , बोलो। घ ू म-फिरकर सभी देश काफी कुछ ऐसे ही होते हैं , हुक्मरानों के चरित्र भी ऐसे ही। तकलीफ देने पर आयें , तो ऐसे ही देते हैं तकलीफ। इसी तरह उल्लास से चुभोएँगे सूइयाँ तुम्हारी कलाई के सामने , पत्थर-चेहरा लिए बैठे , मन ही मन नाच रहे होंगे। नाम-धाम में भले हो फर्क अँधेरे में भी पहचान लोगे उन्हें , सुनकर चीत्कार , खुसफुस , चलने-फिरने की आहट , तुम समझ जाओगे कौन हैं वे लोग। हवा जिस तरह , उनके लिए , उधर ही दौड़ पड़ने का समय। हवा भी तुम्हे बता देगी , कौन हैं वे लोग। हुक्मरान आखिर तो होते हैं हुक्मरान। चाहे तुम कितनी भी तसल्ली दो अपने को , किसी शासक की जायदाद नहीं- देश। देश होता है आम-जन का , जो देश को प्यार करते हैं , देश होता है उनका। चाहे तुम जितना भी किसी को समझाओ- यह देश तुम्हारा है , इसे तुमने रचा-गढ़ा है , अपने अन्तस में , अपनी मेहनत और सपनों की तूली में आँका है इसका मानचित्र। अगर शासक ही तुम्हे दुरदुराकर खदेड़ दें , कहाँ जाओग...

(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ (1) जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जिसमें एक बंद खिड़की है, जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती,  खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है, चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती। इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़,  लाँघ नहीं सकती चौखट। एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं, जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर, चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ। मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।...