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सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा (Saare Jahan Se Achha Hindostan Hamara)

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'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' के बीच राष्‍ट्रीय गीत या गान का विवाद गाहे ब गाहे चलता रहता है। पिछले दिनों हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया में भी यह विवाद उठा था। मेरे ज़हन में अक्‍सर यह सवाल उठता है कि इस विवाद में 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' का नाम क्‍यों नहीं सुनाई देता। क्‍या कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाता कि यह तराना, कौमी तराना क्‍यों नहीं बना। क्‍या इसमें देशभक्ति की कमी थी। क्‍या इसमें लय ताल छंद कमजोर थे। क्‍या इसमें वह सलाहियत नहीं थी, जो इसके आगे 'राष्‍ट्रीय' गीत या गान लगवा सके। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास इनके जवाब नहीं है। महज जिज्ञासु सवाल हैं। मैं कोई विवाद नहीं पैदा करना चाह रहा  और न ही मेरी बेजा विवादों में दिलचस्‍पी है। न ही इस बात का अब कोई मतलब है। लेकिन यह बात आज क्‍यों फिर जहन में आई। आज सुबह उर्दू राष्‍ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन छपा। इसके मुताबिक दस अगस्‍त यानी आज 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' ...

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।   इन्‍हें भी देखें 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन Technorati Tags: ...

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं। उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है। जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ। उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'। Technorati Tags: मोदी नहीं हूं मैं , उर्दू कहानी , ढाई आखर , मुशर्रफ आलम जौक्‍ी , साहित्‍य , Modi Nahi hoon Main , Urdu storu , Musharraf Alam Zauki , Dhai ...

जनाब फिलिस्‍तीन का संगीत सुनेंगे (Music from Palestine)

फिलिस्‍तीन के संगीत से तो नफरत नहीं है। संगीत हर सीमाओं से परे होता है, ऐसा बड़े-बुजुर्ग कहते हैं। इसलिए हमने सोचा क्‍यों न फिलिस्‍तीन का आधुनिक संगीत ही दोस्‍तो के लिए पेश किया जाए। हमने डायरी के चंद पन्‍ने पेश किए। कविताएँ पेश की- पर कुछ दोस्‍तो को यह पसंद नहीं आया। जाहिर है सबको न तो खुश किया जा सकता है और न ही हम यहाँ सबको खुश करने के लिए आए हैं। शायद इस कला में हम पारंगत भी नहीं हैं। इसलिए हम तो वह बात कहने की कोशिश करते हैं, जो हमें जरूरी लगता है। फिलिस्‍तीन के बारे में हम क्‍यों पोस्‍ट कर रहे हैं, इसको लेकर कई दोस्‍तो में बड़ी बेचैनी है। इस बेचैनी पर बाद में बात करेंगे तब तक यह संगीत सुनें। इस संगीत को तैयार किया है चेकप्‍वाइंट 303 (Checkpopint 303)  नाम के समूह ने। यह फिलिस्‍तीन के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में आवाज के टुकड़ों की संगीतमय प्रस्‍तुति है। इसे किसी बैंड ने तैयार नहीं किया है। मिडिल ईस्‍ट के लोगों की जिंदगी में जो संगीत है, उसमें गोलियों की आवाज, चीख पुकार शामिल हैं। हर रोज इ...