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सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ

सवाल उठाने पर सवाल पृथ्‍वी गोल है। सूरज पूरब से उगता है। गंगा नदी है। हिमालय पर्वत राज है- अगर इन प्राकृतिक सचाइयों को छोड़ दें तो सच वही नहीं होता जो अक्‍सर बताया या दिखाया जाता है। सच के भी कई रूप होते हैं। सच को हम अपने मुताबिक स्‍वीकार या इनकार करते हैं। पिछले कुछ दिनों में सच की ढेर सारी शक्‍लें सामने आ रही हैं। ये शक्‍लें वैसी हैं, जिन्‍हें हम अपने मुताबिक ढालने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्‍ली में विस्‍फोट और कई बेगुनाहों की हत्‍या। विस्‍फोट करने वाले कथित लोगों का बटला हाउस में इनकाउंटर। फिर तफ्तीश का ब्रेकिंग न्‍यूज... मैं मॉस कॉम का विद्यार्थी रहा हूँ। मॉस कॉम सिद्धांत और रिसर्च में मेरी दिलचस्‍पी है। मॉस कॉम का एक मूल और सामान्‍य सा सिद्धांत है जो सच की सचाई को बताती है। इसके मुताबिक सच का चेहरा कलम को पकड़ने वाले हाथ, टाइपराइटर या कम्‍प्‍यूटर पर चलने वाली उंगलियाँ, कैमरे के पीछे लगी आँखें और सबसे बढ़कर 'गेटकीपर' तय करते हैं। ( गेटकीपर यानी खबरें जिन आँखों से गुजरती और खबरों के होने न होने पर जिनका नियंत्रण होता है।) सच वही होता है, जो ये सभी बताते, लिखते, दिखाते...

आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस

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जयपुर में विस्‍फोट के कुछ दिनों बाद ही पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा और दावा किया कि साजिश का पर्दाफाश हो गया है। हर पकड़ा गया शख्‍स मास्‍टरमाइंड था। इन्‍हीं में से थे- राशिद हुसैन। बिहार के रहने वाले। पेशे से इंजीनियर। इन्‍फोसिस में नौकरी। इनकी खता क्‍या थी। यह कभी सिमी से जुड़े थे, जब उस पर पाबंदी नहीं थी। लेकिन जो चीज उन्‍हें शक के दायरे में लाई- वह था सेवा करने का जज्‍बा। विस्‍फोट के बाद, राशिद उन चंद लोगों में शामिल थे, जो घायलों की मदद के लिए पहुँचे थे। पुलिस का दिमाग देखिए, उसे लगा ‘राशिद’ नामधारी व्‍यक्ति सेवा करने कैसे पहुँचा। जरूर दाल में काला है। और राशिद हो गए ‘आतंकी’। किसी तरह छूटे। इससे आगे की कहानी, अपूर्वानन्‍द बता रहे हैं। आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस राशिद हुसैन के स्वर में कड़वाहट नहीं थी. होना स्वाभाविक होता. आख़िर राजस्थान पुलिस ने उसे नौ दिन गैरकानूनी तरीके से बंद कर रखा था और लगातार यह कोशिश की थी कि उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया जाए कि उसके ताल्लुकात ‘सिमी’ ...

मदरसे पर हमला, इमाम की पिटाई

पहले बसपा और अब सपा। श्रावस्ती में एक अंतधार्मिक शादी के बाद हुए हमले और यौन हिंसा में बसपा नेताओं का नाम आया था तो सिद्धार्थ नगर में एक मदरसे पर हमले में सपा नेता का नाम आ रहा है। उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियां अल्पसंख्यकों की कितनी हितैषी हैं, ये घटनाएं एक झलक भर हैं। सिद्घार्थ नगर के अटवा तहसील के मौजा हरिबंधन पुर में कल 7 अगस्त को बन रहे मदरसे तालीमुल कुरान की दीवार और अन्य  हिस्से को गांव के ही दूसरे फिरके के लोगों ने हमला कर तोड़ दिया। मदरसे के कर्ताधर्ता की पिटाई की। बताया जा रहा है कि हमलावरों का नेतृत्व समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष अजय उर्फ झिंकू कर रहा था। गांव की आबादी लगभग 700 है, जिसमें पाँच छह फीसदी अल्पसंख्यक हैं। यह मदरसा 20 साल पुराना है और छप्पर के मकान में चल रहा था। अभी तक किसी विवाद की बात सामने नहीं आयी है और इसकी जमीन भी रजिस्टर्ड है। अभी इसे लोगों के चंदे से पक्का बनाने की कोशिश हो रही थी। अहले सुबह हुए हमले में वहां काम कर रहे मजदूर औरत-मर्द की पिटाई हुई। मदरसे के कर्ताधर्ता 85 साल के मोहम्मद सलीम भी पिटाई के शिकार हुए। गांव में इस तामीर को लेकर पहले ही...

''राष्‍ट्रवादियों'' का देश के ''गद्दारों'' पर हमला।

चश्‍मदीद शबनम हाशमी ने बयान की अहमदाबाद में हमले की दास्‍तान छह जुलाई को गुजरात में संघ परिवार ने फिर हमलावर तेवर दिखाने की कोशिश की और राज्‍य का तंत्र मूक दर्शक बना देखता रहा। यह हमला 'अनहद' द्वारा नौजवानों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ। अनहद ने छह से आठ जुलाई तक अहमदाबाद में अमन, कौमी भाईचारा और इंसाफ के लिए आयोजित राष्‍ट्रीय छात्र महोत्‍सव का आयोजन किया है। इस आयोजन में पूरे देश से चुने गये स्‍कूली बच्‍चों की 60 पेंटिंग, मीडिया के विद्यार्थियों की 80 डिजायन और 45 डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म का प्रदर्शन हो रहा है। सेंट जेवियर सोशल सर्विस सोसायटी के फादर एरविती मेमोरियल हाल में प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रोफेसर शिवजी पण्णिकर को करना था। जबकि सेंट जेवियर हाई स्‍कूल कैम्‍पस के लोयला हॉल के डायमंड जुबली ऑडिटोरियम में स्‍टूडेंट वीडियो डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म महोत्‍सव का उद्घाटन नफीसा अली को करना था। करीब पौने ग्‍यारह बजे जैसे ही प्रोफेसर पण्णिकर जेवियर कैम्‍पस की गेट तक पहुंचे, उनकी कार को एक भीड़ ने घेर लिया। वे पण्णिकर के खिलाफ नारे लगा रहे थे... पण्णिकर वापस जाओ... भारत माता की ...

महाश्वेता देवी की नज़र में विभूति

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बिरले ही ऐसे पुलिस अफसर मिलते हैं, जो वर्दी की जिम्मेदारी के साथ-साथ समाज में हो रही उथल-पुथल का समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी करते हैं। विभूति नारायण राय ऐसे ही पुलिस अफसर हैं। वे वर्दीधारी अफसर हैं। साहित्यकार हैं। जिज्ञासु शोधार्थी भी। मूलत: उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले के रहने वाले विभूति की तालीम बनारस और इलाहाबाद में हुई। 1971 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। 1975 से भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अफसर हैं।कुछ सालों के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में भी रहे। बतौर साहित्यकार उनकी सबसे मशहूर रचना 'शहर में कर्फ्यू' है। भारतीय पुलिस अकादमी की फेलोशिप के तहत साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस पर किया गया उनका रिसर्च काफी चर्चित रहा है।1857 के विद्रोह पर भी उन्होंने नये सिरे से विचार करने की कोशिश की है। ढाई आखर के पाठक विभूति के विचार पहले ही पढ् चुके हैं। विभूति किस शख्सियत के मालिक हैं, प्रख्यात साहित्यकार, समाजसेवी महाश्वेता देवी ने कुछ दिनों पहले हिन्दुस्तान में उनके बारे में अपनी राय जाहिर की है। विभूति, बकौल महाश्वेता देवी- ढाई आखर के पाठ...

इन बुज़ुर्गों से हम क्यों नहीं सीख लेते

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एकता की अनूठी मिसाल हैं मौलाना यामीन और डॉ. हरपाल दोनों काफी बुज़ुर्ग हैं। दोनों के जवान बेटे फिरकापरस्त हिंसा की बलि चढ़ गये। अगर मज़हब के चश्मे से देखें तो एक हिन्दू है, दूसरा मुसलमान। पर ये 'हम' और 'तुम' के मज़हबी खानों में नहीं बँटे। ये एक-दूसरे के दुश्मन भी नहीं बने। न ही इन्हें, हर दूसरा मज़हब वाला दुश्मन नज़र आता है। ये हैं मौलाना मोहम्मद यामीन और डॉ. हरपाल सिंह। मौलाना मोहम्मद यामीन मज़हबी मामलों के जानकार हैं और मेरठ नगर निगम के पार्षद रह चुके हैं। डॉ़. हरपाल राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं। नफरत के साये में रहने के बावजूद ये दोनों हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल हैं। मेरठ के हाशिमपुरा कांड की जद्दोजहद बीस साल से चलते रहने के पीछे भी यही दो बुज़ुर्ग हैं। चारों ओर बढ़ते नफरत के बीच ये लोग प्रेरणा की जीवंत मिसाल हैं। मेरठ। मई १९८७। वही दंगा जिसमें हाशिमपुरा कांड हुआ। एक नौजवान डॉक्टर, जिसने अभी-अभी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की थी, एक मुस्लिम डॉक्टर के बुलावे पर, मुस्लिम मरीज के ऑपरेशन के लिएं बेहोशी की दवा देने घर से निकलता है। दंगा, एक दिन पहले ही शहर में फैल...

मकसद, मुसलमानों को सबक सिखाना था

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मेरठ के हाशिमपुरा नरसंहार को नजदीक से देखने और महसूस करने वालों में आईपीएस अफसर विभूति नारायण राय भी हैं। इस घटना के बीस साल पूरे होने पर मैंने, हिन्दुस्तान के लिए उनसे बात की। बातचीत और उनकी किताब के आधार पर तैयार रिपोर्ट ढाई आखर के पाठकों के लिए- नासिरूद्दीन हाशिमपुरा कांड पर एक पुलिस अफसर का नजरिया 'पुलिस हिरासत में हत्या का हाशिमपुरा कांड जैसा उदाहरण खोजना मुश्किल है। असलीयत में यह नरसंहार मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए अंजाम दिया गया था। अल्पसं ख्यकों के बारे में पुलिस के नजरिये का इससे बेहतर उदाहरण और दिल दहला देने वाली घटना, शायद ही कोई और हो।' सन् 1987 में हुए मेरठ के हाशिमपुरा कांड के बारे में यह ख्यालात आईपीएस अफसर विभूति नारायण राय के हैं। बतौर गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय ने इस घटना को नजदीक से देखा था। यही नहीं, शोधकर्ता के रूप में भारतीय पुलिस पर अपने अध्ययन 'कॉम्बैटिंग कम्युनल कांफिल्कट` में इस घटना का विश्लेषण भी किया है। 22 मई 2007 को जब इस हत्याकांड के 20 साल पूरे हो गये हैं, वीएन राय घटनाक्रम की कड़ियाँ ऐसे जोड़ते हैं, मानो...

हाशिमपुरा याद है!

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हाशिमपुरा याद है! 22 मई 1987 तक मेरठ का यह एक गुमनाम कस्बा था। पर बीस साल पहले कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस कस्बे को देश की सुर्खी बना दिया। दंगे के दौरान इस इलाके से हिरासत में लिये गये करीब 50 मुसलमानों को पीएसी की एक बटालियन उठाकर ले जाती है और रात के अँधेरे में मारकर नहर में फेंक देती है। संयोग से मरा हुआ समझ कर फेंके लोगों में पाँच, गोलियाँ लगने के बावजूद बचने में कामयाब रहे। आजाद हिन्दुस्तान में पुलिस हिरासत में इतनी बडी तादाद में हत्या का कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। नागरिक समाज उस वक्त तो उद्वेलित हुआ था पर पिछले 20 सालों में वह इसे लगभग भूल सा गया। ठीक वैसे ही जैसे असम का नल्ली, बिहार का भागलपुर या महराष्ट्र का मुम्बई भुला दिया गया या फिर अब गुजरात के दंगों को भुलाने की कोशिश हो रही है। जख्म हमेशा हरे रहे, यह अच्छी बात नहीं है। पर जख्म भरने के लिए जरूरी है कि पीड़ितों को इंसाफ मिले। ऊपर गिनाये गये किसी भी नरसंहार में लोगों को आज तक इंसाफ नहीं मिला। हजारों लोगों ने न सिर्फ अपने अजीज खोये बल्कि हजारों परिवार पीढ़ियों के लिए तबाह व बर्बाद हो गये। हाशिमपुरा के लोग पिछले 20 सालों से...