हाशिमपुरा याद है!


हाशिमपुरा याद है! 22 मई 1987 तक मेरठ का यह एक गुमनाम कस्बा था। पर बीस साल पहले कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस कस्बे को देश की सुर्खी बना दिया। दंगे के दौरान इस इलाके से हिरासत में लिये गये करीब 50 मुसलमानों को पीएसी की एक बटालियन उठाकर ले जाती है और रात के अँधेरे में मारकर नहर में फेंक देती है। संयोग से मरा हुआ समझ कर फेंके लोगों में पाँच, गोलियाँ लगने के बावजूद बचने में कामयाब रहे। आजाद हिन्दुस्तान में पुलिस हिरासत में इतनी बडी तादाद में हत्या का कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। नागरिक समाज उस वक्त तो उद्वेलित हुआ था पर पिछले 20 सालों में वह इसे लगभग भूल सा गया। ठीक वैसे ही जैसे असम का नल्ली, बिहार का भागलपुर या महराष्ट्र का मुम्बई भुला दिया गया या फिर अब गुजरात के दंगों को भुलाने की कोशिश हो रही है। जख्म हमेशा हरे रहे, यह अच्छी बात नहीं है। पर जख्म भरने के लिए जरूरी है कि पीड़ितों को इंसाफ मिले। ऊपर गिनाये गये किसी भी नरसंहार में लोगों को आज तक इंसाफ नहीं मिला। हजारों लोगों ने न सिर्फ अपने अजीज खोये बल्कि हजारों परिवार पीढ़ियों के लिए तबाह व बर्बाद हो गये। हाशिमपुरा के लोग पिछले 20 सालों से इंसाफ पाने की जद्दोजहद में लगे हैं। इंसाफ की आस में बीस साल बाद वे लखनऊ भी पहुँचे। क्या है हाशिमपुरा का नरसंहार, अब तक क्या हुआ, पीड़ितों की लड़ाई कहाँ तक पहुँची- पेश है घटनाक्रम।
नासिरूद्दीन
  • सन् 1986 में अयोघ्या में बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोले जाने के बाद पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव की हालत थी। इसी पसेमंजर में मेरठ में अप्रैल 1987 में दंगे भड़के, जो तुरंत ही थम गये लेकिन मई 1987 में दोबारा साम्प्रदायिक हिंसा शुरू हुई और इसने एक बड़े इलाके को काफी दिनों तक अपने घेरे में ले लिया।
  • हिंसा को देखते हुए पीएसी और सेना बुलायी गयी।
  • कर्फ्यू लगा और मुस्लिम इलाकों में तलाशी अभियान शुरू हुई।
  • 22 मई को हाशिमपुरा में जबरदस्त तलाशी अभियान हुई और 650 से ज्यादा मुसलमान मर्दों को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • इनमें से करीब 50-60 मुसलमान मर्दों को ट्रक (यूआरयू 1493) में प्लाटून कमांडर सुरेन्द्र पाल सिंह के नेतृत्व में पीएसी जवान लेकर चले लेकिन जेल की बजाय कहीं और...
  • पुलिस हिरासत में पकड़े ये लोग 13 से 65 साल के बीच के थे। पहले इन्हें गाजियाबाद के मुरादनगर के पास स्थित नहर ले जाया गया। फिर बारी-बारी से उतार कर पीएसी जवानों ने उन्हें गोली मारना शुरू किया और इन्हें नहर में फेंकते चले गये। इसी बीच गोलियों की आवाज सुनकर दूर कहीं गांव वालों ने हल्ला करना शुरू कर दिया तो ये पीएसी जवान ट्रक ले कर वहाँ से भागे। इसके बाद ये हिंडन नहर के पास पहुँचे और बाकी बचे लोगों को मार गिराया और इनके शवों को नहर में बहा दिया।
  • इस नरसंहार में छह लोग किसी तरह जिंदा निकले। जिनमें एक ने अस्पताल के रास्ते में दम तोड़ दिया। बाकी बचे पाँच लोग आज इस पूरे मामले के चश्मदीद हैं। कितने लोग मरे, ये आज तक पता नहीं चल पाया क्योंकि कई लोग अब भी लापता हैं। हालांकि सीआईडी की रिपोर्ट 43 लोगों के मरने की बात कहती है। दो लोग स्थाई रूप से विकलांग हो चुके हैं।
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने 1988 में सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिये। छह साल बाद फरवरी 1994 में सीबीसीआईडी ने अपनी रिपोर्ट दी। ऐसा कहा जाता है कि सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में 66 लोगों को इस घटना के लिए जिम्मेदार माना है। हालाँकि जांच रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गयी है।
  • सीबीसीआईडी की रिपोर्ट आने के दो साल तक सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। फिर 20 मई 1996 को गाज़ियाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में केवल 19 पीएसी कर्मियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किये गये। राज्य सरकार ने केवल 19 के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आदेश दिया न कि सभी पीएसी कर्मियों के खिलाफ जिन्हे सीआईडी रिपोर्ट में दोषी माना गया था।
  • सन् 1997 से 2000 के बीच गाज़ियाबाद अदालत के समक्ष कोई भी अभियुक्त पेश नहीं हुआ। यह सभी 19 अभियुक्त राज्य की सक्रिय सेवा में लगे रहे। इनके खिलाफ छह जमानती और 17 गैरजमानती वारंट भी जारी हुए लेकिन ये अदालत में पेश नहीं हुये। नतीजतन, मुकदमा ही नहीं शुरू हो सका।
  • मई 2000 में मीडिया द्वारा केस में जानबूझ कर की जा रही हिलाहवाली की खबरें छापे जाने के बाद 19 अभियुक्तों में से 16 ने गाज़ियाबाद अदालत में समर्पण किया।
  • जून से जुलाई 2000 के बीच गाज़ियाबाद कोर्ट ने अभियुक्तों को जमानत दे दी।
  • सितम्बर 2000 में हाशिमपुरा के पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई उत्तर प्रदेश से दिल्ली में करने का आदेश दिया। यहां ध्यान देने वाली बात है कि बेस्ट बेकरी से कई साल पहले मुकदमे की सुनवाई मूल राज्य से बाहर किये जाने का आदेश हाशिमपुरा कांड में सुप्रीम कोर्ट दे चुकी थी।
  • 2002 में दिल्ली में मुकदमा दिल्ली पहुँचा। हाशिमपुरा के पीड़ित परिवारों ने वृन्दा ग्रोवर और रेबेका जॉन को अपना वकील बनाया।
  • लेकिन सन् 2004 तक मुकदमे की कार्यवाही इसलिये नहीं शुरू हो पा रही थी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार प्रशिक्षित और योग्य सरकारी वकील नहीं नियुक्त कर रही थी।
  • मार्च 2004 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एएस कुलश्रेष्ठ को विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) नियुक्त किया।
  • अक्टूबर 2004 में पीड़ितों के वकील ने एसपीपी की नियुक्ति और योग्यता को चुनौती दी। एसएस कुलश्रेष्ठ ने एसपीपी के रूप में अपना नाम वापस लिया।
  • नवम्बर 2004 में सुरेन्द्र अदलाखा एसपीपी नियुक्त किये गये।
हत्याकाण्ड के 19 साल बाद
  • मई 2006 में एएसजे दिल्ली श्री एनपी कौशिक की अदालत ने सभी अभियुक्त पीएसी कर्मियों के खिलाफ हत्या, हत्या की साज़िश, हत्या की कोशिश, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ समेत कई मामलों में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/120बी/307/201/149/364/148/147 के तहत आरोप निर्धारित किये।
  • 15 जुलाई 2006 को तारीख के बावजूद घटना के चश्मदीद जुल्फिकार नासिर की गवाही नहीं हो सकी।
  • 31 जुलाई 2006 को एसपीपी एस. अदलाखा सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हो पाये। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर पाँच हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
  • अगस्त से चार सितम्बर 2006 तक हत्याकाण्ड के चश्मदीद गवाह जुल्फिकार नासिर का बयान रिकार्ड किया गया।
  • सितम्बर से सात नवम्बर 2006 तक दूसरे चश्मदीद मोहम्मद नईम का बयान रिकार्ड किया गया।
  • 15 जनवरी 2007 को उत्तर प्रदेश सरकार ने हत्याकाण्ड में मारे गये 43 लोगों के परिजनों के लिए चार लाख 60 हजार रुपये मुआवजा देने की घोषणा की।
  • चूंकि मामले में 164 लोगों गवाहियॉं होनी है और तब तक केवल दो लोगों के बयान दर्ज हो पाये थे। इस आधार पर मुकदमे की सुनवाई कर रही अदालत ने पाँच फरवरी 2007 को आठ फरवरी के बाद प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई का आदेश दिया।
  • आठ से 22 फरवरी 2007 तक तीसरे गवाह उस्मान का बयान दर्ज किया गया। वो इस हत्याकांण्ड में जान बचाने में कामयाब तो रहे लेकिन उन्हें अपना एक पैर हमेशा के लिए खो देना पड़ा है। उनके पैर में गोली लगी थी।
  • आठ मार्च 2007 को चौथे गवाह मुजिबुर्रहमान के बयान दर्ज होने शुरू हो गये।
  • अप्रैल 2007 को मुकदमा एएसजे रमेश कुमार की अदालत में स्थानांतरित किया गया।
  • 31 जुलाई 2007 को चौथे गवाह मुजिबुर्रहमान की गवाही की अगली तारीख है।
  • एक ओर जहां पीएसी वालों पर सामूहिक नरसंहार के लिए मुकदमा चल रहा है, दूसरी ओर वो सेवा में बने रहे। तीन अभियुक्त पुलिस वालों की मुकदमा शुरू होने से पहले ही मौत हो गयी। दो लोग सेवानिवत्त हो चुके हैं और अब पेंशन का लाभ उठा रहे हैं। एक अभियुक्त ने पीएसी से इस्तीफा दे दिया था।
  • पीड़ित परिवार वालों के इंसाफ की जद्दोजहद अब भी चल रही है।


  • 24 मई 2007: नरसंहार के 20 साल बाद सूचना के अधिकार के तहत कई जानकारी लेने पीड़ित परिवार लखनऊ पहुँचे।

Comments

सच कहा आपने नासिर.. नहीं याद है.. किसी को याद नहीं.. लोग भूल गये हैं.. हम एक निहायत स्वार्थी स्माज में जी रहे हैं.. अपने भर से मत्लब है हमे.. अगर मैं भूल सकता हूँ तो भूल जाऊँगा.. बस जिनके परिवार के लोग मरे बस वही नहीं भूले.. ऐसे हादसे फिर क्या नहीं हो जायेंगे इस दहशत में जीते मुसलमान नहीं भूले.. वो सिख भाई तक भूल गये होंगे.. जिन्हे ८४ का इन्साफ़ नहीं मिला.. ये उनका मामला जो नहीं था.. और हमारे जैसे हिन्दू तो भूल ही चुके हैं.. हमें इस तरह की हिंसा का कोई डर नहीं.. तो हम सहजता से भूल जाते हैं..
अच्छा किया नासिर आप्ने जो याद दिलाया.. घुघूती जी की बात को भी रखा.. ऐसी हिंसा सिर्फ़ गुजरात में ही नहीं होती.. और पहली बार भी नहीं हुई.. साम्प्रदायिक हिंसा में राज्य की भूमिका और फिर दोषियों को छिपाने बचाने का एक पूरा इतिहास है.. इसलिये इस पूरे मामले को गुजरात के दायरे से निकाल कर इसके विस्तृत अर्थों में समझने की ज़रूरत है..भागलपुर की भी याद दिलायें.. उसे भी भूल गया हूँ मैं.. क्या हुआ था वहाँ?
नासिर साहब, हाशिमपुरा की ये घटना निन्दनीय है और इन पुलिसिया हत्यारों के साथ हत्यारों जैसा ही सलूक होना चाहिये.
आपके लेख ने मुझे उद्वेलित कर दिया है.
Farid Khan said…
देर से इंसाफ़ होना भी एक तरह की नाइंसाफ़ी है...पहले मुझे अदालतों पर भरोसा था लेकिन भारत की अदालतें अब अपना भरोसा खो रहीं हैं...

घटिया घटिया हिन्दी फ़िल्में भी अदालतों का मज़ाक उडा़ चुकी हैं...

राजनीति में विकल्प के अभाव के कारण भी लोग अक्सर ऐसी बातें भूल जाते हैं.
Vinit said…
shocking! seeking justice takes so much courage and perseverance. thanks for posting, Nasiruddin.
--- Vinit