संदेश

साम्प्रदायिकता लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तीस साल बाद स्याह यादें

(अभी सन 84 के दंगों को लेकर काफी हंगामा बरपा था। जिस पार्टी को जो आसान और सुविधाजनक लगा, उसने 84 के दंगा और पीडि़तों का अपने तरीके से इस्तेमाल किया। लेकिन इस मुल्क ने सत्तर और अस्सी के दशक में कुछ और भयानक दंगे देखे हैं, उन्‍हें कोई याद नहीं रखना चाहता। उसके लिए कोई हो हल्ला भी नहीं मचता। ऐसा ही एक दंगा था, जमशेदपुर का। मैंने भी दंगा पीडि़तों को पहली बार इसी दंगे के जरिए जाना था। समाचार वेबसाइट टूसर्किल्स डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा उस वक्त पाँच साल के थे और दंगे में बाल-बाल बच गए थे। उस दंगे के तीस साल बाद यह बच्‍चा अपने बचपन के उन काली स्‍याह यादों को ताजा कर रहा है। इसलिए नहीं कि आप सियापा करें। इसलिए कि ऐसी यादें कितनी खौफनाक होती हैं और उनका असर ताउम्र होता है। तो क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी ऐसी ही खौफनाक यादें देकर जाना चाहते हैं। यह टिप्‍पणी मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे हिन्दी में सिटिजन न्यूज सर्विस ने तैयार किया है। मैंने उस हिन्दी अनुवाद में थोड़ा संशोधन, थोड़ा सम्पादन किया है।- नासिरूद्दीन ) 1979 के जमशेदपुर के दंगों की याद काशिफ-उल-हुदा 1979 क...

आप कैसा इस्‍लाम या मुसलमान देखना चाहते हैं

प्रभात जी, मैं जानता हूँ आपने उकसाने के लिए ये टिप्‍पणी नहीं कर रहे। लेकिन जिस माहौल में हम रह रहे हैं, वहाँ आपका सवाल और फरीद का जवाब, ये बता रहा है कि हमारे समाज में कहीं कोई कड़ी टूट गयी या गायब हो गई है। हम अपने ही समाज को, वहाँ रहने वाले जीते-जागते इंसानों के बारे में कितना कम जानते हैं। आज कोई हिन्‍दू रोजा रखता है या कोई मुसलमान छठ का व्रत, तो यह हमारे लिए खबर होती है। लेकिन मुझे कभी ताज्‍जुब नहीं हुआ क्‍योंकि मैं ऐसे ही समाज से निकला हूँ। मुझे ताज्‍जुब तब होता है, जब ऐसा नहीं होता। रही बात आपके सवालों की, तो आपने देखा होगा, मैं उकसाने वाले ब्‍लॉगजगत के विद्वानों की बात का जवाब न देना ही पसंद करता हूँ। लेकिन आप उनमें से कतई नहीं हैं। मैं आपके सवालों पर तैयारी के साथ पोस्‍ट लिखना चाह रहा था। पर अब बात शुरू हुई है तो कुछ कह रहा हूँ। इतिहास की मुझे बहुत जानकारी नहीं है। लेकिन जहाँ तक मुझे मालूम है, औरंगजेब को छोड़ आप किसी मुगल बादशाह को तथाकथित कट्टर की श्रेणी में नहीं रख पाएँगे। यहाँ तक कि औरंगजेब ने आपके पड़ोस चित्रकूट में श्री राम वनवास के प्रतीकों की हिफाजत कराई है। खैर। बाबर...

आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस

चित्र
जयपुर में विस्‍फोट के कुछ दिनों बाद ही पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा और दावा किया कि साजिश का पर्दाफाश हो गया है। हर पकड़ा गया शख्‍स मास्‍टरमाइंड था। इन्‍हीं में से थे- राशिद हुसैन। बिहार के रहने वाले। पेशे से इंजीनियर। इन्‍फोसिस में नौकरी। इनकी खता क्‍या थी। यह कभी सिमी से जुड़े थे, जब उस पर पाबंदी नहीं थी। लेकिन जो चीज उन्‍हें शक के दायरे में लाई- वह था सेवा करने का जज्‍बा। विस्‍फोट के बाद, राशिद उन चंद लोगों में शामिल थे, जो घायलों की मदद के लिए पहुँचे थे। पुलिस का दिमाग देखिए, उसे लगा ‘राशिद’ नामधारी व्‍यक्ति सेवा करने कैसे पहुँचा। जरूर दाल में काला है। और राशिद हो गए ‘आतंकी’। किसी तरह छूटे। इससे आगे की कहानी, अपूर्वानन्‍द बता रहे हैं। आतंक, राशिद और इन्‍फोसिस राशिद हुसैन के स्वर में कड़वाहट नहीं थी. होना स्वाभाविक होता. आख़िर राजस्थान पुलिस ने उसे नौ दिन गैरकानूनी तरीके से बंद कर रखा था और लगातार यह कोशिश की थी कि उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया जाए कि उसके ताल्लुकात ‘सिमी’ ...

दोस्‍त, साँस की डोर क़ायम है

हम ढेर सारे मिथकों और भ्रां‍तियों पर यक़ीन करते हैं और उसी में जीते हैं। समाज के बारे में, समुदायों और जातियों के बारे में... हम उसे सच की कसौटी पर कसना भी नहीं चाहते। वही भ्रांति और मिथक समुदायों और जातियों के बीच दूरी की वजह भी बनता है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट '... तो टीवी देखना इस्‍लाम के खिलाफ़ है ' पर पाठक साथी ab inconvenienti ने  एक टिप्‍पणी दर्ज की। टिप्‍पणी भ्रांतियों और मिथकों के तह में लिपटे मुसलमानों के बारे में है। ab inconvenienti कहते हैं, ' यही बात आप किसी मुस्लिम आबादी के सामने कह कर देखें, मौलवी-मौलानाओं के सामने... देखते हैं फ़िर कितनी देर आप अपनी साँसों की डोर को कायम रख पाते हैं?' यह चेतावनी है... धमकी है या फिर चुनौती या दोस्‍ताना सलाह...  जो भी हो... मैं अक्‍सर सुनता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह दोस्‍त किस आबादी में जाने को कह रहे हैं और कहाँ इन्‍होंने ऐसी हालत देखी जहाँ, साँस की डोर काटने वाले तो हैं पर जिंदगी बचाने वाले नहीं। मेरा तजुर्बा जुदा है। मेरी साँस की डोर पर जान लड़ा देने वाले ढ...

वो बात उनको बहुत नाग़वार गुज़री है

कितना आसान होता है, दूसरों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट माँगना। उससे भी आसान होता है, तड़ से सर्टिफिकेट दे देना। मुझे भी सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। पहले भी ख़ूब दिए गए। ललकारा गया। पर मुझे किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। इसलिए कि जब सर्टिफिकेट देने वाला किसी खास रंग का चश्‍मा पहने होगा, तो उसे कुछ भी साफ नज़र नहीं आएगा। न ही मैं यहाँ बॉक्सिंग रिंग में हूँ कि धींगामुश्‍ती करूँ। जो चीज हम देखना नहीं चाहते, वह सामने होते हुए भी नहीं दिखती। जैसे कुछ दोस्‍तो को (मैं जानबूझ कर नाम नहीं लेना चाहता) पिछले पोस्‍ट में नहीं दिखा। मैं यही कह सकता हूँ कि उन्‍होंने पोस्‍ट पूरी नहीं पढ़ी। कुछ लोग अगर मेरे पिछले कई पोस्‍ट देख लेते तो शायद,  उनका जो ख़ून जला, न जलता। यही नहीं, यह सब संवाद वाली टिप्पिणियाँ नहीं हैं, विवाद वाली हैं। संवाद वाली टिप्पिणियाँ कैसे की जाती हैं, यह घुघूती बासूती से सीखना चाहिए। ख़ैर। कुछ उदाहरण। पिछली पोस्‍ट की दो लाइन है- 'मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भु...

सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है। कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर। एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई न...

तो यह तैयारी की झलक है

तो यह तैयारी ऐसे ही वक्‍त के लिए थी। यह बात बृहस्‍पतिवार को समझ में आई। चकाचक क्रिज वाला भगवा शर्ट पहने... कान में मोबाइल की आवाज पकड़ने वाला मशीन लगाए...हाथों में चमकता त्रिशूल लहराते नौजवान..गदा उठाए... जी हाँ... ये हैं ‘तेजस्‍वी’ और ‘वीर बालक’। यह छवि उसी इंदौर की है, जहाँ ‘सांस्‍कृतिक’ काम करने वाले एक संगठन के लोग पिछले दिनों खुलेआम बंदूक से गोलियाँ दाग रहे थे। क्‍यों। क्‍यों क्‍या...प्रैक्टिस कर रहे थे... ये लोग भी इन्‍हीं के भाई बंधु हैं, ऐसा कहा जाता है। यह सड़क पर उतरें और भू-डोल न हो, तो इनका उतरना बेमानी। इनका कमाल देखिए, रथ पर चलते हैं, पीछे-पीछे अपने-आप भू-डोल होता जाता है। बृहस्‍पतिवार को देश बंद कराने चले, तो हो गया भू-डोल। और फिर बंदूक चलाना और त्रिशूल लहराना, सीखने का फायदा क्‍या, जब उसका इस्‍तेमाल ही न हो। तो हो गया इस्‍तेमाल। लग गया इंदौर के कई इलाकों में कर्फ्यू। राष्‍ट्रीय अस्मिता का सवाल है जनाब, थोड़ा बर्दाश्‍त तो करना पड़ेगा। न ही करेंगे तो ...

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं। उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है। जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ। उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'। Technorati Tags: मोदी नहीं हूं मैं , उर्दू कहानी , ढाई आखर , मुशर्रफ आलम जौक्‍ी , साहित्‍य , Modi Nahi hoon Main , Urdu storu , Musharraf Alam Zauki , Dhai ...

बिलकिस को शुक्रिया (Thanks to Bilkis)

अपूर्वानन्‍द * गणतंत्र दिवस की सुबह धूप खिल आई है. मैं उनकी सूची देख रहा हूँ जिनको राज्य ने इस मौके पर अपना धन्यवाद  देने के लिए अलग अलग उपाधियों  से विभूषित किया है. अजीब सी इच्छा थी इस बार कि एक नाम होता इस सूची  में कहीं तो शायद यह गणतंत्र बता पाता कि वह उनकी कद्र करता है जो उसे वैसा  बनाए  रखने के लिए अपने आप की बाजी लगा देते हैं जिसकी कल्पना आज से साठ साल पहले उसने की थी. यह मालूम है हम सबको  कि यह एक व्यर्थ  इच्छा है एक मामूली सी हिन्दुस्तानी शहरी बिलकीस बानो का नाम उनके बीच तलाश करने की जिन्हें यह गणतंत्र मानता है कि उन्होंने उसे प्राणवंत   बनाए  रखा है. बिलकीस आज  कहाँ होगी, यह ख़बर हमें नहीं. क्या वह उस गुजरात को लौट गई जिसे वह अभी भी अपना वतन मानती है लेकिन जहाँ   पिछले छः साल तक वह नहीं रह सकी थी ? उस  गुजरात को जिसकी पुलिस ने यह रिपोर्ट दाखिल की कि  उसे इसके पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके जिससे वह बिलकीस की वह बात  कानूनी तौर पर कबूल करने  लायक मान सके कि २८ फरवरी , २००२ से गुजरात म...

कुछ कहना चाहती है बिलकीस (Bilkis has something to say)

चित्र
इंसाफ के लिए जद्दोजहद का नया चेहरा है बिलकीस बानो (Bilkis Bano)। सन् 2002 में हुए जनसंहार के दौरान बिलकीस बानो और उनकी महिला परिवारीजनों के साथ सामूहिक दुराचार हुआ और फिर उनकी हत्‍या कर दी गई। इस घटना में बिलकीस किसी तरह बच गई। उसने इंसाफ के लिए जद्दोजहद किया और कामयाब हुई। (खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसके बाद बिलकीस ने कुछ कहने का मन बनाय। तो पढि़ए बिलकीस की संघर्ष गाथा, बिलकीस की जुबानी- मैं सच साबित हुई आज मैं सच साबित हुई हूँ. मेरे सच की सुनवाई कर ली गई है.मुम्बई की एक अदालत में बीस रोज़ तक मुझसे जिरह की जाती रही लेकिन मेरे सच की ताकत ने मुझे सहारा दिए रखा. शुक्रवार १८ जनवरी , २००८ को मुम्बई के सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया उसने उस लम्बे और दर्दनाक सफर को किसी हद तक एक मंजिल तक पहुँचाया है  जिस पर मुझे और मेरे परिवारवालों को चलने पर मजबूर कर दिया गया था. यह भी सच है कि कई घाव कभी भी नहीं भरेंगे लेकिन आज मैं पहले के मुताबिक कहीं अधिक ताकत महसूस कर रही हूँ और इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ. इस जीत का बड़ा हिस्सा उन दोस्तों और साथियों का है जो इस दौरान मेरे साथ...

तसलीमा के हक में (In favour of Taslima Nasreen)

चित्र
बनाम आमतौर पर जब भी किसी समुदाय या समूह का कट्टरपंथी या पुरातनपंथी तबका कोई असंवैधानिक और अमानवीय बात कहता है तो उनका शोर सबसे ज्‍यादा सुनाई देता है। यही नहीं इन्‍हीं की आवाज को पूरे समुदाय की आवाज भी मान ली जाती है। हालाँकि जब उसी समुदाय या समूह का संवेदनशील और उदारवादी तबका कोई बात कहता है तो उसे आमतौर पर नजरंदाज करने की कोशिश होती है। इसी तरह जब बांग्‍लादेशी साहित्‍यकार तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथी ताकतों ने आवाज बुलंद की तो सब ने सुनी। मीडिया ने भी उनको तवज्‍जो दी। चैनलों के ब्रेंकिंग न्‍यूज बनी। लेकिन जिन लोगों ने तसलीमा के हक में आवाज उठायी, वह कहीं नहीं दिखे। सिर्फ इस बार नहीं पिछले दिनों भी यही हुआ था। तसलीमा नसरीन के खिलाफ ताजा मुहिम के बाद पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवी अब उनके पक्ष में खुलकर सामने आ गए हैं। एक खबर के मुताबिक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने पिछले दिनों कोलकाता प्रेस क्लब में एक सभा कर तसलीमा को वापस कोलकाता आने देने की माँग की। वे रैली भी करेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गियासुद्दीन का कहना है 'तसलीमा नसरीन को जिस तरह पिछले 52 दिनों से एक अज्ञात स्थान में ...

कौन हैं 'गुजराती' ? (kaun Hain Gujarati?)

चित्र
गुजराती कौन हैं? आप पूछेंगे, यह कौन सा सवाल है? गुजराती, यानी जो गुजरात में रहता है। मुझे भी यही लगता रहा कि यह सवाल नहीं हो सकता। पर हाल के दिनों में जब भी नरेन्‍द्र मोदी या अजगर की जबान उधार लें तो 'नमो' यह कहते, 'मैं तो पांच करोड़ गुजराती की बात करता हूं। पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता की बात करता हूं।'  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगता।  मुझे लगता कि मोदी का दिल बदला तो कैसे?  यह अपने सारे लोगों की बात करने लगा। यह भी सोचता कि हर बात पर शक करना ठीक नहीं। फिर यही सोचा चलो कम से कम मुख्‍यमंत्री मोदी ऑन रिकार्ड 'सिर्फ गुजरातियों' की बात करते हैं। यानी गुजरात में रहने वाले सभी लोगों की बात। लेकिन जनाब, यकीन जानिये, यह मेरा भ्रम था। जजेज बंगलो रोड से मैं साबरमती आश्रम जाने के लिए निकला। एक ऑटो किया और चल दिया। पता चला कि कम से 25-30 मिनट तो लगेंगे ही। मैंने आदतन ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कौन हैं? क‍हां से आए? मोदी जी की क्‍या हालत है? चुनाव में क्‍या होगा? उसने कहा, 'मैं तो गुजराती हूं।' मैंने कहां,  'हां, वह आपकी बोली से लग रहा है।' फिर उसने अप...

बंधु बुद्धदेव और भाई नरेन्द्र

चित्र
अंतर बताओ तो जानें ! सत्या सागर ने‍ कोशिश की है, आप भी कुछ कोशिश करें। तलाशें करें कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बंधु बुद्धदेव भट्टाचार्य और गुजरात के मुख्‍यमंत्री भाई नरेन्‍द्र मोदी कितने पास, कितने दूर हैं। पार्टी के वफादार कारकुन पार्टी के वफादार कारकुन रहन सहन का तरीका आम रहन सहन का तरीका आम नन्‍दीग्राम में नरसंहार के लिए कुख्‍यात नरोदा पाटिया में नरसंहार के लिए कुख्‍यात कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते कैडर-पुलिस-माफिया की मदद से राज्य की शासन व्‍यवस्‍था चलाते भारतीय पूंजीपति के दुलारे भारतीय पूंजीपति के दुलारे वैश्विक पूंजीपति के दुलारे वैश्विक पूंजीपति के दुलारे 'सेज' के चैम्पियन 'सेज' के चैम्पियन लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते लोकतंत्र में यकीन नहीं रखते इनके पार्टी कार्यकर्ता 'शत्र...

क्या रवीश पैसे के लिए सेक्यूलर हैं

बड़ा आसान होता है किसी की ईमानदारी और विचार पर सवाल खड़े करना। अपने विचार को ‍ सर्वश्रेष्ठ मानना भी बड़ा आसान होता है और सबसे आसान होता है कि किसी की धर्मनिरपेक्षता पर ताने कसना। इस तरह के विचार छिपाते-छिपाते काफी कुछ कह जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माहिर सहाफी रवीश कुमार ने काफी पहले (22 अगस्‍त 2007) 'चक दे इंडिया' पर एक टिप्‍पणी लिखी थी। वह टिप्‍पणी ढाई आखर ने पोस्‍ट की। जनाब अतुल जी ने कल चार नवम्‍बर को उस पोस्‍ट पर अपनी राय जाहिर की। उस टिप्‍पणी में उन्‍होंने रवीश कुमार पर ही कुछ सवाल उठा दिए। चूँकि पोस्‍ट को काफी दिन हो चुके हैं, इसलिए अतुल जी की राय और रवीश के जवाब को हम यहां अलग पोस्‍ट की तरह पेश कर रहे हैं। जनाब अतुल जी ने लिखा है- ' विवाद कि जगह संवाद करने का र‍िक्‍वेस्ट बिल्कुल बढि़या है और कोशिश कि जायेगी। कबीर खान को लेकर फिल्म बनाना आसान है क्योंकि आजकल काफी फ़ैशनेबल सा हो गया है सेक्‍यूलर दिखना इन्क्लुडिंग रवीश जी. क्योंकि उसमें काफी नाम भी, पैसा भी है और सेफ्टी भी है. मगर हिम्मत तो हम तब माने जब रवीश अपने डेनमार्क के पत्रकार भाई जिन पे अटैक होता ह...

हमारे राम

(दोस्तो, तकनीकी कारणों से इसे दोबारा पोस्ट करना पड़ा। तकलीफ के लिए माफी।) राम के नाम पर एक बार फिर तनातनी ज़ारी है। हिन्‍दुत्‍ववादी अपने-अपने खोल से निकल आये हैं। हिन्‍दुत्‍ववादियों और हिन्‍दू मज़हब मानने वालों में फ़र्क़ है। हिन्‍दुत्‍व, एक राजनीतिक विचार है, जो दूसरे मज़हब वालों के साथ नफरत की बुनियाद पर टिका है। ठीक उसी तरह, जिस तरह तालीबानी एक राजनीतिक विचार है, और मज़हब उस विचार को फैलाने का महज़ एक सहारा। जिस तरह तालीबानी ही इस्‍लाम की नुमाइंदगी नहीं करते, उसी तरह हिन्‍दुत्‍ववादी, इस मुल्‍क के हिन्‍दू दर्शन के नुमांइदे नहीं हैं। महात्‍मा गांधी की तरह जो हिन्‍दू धर्म पर यकीन रखते हैं, उनके आचार-व्‍यवहार में नफ़रत की कोई जगह नहीं है। उनके लिए राम आराध्‍य हैं। नैतिकता के प्रतिमान। मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं। उनके लिए राम, सत्‍ता के गलियारों में पहुंचने का साध्‍य नहीं। न ही राम का नाम, उनके लिए नफ़रत की फ़सल बोने और काटने का ज़रिया है। हिन्‍दुस्‍तान में राम कथा, पर एकाधिकार भी किसी एक मज़हब का नहीं है। इस हिन्‍दुस्‍तान में खास तौर से उत्‍तर भारत में ऐसा शख्‍स मिलना मुश्किल है, जिस...

अपनी तकलीफ़ पर सवाल करें...

कई बार आप सवाल इसलिए करते हैं कि आप खुद से जद्दोजहद कर रहे होते हैं। मैंने भी 'मुल्क और मुसलमानों से जुड़े चंद सवाल' में मन को कुरेदते चंद सवाल आपके सामने रखे थे। इस सवाल पर ढाई आखर के पाठक दोस्तों में से कई ने अपनी राय जाहिर की है। कइयों की राय सवाल से जूझने और उसके जवाब तलाशने में मदद करती है तो कई दोस्त सवाल के जवाब में सवाल दागते रहे। कई ने इस विमर्श को मेरा और तेरा में बदलने की भी कोशिश की। बिना किसी भेदभाव के वे सभी टिप्पणियां आपके सामने पेश हैं- a vinash said... ठीक ऐसा ही सवाल मेरे मन में भी आता है... और आपकी बातों से मेरे निष्‍कर्ष और मेरी समझ को सहायता मिली है। ... यानी ये समय इस तरह की चिंताओं के साझा करने का भी है- कि हम दरअसल कैसे मुल्‍क में जी रहे हैं ? हम जिन राष्‍ट्रगीतों में अपने लिए देशभक्ति का पैमाना बचपन से खोजते रहे हैं- क्‍या होश आने पर उनका मानी बिगड़ जाता है ? हमने कैसी सुरक्षा एजेंसियां , कैसा प्रधानमंत्री , कैसी सेना बनायी है , जो मुल्‍क को एक खास कौम की निगाह से पारिभाषित करते हैं ? धमाका-विस्‍फोट या ऐसे किसी भी किस्‍म की दुर्घटनाएं मुल्‍क की...