तसलीमा के हक में (In favour of Taslima Nasreen)

बनाम
आमतौर पर जब भी किसी समुदाय या समूह का कट्टरपंथी या पुरातनपंथी तबका कोई असंवैधानिक और अमानवीय बात कहता है तो उनका शोर सबसे ज्‍यादा सुनाई देता है। यही नहीं इन्‍हीं की आवाज को पूरे समुदाय की आवाज भी मान ली जाती है। हालाँकि जब उसी समुदाय या समूह का संवेदनशील और उदारवादी तबका कोई बात कहता है तो उसे आमतौर पर नजरंदाज करने की कोशिश होती है।
इसी तरह जब बांग्‍लादेशी साहित्‍यकार तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथी ताकतों ने आवाज बुलंद की तो सब ने सुनी। मीडिया ने भी उनको तवज्‍जो दी। चैनलों के ब्रेंकिंग न्‍यूज बनी। लेकिन जिन लोगों ने तसलीमा के हक में आवाज उठायी, वह कहीं नहीं दिखे। सिर्फ इस बार नहीं पिछले दिनों भी यही हुआ था।
तसलीमा नसरीन के खिलाफ ताजा मुहिम के बाद पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बुद्धिजीवी अब उनके पक्ष में खुलकर सामने आ गए हैं। एक खबर के मुताबिक मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने पिछले दिनों कोलकाता प्रेस क्लब में एक सभा कर तसलीमा को वापस कोलकाता आने देने की माँग की। वे रैली भी करेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गियासुद्दीन का कहना है 'तसलीमा नसरीन को जिस तरह पिछले 52 दिनों से एक अज्ञात स्थान में नजरबंद रखा गया है, वह अमानवीय है। ऐसा कर पश्चिम बंगाल सरकार की तरह केन्‍द्र सरकार ने भी मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है।' उनके मुताबिक फतवा देनेवाला धार्मिक नहीं होता, बल्कि कट्टरपंथी होता है।
इनकी ही तरह वरिष्ठ लेखक डॉ. शेख मुजफ्फर हुसैन, डॉ. गुलाम याजमानी, डॉ. मोहब्बत हुसैन, डॉ. सफीउल्लाह और इनामुल कबीर ने भी तसलीमा को बंगाल से बाहर किए जाने की आलोचना की। मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एक प्रस्ताव के ज़रिये कई माँगें भी रखीं।
इनकी माँगें हैं-
1. तसलीमा को नजरबंदी से मुक्त किया जाए।
2. तसलीमा को स्वाभाविक जीवन जीने दिया जाए।
3. तसलीमा को तुरंत कोलकाता आने दिया जाए।
4. तसलीमा की हिफाजत के इंतजाम किए जाएँ।
5. कोलकाता पुस्तक मेले में तसलीमा के प्रवेश को सुनिश्चित किया जाए।
6. कोलकाता पुस्तक मेले में तसलीमा की किताबें बेचने में बाधा न पड़ने दी जाए।
7. जिन्होंने तसलीमा के विरुद्ध फतवे जारी किए हैं, उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।

मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ सभा में प्रख्‍यात साहित्‍यकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता महाश्वेता देवी भी मौजूद थीं। महाश्‍वेता ने भी मुस्लिम बुद्धिजीवियों के प्रस्ताव का जोरदार समर्थन करते हुए सभी भारतीय भाषाओं के लेखकों से तसलीमा के पक्ष में लामबंद होने की अपील की।
मुसलमानों के अंदर से निकली इस उदारवादी आवाज को किस ने सुना? क्‍या हम सिर्फ पागलपन को ही किसी समुदाय या समूह या धर्म की वास्‍तविक आवाज के रूप में सुनना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में ही इस मुल्‍क के मु‍स्‍तकबिल की तस्‍वीर छिपी है।

खबर के मुताबिक, इस सभा में तसलीमा विरोधी आंदोलन के अगुओं में एक इदरीस अली भी मौजूद थे। उन्होंने वहॉं गड़बड़ी फैलाने की भी कोशिश की पर कामयाब नहीं हो पाए।
मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक और संगठन ‘धर्ममुक्त मानववादी मंच’ ने भी तसलीमा के हक में आवाज उठाते हुए, उनको तुरंत कोलकाता लौटने की इजाजत देने की माँग की। मंच के बयान में कहा गया है कि यह कहना सरासर गलत है कि सभी मुसलमान तसलीमा के विरुद्ध हैं और वे उन्हें निर्वासित करना चाहते हैं। कोलकाता में भी जिन लोगों ने तसलीमा विरोधी बवंडर मचाया, वे संख्या में गिने चुने थे। अभी भी अधिकतर मुसलमान तसलीमा की लेखकीय आजादी का समर्थन करते हैं।
मुसलमानों के अंदर से निकली इस उदारवादी आवाज को किस ने सुना? क्‍या हम सिर्फ पागलपन को ही किसी समुदाय या समूह या धर्म की वास्‍तविक आवाज के रूप में सुनना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में ही इस मुल्‍क के मु‍स्‍तकबिल की तस्‍वीर छिपी है।


ढाई आखर पर तसलीमा से जुड़ी और पोस्‍ट यहां पढ़ें।
Technorati Tags: ,,,

Comments

maithily said…
लेखकीय आज़ादी का समर्थन होना ही चाहिये.
आपका ये लेख पसंद आया