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गुलजार की नज्‍म 'सूर्य ग्रहण'

कल सुबह सूर्य ग्रहण है। पूर्ण सूर्य ग्रहण। खग्रास सूर्य ग्रहण। खास चश्‍मा पहनें और यह अद्भुत खगोलीय घटना जरूर देखें। तब तक गुलजार साहब की यह नज्‍म पर पढ़ें- 'सूर्य ग्रहण' कॉलेज के रोमांस में ऐसा होता था/ डेस्क के पीछे बैठे-बैठे/ चुपके से दो हाथ सरकते धीरे-धीरे पास आते... और फिर एक अचानक पूरा हाथ पकड़ लेता था, मुट्ठी में भर लेता था। सूरज ने यों ही पकड़ा है चाँद का हाथ फ़लक में आज।। गुलजार

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन

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जन्‍माष्‍टमी की चारों ओर धूम है और सूफी शायारों में श्री कृष्‍ण की काफी धूम रही है। नजीर अकबराबदी (पूरा नाम वली मुहम्‍मद नज़ीर ) ने श्री कृष्‍ण पर कई रचनाएँ लिखीं हैं। काफी लम्‍बी और काफी रोचक। नज़ीर ने ये नज्‍़म करीब पौने दो सौ साल पहले लिखी थीं। इस जन्‍माष्‍टमी पर उनकी कई रचनाओं में से दो के कुछ अंश आपके सामने पेश है। अगर आपको पसंद आया तो बाकि पोस्‍ट की भी हिम्‍मत करूँगा। जन्‍माष्‍टमी के मुबारक मौके पर ये कलाम उन दोस्‍तों की नजर, जो साझी संस्‍कृति-विरासत और परम्‍परा को अपवाद बनाने में लगे हैं। इस दुआ के साथ की उनकी कोशिश कभी कामयाब न हो। (1) जनम कन्‍हैया जी ............................................. फिर आया वाँ एक वक्‍़त ऐसा जो आए गर्भ में मनमोहन। गोपाल, मनोहर, मुरलीधर, श्रीकिशन, किशोर न, कंवल नयन।। घनश्‍याम, मुरारी, बनवारी, गिरधारी, सुन्‍दर श्‍याम बरन। प्रभुनाथ बिहारी कान्‍ह लला, सुखदाई, जग के दु:ख भंजन।। जब साअत परगट की, वाँ आई मुकुट धरैया की। अब आगे बात जनम की है, जै बोले किश्‍न कन्‍हैया की।। 11 ।। था नेक महीला भादों का, और दिन बुध, गिनती आठन की। फिर आ...

सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा (Saare Jahan Se Achha Hindostan Hamara)

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'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' के बीच राष्‍ट्रीय गीत या गान का विवाद गाहे ब गाहे चलता रहता है। पिछले दिनों हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया में भी यह विवाद उठा था। मेरे ज़हन में अक्‍सर यह सवाल उठता है कि इस विवाद में 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' का नाम क्‍यों नहीं सुनाई देता। क्‍या कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाता कि यह तराना, कौमी तराना क्‍यों नहीं बना। क्‍या इसमें देशभक्ति की कमी थी। क्‍या इसमें लय ताल छंद कमजोर थे। क्‍या इसमें वह सलाहियत नहीं थी, जो इसके आगे 'राष्‍ट्रीय' गीत या गान लगवा सके। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास इनके जवाब नहीं है। महज जिज्ञासु सवाल हैं। मैं कोई विवाद नहीं पैदा करना चाह रहा  और न ही मेरी बेजा विवादों में दिलचस्‍पी है। न ही इस बात का अब कोई मतलब है। लेकिन यह बात आज क्‍यों फिर जहन में आई। आज सुबह उर्दू राष्‍ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन छपा। इसके मुताबिक दस अगस्‍त यानी आज 'सारे जहाँ से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍ताँ हमारा' ...

फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

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कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर। दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेर...

सुनिए, जब फागुन रंग झमकते हों

अब सुनिए नजीर अकबराबादी (Nazir Akbarabadi) की शायरी ' जब फागुन रंग झमकते हों...'।  होली के मौके पर मैंने नजीर अकबराबादी की दो रचनाएँ पेश की थीं। जिसमें एक थी, 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' (Jab fagun rang Jhamakte hon tab dekh bahare Holi ki) । युनूस भाई की गुजारिश थी कि इसे सुना कैसे जाए। तब ही मुझे याद आया कि मेरे एक दोस्‍त मोहिब ने इसे कभी अपने ब्‍लॉग पर कई और गीतों के साथ पेश किया था। मैंने मोहिब से इसे भेजने की गुजारिश की और चंद घंटे बाद मेरे पास इस गीत की फाइल मौजूद थी। यह गीत मुजफ्फर अली द्वारा तैयार एलबम 'हुस्‍न ए जाना' का हिस्‍सा है। इसे आवाज दी है, छाया गांगुली ने। अगर किसी दोस्‍त के पास यह गीत किसी और गायक या गायिका की आवाज में हो तो भेजने की तकलीफ करेंगे। फिलहाल इसे साभार यहाँ आप सबके लिए पेश कर रहा हूँ। तो प्‍ले क्लिक कीजिए और फागुन की मस्‍ती में डूब जाइये।   इन्‍हें भी देखें 'जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की...' कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन Technorati Tags: ...

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दुस्तान की गंगा जमनी तहजीब का अगर कोई सबसे मजबूत वाहक है, तो वह हैं नजीर अकबराबादी । नजीर एक शायर नहीं, बल्कि परम्परा हैं। जो इस बात की मजबूत दलील पेश करते हैं कि इस मुल्क में रहने वाले लोगों के मजहब भले ही अलग-अलग हों, उनकी तहजीब की जड़ एक है। उस जड़ को बिना 'जड़' बनाए आगे बढ़ाते रहना ही, हिन्दुस्तान की असली परम्परा है। आज इसी मिली-जुली संस्कृति पर कई ओर से हमला हो रहा है। एक खास विचारधार इस बात पर यकीन करती है कि इस मुल्क में संस्कृति और धर्म के आधार पर मेलजोल मुमकिन नहीं है। इसके लिए वे नफ़रत और हिंसा फैलाने में यकीन रखते हैं। हमारे आस-पास नफ़रत फैलाने वाले ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल नहीं है। ऐसे में होली के मौके पर नजीर को याद करना जरूरी है। होली पर जितना नजीर ने लिखा है, उतना शायद ही किसी और ने लिखा हो। यह बात हर साल इसलिए याद दिलाने की जरूरत है ताकि कुछ लोग जो भारतीय संस्कृति के एकमात्र दावेदार होने की घोषणा करते हैं, नजीर की शायरी में अपना असली चेहरा देखें। नजीर की ढेर सारी होली कविताओं में से दो की चंद लाइनें आपके सामने पेश है। होली मुबारक!!!!!! हो ली - 1 जब खेली...

'मोदी नहीं हूँ मैं'

मुशर्रफ आलम जौकी उर्दू के साहित्‍यकार हैं। मुसलमानों की जिंदगी, उनकी कहानियों और उपन्‍यासों का‍ विषय रही है। उनका उपन्‍यास 'मुसलमान' काफी मशहूर रहा है। इसका हिन्‍दी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अपने विचारों को लेकर वह काफी चर्चा में भी रहे हैं। उनकी एक कहानी है, 'मोदी नहीं हूँ मैं'। यह कहानी आम हिन्‍दू-मुसलमानों के रिश्‍तों की दास्‍ताँ है। यह कहानी साम्‍प्रदायिक हिंसा के बावजूद इंसानी रिश्‍तों के बचे रहने की कहानी है। इसी रिश्‍ते के बिना पर यह मुल्‍क आज खड़ा है और इसी रिश्‍ते को खत्‍म करने की लगातार कोशिश हो रही है। जब मैं यह कहानी पॉडकास्‍ट के रूप में यहाँ दे रहा हूँ तो मेरे जहन में असगर वजाहत की कहानी पर हुए विवाद की याद ताजा हो रही है। इसके बावजूद में मैं यह पोस्‍ट कर रहा हूँ। उर्दू की इस कहानी को पेश किया है, टूसर्किल डॉट नेट के सम्पादक काशिफ उल हुदा ने। तो सुनिये कहानी 'मोदी नहीं हूँ मैं'। Technorati Tags: मोदी नहीं हूं मैं , उर्दू कहानी , ढाई आखर , मुशर्रफ आलम जौक्‍ी , साहित्‍य , Modi Nahi hoon Main , Urdu storu , Musharraf Alam Zauki , Dhai ...

फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ (Lover From Palestine)

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  महमूद दरवेश (Mahmoud या Mahmood Darwish) फिलिस्‍तीन के मशहूर कवि हैं। दुनिया के बड़े साहित्‍यकारों में उनका शुमार होता है। अपने वतन फिलिस्‍तीन के लिए जबरदस्‍त बेचैनी उनकी शायरी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। फिलिस्‍तीन को समझने का एक बड़ा जरिया दरवेश की कविताएँ हैं। ढाई आखर पर इससे पहले भी हमने उनकी कविताएँ पोस्‍ट की थीं। आज चंद और रचनाएँ पेश हैं। इसे अंग्रेजी से हिन्‍दुस्‍तानी में पेश किया है साहित्‍यकार/ नाटककार ख़ुर्शीद अनवर ने।   फि़लिस्‍तीन का एक आशिक़ तेरी आँखें कि उतरता कोई नश्‍तर दिल में दर्द महसूस करूँ, या कि फि़दा हो जाऊँ तेज़ झोंकों में हूँ फा़नूस इनका   रात को चीर दे और दर्द को गहरा कर दे ऐसे पेवस्‍त करो आँखों को सीने में मेरे तेरी आँखों से मिले ज़ख्‍़म यूँ चमकें जैसे आज के घोर अँधेरों में रोशनी की किरण कल के ख्‍़वाबों को भी रोशन कर दे और मेरी रूह पे भी छा जाए। और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र यह भी न याद रहे हम कभी साथ भी थे, एक ही थ...

तसलीमा की ताजा कविताएँ-2 (Latest Poems of Taslmia Nasreen-2)

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  (3) नो मेन्स लैंड अपना देश ही अगर तुम्हें न दे देश , तो दुनिया का कौन-सा देश है , जो तुम्हें देगा देश , बोलो। घ ू म-फिरकर सभी देश काफी कुछ ऐसे ही होते हैं , हुक्मरानों के चरित्र भी ऐसे ही। तकलीफ देने पर आयें , तो ऐसे ही देते हैं तकलीफ। इसी तरह उल्लास से चुभोएँगे सूइयाँ तुम्हारी कलाई के सामने , पत्थर-चेहरा लिए बैठे , मन ही मन नाच रहे होंगे। नाम-धाम में भले हो फर्क अँधेरे में भी पहचान लोगे उन्हें , सुनकर चीत्कार , खुसफुस , चलने-फिरने की आहट , तुम समझ जाओगे कौन हैं वे लोग। हवा जिस तरह , उनके लिए , उधर ही दौड़ पड़ने का समय। हवा भी तुम्हे बता देगी , कौन हैं वे लोग। हुक्मरान आखिर तो होते हैं हुक्मरान। चाहे तुम कितनी भी तसल्ली दो अपने को , किसी शासक की जायदाद नहीं- देश। देश होता है आम-जन का , जो देश को प्यार करते हैं , देश होता है उनका। चाहे तुम जितना भी किसी को समझाओ- यह देश तुम्हारा है , इसे तुमने रचा-गढ़ा है , अपने अन्तस में , अपनी मेहनत और सपनों की तूली में आँका है इसका मानचित्र। अगर शासक ही तुम्हे दुरदुराकर खदेड़ दें , कहाँ जाओग...

(तसलीमा की ताजा कविताएँ-1 (Latest Poems of Taslmia Nasreen)

तसलीमा नसरीन 'कैद' हैं। वह कहाँ रह रही हैं, किसी को पता नहीं। 'हिफ़ाजत' के इंतज़ाम इतने 'पुख्ता' हैं कि दोस्तों को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं है। इसे 'कैद' ही जाएगा। भला हो तकनीक का, इसी कैद-ए-तनहाई से तसलीमा ने अपने दोस्तों को ये कविताएँ भेजी हैं। बांग्ला में लिखी कविताओं को हिन्दी में ढालने की कोशिश कृपाशंकर चौबे ने की है। उन्हीं से ये कविताएँ ढाई आखर को मिलीं। आप कविताएँ पढ़ें और ज़रा गौर करें कि हम किस दौर में रह रहे हैं। पहला हिस्से में दो कविताएँ (1) जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जिसमें एक बंद खिड़की है, जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती,  खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है, चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती। इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़,  लाँघ नहीं सकती चौखट। एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं, जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर, चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ। मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।...

हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या

नन्‍दीग्राम ने उन सारे लोगों को काफी परेशान कर दिया है, जो सालों से उस विचारधारा के हामी हैं, जिस विचार का होने का दावा पश्चिम बंगाल की सरकार करती है। ऐसे लोग किसी आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्‍य भले न हो पर वे इस मुल्‍क में हर तरह की गैर बराबरी के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। हालांकि जब ऐसे लोग अब सवाल कर रहे हैं तो उन पर तथा‍कथित क्रांतिकारियों ने हमले बोल दिए हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्राध्‍यापक अपूर्वानन्‍द ने जब नन्‍दीग्राम में हिंसा पर टिप्‍पणियां लिखीं तो कई 'क्रांतिकारियों' ने उन पर तरह तरह के आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। शायद आक्षेपों और उससे चल रही जद्दोजहद ने एक कविता की शक्‍ल ले ली। पेश है अपूर्वानन्‍द की कविता हत्या को कहना चाहता हूँ, हत्या ओ मेरी धर्षिता माँ मैं सिर्फ़ खड़ा रहना चाहता हूँ तुम्हारे पास पूछना नहीं चाहता कौन सा रंग था ध्वजा का जिसे तुम्हारी देह में गाड़ा था कौन थे वे लोग पूछना नहीं चाहता क्यों ऐसा लगने लगा है मुझे कि कहीं मैं तो नहीं था वह यह एक ठंड भरी रात है और रक्त चंद्रमा की निर्विक...

तसलीमा को भारत की नागरिकता मिले

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बंगाल की प्रगतिशील और वाममोर्चा सरकार ने जिस तरह तसलीमा को राज्य से बाहर किया, उससे उसका धर्मनिरपेक्ष मुखौटा सबके सामने आ गया है। 'हिन्दुस्तान' में इसी टिप्पणी के साथ आज प्रख्यात साहित्यकार और आंदोलनों की अगुवा महाश्वेता देवी की टिप्पणी छपी है। हिन्दुस्तान से साभार ढाई आखर के पाठकों के लिए पेश है महाश्वेता देवी के विचार - तसलीमा को भारत की नागरिकता मिले बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन का वीसा रद्द करने और नंदीग्राम के सवाल को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय का एक संगठन कोलकाता में बुधवार को सड़क पर उतरा था। मुझे नहीं समझ में आता कि सड़क पर उतरे लोग नंदीग्राम को लेकर सरकार की भूमिका के प्रति अपना प्रतिवाद जता रहे थे या तसलीमा के भारत में रहने के प्रति अपनी आपत्ति जता रहे थे। मुझे लगता है कि धार्मिक कट्टरता का विरोध करने की जो कीमत 13 वर्षों से निर्वासित रहकर तसलीमा नसरीन ने चुकाई है, वह विरल है और इसीलिए मैं तसलीमा नसरीन के इस संग्राम को सलाम करती हूं। मैं चाहती हूं कि उन्हें भारत सरकार नागरिकता दे। वे एक लेखिका हैं। वे एक स्त्री हैं। मैं भी एक लेखिका और स्त्री हूं, इस नाते...

कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन

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त्‍योहार हो और नज़ीर की याद न आये मुमकिन नहीं। नज़ीर अकबराबादी ने जैसी शायरी की है, वो शायरी वही शख्‍स कर सकता है, जिसे हिन्‍दुस्‍तान की गंगा जमनी तहजीब की न सिर्फ समझ हो बल्कि जो इसमें पूरी तरह डूबा हुआ हो। अठाहरवीं सदी के शुरुआती दौर (सन् 1735) के इस शायर के बारे में, आप कितना जानते हैं, मुझे नहीं मालूम। ईद के खुशनुमा मौके पर ढाई आखर के लिए पाठकों के लिए पेश है नजीर की नज्‍म ईदुलफित्र। पढ़ें और ईद के माहौल का मज़ा लें। है आबिदों को ताअतो-तजरीद की खुशी। और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की खुशी। रिंद आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी। कुछ दिलबरों के वस्‍ल की कुछ दीद की खुशी। ऐसी न शब्‍बरात न बक़रीद की ख़ुशी। जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी। ( आबिद- उपासक, इबादत करने वाला, भक्‍त। ताअतो तजरीद - उपासना, आराधना, इबादत। ज़ाहिद- कर्मकाण्डियों। ज़ुहद - धार्मिक कृत्‍य, संयम। तमहीद - पालन। रिंद - रसिया, धार्मिक बंधनों से मुक्‍त। दिलबर- प्रेमपात्र। वस्‍ल- प्रेमी प्रेमिका का मिलन। दीद- दर्शन, दीदार।) रोज़े की ख़ुश्कियों से जो है ज़र्द-ज़र्द गाल। ख़ुश हो ग...

राम का 'दूसरा बनबास'

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राम के नाम पर अयोध्या में जो कुछ हुआ या उसके बाद पूरे देश में- क्या राम उससे खुश हुए होंगे। इस बात को बिना मर्यादा पुरुषोत्तम को समझे बिना, नहीं जाना जा सकता। कैफ़ी आज़मी ने इसे समझने की कोशिश की। कैफ़ी न सिर्फ बड़े शायर थे बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन के पुरोधा भी। कैफ़ी का जुड़ाव जिस ज़मीन से था, वो उस जगह की मिलीजुली संस्कृति के मज़बूत वारिस हैं। वह, हर उस परम्परा और संस्कृति को अपना मानते थे, जिसे आप हिन्दुस्‍तानी कह सकते हैं। राम उनके लिए इस संस्कृति और परम्‍परा की धरोहर हैं। वे राम के मर्म को समझते थे, तब ही उनकी कलम से 'दूसरा बनबास' जैसी कविता निकली। कैफ़ी ने राम के मन को समझा या नहीं, यह आप तय करें- दूसरा बनबास राम बनबास से लौट कर जब घर में आये याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा (रक्स- तांडव) छह दिसम्बर को सिरी राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये। जगमगाते थे जहां राम के कदमों के निशां प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां मोड़ नफ़रत के उसी राहगुजर में आये। धर्म क्या उनका है, क्या जात है,...

इमाम-ए-हिन्द हैं राम

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एक शख्स जिसे दुनिया इस्लामी चिंतक और दार्शनिक के रूप में जानती है। एक शख्स जिसे अपना हिन्दोस्तां, सारे जहां से अच्छा लगता था। वो शख्स एक ऐसे किरदार के बारे में कलम उठाता है जिसे दुनिया 'राम' के रूप में जानती है। इसमें उसका मज़हब या दीन का यकीन आड़े नहीं आता। उसने यह नज्म अपने को राष्ट्रवादी साबित करने के डर से भी नहीं लिखा। यह शख्स कोई और नहीं मोहम्मद इक़बाल हैं। जिन्होंने 'राम' नाम की महिमा का गान किया है। सबके अपने-अपने राम हैं, अगर यह कहा जाये तो शायद गलत न होगा। ...लेकिन 21 वीं शताब्दी में हिन्दुत्‍ववादी (हिन्दू मज़हब मानने वाले नहीं, बल्कि उसके नाम पर राजनीति करने वाले) राम की एक ही पहचान बनाने की जुगत में लगे हैं। उन्होंने यह भ्रम भी फैलाने का काम किया है कि राम का नाम उनकी ही वजह से बचा है और हिन्दू धर्म तो उनके बिना नेस्तनाबूत हो जायेगा। अपना भ्रम दूर करने के लिए हिन्दुत्‍ववादियों को 20 वीं सदी में लिखी इस नज्म को पर भी जरा गौर करना चाहिए। ख़ैर, वो गौर करें या नहीं, हम तो देखें ही इक़बाल की राम भक्ति। राम लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिन्द सब फ़लसफ़ी ह...

दो बदन प्‍यार की आग में जल गये

अभय जी की टिप्‍पणी के बाद मुझे लगा कि कहीं मेरी याददाश्‍त तो धोखा नहीं खा रही है। आखिरकार मैं कल इस नज्‍़म को तलाशने में कामयाब रहा। यह नज्‍़म क्रांतिकारी शायर मख़दूम मोहिउद्दीन की है। मख़दूम ने जहां क्रांति के गीत लिखे वहीं उन्‍होंने मोहब्‍बत के गीत भी उसी जज्‍़बे से गाया। मख़दूम उन इंकलाबी शायरों में हैं, जो बार बार याद दिलाते हैं कि एक इंकलाबी शख्सियत के लिए एक इंसानी जज्‍़बे से भरपूर दिल की भी ज़रूरत होती है। इसके बिना क्रांतिकारी की कल्‍पना अधूरी है। मख़दूम आज़ादी की लड़ाई के सिपाही रहे और बाद में कम्‍युनिस्‍टों की कतार में शामिल होकर तेलंगाना विद्रोह की शमा भी जलाई। उनके चंद मशहूर अशआर हैं- न माथे पर शिकन होती, न जब तेवर बदलते थे खुदा भी मुस्‍कुरा देता था जब हम प्यार करते थे यही खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी। -------------------- हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो- चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो। -------------------- इक नयी दुनिया, नया आदम बनाया जायेगा। -------------------- सुर्ख़ परचम और ऊंचा हो, बग़ावत जि़दाबाद। ढाई आखर के पाठकों के लिए पेश है उनकी मशहूर नज्‍़म। ...

गुरुदेव ने क्या कहा जन गण मन के बारे

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खुद गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर 'जन गण मन' के बारे में क्या कहते थे। यह जानना निहायत जरूरी है। एक लम्बे समय से 'राष्ट्रवादी' दोस्त वंदे मातरम के बरअक्स जन गण मन को रखकर टैगोर की रचना को चारण साबित करते रहे हैं। पिछले दो दिनों से ब्लॉग की दुनिया में भी यह बहस हो रही है। न सिर्फ हिन्दी में बल्कि अंग्रेजी ब्लॉगर के बीच भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है। अभय जी ने निर्मल आनन्द पर जन गण मन के बारे में हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक लेख कल पोस्ट किया। इसमें द्विवेदी जी ने साफ किया है कि‍ यह गीत क्यों और कैसे लिखा गया। इसके बावजूद हमारे कुछ दोस्तों को यह बात पच नहीं रही। इंटरनेट पर तलाश करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ डैटोन के मोनीष आर. चटर्जी का एक लेख मिला, 'टैगोर एंड जन गण मन' । यह लेख अंग्रेजी में दो जगहों पर मौजूद है। इस लेख के दो अंश काफी अहम हैं, जो जन गण मन के बारे में थोड़ी रोशनी डालते हैं। खुद टैगोर क्या सोचते थे, वो इस लेख में है। अंग्रेजी में लिखे इस लेख के इन दो अंशों को ढाई आखर के पाठकों के लिए हिन्दी में करने की कोशिश की है। गलती के लिए पहले से माफी। लेख के अंश- का...

ये जंग है जंगे आज़ादी

आज़ादी मिली तो फैज़ ने बहुतों के दिल के दर्द को आवाज़ दी 'ये वो सहर तो नहीं'। यानी हम देश के बंटवारे के लिए तो आज़ादी नहीं चाह रहे थे। कल तक जिनकी जद्दोजहद साझा थी, उसे हुक्‍मरानों ने बांट दिया था। दिलों पर जख्म लिये लोगों ने नया सफ़र शुरू किया। नये उम्मीदों से भरपूर सफ़र। स्वराज का सफ़र। पर कुछ ही सालों में लोगों को लगा कि आमजन का स्वराज तो अब भी नहीं आया है। फिर याद आने लगी 1931 में लिखी भगत सिंह की  बात- 'भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को- भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगार हटाकार जो कि उसी आर्थिक व्यवस्था के  पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें शोषण पर आधारित हैं-आगे आना है। हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां, एक स्वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्थान लेने के लिए तैयार हैं।' क्या आपको नहीं लगता कि भगत सिंह भविष्यवक्ता के रूप में अपनी बात कह रहे थें। उनकी बात आज भी, मेरी नज़र में सौ फीसदी सटीक है। ... जब यह बात महसूस हुई तो फिर आज़ाद मुल्क में ही जद्दोजहद की शुरुआत हुई। इसका इतिहास काफी लम्बा...

ये वो सहर तो नहीं

आज़ादी के साठ साल। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साठ साल। यह कोई मामूली कामयाबी नहीं है। इसका सेहरा इस देश के अभिजन यानी एलीट को नहीं आमजन को जाता है। जो आज भी यक़ीन करता है कि यह देश उसका है और उसके लिए कुर्बानी दे रहा है। आज़ादी की जद्दोजहद, बिना ख्वाब के मुमकिन नहीं रही होगी। जो लड़ रहे थे, जो जान की बाज़ी लगा रहे थे और एक नये हिन्दुस्तान का ख्वाब देख रहे थे। ... पर जब आज़ादी आयी तो ख़ून ख़राबे और हिंसा के साथ। देश के टुकड़े करने के साथ। तब भी इस देश के अभिजन को शायद ही फर्क पड़ा हो, दर बदर और खूंरेंजी का शिकार आमजन ही हुआ। कई लोगों के लिए यह ख्वाब टूटने जैसा था। पर वे हिम्मत नहीं हारे। कुछ ऐसे ही हालात का बयान फैज़ अहमद फैज़ की नज्म करती है-सुबहे आज़ादी। सुबहे आज़ादी ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में चले जो यार तो...

एक कवि का गुजरात वियोग

मेरी पोस्ट एक 'गुजराती' की तलाश के बाद कई दोस्तों की राय थी कि वली गुजराती/दक्खिनी की कुछ रचनाओं को भी ढाई आखर पर पेश करना चाहिए था। उनके सुझाव पर वली की कुछ रचनाएँ आपके सामने पेश हैं। जिन कठिन अल्फ़ाज़ के मायने मिले, उन्हें ब्रैकेट में दिया गया है। वली की जिंदगी में दिल्ली जाना एक अहम घटना है। लेकिन दिल्ली जाना, उन जगहों से बिछुड़ना भी था, जिनसे वली बेपनाह मुहब्बत करते थे। तभी तो गुजरात छूटने की तकलीफ एक पूरी नज्म़ के रूप में सामने आयी। मज़ार ढहाते वक्त गुजरात गौरव का ठेका लेने वालों को वली की गुजराती की इस बेपनाह मुहब्बत का भी खयाल नहीं आया! (1) गुजरात वियोग गुजरातके फिराके सों है खा़र-खा़र दिल। बेताब है सूनेमन आतिलबहार दिल।। ( फिराक: वियोग, खा़र-खा़र : काँटा-काँटा, बेताब: अधीर, सूनेमन: शून्य, आतिलबहार: आग बरसता) मरहम नहीं है इसके जखम़का जहाँमने। शम्शेरे-हिज्र सों जो हुआ है फिगा़र दिल।। ( शम्शेरे-हिज्र: वियोग के खड्ग, फिगा़र: घायल) अव्वल सों था ज़ईफ़ यह पाबस्ता सोज़ में। ज्यों बात है अग्निके उपर बेकरार दिल।। ( ज़ईफ़: निर्बल, पाबस्ता: पादनिगड़ित, सोज़: जलन) इस सैरके नशे ...