गुरुदेव ने क्या कहा जन गण मन के बारे

खुद गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर 'जन गण मन' के बारे में क्या कहते थे। यह जानना निहायत जरूरी है। एक लम्बे समय से 'राष्ट्रवादी' दोस्त वंदे मातरम के बरअक्स जन गण मन को रखकर टैगोर की रचना को चारण साबित करते रहे हैं। पिछले दो दिनों से ब्लॉग की दुनिया में भी यह बहस हो रही है। न सिर्फ हिन्दी में बल्कि अंग्रेजी ब्लॉगर के बीच भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है। अभय जी ने निर्मल आनन्द पर जन गण मन के बारे में हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक लेख कल पोस्ट किया। इसमें द्विवेदी जी ने साफ किया है कि‍ यह गीत क्यों और कैसे लिखा गया। इसके बावजूद हमारे कुछ दोस्तों को यह बात पच नहीं रही। इंटरनेट पर तलाश करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ डैटोन के मोनीष आर. चटर्जी का एक लेख मिला, 'टैगोर एंड जन गण मन'। यह लेख अंग्रेजी में दो जगहों पर मौजूद है। इस लेख के दो अंश काफी अहम हैं, जो जन गण मन के बारे में थोड़ी रोशनी डालते हैं। खुद टैगोर क्या सोचते थे, वो इस लेख में है। अंग्रेजी में लिखे इस लेख के इन दो अंशों को ढाई आखर के पाठकों के लिए हिन्दी में करने की कोशिश की है। गलती के लिए पहले से माफी। लेख के अंश-

कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन 16 दिसम्‍बर 1911 को शुरू हुआ। दूसरा दिन पूरी तरह सम्राट जार्ज पंचम के खैरमक़दम के लिए न्यौछावर था। जन गण मन इसी मौके पर गाया गया। इसके बाद अखबारों में रिपोर्ट प्रकाशित हुई कि यह गीत सम्राट की शान में कसीदे के रूप में गाया गया। चूंकि गुरुदेव ने इस इलज़ाम का खण्डन तुरंत नहीं किया, इसका असर यह हुआ कि लोग इसे राजशाही की प्रशंसा में लिखा गया गीत मानने लगे...

रवीन्द नाथ ठाकुर की संकलित रचनाओं में, इस बात का जिक्र है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सम्राट के अभिनंदन में एक गीत लिखने की गुजारिश टैगोर से की थी। कांग्रेस बंगाल विभाजन विधेयक के रद्द किये जाने के जवाब में सम्राट के प्रति इस गीत को अपने शुक्राने के रूप में पेश करना चाहती थी। टैगोर न सिर्फ इस गुजारिश से बेचैन हुए बल्कि उन्होंने सीधे-सीधे इसे अपनी बेइज्जती मानी। यह कहा जाता है कि जन गण मन राजशाही की प्रशस्ती के बजाय प्रतिरोध और विद्रोह के रूप में लिखा गया गीत है। अगर इस गीत को बिना किसी पूर्वग्रह के पढ़ा जाये तो शायद यह बात साफ हो जानी चाहिए कि कवि ने अपनी वंदना किसे अर्पित की है।

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने पुलिन बिहारी सेन को लिखे एक पत्र में इस गीत के बारे में लिखा है, 'महामहिम की सेवा में लगे एक आला अफ़सर जो मेरे भी दोस्त थे, उन्होंने मुझसे गुज़ारिश की कि मैं सम्राट के अभिनन्दन में एक गीत की रचना करूं। इस गुज़ारिश ने मुझे चौंका दिया। इसने मेरे अंतर्मन में बेचैनी पैदा कर दी। इस जबरदस्त दिमागी उथलपुथल और बेचैनी के जवाब में मैंने भारत के भाग्य विधाता, जन गण मन की जीत का एलान किया जिसने युगों से युगों से उतार-चढ़ाव और उबड़-खाबड़ रास्तों के बावजूद भारत के रथ का लगाम मजबूती से थामे रखा है। भारत की नियति के खुदा, भारत के सामूहिक मन मस्तिष्क को समझने वाले, जो युगों-युगों से इस देश को राह दिखाते आ रहे हैं, वे जार्ज पंचम, जार्ज षष्ठम या कोई और जार्ज कभी नहीं हो सकते। यहां तक कि मेरे आला अफ़सर दोस्त ने भी इस गीत के बारे में यह बात समझ ली थी। क्योंकि सम्राट का जबरदस्त प्रशंसक होने के बावजूद, उसकी सामान्य समझ कम नहीं थी।'

अंग्रेजी में इस लेख को पूरा यहां पढ़ें
http://homepages.udayton.edu/~chattemr/janaganamana.html
http://www.countercurrents.org/comm-chatterjee310803.htm

Comments

Pratik said…
उपयुक्त उद्धरण प्रस्तुत किए हैं आपने। शायद इन्हें पढ़ने के बाद यह विवाद कम-से-कम चिट्ठा जगत में थम जाना चाहिए। हालाँकि फिर भी यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि राष्ट्रगान के रूप में ईश्वर की आराधना का यह भजन कितना प्रासंगिक है?
आपने गुरूदेव के पत्र को सामने लाकर बहुत अच्छा किया है मगरगलतफहमी के शिकार लोगो की बोलती बंद करना मुश्किल है। और उसकी कोई ज़रूरत या प्रासंगिकता भी नहीं है।