फ़हमीदा रियाज की नज्‍म नया भारत (Naya Bharat by Fahmida Riyaz)

कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोस में कुकर्म हो रहा है, तो वे भी अपने यहाँ कुकर्म करने के हकदार हो गए हैं। अगर आप अपने यहाँ के कुकर्म के बारे में आवाज उठा‍इए तो वे कहेंगे, पड़ोस का कुकर्म नहीं दिखाई देता। यानी इनका कुकर्म एक वाजिब कर्म हो गया क्‍योंकि पड़ोस में भी ऐसा ही चल रहा है। एक मु‍ल्‍क है, जिसका नाम है पाकिस्‍तान। साठ साल की उम्र है। मजहब के नाम पर बना। लेकिन मजहबी लोगों ने नहीं बनाया। वहाँ क्‍या होता आया है या हो रहा है- इस पर तनकीद की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी बाकि किसी चीज से कम्‍पटीशन करे या न करे, कुछ लोगों को उनका कट्टरपंथ बड़ा भा रहा है। वहाँ का कट्टरपंथ, मजहबी पेशवाई, उनके लिए इस मुल्‍क में खाद-पानी का काम कर रहा है। वे उससे कम्‍पटीशन करने में लगे हैं। वे उसे जिंदा रखना चाहते हैं, ताकि खुद भी जिंदा रहें।  ख़ैर।

दूसरी ओर, पाकिस्‍तान के आम लोग, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी,  कट्टरपंथ से आजिज हैं। (शक हो तो खुदा के लिए KHUDA KE LIYE फिल्‍म जरूर देखें) उनके लिए हिन्‍दुस्‍तान प्रेरणा का स्रोत है। और हिन्‍दुस्‍तानी सेक्‍यूलरिज्‍म और जम्‍हूरियत को अपना आदर्श मानते हैं। वे इसके लिए लिखते हैं। मुहिम चलाते हैं। जेल जाते हैं। लेकिन जब वे इस मुल्‍क का हाल भी वैसा ही देखते हैं, तो परेशान हो जाते हैं।

इसी परेशानी का सबब है, कि फ़हमीदा रियाज़ Fahmida Riyaz जैसी शायरा बेचैन हो कर एक नज्‍म लिखती हैं लेकिन उनका लिखा यहाँ के 'राष्‍ट्रवादी तत्‍वों' को पसंद नहीं आता है। उन पर दिल्‍ली में एक कार्यक्रम में हमला होता है। आपके लिए पेश है वही नज्‍म।

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई 

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

 

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे ?

सारे उल्‍टे काज करोगे !

अपना चमन ताराज़ करोगे !

 

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फ़तवे जारी

 

होगा कठिन वहाँ भी जीना

दाँतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

 

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

क्‍या हमने दुर्दशा बनायी

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

 

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हँसी आज आयी

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

 

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा

उल्‍टे पाँव चलते जाना

ध्‍यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

 

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया जमाना

 

एक जाप सा करते जाओ

बारंबार यही दोहराओ

'कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत'

 

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे

बस परलोक पहुँच जाओगे

 

हम तो हैं पहले से वहाँ पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहाँ से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

 

Comments

abhivaykti sahi hai isme kuch galat najar nahi ata hai .
Mired Mirage said…
यह कविता मैंने पहले पढ़ी है। यहीं किसी ब्लॉग में शायद। बिल्कुल सही बात कह रही हैं वे । सब गड्ढे में गिर रहे हैं तो हमें तो कम से खाई से कम में तो क्या गिरना चाहिए !
घुघूती बासूती
बिल्कुल सही कटाक्ष !
सही कहा जी, गिरे हुए को देख गिरा नहीं जाता. कोई गिराए तो गिरने से बचने का उपाय किया जाना चाहिए.
shobhit said…
I tried to write in hindi but somehow it doesn't seem to work.

"Ranjha Ranjha karte karte aape ranjha hoyi" shayad bharat ke naye hindu fundamentalist ke liye yahi baat kahi ja sakti hai...
Anyways, great work from you. Shayad aapki baat sarhad ke dono tarf ke logon ko akal de...
पहली बार इस तरफ आना हुआ .और ये आना सार्थक हुआ.सरसरी कई चीज़ें नज़र से और बहुत कुछ जेहन से होकर गुजरी.मुबारक हो भाई .

अपन तो नए खिलाडी हैं .कभी मेरी तरफ भी गुज़र हो तो सुझाव दीजिये .
इंतज़ार रहेगा.