सियासत का मजहब और मजहब की सियासत (Politics, secularism and religion)

सियासत को मजहब बड़ा भाता है और मज़हब को सियासत। सब अपनी सत्‍ता कायम करना चाहते हैं लेकिन भारत के संविधान की मजबूरी है। वह मजहब और सियासत के घालमेल के खि़लाफ़ है।

कल का हंगामा ही लें। मामला उस अमरनाथ यात्रा से जुड़ा था, जो हिन्‍दुस्‍तान की मिली-जुली तहज़ीब का अद्भुत नमूना है। पर यह उन लोगों को गवारा नहीं, जिनकी कामयाबी का राज़ लोगों को बाँटने में छिपा है। जो बेरोजगारी के सवाल पर भारत बंद कभी नहीं कराते। उन्‍हें तो 'आस्‍था' भाती है। सो साधु नुमा राजनेता और राजनेता नुमा साधु जुट गए। धर्म पर हमला हो रहा है... सो उन्‍होंने जगह-जगह हमला बोल दिया। ख़ूब तोड़ा- ख़ूब बिख़ेरा। ख़ूब बोई नफ़रत के बीज... अब फ़सल पकाएँगे। यह है धर्म और राजनीति का गठजोड़। ख़ैर।

एक ओर मजहब में राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर राजनीति में मजहब। यह मुल्‍क न्‍यूक्‍लीयर करार करेगा या नहीं, ख़ालिस सेक्‍यूलर मसला है। यह इस मुल्‍क के मुस्‍तकबिल से जुड़ा है। आगे आने वाले दिनों में देश की सियासत की लाइन भी यह तय करेगा। कई पुराने दोस्‍त छूटेंगे तो कई नए बनेंगे। जिस चीज का दूर-दूर तक मज़हब के साथ लेना-देना नहीं है, उस डील के साथ भी मजहब की डील हो गई।

यह हमारे सियासतदानों को भा गया। इसमें कोई पीछे नहीं रहा। क्‍या वाम, क्‍या दक्षिण। अपने-अपने पक्ष में तर्क जुटाने के लिए सबने निकाल लिया, करार का मजहबी एंगिल। मजहबी रहनुमाओं को भी लुभाने लगा। और दीन की रहनुमाई करने वाले पहुँच गए दुनियावी रहनुमा के आस्‍तान: पर।

निहायत सेक्‍यूलर मसले पर धर्म का कर्म का काम करने वाले दखलंदाजी न करें, आदर्श स्थिति तो यही है। वरना हम तो हम पूछेंगे ही भई कि जब दलितों पर अत्‍याचार होता है, महिलाओं पर जुल्‍म होता है, नौजवान हाथों को काम नहीं मिलता... तब मजहबी रहनुमा कहाँ चले जाते हैं।  यही नहीं सियासतदानों की राजनीति उस समय क्‍यों चुक जाती है, जब धर्म के नाम पर बाँटने का काम होता है। राजधर्म भले याद न रहे, धर्म की राजनीति जरूर याद रहती है।

भई, क्‍यों इस मुल्‍क में कभी अयोध्‍या तो कभी अमरनाथ तो कभी डील के नाम पर धर्म और राजनीतिक के घालमेल की कोशिश की जाती है। ऐसा जब-जब होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं। नफ़रत फ़ैलती है। इस मुल्‍क की रूह ऐसी राजनीति के माफि़क़ नहीं है।

Comments

बन्द के दौरान हुई तोड़फोड़ की निंदा करता हूँ. जोर जबरदस्ती सही नहीं.


आपकी कलम कभी कश्मीरी दंगाईयों पर नहीं चली!
बहुत अच्छा चिंतन है। धर्म के नाम पर अधर्म। वोट के लिए ये किसी भी हद तक गिर सकते हैं.
मियां कभी-कभी ओसामा की भी निन्दा कर दिया कीजिये। कभी सिमी पर भी अपनी लेखनी दौड़ाइये। कभी भारत का अन्न खाकर पाकिस्तान और अरबिस्तान का नाम जपने वालों की भी खबर ले लिया कीजिये।
मियाँ, समय मिले तो कभी काश्मीर के सेक्युलरिज्म पर भी प्रकाश डालें। कभी पाकिस्तान की निन्दा भी कर दिया करें।
आप सही कह रहे हैं, इसकी जितनी निन्दा की जाए वह कम है।
Mired Mirage said…
मेरे खयाल से तो सभी सेर पर सवा सेर हैं, एक को थोड़ी सी धरती देनी रास नहीं आई तो दूसरे को उसका ना मिलना। किसको दोष दें ? दोष तो बस जनता का है जो हर तरफ से मारी जाती है।
वैसे क्यों आशा की जाती है कि यह चिट्ठाकार आपसे या मुझसे अधिक आगे बढ़कर पाकिस्तान की बुराई करे ? कश्मीर व वहाँ होने वाली बातों की बात और है, उनपर इनका बोलना गलत नहीं होगा क्योंकि वह हमारी आपकी तरह इनका भी देश है।
घुघूती बासूती