महाश्वेता देवी की नज़र में विभूति

बिरले ही ऐसे पुलिस अफसर मिलते हैं, जो वर्दी की जिम्मेदारी के साथ-साथ समाज में हो रही उथल-पुथल का समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी करते हैं। विभूति नारायण राय ऐसे ही पुलिस अफसर हैं। वे वर्दीधारी अफसर हैं। साहित्यकार हैं। जिज्ञासु शोधार्थी भी। मूलत: उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले के रहने वाले विभूति की तालीम बनारस और इलाहाबाद में हुई। 1971 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। 1975 से भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अफसर हैं।कुछ सालों के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में भी रहे। बतौर साहित्यकार उनकी सबसे मशहूर रचना 'शहर में कर्फ्यू' है। भारतीय पुलिस अकादमी की फेलोशिप के तहत साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस पर किया गया उनका रिसर्च काफी चर्चित रहा है।1857 के विद्रोह पर भी उन्होंने नये सिरे से विचार करने की कोशिश की है। ढाई आखर के पाठक विभूति के विचार पहले ही पढ् चुके हैं। विभूति किस शख्सियत के मालिक हैं, प्रख्यात साहित्यकार, समाजसेवी महाश्वेता देवी ने कुछ दिनों पहले हिन्दुस्तान में उनके बारे में अपनी राय जाहिर की है। विभूति, बकौल महाश्वेता देवी- ढाई आखर के पाठकों के लिए।
विभूति की बेबाकी विस्मयकारी
दंगे भारत के माथे पर कलंक है। दंगे पर भारतीय भाषाओं में काफी लिखा गया है, लेकिन विभूति नारायण राय कृत 'शहर में कर्फ्यू' इस अर्थ में सबसे अलग है कि रचयिता ने ऐसे दंगों को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में निकट से देखा और प्रामाणिक चित्र उपन्यास में खींचा। विभूति का यह उपन्यास मैंने हिन्दी में ही पढ़ा था। बाद में मैने इसका बांग्ला में अनुवाद कराया, जो मासिक 'भाषा बंधन' के पूजा विशेषांक में छपा और अब यह ग्रंथ मित्र प्रकाशन से यह पुस्तकार छपा है। बांग्ला में यह औपन्यासिक कृति बहुत समादृत हुई है। इसके बारे में नवारूण भट्टाचार्य ने लिखा है, 'शहर में कर्फ्यू' एक दस्तावेजी उपन्यास है। इसके साथ बांग्ला ही क्यों, भारत की किसी भाषा की रचना से तुलना नहीं हो सकती। साम्प्रदायिक दंगे किस प्रकार होते हैं और कौन इस नृशंसता के शिकार होते हैं, यह जानने के लिये 'शहर में कर्फ्यू' पढ़ना पड़ेगा।'
नवारुण ने जो लिखा है, उसी में बांग्ला के आलोचकों और पाठकों की राय अंतर्निहित है। मेरी राय भी। पुलिस सेवा में रहते हुए राज्य और जनता के रिश्तों पर जिस बेबाकी से विभूति ने कलम चलाई है, वह मेरे लिये विस्मयकारी है। अपने बेबाक वर्णन-विश्लेषण में विभूति ने पुलिस को भी नहीं बख्शा है। विभूति एक वक्तव्य में कहते हैं कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस और फौज का काम देश के सभी नागरिकों की रक्षा करना है, हिन्दुत्व के औजार की तरह काम करना नहीं है। इस बेबाक वक्तव्य में ही हम विभूति की विलक्षणता और विशिष्टता का संधान आसानी से कर सकते हैं। विभूति की बेबाकी से सिर्फ मैं ही नहीं विस्मित हुई हूँ। अनेक अन्य लोंगों को भी भरोसा नहीं है कि पुलिस सेवा में वरिष्ठ पद पर रहते हुए उन्होंने साम्प्रदायिक दंगों पर इस तरह कलम चलाई है। इसीलिए 'मुस्लिम इंडिया` के संपादक शहाबुद्दीन, विभूति को रिटायर्ड पुलिस अफसर लिखतें हैं। यह तथ्य दीगर है कि वे अभी भी पुलिस सेवा में हैं। संप्रति वे उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) हैं। विभूति ने 'शहर में कर्फ्यू' तब लिखा जब इलाहाबाद में वे एसपी (सिटी) थे और उसी समय इलाहाबाद का पुराना हिस्सा दंगों के चपेट में था। उसी दंगे की दरिंदगी विभूति के अनुभव संसार का अंग बन गई। विभूति को भारतीय पुलिस अकादमी की एक फेलोशिप भी मिली जिसके तहत उन्होंने पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में शोध भी किया। फेलाशिप के तहत वही शोध प्रबन्ध है 'साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस'।
विभूति नारायण इस धारणा को गलत साबित करतें है कि हिन्दू स्वभाव से अधिक उदार और सहिष्णु होता है और मुसलमान आनुवांशिक रूप से क्रूर होता है। वे यह भी बताते हैं कि दंगों में मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान होते हैं। विभूति बहुसंख्यक समुदाय के मनोविज्ञान की बात करतें है। उनका यह मानना है कि इस मनोविज्ञान को बदले बगैर, इस देश में साम्प्रदायिक दंगे नहीं रोके जा सकते 'शहर में कर्फ्यू' में लेखक बताता है कि दंगे और उसके बाद लगने वाले कर्फ्यू के दौरान सबसे ज्यादा तकलीफ कौन उठातें हैं।
उपन्यास बताता है कि सईदा यानी एक औसत मुस्लिम स्त्री 13 गुना आठ फीट के कमरे में किस तरह अपने पूरे परिवार के साथ गुजर बसर करती है। उपन्यास बताता है कि 15 साल की एक लड़की दंगे के दौरान किस तरह दंगाइयों द्वारा बलात्कार की शिकार हुई और उसकी यातना तभी खत्म हुई, जब वह बेहोश हो गई। इसके ठीक पहले वह लड़की एक लड़के प्रेम में पड़ी थी।
विभूति ने 'शहर में कर्फ्यू' के अवाला तीन अन्य उपन्यास, 'घर', 'किस्सा लोकतंत्र' और 'तबादला' भी लिखा। 'घर' उनका पहला उपन्यास है, जिसके छपते ही वे हिन्दी जगत में चर्चित हो गये थे। 'शहर में कर्फ्यू' उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ले गया।
'किस्सा लोकतंत्र' और 'तबादला` भी चर्चा में रहे। चारों उपन्यासों के अनुभव संसार अलग हैं। चारों के अनुकूल भाषा और शिल्प के सार्थक प्रयोग उन्होंने किये हैं। उपन्यासकार में जन के साथ प्रतिबद्धता है। उनमें प्रतिबद्धता के साथ नवीनता और प्रयोगधर्मिता का मणिकांचन योग भी है। उन्होंने धारदार व्यंग्य भी लिखें हैं। विभूति ने पत्रिका 'वर्तमान साहित्य' का 15 वर्ष तक संपादन किया। वे आजमगढ़ के अपने गांव में एक पुस्तकालय-श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय भी चलाते हैं। पुलिस में रहते हुए भी रचनात्मक कार्य किये जा सकते हैं, इसका विरल उदाहरण विभूति नारायण राय हैं। (हिन्दुस्तान से साभार)

Comments

विभूति जी से एक दशक से भी ज्यादा समय से परिचय रहा है . निस्संदेह वे अपने ढंग के आदमी हैं . पुलिस अफ़सर और लेखक दोनों रूपों में वे आपको वैचारिक ईमानदारी के नए प्रतिमान गढते दिखाई देते हैं .

महाश्वेता जी ने विभूतिनारायण राय के बारे में जो लिखा है वह उनके लेखकीय व्यक्तित्व और उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ पूरी तरह न्याय करता है .
Arvind Mishra said…
सचमुच विभूति जी का एक विरला व्यक्तित्व और कृतित्व है !