...तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती

फिलस्तीन के कवि महमूद दरवेश (Mahmood Darvish) की चंद रचनाएँ पेश हैं। यह रचना मुश्किल हालात का आईना हैं। फिलस्तीनी लोगों की जिंदगी को समझने को इन कविताओं से बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता।
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एक कातिल को
अगर तुमने अपन शिकार के चहरे पर ध्यान दिया होता
और फिर ज़रा सोचा होता
तो तुम्हें गैस चैंबर में अपनी माँ की याद आती,
तुम बंदूक के तर्क से आज़ाद हो गए होते
और तुमने बदल दिया होता अपना ख़याल:
यह अपनी पहचान फिर से हासिल करने का तरीका नहीं है.


हमारा नुकसान
हर रोज़ दो से आठ के बीच शहीद
और दस जख्मी
और बीस मकान
और पचास जैतून के दरख्त...
इसमें जोड़ दें वह गड़बड़ी जो संरचना में होती है
शायरी , नाटक और अधूरे कैनवास के .

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एक औरत ने बादल को कहा : मेरे महबूब को ढाप लो
क्योंकि मेरे कपड़े तर हैं उसके लहू से.

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गर तुम बारिश नहीं हो सकते तो पेड़ बन जाओ
उर्वरता से भरपूर पेड़
अगर तुम पेड़ नहीं बन सकते , मेरी जान
पत्थर बन जाओ ,
नमी से पुर , पत्थर
अगर तुम पत्थर नहीं बन सकते मेरी जान
चाँद बन जाओ, चाँद
( ऐसा कहा एक औरत ने अपने बेटे को दफ्न करते वक्त)

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वह अपने कातिल को सीने से लगाता है.
वह अपने कातिल को सीने से लगाता है.
खुदा करे कि वह उसका दिल जीत ले :
क्या तुम और नाराज़ हो जाओगे अगर मैं ज़िंदा बच जाऊँ ?

भाई...मेरे भाई! आखिर क्या किया मैंने की तुम मुझे बरबाद कर डालो?

दो पंछी उड़ते है सर के ऊपर.
क्यों नहीं तुम गोली दाग देते ऊपर की ओर?
बोलो, क्या कहते हो?

तुम मेरे आलिंगन और मेरी गंध से थक गए.
क्या तुम इतना ही थक नहीं गए हो मेरे भीतर के डर से?
फिर फेंक दो अपनी बन्दूक दरिया में.
बोलो, क्या कहते हो?
दरिया किनारे दुश्मन निशाना साधता है आलिंगन पर.
फिर दुश्मन को ख़त्म कर दो .
इस तरह हम दुश्मन की गोलियों से बचेंगे और बचेंगे पाप में गिरने से.
बोलो, क्या कहते हो?
तुम मुझे मारोगे कि दुश्मन आराम से हमारे घर घुस सके
और गर्क हो जाए फिर जंगल के कानून में?
क्या किया तुमने मेरी माँ की कॉफी का, अपनी माँ की कॉफी का?
मैंने क्या जुर्म किया कि तुम मुझे बरबाद कर दो?
मैं तुम्हें सीने से लगाना कभी बंद नहीं करूँगा.
और मैं तुम्हें अपनी गिरफ्त से कभी आज़ाद नहीं करूँगा.

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