ऐसे फतवों का क्या करें

आज सुबह के अखबार में एक और फतवे की खबर है। खबर के मुताबिक मुसलमानों को फोटो नहीं रखना चाहिए। एक और खबर है कि एक ऐसा फतवा दिया गया है जिसने तीन सौ लोगों की शादीशुदा जिंदगी को खतरे में डाल दिया। ... ... कोई भी शख्‍स जो इन फतवों के बारे में पढ़ेगा या सुनेगा... वह इस पर क्‍या राय देगा, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जो लोग फतवों के बारे में नहीं जानते, उन्‍हें लगेगा कि यह कैसा समुदाय है, जो ऐसे फतवों पर जीता है।

फतवा अरबी का लफ्ज़ है। इसका मायने होता है- किसी मामले में आलिम ए दीन की शरीअत के मुताबिक दी गयी राय। ये राय जिंदगी से जुड़े किसी भी मामले पर दी जा सकती है। फतवा यूँ ही नहीं दे दिया जाता है। फतवा कोई मांगता है तो दिया जाता है, फतवा जारी नहीं होता है। हर उलमा जो भी कहता है, वह भी फतवा नहीं हो सकता है।

फतवे के साथ एक और बात ध्‍यान देने वाली है कि हिन्‍दुस्‍तान में फतवा मानने की कोई बाध्‍यता नहीं है। फतवा महज़ एक राय है। मानना न मानना, मांगने वाले की नीयत पर निर्भर करता है। यह ठीक उसी तरह है, जिस तरह कोई किसी वकील से किसी मामले में राय लेने जायें और वो कानून सम्‍मत राय दे। वकील की राय बाध्‍य होगी, यह तो होता नहीं है। जिस तरह हर वकील की राय अलग हो सकती है, उसी तरह अलग अलग जगहों या व्‍यक्तियों से लिये गये फतवे भी अलग-अलग हो सकते हैं। दो जगहों से एक ही मुद्दे पर लिये गये फतवे एकदम उलट भी हो सकते हैं। ... तो लोग क्‍या करेंगे। इसलिए यह निहायत निजी और स्‍वैच्छिक चीज़ है। माने न माने, यह फतवा मांगने वाले पर निर्भर करता है।

एक और अहम बात, जब भी किसी फतवे की बात होती है, उसमें यह देखा जाना जरूरी है कि फतवे के लिए क्‍या सवाल पूछा गया था। किन शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया गया था। क्‍योंकि एक ही मुद्दे पर पूछे गये सवाल का जवाब अलग-अलग हो सकता है। जैसे इस मामले में एक शख्‍स ने पूछा था कि मेरे पास कुछ पुरानी फोटो और मेरी कुछ फोटो दूसरे लोगों के पास है, मैं इनका क्‍या करूँ। इसका जवाब मुफ्तियों ने दिया, कि आप इसे नष्‍ट कर दें। यह सभी तरह के फोटो के बारे में भी राय हो सकती है और नहीं भी। इस बात पर अमल करना उस शख्‍स पर निर्भर करता है। हांलाकि एक सवाल के जवाब में साफ किया गया है कि जहां जरूरी हो, वहां फोटो खिंचवाया जा सकता है।

लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल है, कि आज के वक्‍त में बिना फोटो खिंचवाये ढेर सारे काम मुमकिन ही नहीं हैं। यहां तक कि मुसलमानों के एक बड़े मज़हबी काम हज पर जाने के लिए भी फोटो खिंचवाना जरूरी है। पासपोर्ट में फोटो, वीज़ा में फोटो...। यही नहीं मुल्‍क में कई कामों में फोटो का लगना जरूरी होता है। ऐसे में इन फतवों की क्‍या अहमियत जिसे लोग मान ही नहीं पायें... कितने भी फतवे आ जायें, पासपोर्ट, पैन कार्ड, वोटर आईडी के लिए लोग फोटो खिंचवायेंगे ही।

फतवों की भी राजनीति होती है। कभी फतवा पितृसत्‍तात्‍मक समाज के मूल्‍यों को बरकरार रखने का ज़रिया बनता है तो कभी फतवा अपने मसलक (पंथ) को दूसरे से बेहतर साबित करने का ज़रिया। सवाल है कि फतवों के जरिये कैसा समाज बनाने की कोशिश हो रही है।

Comments

avinash said…
देखिए, मैं भी नहीं जानता था कि फतवा क्‍या होता है। ठीक-ठाक शब्‍द का सांस्‍कृतिक कबाड़ा ऐसे ही किया जाता है। जैसे ख़‍िलाफत को ख़‍िलाफ़ के संदर्भ में और ख़ुलासा को विस्‍तार के संदर्भ में इस्‍तेमाल किया जाता है। लेकिन ज़रूरी बात ये है कि आपने अपने इस राइट अप से हिंदुस्‍तानी कठमुल्‍लाओं की अंधेरगर्दी पर टॉर्च मारने का काम किया है।
ऐसे विषयों पर और लेखन चाहिए.. आप जैसे और लेखक चाहिए..
फतवा, जिहाद, काफिर आदि ऐसे शब्द हैं जो इस्लाम को कभी आगे नहीं बढ़ने देंगे। और इसका खामियाजा भारत को भोगना पड़ेगा।
समाज के इन अनछुये topics पर अब खुल कर बोलने की जरुरत है । आपको साधुवाद , इन विषयों को जगह देने का , सच तो यह है कि अब हर धर्मावलंबी को यह निर्णय लेना है कि उनके हर फ़ैसले उनके अपने स्वंय के हों और उन पर किसी भगवा धारी, ढाढी धारी और चोगा धारियों का मनहूस साया भी न पडे ।
Mired Mirage said…
नासिर जी , आपका लेख पढ़कर एक भ्रान्ति दूर हुई । इसी तरह से हमें विभिन्न प्रथाओं, शब्दों ,कानूनों व उनके कारणों आदि के बारे में बताते रहिये । जब हम सब साथ रहते हैं तो एक दूसरे के बारे में जानना आवश्यक है ।
घुघूती बासूती