मीडिया का योगी... योगी (1)

एक ब्‍‍लॉग पर मीडिया की साम्‍‍प्रदायिकाता पर भगत सिंह की टिप्‍पणी पोस्‍‍ट की गयी थीउसके बाद फिर एक पोस्‍ट हुआ, जिसमें मीडिया के बारे में राय जाहिर की गयी थीमैंने उस पोस्‍‍ट की टिप्‍पणी में वादा किया था कि ढाई आखर पर जल्‍द ही मीडिया की साम्‍प्रदायिक भूमिका पर एक विश्‍‍लेषण पोस्‍ट किया जायेगा। इस काम को आसान बना दिया मेरे दोस्‍त मनोज कुमार सिंह ने। मनोज गोरखपुर के रहने वाले हैं। पेशे से पत्रकार हैं लेकिन सामाजिक सरोकार वाले पत्रकार। पिछले दिनों गोरखपुर में जो हिंसा हुई, उसे इन्‍हें काफी नजदीक से देखा। जो देखा, जो पाया और जो पढ़ा, मनोज ने इसी के बिना पर अपने ही पेशे के काम की पड़ताल की है।
र्कुलेशन ढ़ाना है तो योगी... योगी कहना है
गोरखपु में दिसम्बर 22, 23 व 24 को गोरखपुर में आयोजित विश्व हिन्दू महासंघ के सम्मेलन के दौरान गोरखपुर की मीडिया ने योगी आदित्यनाथ के प्रति जो आदरणीय भाव दिखाया था, वह गोरखपुर में जनवरी में हुए साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान वीभत्स रूप में देखने को मिला। बाहर से आये मीडिया के नुमाइंदों को स्थानीय मीडिया के योगीमय रूप का जनवरी-फरवरी की हिंसा के दौरान कई बार साक्षात्कार हुआ और वे स्थानीय मीडिया के इस रूप को देख हतप्रभ रह गये। स्थानीय मीडिया ने लगभग एकतरफा रिपोर्टिंग की। हिंसा की शुरुआत की वजह माने जाने वाली एक युवक राजकुमार अग्रहरि की हत्या का जिक्र तो बार-बार किया गया लेकिन इस घटना की असली वजह बताने की तकलीफ मीडिया ने नहीं उठायी।
असली वजह थी, डीएवी डिग्री कॉलेज में शादी के रिसेप्शन के दौरान चल रहे आर्केस्ट्रा की महिला कलाकारों के साथ छेड़खानी और उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ाना तथा उन पर कट्टे से फायरिंग करना। संयोगवश उसी समय सड़क पर मोहर्रम का जुलूस निकल रहा था और कट्टे से चली गोली जुलूस में शामिल चार युवकों को लग गयी। इसी के बाद भीड़ द्वारा एक युवक राजकुमार अग्रहरि पर हमला किया गया था और घटनास्थल से लगभग एक किलोमीटर दूर इस्माइलपुर मुहल्ले में एक व्यापारी शुभकरन जालान की कार के जला देने तथा दो अन्य कारों को क्षतिग्रस्त कर देने की घटना हुई थी।
एकाधिक समाचार पत्रों में शुभकरन जालान के घर को जला देने की बात लिखी गई जबकि कार उनके घर के पोर्च में खड़ी थी और कार में आग लगने के कारण पोर्च की दीवार काली पड़ गई थी। इस आधार पर ही घर को जला देने की कोशिश की बात कही गई। दूसरी ओर, सुबह करीब नौ बजे, इसी स्थान पर योगी के पहुँचने पर मज़ार का चैनल गेट तोड़ कर उसमे आग लगाने तथा असलहों से धुआँधार फायरिंग करने, अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार करने व चाकू, छुरी व तलवार का प्रदर्शन किये जाने की घटना को मीडिया ने नज़रअंदाज ने कर दिया। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि मज़ार में आगजनी के दौरान फोटो लेने की की कोशिश करने वाले 'राष्ट्रीय सहारा' के फोटोग्राफर मुकेश पर न केवल हमला किया गया बल्कि उनका कैमरा भी तोड़ने की कोशिश की गयी। फोटोग्राफर के साथ हुई यह घटना सिर्फ एक समाचार पत्र 'हिन्दुस्तान' में संक्षिप्त खबर के रूप में छपी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि फोटोग्राफर पर हमला मज़ार में आगजनी की घटना को कैमरे में कैद न होने देने के लिए किया गया था। इसी दिन शाम को रेलवे स्टेशन के सामने योगी की सभा के दौरान रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन के बीच स्थित अल्पसंख्यकों की पाँच दुकानों में आगजनी, लूटपाट व तोड़फोड़ की घटना की गई। मशाल जुलूस के दौरान एक मज़ा़र व अल्पसंख्यकों की बंद दो दुकानों पर पथराव किया गया। प्रशासन ने संभवत: इन्हीं घटनाओं के मद्देनज़र योगी को 28 जनवरी को गोलघर में सभा नहीं करने देने का और उन्हें शांतिभंग के अंदेशे में गिरफ्तार करने का फैसला किया लेकिन मीडिया ने इन घटनाओं को लगभग नजरअंदाज कर दिया। मीडिया की सुर्खिया थीं-प्रशासन ने योगी की श्रद्धाजंलि सभा नहीं होने दी। एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल आईबीएन 7 ने भी इसी को प्रमुखता दी। 'इंडिया टुडे' के 14 जनवरी के अंक में 'देर तक बने रहेंगे ज़ख्म' में भी इन सभी घटनाओं का जिक्र नहीं है। सिर्फ राजकुमार अग्रहरि की हत्या और व्यापारी शुभकरण जालान का घर जला देने और कई वाहनों-मकानों में जमकर तोड़फोड़ की खब़र है। अगले दिन धरना और फिर अगले दिन योगी, डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल, डॉ. वाईडी सिंह व शिव प्रताप शुक्ल की गिरफ्तारी और हिंसा, पड़ोसी जिलों और बाद में गाँव-कस्बों में तनाव फैलते जाने की बात कही गयी है। 'आउटलुक' के 12 फरवरी के अंक में भी योगी के इस्माईलपुर में पहुँचने पर स्थिति के नियंत्रण से बाहर हो जाने की बात कहते हुए जिलाधिकारी से धक्कामुक्की किये जाने की बात कही गई है। मजार जलाये जाने और फायरिंग किए जाने का कोई उल्लेख नहीं है। 27 जनवरी की शाम को योगी द्वारा मशाल जुलूस निकालने और उनके द्वारा दिये गये भाषण 'यदि वे हमारे एक भाई को मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे` का इसमें उल्लेख है लेकिन उसी वक्त स्टेशन रोड पर अल्पसंख्यकों की पाँच दुकानों को जलाय़े जाने का ज़िक्र नहीं है।
ज़ाहिर है कि यदि राजकुमार अग्रहरि की हत्या और व्यापारी की कार जलाने व तोड़े जाने की घटना के बाद योगी की गिरफ्तारी के बीच की घटनाओं को जानबूझ कर उल्लेख न किया जा़ये तो कोई भी यही निष्कर्ष निकालेगा कि योगी को सभा करने दिया गया होता तो क्या बिगड़ जाता।
  • राजकुमार अग्रहरि की हत्या के मामले में कोई कार्रवाई न होने का भी बार-बार जिक्र किया गया। 'युनाइटेड भारत' अखबार ने राजकुमार अग्रहरि की हत्या के पाँच दिन बाद दो फरवरी को प्रथम पृष्ठ पर 'अब तक पकड़े नहीं जा सके हत्या के आरोपी` शीर्षक से खब़र छापी कि राजकुमार अग्रहरि की हत्या के अभियुक्तों की गिरफ्तारी नहीं हो रही है। इस समाचार के प्रथम पैरा में ही लिखा गया है कि-'बीते २६ फरवरी की रात पुलिस कस्टडी में जिस राजकुमार अग्रहरि पर हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया गया उसके नौ आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस सिर्फ अब तक छह को ही गिरफ्तार कर सकी है।` सवाल यह उठता है कि जब नौ में से छह आरोपी गिरफ्तार क़िये जा चुके थे तब इस तरह का शीर्षक क्यों लगाया गया? क्या यह हिन्दू भावनाओं को भडकाने का प्रयास नहीं था? 29 जनवरी की शाम 8 बजे राशिद नामक युवक की हत्या की घटना में भी मीडिया ने अपने इकतरफा रवैये का परिचय दिया। 30 जनवरी के अंक में प्रथम पृष्ठ पर 'राष्ट्रीय सहारा ' में युवक की हत्या तथा एक युवक के गंभीर रूप से घायल होने की खबर छापी गई लेकिन पृष्ठ तीन पर फोटो उस घायल चंदन विश्वकर्मा की छापी जिसे पुलिस ने राशिद की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया है। फोटो कैप्शन था-'अज्ञात लोगों द्वारा चलायी गयी गोली से घायल होने के बाद जिला अस्पताल में भर्ती चंदन विश्वकर्मा।' 'दैनिक जागरण` ने लिखा की 29 जनवरी की शाम कफर्यू में ढील के दौरान राजघाट थाना क्षेत्र के मिर्जापुर मुहल्ले में हार्वट बांध पर तीस वर्षीय युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गयी, वहीं भाजपा पार्षद सौरभ विश्वकर्मा के भाई चंदन विश्वकर्मा गोली लगने से घायल हो गये। 'हिन्दुस्तान` के प्रथम पृष्ठ पर कफर्यू में ढील के दौरान शाम चार बजे मोटरसाइकिल पर सवार अज्ञात बदमाशों द्वारा भाजपा पार्षद सोनेलाल विश्वकर्मा के भाई चंदन विश्वकर्मा को गोली मार दने की बात कही गई है। 'आउटलुक' ने राशिद को रोशन बना डाला। 'आउटलुक' के 12 फरवरी के अंक में लिखा गया -'कफर्यू में ढील के दौरान 29 जनवरी को राजघाट थाना क्षेत्र के मिर्जापुर मोहल्ले में हार्वट बांध पर 27 वर्षीय युवक रोशन की गोली मार कर हत्या कर दी गई वहीं भाजपा पार्षद सौरभ विश्वकर्मा के भाई चंदन विश्वकर्मा गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गया।` इसी खबर में आगे लिखा गया है कि 'स्थिति की नाजुकता को भांपे बगैर कफ्र्यू में छह घंटे की ढील दिये जाने का ही तकाजा था कि रोशन दंगाइयों का शिकार हो गया। नतीजतन गुस्साए वकीलों ने जिलाधिकारी कार्यालय में तोड़फोड़ कर अपना गुस्सा निकाला।' गोरखपुर में सब जानते हैं कि राशिद की हत्या और वकीलों के तोडफोड की घटना से कोई सम्बन्ध नहीं था। लेकिन दोनों घटनाओं को बेतुके तरीके से जोड़ दिया गया।
  • चंदन और उसका भाई सौरभ विश्वकर्मा हिन्दू युवा वाहिनी से जुड़े हुए हैं और चंदन विश्वकर्मा सन् 2003 में होली के दिन मौलाना साबिर की हत्या में भी अभियुक्त था। मौलाना साबिर की हत्या के बाद विनय श्रीवास्तव की हत्या हुई थी और शहर में कफर्यू लगाना पडा था। चंदन विश्वकर्मा का नाम विवेचना के दौरान पुलिस ने अज्ञात दबाव में निकाल दिया था। हाल में पार्षद चुनाव में इन्हीं विश्वकर्मा बन्धुओं ने नीम के पेड पर पूजा होने के मामले को लेकर साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न कर दिया था, जिसका लाभ सौरभ को पार्षद चुनाव में जीत के रूप में मिली। एक समाचार पत्र में चंदन को गोली मारे जाने की खबर भी छपी। इतने दिनों बाद अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि चंदन ने राशिद की हत्या दंगा भड़काने के उद्देश्य से की थी और अपने ऊपर मुसलमानों द्वारा हमला साबित करने के लिए अपने ही पैर में गोली मार ली। चंदन विश्वकर्मा का आपराधिक रिकार्ड है। कोई भी पत्रकार यदि राजघाट थाने पर चला गया होता तो राशिद की हत्या और चंदन के घायल होने की पूरी कहानी सामने आ गयी होती लेकिन किसी ने तथ्य जानने की कोशिश नहीं की। इन पंक्तियों को लिखने वाला यदि खुद रात को 11 बजे राजघाट थाने न गया होता, जिला अस्पताल में घायल चंदन विश्वकर्मा से न मिला होता तथा अगले दिन रहमत नगर जाकर राशिद के परिजनों तथा मुहल्लेवासियों से बातचीत न की होती तो इस तथ्य का खुलासा न हुआ होता। 'दैनिक जागरण' ने राजकुमार अग्रहरि के परिजनों से बातचीत कर एक खब़र बनाई लेकिन आज तक किसी भी स्थानीय समाचार पत्र ने राशिद के पारिवारिक पृष्ठभूमि पर खब़र नहीं लिखी। पडरौना में साम्प्रदायिक हिंसा में शिकार सैफुल्लाह के बारे में भी समाचार पत्रों में कुछ नहीं देखने को मिला।
  • योगी की गिरफतारी के बाद गोरखनाथ क्षेत्र में आगजनी, लूटपाट, तोडफोड की घटनाओं के बारे में भी मीडिया का यही रवैया रहा। 29 जनवरी की सुबह अफवाह फैल गयी कि गोरखनाथ मंदिर की दीवार ढाह दी गयी है। इस अफवाह की सचाई पता करने के बजाय मीडिया कर्मी इसे प्रसारित करते रहे। तत्कालीन जिलाधिकारी डा। हरिओम ने अपनी पत्रकार वार्ता में इस सम्बन्ध में सवाल पूछे जाने पर अनुरोध किया कि पत्रकार स्वयं मौके पर जाकर स्थिति देख लें। दीवार नहीं ढही है, बल्कि मंदिर की पीछे की चहारदीवार की उपरी हिस्से की कुछ ईंटें गिर गयीं हैं। पता नहीं कितने पत्रकार मौके पर गये लेकिन मौके का निरीक्षण करने व फोटोग्राफ देखने से स्पष्ट हो रहा था कि मंदिर परिसर के अंदर से तथा इसके जवाब में बाहर से किये जा रहे पथराव के कारण ही चारदीवारी की कुछ ईंटें सरक गयीं जिसको दीवार का ढहना बता कर प्रचारित किया गया। मौके पर मिले सुरक्षा कर्मियों ने भी यह बात कही। अगले दिन 30 जनवरी को 'राष्ट्रीय सहारा' ने प्रथम पृष्ठ पर क्रासर में गोरखनाथ मंदिर की चहारदीवारी क्षतिग्रस्त होने की खबर छापी। खबर के अन्दर लिखा गया था कि 'गोरखनाथ मंदिर की चहारदीवारी क्षतिग्रस्त किए जाने के बाद कफर्यू लगा दिया गया।' 'दैनिक जागरण' ने लिखा कि 'मंदिर की पश्चिमी चहारदीवारी के पीछे से कुछ अराजक तत्वों ने मंदिर परिसर में पथराव करना शुरू कर दिया। पश्चिमी चहारदीवारी तोड़ने की भी कोशिश की गई। इसी बीच पुलिस सतर्क हो गई लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में लोगों ने चहारदीवारी से सटे एक घर में तथा एक कबाड़ी के गोदाम में और पास खड़े डीसीएम में आग लगा दी।` इसी समाचार पत्र में पृष्ठ संख्या चार पर 'कफर्यू की गरमी में दौड़ती रही अफवाहों की सिहरन' में लिखा गया है कि- मंदिर की दीवार ढहने की अफवाह ने न केवल गोरखपुर वरन समीपवर्ती जिलों के लोगों को भी गरम कर दिया।' जब अफवाह को सच मानकर छापा जाएगा तो कोई भी गरम हो जायेगा।
  • गोरखपुर की घटनाओं को 'गोरखपुर में गदर' की संज्ञा देने वाले आई बी एन 7 ने महराजगंज में साम्प्रदायिक झड़प के दौरान एक की मौत हो जाने की खबर प्रसारित की। यह खबर एक दिन पूर्व से प्रसारित हो रही थी जबकि महराजगंज में आज तक कोई भी व्यक्ति साम्प्रदायिक हिंसा में नहीं मरा है। पनियरा में जरूर मारपीट की घटना हुई थी लेकिन किसी की मौत नहीं हुई थी। इसी प्रकार 30 जनवरी को कफर्यू में छूट की सूचना इलेक्ट्रॉनिक चैनलों द्वारा प्रसारित कर दी गई जबकि इस दिन कफर्यू में कोई छूट नहीं दी गई थी। इस झूठी सूचना के प्रसारित होने से बहुत से स्थानों पर लोग सड़क पर उतर आये और उन्हें पुलिस की लाठी खानी पड़ी।
  • दूसरी ओर कुशीनगर जिले में नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत़्र में रास्ता जाम कर रहे हिन्दू युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज के बाद मची भगदड़ में एक वर्ष का एक बच्चा मर गया और उसकी मां घायल हो गई। एक अन्य वृद्धा की भी जीप से कुचलकर मौत हो गई। यह खबर साम्प्रदायिक हिंसा के बुरे प्रतिफलन के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण बनाकर प्रस्तुत की जानी चाहिए थी लेकिन योगी की जय जयकार में एक दूसरे से आगे निकलने की होड में स्थानीय मीडिया के साथ-साथ यहां आये इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को भी यह नहीं सूझा। गोरखपुर में गोरखनाथ पुल पर एक भिखारिन महिला द्वारा एक बच्ची को जन्म देने की घटना जरूर सुर्खी बनी लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया कि महिला और बच्ची की मदद करने के लिए तनाव व भय के इन क्षणों में भी भारी संख्या में लोग सामने आये और किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि महिला किस जाति या धर्म की है। (जारी)

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