बिछुडना एक भतीजे का अपनी चाची से

भाई संजय बेगाणी ने कल एक पोस्ट लिखी। मैं कमेंट लिख रहा था लेकिन वो काफी बड़ा हो गया। मुझे लगा कि इस माहौल में अगर यह कमेंट भेजा, तो न जाने इसके कितने निहितार्थ निकाल लिये जायें। फिर इतने बडे़ कमेंट के लिए उनकी जगह क्यों बर्बाद की जाये। तो इसलिए ढाई आखर पर दे रहा हूं। मैं शीर्षक में "एक भतीजे" की जगह संजय लिखना चाह रहा था लेकिन लगा कि इस पर आपत्ति न हो जाये।
संजय लिखते हैं_

'फिर एक दिन चाची ने अपना घर बेच दिया. चाचा दुनिया में थे नहीं, कई जिम्मेदारियाँ थी. दो जवान बेटीयाँ थी, बेटे शायद अरब में कहीं गए हुए थे, तो बहूंए पौते पौतियों की ज़िम्मेदारी भी थी. आर्थिक संकट रहा होगा. वे मुस्लिम बहूल मोहल्ले में छोटा घर लेकर रहने चले गए.'


भाई संजय पहली बार आपके ब्लॉग पर टिप्पणी कर रहा हूँ। अन्यथा नहीं लेंगे। ज़रा सोचियेगा कि आपकी चाची मुस्लिम बहुल मोहल्ले में क्यों रहने चली गयीं? क्या सिर्फ इसलिए कि चाचा नहीं थे... क्या सिर्फ इसलिए कि आर्थिक संकट था... या जहां वो इतनी घुली मिली थीं, वहां उन्हें वो सुरक्षा का अहसास नहीं मिल रहा था, जिसकी गुजरात जैसे माहौल में उस वक्त सख्त जरूरत थी। आप अहमदाबाद में रह रहे हैं न। जजेज बंगलो रोड, वसतरापुर, जैसे इलाकों से मकान बेचकर मुसलमान झुहापूरा में क्यों चले गये। एेसा भी नहीं है कि वहां सुविधा ही सुविधा है। मैं जिस दौरान वहां गया था, वहां कई दिनों से पानी नहीं आया था।


ये आप भी जानते होंगे कि चीन की दीवाल की तरह एक पूरी दीवाल खड़ी की गयी है, जो झूहापूरा को पड़ोस के हिन्दू मोहल्ले से अलग करती है। झूहापूरा को पाकिस्तान कहा जाता है। ऐसा क्यों भई?


हम यही कहना चाहते हैं कि संजय बेगाणी जी अपनी चाची से जिस वजह से जुदा हो गये, उसकी वजह एक खास विचारधारा है। जो सदियों से साथ रहने वाले हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग-अलग देखना चाहती है। उसका मानना है कि ये दोनों दो विपरीत ध्रुव हैं। इनका मिलन नहीं हो सकता। मिलन न हो, उसके लिए नफरत जरूरी है। वरना यह कैसे मुमकिन है भाई संजय कि नरोदा पाटिया में एक गर्भवती औरत का पेट फाड़ दिया जाये और उसके भ्रूण को तलवार से निकालकर आग के हवाले कर दिया जाये। ... क्या बिना नफरत के यह मुमकिन है। क्या आप ऐसा कर पायेंगे?


... इसलिए आपको और गम्भीरता से सोचना चाहिए कि आखिर आपकी चाची क्यों चली गयीं। आपको मौका मिले तो उनसे बात करनी चाहिए ...और अपने आस पड़ोस में भी पता कीजियेगा कि अगर आपकी चाची या कोई और, जिसके साथ मुसलमान शब्द जुड़ा है, अगर उनका पड़ोसी बनना चाहे तो क्या वे उसके लिए राजी हैं... राजी हैं तो क्या वे उनसे वादा कर पायेंगे कि जब दंगाई आयेंगे तो सब ढाल बन जायेंगे ... एक और बात ... आप आईटी से जुडे़ हैं, ज़रा पता कीजियेगा कि बीपीओज़ और कॉल सेंटर में कितने मुसलमान हैं? मैं हाल में दो बार अहमदाबाद और आसपास होकर आया हूँ। कुछ जानकारी मेरे पास भी है... कुछ आप बतायेंगे... इन सबके जवाब से शायद आपको अपनी चाची से बिछुड़ने का जवाब तलाश करने में मदद‍ मिले। जवाब जल्दबाज़ी में नहीं दीजियेगा...


कई बार अपने तर्क को कसौटी पर कसने और सीखने के लिए भी, जिन्हें आप विरोधी मानते हैं, उनकी चीज़ें भी देखनी आर पढ़नी चाहिए। अगर आपने राकेश शर्मा की फाइनल सोल्यूशंस और राहुल ढोलकिया की परज़ानिया नहीं देखी है तो एक बार देख लें,कई सवालों के जवाब तलाशने में मदद मिलेगी... अगर सवाल हैं तब...

Comments

कई बार अपने तर्क को कसौटी पर कसने और सीखने के लिए भी, जिन्हें आप विरोधी मानते हैं, उनकी चीज़ें भी देखनी आर पढ़नी चाहिए।
यह सही लिखा आपने!
Farid Khan said…
दीवार खडी करने की, पूंजीवाद की पूरानी नीति रही है.इससे समुदाय विषेश को लक्ष्य करने में काफ़ी आसानी होती है. इससे मौलिक प्रश्नों से ध्यान बँटाने में काफ़ी असानी होती है.

अब तो सिर्फ हिन्दू मुस्लमानों को ही नहीं बँटा जा रहा है,अपितु हिन्दुओं को गुर्जर और मीणा में बाँट दिया गया, सवर्ण और अवर्ण में बाँट दिया गया,पंजाबियों को सिख्खों को डेरा सच्चा सौदा में बाँट दिया गया,सद्दाम को फँसी देकर मुस्लमानों को शिया और सुन्नियों में बाँट दिया गया,

अभी तो भी टुकडे होंगे....
Mired Mirage said…
जोड़ने के बजाय बाँटने की यह नीति किसी का भी भला नहीं करेगी ।
घुघूती बासूती