गांधी जी की ताबीज और वाइब्रेंट गुजरात

मैं कोई ताबीज नहीं बांधता। मैं गांधीवादी भी नहीं हूं लेकिन मुझे गांधी जी की ताबीज पसंद है। यही ताजीब मुझे साबरमती आश्रम के दीवारों पर दिख गई। मैंने सोचा, क्‍यों न साबरमती के संत की ताबीज, उनकी ही जन्‍मभूमि यानी गुजरात के 'वाइब्रेशन' पर आजमा कर देखी जाए।

Nasir-Gandhi

गांधी जी की ताबीज

गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा?

हिंसा की बात नहीं

पांच साल से गुजरात को 'वाइब्रेंट' बनाने का दावा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि गुजरात प्रगत‍ि की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। (हालांकि मुझे नहीं मालूम कि गुजरात प्रगति में कब बिहार, पश्चिमबंगाल, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश या राजस्‍थान जैसे बड़े राज्‍यों से पीछे था और पांच साल में कैसे इसे इन राज्‍यों से आगे कर दिया गया।) जो लोग भी थोड़ी आलोचना करते हैं, उन्‍हें कहा जाता रहा है 'गुजरात का विकास हो रहा है और आप हिंसा और हिन्‍दू-मुसलमान की बात कर रहे हैं।' चलिए आज हम हिंसा, हिन्‍दू-मुसलमान की बात नहीं करेंगे। हम यह कतई नहीं कहेंगे कि अहमदाबाद के वेजलपुर, वस्‍त्रापुर की तुलना में जुहापूरा या सरखेज में पानी-बिजली-सड़क-स्‍कूल की हालत काफी खराब है। हम यह भी नहीं कहेंगे कि किस जगह किस मजहब के मानने वाले लोग रहते हैं। हम दूसरी बात करेंगे। हम गांधी जी की ताबीज के मुताबिक अपनी दुविधा दूर करने के लिए गरीब औ दुर्बल व्‍यक्ति की बात करेंगे। हम उसकी बात करेंगे, जिसकी बात बड़े शहरों के चकाचौंध में खोती चली जा रही है।

किसान आत्महत्या कर रहे हैं

हम आज सिर्फ गांधी जी की ताबीज को परखेंगे। किसान अन्‍नदाता है, शायद हम सभी ने बचपन में यह लाइन जरूर पढ़ी होगी। आइये देखें वाइब्रेंट गुजरात में किसान कहां है? क्‍या आपको पता है कि गुजरात में भी किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं?

नहीं, तो हम बताते हैं। सन् 2004 में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में 'विकासपुरुष' नरेन्‍द्र भाई मोदी ने जोरदार तरीके से कहा था कि गुजरात में एक भी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की है। ... एक महीने बाद ही भाई को विधानसभा में मानना पड़ा कि गुजरात में 148 किसानों ने आत्‍महत्‍या की। ... लेकिन सच इससे भी डरावना था। फिल्‍मकार राकेश शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता भरत झाला ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से एक जानकारी मॉंगी। उस जानकारी के जवाब चौंकाने वाले हैं। बकौल राकेश शर्मा, 'पांच महीने की जद्दोजहद के बाद दस अक्‍टूबर 2007 को गुजरात सरकार ने बताया कि राज्‍य में 498 किसानों ने खेती की परेशानियों से तंग आकर आत्‍महत्‍या की है। यह आंकड़ा भी अधूरा है। मेरी नई फिल्‍म में ऐसे करीब 6695 किसानों की मौतों का हवाला है, जिनकी मौत की वजह 'दुर्घटना' बतायी गई। इन किसानों को बीमा योजना का भी लाभ नहीं मिला है।' न...न यह किसी मोदी विरोधी के दिमाग की उपज नहीं है। यह किसानों की आत्‍महत्‍या का स‍रकारी आंकड़ा है। सूचना के अधिकार के तहत मिले आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्‍महत्‍या का जिलावार आंकड़ा कुछ यूँ है- राजकोट (63), जूनागढ़ (85), अम्रेली (34), मेहसाणा (48), नाडियाड (44), जामनगर (55), नर्मदा (30) और भाई नरेन्‍द्र मोदी की नाक के नीचे गांधीनगर में 13 किसानों ने आत्‍महत्‍या की।

बाढ़ की तबाही

यही नहीं। विकास की दिशा क्‍या है, यह भी देखें। सौराष्‍ट्र में पिछले दिनों बाढ़ आई थी। राकेश शर्मा की नई फिल्‍म 'खेड़ु मोरा रे' में एक किसान बताता है, 'गोखरवाड़ा (जिला सुरेन्‍द्रनगर) में कुछ सालों पहले तक बाढ़ की तबाही नहीं होती थी। जब से सुजलम सुफलम योजना शुरू हुई और चेक डैम बनाए जाने लगें, तब से हर साल जल जमाव और बाढ़ की परेशानी शुरू हो गई है।' यही नहीं मोदी ने किसानों की राहत के लिए पैकेज की घोषणा की। सन् 2007 की बात कौन करे, सन् 2005 में एलान किये गए पैकेज का एक पैसा भी किसानों को नहीं मिला। यही नहीं बाकि राज्‍यों की तरह यहां के किसान भी सेज का विरोध कर रहे हैं। भावनगर और काठिवादर इसके उदाहरण हैं।

लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं

सरदार वल्‍लभ भाई पटेल की जन्‍मस्‍थली गुजरात है। आणंद जिला का करमसद इलाका। क्‍या आपको पता है कि वाइब्रेंट गुजरात का दावा करने वाले जिन पटेल का नाम लेते नहीं अघाते, उन लौह पुरुष के इलाके में बिजली नहीं है। सड़क का हाल बुरा है। यह हम नहीं, टीवी कैमरे के सामने वहां के लोगों ने बताया है।

अंत में

अब आप गांधी जी की ताबीज को एक बार फिर याद कीजिये और खुद अंदाजा लगाइये कि कितना और किनके लिए वाइब्रेंट है, गुजरात। जरा इस पर भी गौर फरमाइये कि अगर वाकई में गुजरात वाइब्रेंट है, तो फिर नरेन्‍द्र भाई मोदी को तेजाबी भाषण पर क्‍यों उतरना पड़ा ? क्‍यों उन्‍हें चुनाव नजदीक आते-आते विष वमन पर ही भरोसा करना पड़ रहा है? क्‍यों नहीं, वह विकास पर ही टिके रहें? क्‍यों वे ही उनके चुनाव का मुद्दा बन गए, जो नाम से एक खास मजहब के मानने वाले लगते हैं ? गांधी जी की ताबीज इन सवालों का जवाब खोजने में आपकी मदद करेगी, यही दुआ है। आमीन।

इसे भी पढ़ें

कौन हैं 'गुजराती' ?

क्‍या मोदी की पारी के अंत की शुरुआत हो गई?

एक "गुजराती" की तलाश

Comments

नासिरूद्दीन भाई किसे बता रहे हो यह सब...लोग जानना ही नहीं चाहते हैं....लोगों के लिए विकास नहीं हिंदुत्व अधिक महत्वपूर्ण है...इस देश का तो कौन मालिक है...कुछ नहीं पता.....सब मोदी की माया में हैं..
kuch mahine pahle gujarat ko lekar apne blog par likha tha, yah 2004 ke desember ke bat hai.
पिछले दिनों रवीश जी के ब्लाग पर अहमदाबाद का जातिवाद में वहां का अनुभव याद आ गया, आप लोगों से बाँट रहा हूँ। फिर बतायें कि वहां का समाज किस क़दर बँटा है। ...विनीत
वह २८ दिसंबर,२००४ की शाम थी. कुन-कुने ठंड के मौसम में अहमदाबाद के शाह आलम रोजा इलाके में बैठा था। मेरे साथ कैम्प से जुडे स्वयंसेवी लोग थे। इनमें स्थानीय पत्रकार भी थे। ठंड से बचने के लिए बेहतर चाय का स्वाद सभी ले रहे थे।
दो मंजिले भव्य शापिंग काम्प्लेक्स में हो रही हमारी बातचीत अहमदाबाद में पिछले दिनों हुआ गैंग रेप पर आकर टिक गई। मौक़े पर मौजूद पत्रकार मित्र का बयां वहां की स्थिति पेश करने के लिए काफी था। दोस्तो, मैंने सहमति से batcheet रिकॉर्ड कर लिया।आज जब इस बात के करीब ढाई साल होने को हैं, अभी भी प्रासंगिक है।
गैंग रेप नेचरल कम्यूनल नहीं था, परंतु उसे आप कुछ हद तक कास्ट या लेटेस्ट फिलिंग, जो जेनरेट किया गिया है, उस पर ही (आधारित था )।
तीन-अक रोज, किसी पेपर में (नाम तो याद नहीं है ) काण्ड का जिक्र करते हुआ कहा गया था कि ग़ैर- गुजराती समुदाय के लोगों ने रेप किया।
इसका मतलब यह हुआ कि गुजराती रेप करता तो वह jastfied था , ग़ैर-गुजराती किया तो उसे गाली दो।
दूसरा मैं अगजम्पल दूँ कि इंडिया -पाकिस्तान (क्रिकेट ) मैच था (यहाँ पर )। मैच, कभी भी हो तो अलग टेंशन रहता है (यहाँ पर )।...
इंडिया -पाकिस्तान मैच में इंडिया जीता था। उस दिन सहवाग ने अच्छा स्कोर किया था। एक समाचार पत्र में छोटा से बाक्स में खबर थी कि कल मंगलवार का दिन था। हनुमान का दिन था। हनुमान ने आकर पाकिस्तान के खिलाफ मैच जिताया। उसके चार दिन बाद रविवार के रोज श्रीलंका से मैच हार गया (भरत )। मैने मित्रों से पूछा कि (क्या ) रावण से भारत मैच हार गया।
...
...



अक्सर एक पर्सेप्सन partikularlee मुस्लिम के आन् -वे है। कुछ हद तक सही भी है कि हिंदू क्राइम करता है तो इतना बोल्द्ली नहीं लिया जाता। मतलब अगर हिंदू के पास एक-दो रिवाल्वर मिल जाते हैं तो फ्री आइटम होगा। और अगर मुस्लिम के पास मिलता है तो लम्बा सिलसिला चलता है, क्या इसका आइएसआई कनेक्शन है, राइट में रोल था, नहीं था।
मुस्लिम और हिंदू, जब आओ इन्दिविज्व्ली की बात करो तो दोनों तरफ है। अक्सर आप मुसलमानों की बात करें तो कहेंगे कि गुजराती लोग एसा करते हैं। (यहाँ सवाल यह है कि ) वो गुजराती है तो तुम क्या हो? वही गुजरातियों में है, वो तो मुस्लिम है.

ya is par aayen
http://vinitutpal.blogspot.com/2007/06/blog-post_26.html
alok putul said…
जिस देश में लाख भर से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हों (इतिहास में पहली बार)और मीडिया तक को किसानों के सर पर झुलती रस्सी नहीं नजर आती हो, उस समाज का क्या किया जा सकता है ? अब पिछले दो दिनों से मैं देख रहा हूं कि हिंदी के समाचार चैनल राखी सावंत की चोली की रस्सी बांधने में लगे हुए हैं. इसमें हम सब बराबर के हिस्सेदार हैं. मोदी को अकेले गरियाने से कुछ नहीं होगा.
alok putul said…
जिस देश में लाख भर से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हों (इतिहास में पहली बार)और मीडिया तक को किसानों के सर पर झुलती रस्सी नहीं नजर आती हो, उस समाज का क्या किया जा सकता है ? अब पिछले दो दिनों से मैं देख रहा हूं कि हिंदी के समाचार चैनल राखी सावंत की चोली की रस्सी बांधने में लगे हुए हैं.
मोदी को अकेले गरियाने से कुछ नहीं होगा. इसमें हम सब बराबर के हिस्सेदार हैं.
Nasiruddin said…
आशीष भाई, कई बार हमें लगता है कि यह नक्कारखाने में तूती की आवाज है। लेकिन बताना और बार-बार दस्तक देना जरूरी है। मुझे ऐसा ही लगता है। वैसे भी हम क्या हैं- जो कुछ कर पाएं। प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया।
भाई विनीत, जहां अविश्वास की वजह सिर्फ किसी का नाम हो, उस समाज में ऐसा ही होता है। अगर हम चिंतित हैं तो हमें सोचना चाहिए कि ऐसा क्‍यूं हो गया। लार्ड मेघनाद देसाई का कहना है कि ऐसा दो दशक पहले नहीं था।
एक कडवी और भयनक सच्चाई ! लेकिन वह क्या कारण हैं कि जिसका फ़ायदा यह हमारे सियासी नेता करते रहे हैं ?
apoorvanand said…
गुजरात एक दिलचस्प दौर से गुजर रहा है . ग्रामीण , आदिवासी और मुस्लिम गुजरात शहरी मध्यवर्गीय गुजरात के राडार पर नहीं है . हममें से ज्यादातर लोगों का साबका इसी शहरी समुदाय से पड़ता है . इस बार गुजरात आने पर ऐसा लगा की अगर गरीब , साधारण जनता से संवाद बढाया जाता तो शायद हालात और हो सकते थे .
आपका विश्लेषण बिल्कुल ठीक है . सिर्फ़ हमारा पढ़ा लिखा हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया इसे देखने और समम्झने को तैयार नहीं और यह कोई अनजाने नहीं है .मध्यवर्ग की क्रूर बेइमानी मोदी की प्रशंषा में दिखाई देती है .
अपूर्वानंद