नन्दीग्राम और मुसलमान

कोलकाता में दो दिन पहले हुए प्रदर्शन से कई लोगों की पेशानी पर चिंता की लकीर खिंच गई है। जिस तरह से वह प्रदर्शन होने दिया गया। पहले से पता होने के बाद सुरक्षा बलों का एहतियाती इंतजाम नहीं किया गया और उसके बाद सेना बुला ली गई... पहले सच्चर कमेटी और उसके बाद नन्दीग्राम ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की बदतर हालत और सरकार का उनके प्रति नजरिया, उजागर कर दिया है। ऐसे में संगठित होते मुसलमान स‍रकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं... इसलिए नौजवान पत्रकार और www.twocircles.net के सम्पादक काशिफ उल हुदा की सलाह है कि भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है। ढाई आखर की गुजारिश पर उन्होंने हिन्दी में यह टिप्पणी भेजी है। हिन्दी में यह उनकी पहली औपचारिक टिप्पणी है।

मुसलामानों की तरक्की के लिए जरूरी है शांतिपूर्ण समाजी और सियासी तहरीक

1977 से वाम मोर्चा पश्विम बंगाम की सत्ता पर काबिज़ है. चुनाव के जरिये सत्‍ता में रहने वाली ये दुनिया की सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार है. वाम मोर्चे के 30 साल तक सत्ता पर बरक़रार रखने का कुछ सेहरा पश्चिम बंगाल के मुसलामानों को भी जाता है. 1977 से हर चुनाव में राज्य के मुसलमान वाम मोर्चे को वोट देते आये हैं.

मुसलामानों एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल मिला. शायद उनके लिए काफी दिनों तक यही बहुत कुछ था। इसलिए उन्होंने तकरीबन 30 साल अपनी ज़िंदगी को बाद से बदतर होते देखा, लेकिन वाम मोर्चे का साथ नहीं छोड़ा. सच्‍चर कमेटी कि रिपोर्ट ने मुसलमानो के पढ़े-लिखे तबके को ज़ोर से झिंझोड़ा. मुसलमान जागे और तंजीमें हरकत में आयीं. सच्‍चर कमेटी ने जो बयान किया, उससे पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की बदतर हालत दुनिया के सामने आ गई. सिर्फ मुसलमान ही क्‍यों, दलितों की हालत भी वहां अच्‍छी नहीं.

खैर, पता ये चला कि मुसलमान यहां हर पायदान पर पिछड़े हैं. पश्चिम बंगाल में ही नहीं बल्कि भारत के दूसरे राज्यों में भी मीटिंग, धरना और कई पहल होने लगी ताकि मुसलमानों की बदतर हालत पर सरकारों का ध्‍यान जाए.पश्चिम बंगाल में कई संगठन पिछले चंद महीनों से काफी सक्रिय हुए. यही नहीं कई बार अपनी मांगें मनवाने के लिए सड़क पर भी उतरे. नंदीग्राम के हादसे ने इन्हें और झिंझोड़ दिया. जो सुरक्षा मिलने का दावा अब तक सरकार करती रही थी, उसकी भी गारंटी नंदीग्राम ने खत्‍म कर दी. अगर मुसलमानो का हाल एक वामपंथी-सेक्‍यूलर हुकूमत में ये हो सकता है तो फिर हिंदुत्व और सॉफ्ट-हिंदुत्व पार्टियों वाली सरकारों से क्या उम्मीद कि जा सकती है?

इन सब वजहों से ही मुस्लिम संगठनों ने मिल्ली इत्तेहाद परिषद बनाने का ऐलान किया और पिछले शुक्रवार को एक ज़बरदस्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें तकरीबन एक लाख लोग शामिल हुए. इस पर्दर्शन कि अगली कड़ी 24 नवम्‍बर को नंदीग्राम मार्च है. पश्चिम बंगाल और उसके बाहर के लोगों ने महसूस किया कि भारतीयों मुसलामानों के बीच एक मूवमेंट शुरू हो रहा है. ...और नंदीग्राम से उठा या मूवमेंट मुसलमानों के बेहतर सामाजिक और आर्थिक न्याय कि लड़ाई लड़ेगा. सियासत में मुसलमानों को सही मुकाम दिलवाएगा.ये मूवमेंट हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा साबित होगा क्योंकि इस देश का सबसे पिछड़ा समाज अपने बलबूते पे खड़ा हो तो यही देश के लिए भी बेहतर है.

नन्‍दीग्राम एक समाजी और आर्थिक मुद्दा है. इससे तसलीमा के मुद्दे जो कि मुसलमानों कि नज़र में एक धार्मिक मुद्दा है, जोड़ना नहीं चाहिए था. ये ग़लती मुसलमान बार-बार करते आये हैं. एक भावानात्‍मक और सांकेतिक मुद्दे पर ज्यादा ज़ोर देते हैं और सरकार पर दबाव डालते हैं. एक बार फिर सरकार ने तसलीमा को बंगाल से बाहर करने की भावनात्‍मक मांग को मान लिया है... इस तरह मुसलमान तंजीमें अपनी जीत का ऐलान कर देंगी... लोग 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का इल्जाम लगायेंगे. नंदीग्राम जो कि समाजी-आर्थिक मुद्दे के रूप में एक तहरीक की शक्ल ले रह था, दम तोड़ देगा.

मुसलमान तंजीम और लीडरों को बेहतर रणनीति बनाकर मुसलमानों को संगठित करना होगा और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाना होगा. यही नहीं, जिंदगी के मसायल और उनसे जुड़े मुद्दों पर अन्य सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठनों के साथ मिल कर काम करमा होगा. मुसलमान भारत कि आबादी के 15 % हैं और कोई भी देश एक बड़ी आबादी को पिछड़ा रख कर विकास नहीं कर सकता.

Comments

sharad said…
your article is good
Priyankar said…
बहुत सही विश्लेषण है काशिफ़ उल हुदा साहब का . उनसे कहिए कि लगातार लिखें .
आपके विचार बहुत अच्छे है. काश सब ऐसा ही सोचे तो कितना अच्छा हो!
Farid Khan said…
इसके अलावा अगर मुसलमान यह चाहते हैं कि अन्य समुदाय का समर्थन हासिल हो तो इसके लिए उन्हें अन्य समुदाय से इंटरएक्शन बढाना होगा । वरना कई बार होता यह है कि अपनी बेवकूफ़ियों से मुसलमान वैसे लोगों की हिमायत खो देते हैं ....जो अन्य समुदाय के होते हुए भी मुसलमानों के विकास को देश के लिए ज़रूरी समझते हैं।
मुझे लगता है कि काशिफ उल हुदा की सलाह "भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है।" ज्यादा परिपक्त है।