हर धर्म सिर्फ़ एक होड. सिखाता है

डॉ. प्रभात टंडन ने ढाई आखर के एक पोस्ट ' इन बुजुर्गों से हम क्यों नहीं सीख लेते' पर अपनी प्रतिक्रिया में कुछ मूलभूत सवाल उठाये हैं। उनकी टिप्‍पणी हालांकि संक्षिप्त है, फिर भी संवाद के बीज उसमें हैं। इसीलिए ढाई आखर के पाठकों के लिए अलग से इस टिप्पणी को दिया जा रहा है। डॉ. प्रभात के बारे में और उनके काम के बारे में उनके ब्लॉग http://drprabhattandon.wordpress.com से जाना जा सकता है। डॉक्टर प्रभात का कहना है-
नासिर भाई, परस्पर सौहार्द की ऐसी घटनायें हमारे समाज मे रोज ही देखी जा सकती हैं लेकिन आवशयकता है उसे सही रूप से दिखाने की . लेकिन हमारा मीडिया क्या करता है , वह सिर्फ़ लाशों के ढेर पर बैठ कर अपने पेपर और चैनल की TRP बढाने मे लगा रहता है. आपको साधुवाद कि ऐसी सच्ची खबरों को सिर्फ़ खबर न मानते हुये उन्हें सही रूप से दिखाया.
लेकिन नासिर भाई , मेरा सिर्फ़ एक प्रश्न , इतने साल हुये हमे धार्मिक हुये , हमारे देश मे तो अलग-२ धर्म के लोग हैं , अलग-२ रीति रिवाज को मानने वाले , लेकिन क्या कारण रहा कि धार्मिक होते हुये भी हमारे बीच परस्पर प्रेम बिल्कुल भी नही दिखता . क्या आप को नहीं लगता कि धर्म आपसी प्रेम और सौहार्द के बीच मे आने वाली रुकावट है. क्या आप नहीं समझते कि हर धर्म को इस संसार से विदा हो जाना चाहिये ?
चलें थॊडी देर के लिये यह मान ले कि हमारे देश मे समस्या हिन्दू और मुस्लिम मे बीच की है लेकिन पाकिस्तान में धर्म को लेकर बवाल क्यों होते रहते हैं. अगर धर्म एक दूसरे को बाँध कर रख पाता तो मुस्लिम देशों मे अपने ही तबकों मे मारकाट क्यों होती रहती है ? सच यह है कि हर धर्म सिर्फ़ एक होड सिखाता है कि हम नम्बर एक पर हैं और जाहिर है कि न. दो पर रहना कोई भी पसन्द नहीं करेगा . यह समस्यायें आप मानो ऐसे ही चलती रहेंगी जब तक कि हम धर्म के असली चरित्र को पहचान नहीं लेते.

टिप्पणियाँ

dhurvirodhi ने कहा…
आदमी आदत से होड़बाज है. सिर्फ धर्म ही नहीं हर खेमा होड़ सिखाता है, देश का खेमा, प्रान्त का खेमा, शहर का खेमा, जात धरम का खेमा. मैं आगे, तू मेरे पीछे. लोग अपने अपने नुक्कड़ों पर जमे बैठे हैं और अपने अपने नुक्कड़ों के सिकन्दर बन बैठे हैं. जव बात धर्म या देश की आती है तो ये होड़ खूनी संघर्ष में बदल जाती है.

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