सहती है क्यों औरत?
-
छह) तुम पूछते हो सहती है क्यों औरत? जवाब क्यों नहीं देती? … ‘‘पिता-पति-पुत्र
ही हैं स्त्री के रक्षक बाप-शौहर-बेटा है निगहबान इसका खानदान का नाम चलाता है
बे...
1 month ago
Posted by Nasiruddin
Labels: मेहमान की जगह, साहित्य
12 comments:
sundar..aabhar ise padhwane ka
नज्म तो सुंदर है ही, आपके ब्लॉग पर लगा यह चित्र ध्यानाकर्षक है। अध्धे इंटों से दबा कर रखा गया हरा कपडा और उस पर रखी फूलों की पंखुडियां।
वाह!
शानदार बैनर चित्र।
क्या अभिव्यक्ति है साब । वाह
गुलज़ार साहब बहक गए। सूर्य ग्रहण के नाम से चन्द्र ग्रहण की छवि बना बैठे! सूर्य ग्रहण में चांद की मुठ्ठी में सूरज का हाथ गु़म हो जाता है।
कोई गल नहीं जी, अक्सर शाएर-कवियों की साइंस कमज़ोर होती है।
सतीश भाई,
शुक्रिया। बैनर के फोटो के बारे में आपको यहां से जानकारी मिल सकती है-
http://dhaiakhar.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80%20Wali
नासिरूद्दीन
itni romanchak nazm padhwane ke liye shukriya..........lajawwab
चिड़ियों का स्लाइड शो बहुत अच्छा लगा।
भाई आप के ब्लाग पर चिड़ियों का स्लाइड शो देखकर मन प्रसन्न हो गया।
नासिर भाई इस नज्म पर मुझे गुलजार की ही एक और कविता याद आ गई. शायद पसंद आए..
चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।
-संदीप राउजी
ब्लॉग की दुनिया में नया दाखिला लिया है. अपने ब्लॉग deshnama.blogspot.com के ज़रिये आपका ब्लॉग हमसफ़र बनना चाहता हूँ, आपके comments के इंतजार में...
Wah Gulzar sahab, Surya grahan aisa hota ho to, roj hi ho...aameen!
Wah Gulzar sahab, Surya grahan aisa hota ho to, roj hi ho...aameen!
Post a Comment