खुदा के लिए Khuda Ke liye, एक जरूरी फिल्‍म

एक खूबसूरत और झकझोर देने वाली फिल्‍म है- खुदा के लिए (Khuda ke liye- In the name of God)।  फिल्‍म कई मायनों में अहम है। यह पाकिस्‍तानी है। इसने पाकिस्‍तानी सिनेमा (Pakistani Film) को फिर से जिंदा कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत-पाकिस्‍तान के बीच एक-दूसरे की फिल्‍मों के दिखाने पर लगी पाबंदी भी,  इसीसे खत्‍म होगी। करीब दो महीने पहले दिल्‍ली में इस फिल्‍म का खास शो देखने का मौका मिला था। पाकिस्‍तान फिल्‍मों की जो छवि दिमाग में बसी है, यह फिल्‍म उसे पूरी तरह तोड़ देती है।

यह तो हुईं ऊपरी बातें। फिल्‍म का तानाबाना 9/11  के आतंकी हमले की पृष्‍ठभूमि में बुना गया है। यह फिल्‍म आज  के समाज के सवाल से टकराती है। यही इस फिल्‍म को खास बनाती है। मुसलमानों की नई और उदारवादी पीढ़ी के कशमकश को जबान देती है।  एक ओर समाज के अंदर पुरातनपंथी  विचार से उसको जूझना पढ़ रहा है तो दूसरी ओर, दुनिया उसे एक खास बने बनाए खाँचे में ही देखना चाहती है। यानी वह आतंक का हरकारा है।  यह पीढ़ी कई ओर से पिस रही है। अंदरूनी समाज उसे अपनी जकड़न में कैद रखना चाहता है तो बाहरी समाज उसमें दुश्‍मन की छवि देख रहा है और अपने से दूर धकेल रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी खींचतान/तकलीफों / तनावों के बीच अपनी जिंदगी गुजार रही है। 

एक मुसलमान परिवार में पैदा होने वाले दो नौजवान भाई, संगीत के सरगम में खो जाना चाहते हैं। तो उनकी राह में एक ओर मजहबी पुरातनपंथी रोड़ा बनते हैं तो दूसरी ओर दुनिया भर चल रही 'आतंक के खिलाफ जंग' उनके ख्‍वाबों पर पानी फेरने को तैयार है। फिल्‍म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।  लेकिन फिल्‍म यही नहीं है। इसमें मोहब्‍बत है, गीत है और खुशनुमा संगीत भी पर कुछ भी बोझिल नहीं।

मुसलमान या इस्‍लाम कोई इकरंगा चीज नहीं है। इनमें भी कई परतें हैं। आमतौर पर बाहरी समाज या अंदरूनी समाज का पुरातनपंथी तबका और मीडिया उसे इकरंगा और अमानुष के रूप में ही पेश करना चाहता है। लेकिन परतों की बात कोई नहीं करता या करना नहीं चाहता। फिल्‍म इन परतों को सामने लाती है और उनके बीच के तनाव को दिखाती है।

इस फिल्‍म में एक और चीज खास है। इसका भारतीय कनेक्‍शन। नसीरूद्दीन शाह इस फिल्‍म में हैं। जैसा कि निर्देशक का कहना है कि जब यह रोल उन्‍होंने नसीरूद्दीन शाह को ऑफर किया तो पहले उन्‍होंने मना किया। फिर स्क्रिप्‍ट माँगी। और स्क्रिप्‍ट पढ़ने के बाद, बिना पैसे के ही काम करने को राजी हो गए। यानी उस रोल में जरूर कुछ खास था। जी!!!

नसीरूद्दीन शाह भी एक मजहबी आलिम हैं लेकिन मजहब का उदारवादी चेहरा। वह मजहब के आधार पर ही पुरातनपंथियों के तर्कों का जवाब देते हैं। यह मजहब की वह आवाज है, जो आमतौर पर पुरातनपंथियों के शोरगुल में दब जाती है या दबा दी जाती है।

फिल्‍म में संगीत, सिनेमाटोग्राफी, अभिनय, लोकेशन का चुनाव और सबसे बढ़कर निर्देशन लाजवाब है। मौका मिले तो इस फिल्‍म को जरूर देखा जाना चाहिए।

Comments

हाँ , नासिर भाई , यह फ़िल्म बिल्कुल अलग ही फ़िल्म सी है । मैने इसकी लगभग सभी किल्पिगं यू टूयूब पर देखी हैं । नसीरुदीन का उदार चेहरा काबिले तारीफ़ है ।
फिल्म के बारे इतनी सारी जानकारी देकर आपने फिल्म देखने की चाह को और बलवती कर दिया है। शुक्रिया।