प्रलय कभी बताकर नहीं आती (Flood in Bihar-1)

और बाढ़ इस बार भी हमेशा की तरह घंटी बज कर आयी हैDSCF9923

बिहार में आई तबाही पर  हिन्‍दुस्‍तान भागलपुर के स्‍थानीय सम्‍पादक   नागेन्‍द्र का यही कहना है। हिन्‍दुस्‍तान पिछले कुछ महीनों से लगातार लिख रहा था कि कोसी ने अपनी दिशा बदल दी है। तटबंध टूटने का खतरा है। अगर वक्‍त रहते नहीं चेता गया तो विनाश ही विनाश... (एनडीटीवी इंडिया पर रवीश ने भी इस पर रिपोर्ट की है) लेकिन जो होता आया है वही हुआ... किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगी और तबाही हम सब देख रहे हैं। नागेन्‍द्र ने यह टिप्‍पणी आज से 12 दिन पहले लिखी थी। हिन्‍दुस्‍तान से साभार उनकी यह टिप्‍पणी, ढाई आखर के पाठकों के लिए।

प्रलय कभी बताकर नहीं आती

और बाढ़ इस बार भी हमेशा की तरह घंटी बज कर आयी है

नागेन्‍द्र

हम फिर लौट पड़े अपनी पुरानी राह और गाने लगे ‘कोसी का शोक गीत’। हम यह भूल गए कि कोसी हर बार अपनी चाल बदलती है। कई बार अपनी राह बदल चुकी है। वह कितनी वेगवती है यह भी हमें पता है लेकिन हम इसे याद नहीं रखना चाहते। यह सब हर साल होता है। हम फिर कहते हैं कि कोसी फिर बनी बिहार का शोक गीत।

बाढ़ इस बार भी अपनी विनाशलीला के चरम पर पहुँची तो फिर शुरू हुआ हवाई सर्वेक्षण का विधि विधान। जमीनी सर्वेक्षण तो कभी होता नहीं। कोसी क्षेत्र की विनाशलीला देख राज प्रासाद में बैठने वालों को अचानक अहसास हुआ ‘बाढ़ नहीं यह प्रलय है’। वे शायद यह भूल गए कि प्रलय कभी बता कर नहीं आती। और जिस बाढ़ को वे प्रलय के रूप में देख रहे हैं वह हमेशा की तरह इस बार भी घंटी बजा-बजाकर आयी है।

याद कीजिए वह दिन जब कुसहा में तटबंध टूटा था। यह अचानक नहीं हुआ था। नेपाल के पास कुसहा में 12.01 किलोमीटर और 12.90 किलोमीटर पर दो स्पर थे जो 15 दिन से कट रहे थे। रखरखाव के अभाव में कमजोर हो चुके थे और कोसी का वेग इनके संभाले नहीं संभल रहा था। ये बांध को बाँधे रख पाने में सक्षम नहीं रह गए हैं यह भी अहसास सबको था।

अखबारों में खबरें भी छप चुकी थीं। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। और 15 दिन बाद अंतत: बांध ध्वस्त हो गया। 15 दिन का समय कम नहीं होता। पर्याप्त समय था जब हमारे इंजीनियर प्राण-पण से जुटते और इतने बोल्डर वहाँ ठोंक दिए जते कि यह नौबत नहीं आती। दरअसल आज कोसी क्षेत्र में दिखाई दे रही ‘प्रलय’ इसी लापरवाही की देन है। इसके लिए वह तंत्र जिम्मेदार है जिस पर इस तटबंध के रखरखाव की जिम्मेदारी थी और जिसे वह सही तरीके से नहीं निभा सका। एक बात और है, क्या कभी किसी ने इस पर नजर डाली कि कोसी क्षेत्र में देश के इस सबसे लंबे (डेढ़ सौ कि.मी.) तटबंध पर पिछले दो दशकों में कभी मिट्टी भी डाली गई। कभी इसे मजबूती देने की कोई अतिरिक्त कोशिश हुई। शायद इस बात का जवाब (यदि ईमानदारी से दिया जय) किसी के पास भी ‘नहीं’ ही होगा।

दरअसल बिहार की यह कहानी कोई नई नहीं है। 1984 से अब तक कितनी बार तो यह सब मेरी आँखों से गुजरा है और स्मृतियों में है। किसी को याद है 5 सितम्बर 1984 की वह रात जब नौहट्टा के समीप तटबंध टूटा था और ऐसा ही भयावह दृश्य उपस्थित हुआ था। बिहार में तब तक की यह तटबंध टूटने से हुई सबसे बड़ी तबाही थी। यह भविष्य के बिहार खासतौर से कोसी क्षेत्र के लिए खतरे की बहुत तेजी से बजी घंटी थी।

उस वक्त चन्द्रशेखर सिंह मुख्यमंत्री थे और कर्पूरी ठाकुर प्रतिपक्ष के नेता। सब मुख्यमंत्री के इस्तीफे की माँग कर रहे थे तो कर्पूरी ठाकुर का बहुत संयत बयान आया था। उन्होंने कहा था कि विनाशकारी बाढ़ के लिए सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। तटबंध काट दिया गया या कट गया, अहम सवाल यह भी नहीं है। पिछले लंबे समय से इस तटबंध के रखरखाव के लिए कुछ नहीं किया गया, सुरक्षा का कोई इंतजम नहीं किया गया। असल सवाल यही है।

दरअसल कोसी क्षेत्र के वर्तमान सच को भी कर्पूरी ठाकुर के इसी बयान के आलोक में देखने की जरूरत है। बिहार सरकार के कैलेण्डर को ही देखें तो 15 जून से 15 अक्टूबर (5 माह) का समय यहाँ बाढ़ से लड़ने का समय माना गया है। बाकी के सात महीने इस लड़ाई से तैयारी के होते हैं। लेकिन सच यही है कि लड़ाई के पाँच महीनों में हम शोकगीत गाते हैं, गाल बजाते हैं। बाकी के सात महीने पिकनिक पर उड़ाते हैं।

  वरना कोई कारण नहीं कि यदि अगली बार के लिए ही सही हम अभी से तैयारी करें तो कम से कम विनाशलीला का ग्राफ तो नीचे ला ही सकते हैं। अपने घर की नींव और चारदीवारी यानी तटबंधों की दरार और स्परों को मजबूती देने के लिए कुछ कर सकते हैं। इस वक्त भी जरूरत इस बात की है कि बाढ़ नेपाल से आयी या कहीं और से, इस बहस को छोड़कर वर्तमान संकट से मजबूती के साथ निबटा जए। विनाशलीला कम करने के प्रयास किए जाएँ।

सरकार अपनी ‘बाढ़’ और ‘विनाशलीला’ की परिभाषा को थोड़ा बदले। अपने अफसरों को कोई सख्त संदेश दे। उन अफसरों की गर्दन पकड़े जिनकी नाक के नीचे और आंख के सामने कुसहा का तटबंध अपनी कहानी बयाँ करता रहा, अंत में ध्वस्त हो गया। क्योंकि सबसे बड़ा सच यही है।

कोसी 120 साल बाद अपनी पुरानी जगह पर यदि लौटी है तो यह अप्रत्याशित नहीं है। इसके चाल और राह बदलने की आशंका तो हमेशा ही बनी रही है। यह तटबंध इसलिए नहीं टूटा कि भारी बारिश रोके नहीं रुकी। यह तो अपनी कमजोरी और तंत्र की अकर्मण्यता की भेंट चढ़ गया। उसे उसकी खुराक कभी मिली नहीं। मरहम-पट्टी कभी हुई नहीं।

कोसी ने तो बस अपनी पुरानी राह पायी है। इसलिए कहने का कोई अर्थ नहीं कि यह ‘बाढ़’ नहीं ‘प्रलय’ है। बाढ़ हर बार की तरह इस बार भी अपने नीयत समय पर अपनी पुरानी चाल-ढाल के साथ ही आयी है। और प्रलय कभी भी बताकर नहीं आती। प्रलय कभी सुनामी के रूप में आती है तो कभी ‘नरगिस’ जसे चक्रवात के रूप में, कभी भी-किसी भी वक्त।

Comments

Farid Khan said…
सबसे पहले तो नागेन्द्र जी को बधाई एक अच्छे लेख के लिए..... मैंने तकरीबन 10 सालों बाद उनका लिखा कुछ पढ़ा, बहुत अच्छा लगा।


सरकारी तंत्र की अच्छी ख़बर ली है आपने । इस देश में आने वाली हर मुसीबत आने के पहले संकेत दे देती है पर सरकारी तंत्र 'पिकनिक' के शोर में संकेत समझ नहीं पाता।
kuch achcha padane ko mila hai ...very nice
यदि गहराई से सोचा जाय तो यह मानना पड़ेगा कि इस विनाशलीला के सामने असहाय होने के पीछे सरकारी तन्त्र का भ्रष्ट आचरण एवं अकर्मण्यता ही है। इंजिनियरों को दुनिया भर का सर्वेक्षण-शास्त्र पढ़ाया जाता है; गणित पढ़ाया जाता है: आज की तारीख में शक्तिशाली कम्प्यूटर और साफ़्टवेयर उपलब्ध हैं जो बटन दबाते ही बाढ़ा का माडल प्रस्तुत कर सकते हैं - कहां पानी का स्तर कितना रहेगा; पानी का वेग क्या होगा; कौन से स्थान पहले डूबेंगे; कौन से स्थान सुरक्षित रह सकेंगे आदि। लेकिन इन सब के होते हुए भी हम असहाय हैं, यह विडम्बना ही है। बिहार में बार-बार बाढ़ देश की सिविल इंजीनियरिंग क्षमता पर भी कलंक है।
सरकारी तंत्र की नाकामी पर बहुत सही विशेलेषण किया है । सब कुछ संभव है अगर इच्छा शक्ति मे ईमानदारी हो , लेकिन वह दिखती ही कहाँ है ।
सही कहा..... यह प्रलय या सुनामी नहीं है ........ यह बाढ़ ही है ........ जो दस्तक देकर हमारे यहां पहुंची है............ अचानक नहीं आयी।