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मायावती की कहानी मायावती की जुबानी

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वे यहाँ रहने वाली हैं... आप पसंद करे या नापसंद... वे हकीकत हैं... देश की पहली दलित मुख्यमंत्री हैं... पहली महिला मुख्यमंत्री हैं, जो चार बार इस पद तक पहुँची... शायद पहली दलित और दूसरी महिला हों, जो देश की बागडोर भी सम्हाल लें। जी हाँ, बात उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुशी मायावती की हो रही है... पिछले दिनों अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘न्यूजवीक’ ने उन्हें विपरीत हालात में शिखर तक पहुँचने वाली योग्य महिलाओं की वैश्विक सूची में शुमार किया है। पत्रिका ने बहिन जी की कहानी, उन्हीं की जुबानी छापी है। हम ‘ढाई आखर’ के पाठकों के लिए इसे न्यूजवीक से अनुवाद कर इसे साभार यहाँ पेश कर रहे हैं। मैं यहां तक कैसे पहुँची मैं दिल्ली में रहने वाले एक दलित परिवार में पैदा हुई। आठ भाई-बहनों के साथ एक घनी आबादी और भीड़-भाड़ वाले मोहल्ले में पली बढ़ी। मेरे पिता क्लर्क थे और निहायत ही कम  वेतन पाते थे। मेरी अनपढ़ माँ,  परिवार को चलाने के लिए कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती थीं। अक्सर हम अपनी छुट्‌िटयाँ उत्तर प्रदेश की अपने पुश्तैनी गाँव में बिताया करते थे। इन्ह...

कहते हैं तुमको ईद मुबारक हो जानेमन

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त्‍योहार हो और नज़ीर की याद न आये मुमकिन नहीं। नज़ीर अकबराबादी ने जैसी शायरी की है, वो शायरी वही शख्‍स कर सकता है, जिसे हिन्‍दुस्‍तान की गंगा जमनी तहजीब की न सिर्फ समझ हो बल्कि जो इसमें पूरी तरह डूबा हुआ हो। अठाहरवीं सदी के शुरुआती दौर (सन् 1735) के इस शायर के बारे में, आप कितना जानते हैं, मुझे नहीं मालूम। ईद के खुशनुमा मौके पर ढाई आखर के लिए पाठकों के लिए पेश है नजीर की नज्‍म ईदुलफित्र। पढ़ें और ईद के माहौल का मज़ा लें। है आबिदों को ताअतो-तजरीद की खुशी। और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की खुशी। रिंद आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी। कुछ दिलबरों के वस्‍ल की कुछ दीद की खुशी। ऐसी न शब्‍बरात न बक़रीद की ख़ुशी। जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी। ( आबिद- उपासक, इबादत करने वाला, भक्‍त। ताअतो तजरीद - उपासना, आराधना, इबादत। ज़ाहिद- कर्मकाण्डियों। ज़ुहद - धार्मिक कृत्‍य, संयम। तमहीद - पालन। रिंद - रसिया, धार्मिक बंधनों से मुक्‍त। दिलबर- प्रेमपात्र। वस्‍ल- प्रेमी प्रेमिका का मिलन। दीद- दर्शन, दीदार।) रोज़े की ख़ुश्कियों से जो है ज़र्द-ज़र्द गाल। ख़ुश हो ग...

जगी इंसाफ की आस

उम्‍मीद जगी है। श्रावस्‍ती के धन्‍नीडीह की 50 महिलाओं को अपनी आवाज हाकिमों को सुनाने के लिए तीन महीने का इंतजार करना पड़ा। अपने साथ हुए जुल्‍म और यौन हिंसा की बात सुनाने के लिए इन औरतों को सड़क पर उतरना पड़ा था। इस आजाद मुल्‍क में चिल्‍ला-चिल्‍लाकर वो अपने से होने वाली जुल्‍म ओ ज्‍यादती का बयान कर रही थी, पर हाकिम उनकी बात नहीं सुन रहे थे। जब सब्र का बांध टूटा तो वे अपनी पहचान बताने में नहीं हिचकीं। फिर भी कुछ नहीं हुआ। सामाजिक संगठनों ने आवाज उठायी, वहां से लौटकर जांच रिपोर्ट दी। बम्‍बई से तीस्‍ता सीतलवाड आयीं। आखिरकार इन औरतों की तरफ से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। सीबीआई जांच का हुक्‍म देने की मांग की गयी। हाईकोर्ट के कडे रुख को देखते हुए श्रावस्‍ती पुलिस को आखिरकार मुकदमा दर्ज करना पड़ा। बलात्‍कार का मुकदमा। इस मुकदमे में मायावती सरकार के एक राज्‍यमंत्री ददन मिश्रा के भाई अशोक मिश्र समेत 35 लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है। जैसा की ढाई आखर में पहले एक पोस्‍ट में बताया गया था कि उत्‍तर प्रदेश के श्रावस्‍ती जिले में एक हिन्‍दू लड़की और मुसलमान लड़के के गायब हो जाने के...

चे- शहादत के चालीस साल

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दुनिया में बहुत कम लोग होते हैं, जो न सिर्फ अपने वक्त में बल्कि आने वाली कई पीढ़ियों की प्रेरणा की वजह बनते हैं। ऐसे लोग तो और भी कम हैं, जिन्होंने निजी जीवन की सुख सुविधाओं को तज कर गरीबों और मजलूमों के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी हो और उनके ख्यालात आज भी लोगों को जद्दोजहद करने के लिए प्रेरित करते हों। अर्नेस्टो चे ग्वेरा ऐसी ही शख्सियत हैं। चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रों के साथ क्यूबा की क्रांति के नायक थे। अमरीका की दबंगई के खिलाफ क्यूबा के डटे रहने की नींव चे ग्वेरा ने ही डाली थी। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जहाँ संघर्षशील नौजवान चे ग्वेरा से अपने आपने को जोड़ना पसंद न करते हों। चाहे मिस्र हो या अर्जेंटीना, पाकिस्तान, मलेशिया  या अपना हिन्दुस्तान या फिर विश्व सामाजिक मंच जैसा कोई प्रतिरोध जमावड़ा, चे ग्वेरा हर जगह नजर आते हैं। किसी के टीशर्ट पर तो किसी की टोपी पर... तो किसी के गले की लॉकेट में। कोई इन्हें फैशन में इस्तेमाल करता है तो किसी के लिए वो मजलूमों के लिए जद्दोजहद करने की याद दिलाने वाला चेहरा हैं। इसी चे ग्वेरा की नौ अक्तूबर को शहादत दिवस थी। चालीसवीं शहादत...

राम का 'दूसरा बनबास'

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राम के नाम पर अयोध्या में जो कुछ हुआ या उसके बाद पूरे देश में- क्या राम उससे खुश हुए होंगे। इस बात को बिना मर्यादा पुरुषोत्तम को समझे बिना, नहीं जाना जा सकता। कैफ़ी आज़मी ने इसे समझने की कोशिश की। कैफ़ी न सिर्फ बड़े शायर थे बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन के पुरोधा भी। कैफ़ी का जुड़ाव जिस ज़मीन से था, वो उस जगह की मिलीजुली संस्कृति के मज़बूत वारिस हैं। वह, हर उस परम्परा और संस्कृति को अपना मानते थे, जिसे आप हिन्दुस्‍तानी कह सकते हैं। राम उनके लिए इस संस्कृति और परम्‍परा की धरोहर हैं। वे राम के मर्म को समझते थे, तब ही उनकी कलम से 'दूसरा बनबास' जैसी कविता निकली। कैफ़ी ने राम के मन को समझा या नहीं, यह आप तय करें- दूसरा बनबास राम बनबास से लौट कर जब घर में आये याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा (रक्स- तांडव) छह दिसम्बर को सिरी राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये। जगमगाते थे जहां राम के कदमों के निशां प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां मोड़ नफ़रत के उसी राहगुजर में आये। धर्म क्या उनका है, क्या जात है,...

इमाम-ए-हिन्द हैं राम

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एक शख्स जिसे दुनिया इस्लामी चिंतक और दार्शनिक के रूप में जानती है। एक शख्स जिसे अपना हिन्दोस्तां, सारे जहां से अच्छा लगता था। वो शख्स एक ऐसे किरदार के बारे में कलम उठाता है जिसे दुनिया 'राम' के रूप में जानती है। इसमें उसका मज़हब या दीन का यकीन आड़े नहीं आता। उसने यह नज्म अपने को राष्ट्रवादी साबित करने के डर से भी नहीं लिखा। यह शख्स कोई और नहीं मोहम्मद इक़बाल हैं। जिन्होंने 'राम' नाम की महिमा का गान किया है। सबके अपने-अपने राम हैं, अगर यह कहा जाये तो शायद गलत न होगा। ...लेकिन 21 वीं शताब्दी में हिन्दुत्‍ववादी (हिन्दू मज़हब मानने वाले नहीं, बल्कि उसके नाम पर राजनीति करने वाले) राम की एक ही पहचान बनाने की जुगत में लगे हैं। उन्होंने यह भ्रम भी फैलाने का काम किया है कि राम का नाम उनकी ही वजह से बचा है और हिन्दू धर्म तो उनके बिना नेस्तनाबूत हो जायेगा। अपना भ्रम दूर करने के लिए हिन्दुत्‍ववादियों को 20 वीं सदी में लिखी इस नज्म को पर भी जरा गौर करना चाहिए। ख़ैर, वो गौर करें या नहीं, हम तो देखें ही इक़बाल की राम भक्ति। राम लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिन्द सब फ़लसफ़ी ह...

हमारे राम

(दोस्तो, तकनीकी कारणों से इसे दोबारा पोस्ट करना पड़ा। तकलीफ के लिए माफी।) राम के नाम पर एक बार फिर तनातनी ज़ारी है। हिन्‍दुत्‍ववादी अपने-अपने खोल से निकल आये हैं। हिन्‍दुत्‍ववादियों और हिन्‍दू मज़हब मानने वालों में फ़र्क़ है। हिन्‍दुत्‍व, एक राजनीतिक विचार है, जो दूसरे मज़हब वालों के साथ नफरत की बुनियाद पर टिका है। ठीक उसी तरह, जिस तरह तालीबानी एक राजनीतिक विचार है, और मज़हब उस विचार को फैलाने का महज़ एक सहारा। जिस तरह तालीबानी ही इस्‍लाम की नुमाइंदगी नहीं करते, उसी तरह हिन्‍दुत्‍ववादी, इस मुल्‍क के हिन्‍दू दर्शन के नुमांइदे नहीं हैं। महात्‍मा गांधी की तरह जो हिन्‍दू धर्म पर यकीन रखते हैं, उनके आचार-व्‍यवहार में नफ़रत की कोई जगह नहीं है। उनके लिए राम आराध्‍य हैं। नैतिकता के प्रतिमान। मर्यादा पुरुषोत्‍तम हैं। उनके लिए राम, सत्‍ता के गलियारों में पहुंचने का साध्‍य नहीं। न ही राम का नाम, उनके लिए नफ़रत की फ़सल बोने और काटने का ज़रिया है। हिन्‍दुस्‍तान में राम कथा, पर एकाधिकार भी किसी एक मज़हब का नहीं है। इस हिन्‍दुस्‍तान में खास तौर से उत्‍तर भारत में ऐसा शख्‍स मिलना मुश्किल है, जिस...